ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग इक्कीस (21)
भाग 21
प्रियंका
"हेलो प्यारी माँ।" मैंने शाश्वत को सुबह की दौड़ के कपड़े पहने रसोई में आते देखा। उसे अंशुमन की ही तरह सुबह दौड़ना पसंद था। मैं जल्दी उठ गई थी; दरअसल, मैं ठीक से सो नहीं पाई थी। इसलिए मैं उठ कर तैरने गई और दिन जल्दी शुरू करने का फैसला किया।
"सुप्रभात, बेबी। भूख लगी है?" उसने ‘न’ मेँ सिर हिलाया और नाश्ते के कोने में बैठ गया। "लेकिन एक कप कॉफी और थोड़ा संतरे का जूस पीने में कोई आपत्ति नहीं है।"
मुझे अपने परिवार की देखभाल करना बहुत पसंद था और यह मेरे लिए एक सपना सच होने जैसा था, कि मैं सनशाइन होम्स की रसोई में यह कर पा रही थी। मैंने उसके सामने उसकी पसंदीदा कम दूध वाली एक कप कॉफी और एक गिलास ताजा संतरे का जूस रख दिया। “तुम जानते हो न, संतरे के जूस के साथ कॉफी नहीं पीनी चाहिए?” मैं मुस्कराती हुई फिर से नाश्ते के पराँठों के लिए आटा सानने लगी। ताज़े गूँथे आटे के सिंकते पराँठों की खुशबू से बढ़कर कुछ नहीं। मुझे हमारे घर, और अब यहाँ भी, यह मधुर खुशबू अच्छी लगती है।
"माँ, क्या आपके पास बात करने का समय है?" शाश्वत ने विनम्रता से पूछा।
"किसी भी समय, बेटा।" मैंने मुस्कराते हुए उसे शर्मीली नज़र से देखा। "बस मुझे इन्हें सेंकने को पाँच मिनट दो, और फिर मैं पूरी तरह से तुम्हारी बात सुन पाऊँगी।" मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा। मैं इस बात से घबरा रही थी कि वह क्या कहने वाला है। क्या वह कहेगा कि मैं एक बहुत खराब माँ रही हूँ? मेरा सबसे बड़ा डर यह था कि मुझ पर इसका आरोप लगाएगा। या कि मैं एक बुरी पत्नी हूँ। और आखिरकार, अगर वह ऐसा कहता भी है, तो वह गलत नहीं होगा। आखिर मैं अपने संघर्षों के बारे में कोई बात किए बिना घर से भाग गई थी न? मैं एक कप ब्लैक कॉफी लेकर शाश्वत के सामने बैठ गई।
जैसे ही मैंने अपनी कॉफी टेबल पर रखी, मेरे बेटे ने मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए, जिससे मैं हैरान रह गई। "माँ, मुझे माफ कर दो प्लीज। मुझे बहुत खेद है।"
मैंने आँसू पोंछे। "क्यों, बेबी? तुम्हारे पास माफी मांगने को तो कुछ भी नहीं है-"
"है माँ। मैं जानता हूँ," उसने बीच में ही टोका। "आप एक असाधारण महिला हो। देखो न, आप इस रिसॉर्ट को कैसे चलाती हो; आप ने घर पर भी तो हमेशा यह सुनिश्चित किया कि हमारे घर में वह सब कुछ हो जो हम चाहते थे। हमारे दोस्त हमारे यहाँ आना पसंद करते थे क्योंकि आप सब का इतना ख्याल रखती थी। मैं ......” उसने बोलना बंद कर दिया, और उसकी आँखों में आँसू भर आए जिससे मेरा दिल दुखने लगा "माँ मैं जानता हूँ मैंने.... मैंने आपके साथ बुरा व्यवहार किया है। हमेशा... हमेशा आपको छोटा महसूस कराता, यह कहकर कि.... कि आप कभी यूनिवर्सिटी नहीं गईं। और.... और ..."
