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शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग उन्नीस (19)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग उन्नीस (19)



भाग 19

प्रियंका




"मैं यहाँ मर रही हूँ, और तुम मुझसे लड़ना चाहती हो?" श्रेया ने मुस्कराते हुए कहा।

"मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि तुम अपने कैंसर का इस तरह से इस्तेमाल कर रही हो," मैं चिढ़ कर बोली।

"ऐ लड़की, अगर मैं अभी इसका इस्तेमाल नहीं कर सकती, तो इसका फायदा क्या? मैं मरने के बाद भी तो इसका इस्तेमाल नहीं कर पाऊँगी न!" श्रेया ने हँसते हुए कहा। वह चिमनी के पास पुदीने की चाय का प्याला लिए कुर्सी पर बैठी थी, खिड़की की तरफ मुँह करके अंधेरे में देख रही थी जहाँ लहरों का सफ़ेद झाग रात में घूमते बादलों की तरह लग रहा था।

"तुमने अंशुमन से मेरे पीछे से बात की," मैंने आरोप लगाया। उसने हाँ मेँ सिर हिलाया। "उसने मुझे फ़ोन किया था। विनती की कि मैं उसे अपनी गलती सुधारने का मौक़ा दूँ।"

मैंने भौंहें चढ़ाईं। "विनती? श्रेया, मजाक मत करो, वह विनती का मतलब भी नहीं जानता।" उसने नाक भौंह सिकोड़ी। "क्रूर हो रही हो तुम। मेरी बात सुनो, वह रो रहा था फोन पर। तुम चाहती क्या हो? जानती हो न, मैं मौत के करीब होने से नर्म-दिल हो गई हूँ।"

"हे भगवान, हम फिर से मौत की बात पर आ गए," मैं बुदबुदाई।

श्रेया ने चाय की चुस्की ली। "मैं चाहती थी कि दीपावली पर तुम्हारा परिवार तुम्हारे साथ रहे। सिर्फ़ नीलिमा ही नहीं; मैं चाहती थी कि शाश्वत और अंशुमन भी यहाँ हों। और मैं उनसे मिलना भी चाहती थी। जानती हो न... मरने से पहले।" मैंने आँखें घुमाईं, लेकिन वह सही थी; मैं उससे नाराज़ नहीं हो सकती थी। वह मर रही थी, और सच कहूँ तो, यह जानकर मेरा दिल थोड़ा हल्का हो गया कि मेरी शादी टूटने के बाद इस पहले साल, हम दीपावली पर साथ हैं। उन्हें यहाँ, सनशाइन होम्स में पाकर अच्छा लग रहा था। शुक्र है कि मैंने उस दिन शाश्वत और अंशुमन के लिए भी उपहार खरीद लिए थे।

जब अंशुमन ने लोगों को घर पर बुलाना शुरू किया था, तब मैंने केटरिंग की क्लास शुरू की थी, ताकि मैं सीख सकूँ कि एक अच्छी मेजबान कैसे बना जाता है। इसमें मैं अच्छी थी, और अब उसी के कारण मैं यहाँ मेहमानों के लिए मेजबान की भूमिका निभा रही थी जिसमें मैं खुश थी। खासकर इसलिए, क्योंकि अब मैं यहाँ थी और मैं रिज़ॉर्ट के रेस्तरां मेँ कॉकटेल और मार्टीनी के लिए अच्छी खासी फीस लेती थी। ड्रिंक लेने के लिए यहाँ बहुत ज़्यादा जगहें नहीं थीं, और श्रेया के पास शराब का लाइसेंस था। आय का यह नया स्रोत खोलकर हमें बड़ी खुशी हुई थी। श्रेया रोमांचित होने के साथ-साथ खुश भी थी। "बढ़िया खाना और शानदार पेय! ए लड़की, तुम मेरे रिज़ॉर्ट को प्रसिद्ध बना दोगी। मुझे पता है।" उसने चाय का प्याला साइड टेबल पर रख दिया "उसे फिर से देखना कैसा लगा?"

"मुझे बहुत ख़ुशी है कि शाश्वत—"

"मैं जानती हूँ कि बेटे को देखकर कैसा लगा होगा लड़की। मैं अंशुमन की बात कर रही हूँ।" मैं समझ गई थी कि वह किसके बारे में बात कर रही थी। मैंने घड़ी की ओर देखा और वह मुझ पर गुर्राई। "क्या?" मैंने मासूमियत से पूछा, "खाना एक घंटे में -- ।"

"प्रियंका?"