"नहीं," मैंने विरोध किया, हमारे हाथ उलझे हुए थे, इसलिए अब मैं उसका हाथ पकड़ सकती थी। "मुझे उच्च शिक्षित न होने की हीन भावना तो है ही। यह तुम पर नहीं है। और —"
"मैं थेरेपी के लिए गया, माँ।" वह फीकी मुस्कान के साथ बोला। "मैं आपके साथ बहुत बुरा व्यवहार करता रहा हूँ। यह मत कहना कि मैंने नहीं किया, क्योंकि यह झूठ होगा।"
मैं अपने बेटे के अतीत को उजागर करके उसे दुख नहीं पहुँचाना चाहती थी, लेकिन वह सही था; मुझे उसके साथ ईमानदार होना था। मैंने अपनी सच्चाई न बताकर खुद पर यह सब लाद लिया था। "हाँ, बेटा, मैं झूठ नहीं बोलूँगी। मुझे बहुत दुख पहुँचता था जब तुमने मेरा मजाक उड़ाते। कि मैंने कोई उद्धरण गलत दिया था, या किसी ऐसी बात के बारे में बात की थी जिसके बारे में तुमने सोचा था कि मुझे उस पर चर्चा करने का अधिकार नहीं है।"
यह ऐसा था जैसे मैं अपनी छाती को चीरकर उसे अंदर देखने दे रही और चोट, घाव, सब कुछ देखने दे रही हूँ। मैंने उसके हाथ छोड़ दिए। ये बातें कहना बहुत मुश्किल था। तब तो और भी मुश्किल, जब मैं उसे छू रही थी। मैं उसे दिलासा देने के अलावा और कुछ नहीं चाहती थी। "यह जानकर दुख होता था कि मेरे बच्चे मेरा सम्मान नहीं करते।" मैंने अंशुमन का ज़िक्र नहीं किया, क्योंकि मैं बच्चों के सामने उसके बारे में कभी बुरा नहीं बोलूँगी।
उसने सिर हिलाया। "मुझे पता है। मैं आपका सम्मान नहीं करता था, माँ, लेकिन...यह मेरी गलती है, आपकी नहीं। असल मेँ मैं - मैं अपनी पढ़ाई मेँ संघर्ष कर रहा हूँ।"
"क्या?" उसने सिर हिलाया और मुझे आत्म-हीनता से भरी आधी मुस्कान दी। "मैं पढ़ाई में संघर्ष कर रहा हूँ। पढ़ाई जितना मैंने सोचा था उससे कहीं ज़्यादा कठिन थी, और मुझे खुद पर शर्म आ रही थी। .... मैंने पापा को नहीं बताया क्योंकि वे एक होशियार आर्किटेक्ट हैं। मुझे नहीं लगता कि मैं कभी इतना अच्छा बन पाऊँगा। नीलिमा डॉक्टर बनने वाली है। इसलिए, खुद को बेहतर महसूस कराने का एकमात्र तरीका था...कि ... कि.... मुझे बहुत खेद है माँ। ... खुद को बेहतर महसूस कराने का एकमात्र तरीका था कि परिवार में कोई और मुझसे भी नीचे हो, ताकि मैं सबसे पीछे न रहूँ।" उसकी ईमानदारी आश्चर्यजनक थी। यह स्पष्ट था कि वह थेरेपी के लिए गया था, मैंने कुछ राहत के साथ सोचा। थेरेपी ने मेरे लिए बहुत बड़ा बदलाव किया था, और मुझे पता था कि इससे उसे मदद मिलेगी।
"किस समस्या से जूझ रहे हो?" मैंने पूछा। वह तीखी हंसी हंसा। "मैंने आपको इतनी चोट पहुंचाई, और आप अभी भी जानना चाहती हो कि मुझे क्या परेशान कर रहा है? माँ क्या आप नहीं देख सकती कि आप कितनी अद्भुत हो? आप बहुत उदार हो, माँ, और मैं लोगों को उनकी अच्छाई के बजाय उनकी शिक्षा और पैसे के आधार पर आंक रहा था। लेकिन आप? आप हम में से सबसे अच्छी हो। आप स्वेच्छा से काम करती हो, हमेशा सबके लिए मौजूद रहती हो। अरे माँ, आप तो बुआ, चाची और यहाँ तक कि दादी के साथ भी विनम्र रहती थीं, जबकि वह आपके साथ बहुत कमीनी थीं।" ये वो शब्द थे जो मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं अपने बच्चों या पति से सुनूँगी। मैंने कभी नहीं सोचा था कि किसी ने भी इस बात पर ध्यान दिया होगा कि मैंने क्या किया, और एक अच्छी माँ और पत्नी बनने के लिए मैंने कितनी मेहनत की। सच तो यह था कि उसने मेरे दिल को थोड़ा हल्का कर दिया था।
"अपनी दादी को ऐसे मत कहो," मैंने धीरे से डांटा।
"वह एक .... थीं" वह बुदबुदाते हुए बोला। "कोई बात नहीं, शाश्वत।" मैंने उसके हाथों पर हाथ रखा। "तुम मेरे बेटे हो, और मैं तुमसे बिना किसी शर्त के प्यार करती हूँ। यह कभी नहीं बदलेगा।" मैंने हल्के से हँसते हुए कहा, अपने लहज़े में मज़ाक करते हुए, "हो सकता है कि ‘पसंद’ समय-समय पर बढ़ती घटती हो, लेकिन मेरा प्यार कभी नहीं घट सकता।"
वह मुस्कराया। "मैं भी आपसे प्यार करता हूँ, माँ। और मुझे बहुत खेद है। मैं वादा करता हूँ कि मैं आपके साथ हर दिन बेहतर बनूँगा, हर दिन।" अब वह एक साफ-सुथरी हंसी हंसा। "हाँ, माँ। मैं आपके सामने भाषा को शालीन रखूँगा।" फिर वह संभला। "आपने ही हमें बड़ा किया है, हमें सही और गलत के बीच का अंतर सिखाया, और फिर भी मैंने बहुत बड़ी गलती की। मुझे इसके लिए खेद है।" मैंने उसका हाथ थपथपाया। "जाने दो शाश्वत। मैं तो भुला भी दिया है। हम आगे देखते हैं, ठीक है? पीछे के बजाय आगे देखने के लिए बहुत कुछ है।"
"मुझे अपने आप को माफ करने में समय लगेगा कि मैं आपके साथ क्या बन गया था, और मैं कभी भी दोषी महसूस करना बंद नहीं करूंगा, लेकिन आखिरकार मैं इसे पीछे छोड़ दूंगा, लेकिन इसके लिए समय लगेगा।"
"जितना समय चाहिए ले लो बेटा। मैं कहीं नहीं जा रही हूँ।" उसने अपनी भौंह उठाई और हाथ घुमा कर याद दिलाया कि हम किस घर में हैं, मैं पहले ही जा चुकी हूँ। मैं हंस पड़ी। "ठीक है, कम से कम भावनात्मक रूप से तो नहीं जा रही।"
"क्या आपको यहाँ रहना पसंद है?" उसने पूछा।
"बहुत ज़्यादा। मुझे यह द्वीप, यह घर बहुत पसंद है। श्रेया... वह रिज़ॉर्ट मेरे लिए छोड़ रही है। सब कागजात साफ़-साफ़ हैं तो चिंता की कोई बात नहीं है।"
"आप... आह... आप यहाँ ही रहना चाहती हैं?"
"हाँ, मैं इस जगह को चलाना चाहती हूँ. मैं इसमें अच्छी भी हूँ। मैं श्रेया की किताबों का ख्याल सालों से रख रही हूँ. उसकी वेबसाइट, बुकिंग और बाकी सब संभालती रही हूँ," मैंने रसोई के चारों ओर और बड़ी खिड़कियों से उगते हुए दिन को देखा. "मुझे यहाँ शांति मिलती है। मुझे जीविकोपार्जन और स्वतंत्र होने का विचार पसंद है।"
शाश्वत ने बताया, "माँ, पैसा तो पापा के पास बहुत है।"
मैंने गहरी साँस ली और कहा, "यह तुम्हारे पापा का पैसा है, शाश्वत, मेरा नहीं।"
"यह क्या बात हुई? यह सब आपका ही पैसा है। आपकी शादी को बीस साल हो गए हैं।"
"और हमारे विवाह-पूर्व समझौते में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि अगर मैं छोड़ जाऊँ, तो मुझे कुछ नहीं मिलेगा। और मुझे इससे कोई परेशानी भी नहीं है। मुझे कुछ नहीं चाहिए। मेरे पास तुम और नीलिमा हैं; मुझे और क्या चाहिए?" इस बातचीत से असहज महसूस करते हुए, मैं उठकर रसोई मेँ दूसरी ओर चली गई।
"माँ, पापा आपको निश्चित ही पैसे देंगे," शाश्वत ने विश्वास से कहा। मैंने कल रात फ्रिज में रखा दही का बड़ा कटोरा निकाला। मैं अपना दही खुद बनाती थी, मलाईदार। यह दुकान से खरीदे गए दही से बेहतर था, और मेहमानों को बहुत पसंद था। "माँ?" शाश्वत ने पूछा।
"प्रिय, कुछ बातें तुम्हारे पापा और मेरे बीच हैं, ठीक है? बस इतना जान लो कि मेरा ख्याल रखा जाएगा चाहे कुछ भी हो। तुम्हारे पापा और मैं दोनों ही तुमसे बिना किसी शर्त के प्यार करते हैं, चाहे हमारी वैवाहिक स्थिति कुछ भी हो।"
शाश्वत ने सिर झुका लिया, "आप सचमुच पापा को छोड़ दोगी माँ?"