"हाँ-हाँ। यह अच्छा था, ठीक है। बहुत अच्छा। उसकी खुशबू अच्छी है।"

श्रेया हंस पड़ी, "क्या? उसकी खुशबू अच्छी है? "

मैं आह भर कर कुर्सी पर लेट गई। "उसकी खुशबू हमेशा बहुत अच्छी होती है। उसका इत्र” मैंने कश लेने का अभिनय किया, “दिव्य है।”

"सूँघना बंद करो," श्रेया ने हँसते हुए कहा। मैं संयत हो गई। "श्रेया, मुझे गुस्सा आ गया और मैंने कुछ ऐसा बोल दिया जो मैंने कभी किसी को नहीं बताया... सिवाय मेरे मनोचिकित्सक को।" मैंने चिमनी की तरफ देखा और अपने सीने में वही जानी-पहचानी जलन महसूस की, जब मुझे याद आया कि अंशुमन ने अपने भाई से क्या कहा था, जब उसे नहीं पता था कि मैं सुन रही हूँ। "यह कुछ साल पहले की बात है। यह रक्षित का जन्मदिन था। वह और अंशुमन, रक्षित और देविका के बगीचे के सिट-आउट मेँ बैठे सिगार पी रहे थे।"

"वही सिट-आउट जिसकी कीमत सोलह लाख रुपये थी?" श्रेया ने व्यंग्यात्मक लहजे में पूछा।

"हाँ।" मैंने तब उसे बताया था कि कैसे देविका उस महँगे घर के बारे में चुप नहीं रह सकती थी। उस शाम मैं बगीचे में घूम रही थी, अंदर के लोगों से परेशान। रक्षित और अंशुमन ने मुझे नहीं देखा था। मैं बिना किसी से बात किए चुपके से निकल जाना चाहती थी। मैं बस अंशुमन के दिखावटी अमीर दोस्तों और परिवार से पीछा छुड़ाना कर घर जाना चाहती थी। श्रीमती राव-सिन्हा अंदर थीं, और जब दूसरे लोग आस-पास हों तो मैं उनसे दूर रहने की कोशिश करती थी। इसलिए नहीं कि वह दर्शकों के सामने दुष्टता करती हों, बल्कि इसके विपरीत। वह बहुत ज़्यादा विनम्र हो जातीं, "देखो मैं झोंपड़-पट्टी की लड़की के साथ कितनी अच्छी हूँ" के तरीके से विनम्रता का दिखावा करती थीं। इससे मेरी रूह काँप उठती थी।

"मैं बूढ़ा हो रहा हूँ," रक्षित ने धुआँ छोड़ते हुए शिकायत की।

अंशुमन ने अपने सिगार का एक कश लिया। वह धूम्रपान करता तो था, लेकिन बहुत कम, और मैं ऐसी पत्नी नहीं थी जो उसके खाने, पीने या धूम्रपान के बारे में उसे परेशान करती। वह एक वयस्क व्यक्ति था, और वह जो चाहे कर सकता था। मैं चाहती थी कि मुझे भी यह स्वतंत्रता मिले। मेरी सास का व्यवहार हमेशा क्रूर होता था, जिसे मैं संभाल सकती थी, लेकिन फिर यदि अंशुमन भी उनके साथ शामिल हो जाता था, उनसे सहमत होता था, और इससे मैं टूट जाती थी। श्रीमती राव-सिन्हा के रडार पर रहने की तुलना में उनसे दूर रहना आसान था, जो मैंने वर्षों के अनुभव के बाद कुशलता से सीख लिया था।

"मैं तुमसे उम्र मेँ बड़ा हूँ, कमीने," अंशुमन ने हँसते हुए विरोध किया।

"मैं अपने जीवन के बारे में सोच रहा हूँ। उम्र सिर्फ वर्षों मेँ नहीं बढ़ती भाई! तुम्हारे पास जो है, तुम्हारी उम्र नहीं बढ़ती। वह मेरे पास नहीं। मैं बस बूढ़ा होता जा रहा हूँ, और मुझे आश्चर्य है कि क्या मेरे पास कभी वह होगा जो तुम्हारे पास है।"