"मैंने पहले ही छोड़ चुकी हूँ, शाश्वत," मैंने उसे याद दिलाया। "मैं उस जीवन में वापस नहीं जाने वाली हूँ। मैं... मुझे नहीं पता कि मुझे इस बारे में तुमसे बात करनी चाहिए या नहीं। यह तुम्हारा, इस उम्र का, बोझ नहीं है।" .....
"लेकिन मैं जानना चाहता हूँ," शाश्वत ने जोर देकर कहा।
मैंने दही के कटोरे में थोड़ी गाढ़ी मलाई डाली और उसे धीरे-धीरे फेंटना शुरू किया। "जब सभी घर पर थे, तो सब ठीक था, अच्छा भी, कभी-कभी बढ़िया भी। बस उतार-चढ़ाव आते रहते थे। लेकिन उसके बाद, मुझे ऐसा लगा कि मैं गायब हो रही हूँ, अदृश्य सी।"
"पापा ने मुझे बताया कि जब हम घर पर होते थे, तो वे हमेशा रात के खाने के लिए आते थे, लेकिन हमारे जाने के बाद वे अधिक से अधिक घंटों तक काम करने लगे।" मैंने भौंहें उठाईं। अंशुमन कभी किसी से अपनी भावनाओं के बारे में बात नहीं करता था। शाश्वत मुस्कराया। "कल जब हम यहाँ आये तो हमारी काफी लंबी बातचीत हुई। पापा जानते हैं कि उन्होंने बहुत बड़ी गलती की है। कि उन्होंने आपको बहुत अकेला महसूस कराया है।"
"कोई भी आपके साथ ऐसा नहीं कर सकता; यह आप खुद के साथ करते हैं," मैंने झट से कहा। जैसे ही अंशुमन का नाम बातचीत में शामिल हुआ, मेरी शांति और ठंडक गर्म तवे पर पड़े पानी की तरह वाष्पित हो गई। "क्योंकि तुम उससे नाराज हो, प्रियंका। उससे बहुत नाराज हो और यह उचित भी है," डॉ. मिश्रा ने हमारे नवीनतम टेलीथेरेपी सत्र में कहा था।
मैंने आपत्ति जताते हुए कहा था, "मैं क्रोध को अपने अंदर नहीं रखती। मैं ऐसी नहीं हूं।"
“प्रियंका, हम सब ऐसे ही हैं। हो सकता है कि आपके पति ने कोई गलत काम न किया हो, लेकिन उन्होंने जो किया, वह आपको अपने साथ विश्वासघात जैसा लगता है। ऐसा, जैसे उन्होंने आपकी शादी मेँ हर कदम पर आपको अकेला छोड़ दिया, और आपने अकेले ही सभी समझौते किए। आपने एक अच्छी पत्नी बनने के लिए कड़ी मेहनत की, लेकिन आपकी नज़र में उन्होंने एक अच्छा पति बनने के लिए कुछ नहीं किया।"
"वह अधिकांश समय एक अच्छे पति थे," मैंने बचाव करते हुए कहा।
"कोई भी व्यक्ति पूरी तरह से अच्छा या बुरा नहीं होता, प्रियंका। यह ज़रूरतों को पूरा करने के बारे में है। जब से बच्चे चले गए, आपकी ज़रूरतें बदल गईं, और उनकी भी। आप अभी भी उसकी ज़रूरतें पूरी कर रही हैं, लेकिन वह आपकी ज़रूरतें पूरी नहीं कर रहे हैं, और जब तक आप खुद उन्हें नहीं बताएंगी, तब तक उन्हें यह पता नहीं चलेगा।"
"लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है, है न?"
"लोगों को यह बताने में कभी देर नहीं होती कि आप उनकी परवाह करते हैं और वे आप पर क्या प्रभाव डालते हैं। चाहे आपकी शादी में कुछ भी हो, आप दोनों को एक-दूसरे से ईमानदारी से बात करनी चाहिए।"
लेकिन मैंने बात नहीं की थी। मैं जानती थी कि बात करने पर वह मुझे नजरअंदाज कर देगा और मुझे और चोट लगेगी। मैं एक कायर की तरह बिना बात किए निकल पड़ी थी। यदि मैंने बात की होती तो? क्या हुआ होता? क्या वह समझता? क्या हमारी शादी किसी और मोड पर खड़ी होती? उसने उस दिन फोन पर जैसे मुझसे बात की थी उससे तो नहीं लगता। लेकिन फिर वह यहाँ भी तो आया है न? यह भी तो वही है न? उफ्फ़, अनंत प्रश्न चिन्ह थे। लेकिन ......
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