"मतलब?" अंशुमन ने पूछा। "तुम्हारी पत्नी का निश्छल प्यार। देविका मुझसे प्यार नहीं करती, अंशुमन...." अंशुमन ने असहमति की आवाज़ निकाली। "हाँ अंशुमन। उसे ‘मिसेज राव-सिन्हा’ बनना तो पसंद है, लेकिन मुझसे प्यार नहीं है," उसने दोहराया और फिर कहा, "वैसे नहीं जैसे प्रियंका तुमसे प्यार करती है।" मैं चुप थी, मेरा दिल तेजी से धड़क रहा था।

"हाँ, मैं भाग्यशाली आदमी हूँ," अंशुमन ने धीरे से कहा। मुझे पता था कि उसने शराब पी रखी थी। वह पूरी तरह नशे में नहीं था, लेकिन काफी नशे में था। मैं मुस्कराई। हे भगवान। अंशुमन ने कहा कि वह मेरे साथ होने के लिए भाग्यशाली है। रक्षित ने आगे कहा, "मैं पहले प्रियंका को पसंद नहीं करता था, लेकिन अब मैं देख सकता हूं कि वह तुम्हारा और बच्चों का कितना अच्छा ख्याल रखती है।"

"हाँ वह ख्याल करती है।" अंशुमन ने धुएं के छल्ले छोड़े। "उसे कभी सिरदर्द नहीं होता और वह किसी भी तरह से मेरे सेक्स सुख के लिए तैयार रहती है, जैसा भी मैं चाहता हूँ।"

"अंशुमन, तुम क्रूर हो। बेहद अमीर घर के भाग्यशाली पुत्र।" रक्षित ने आह भरी।

"श्रेया, मुझे जैसे लकवा मार गया था। मैं कुछ देर तक हिल तक नहीं पाई थी; जैसे मेरे परों मेँ पाला पड़ गया हो। रक्षित ने कहा कि मैं उसका ख्याल रखती हूँ, और अंशुमन का जवाब था कि मैंने उसके साथ कैसे-कैसे सेक्स संबंध बनाए हैं।" मैं अभी भी उस अपमान को महसूस कर सकती थी जो तब महसूस किया था। "वह नशे में था, प्रियंका।"

"मुझे पता है, लेकिन उसने ऐसा सोचा था, तब ही तो कहा? है न?"

“उसे दोष नहीं दिया जा सकता। तुम हो ही इतनी सेक्सी" श्रेया ने हँसते हुए कहा और खाँसने लगी। मैंने उसकी पीठ थपथपाई और खांसी गुज़रने का इंतज़ार किया। उसके बाद, वह लगभग गिर ही पड़ी, उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं। "उफ्फ़ .... मुझे ऐसे जीना पसंद नहीं, प्रियंका।"

"मुझे पता है, प्रिये।"

उसने मेरी ओर देखा, "अब ज़्यादा समय नहीं बचा है न?" मेरी आँखों में आँसू भर आए। मैंने सिर हिलाया। मैं क्या कह सकती थी? मत जाओ, यहीं रहो? मुझे पता है कि तुम दर्द में हो, लेकिन कृपया मुझे मत छोड़ो। तुम मेरा परिवार हो, एकमात्र व्यक्ति जो मुझे बिना किसी शर्त के प्यार करता हो। ओह, श्रेया, मैं तुम्हारे बिना कैसे रह पाऊंगी? मुझे पता था कि मैं ऐसा कुछ नहीं कह सकती। यह उचित नहीं होता, इसलिए मैंने फीकी मुस्कान दी। "अब तुम आराम करो, और फिर हमारे साथ डिनर करना।" इससे पहले कि वह विरोध कर पाती, मैंने आगे कहा, "कुछ खा लो, और शाश्वत से मिल लो।"

"ठीक है, मेरी प्यारी लड़की। मैं थोड़ी देर की झपकी ले लूँगी।"

"बिस्तर पर ले जाऊँ?"

उसने अपना न मेँ सिर हिलाया, और मैंने उसे ओट्टोमन पर पैर रखकर लेटने में मदद की। मैंने उस पर एक कंबल डाला और देखा कि वह सो गई थी। मैं उसके कमरे से बाहर निकली तो देखा कि अंशुमन लाउंज में एक पेंटिंग देख रहा था। "हमारे घर पर इस कलाकार की कलाकृतियाँ हैं," मुझे देख कर उसने कहा।

मैंने सिर हिलाया "यह लक्षद्वीप का एक स्थानीय कलाकार है. मुझे उसके लैंडस्केप से प्यार हो गया है"

"श्रेया कैसी है?" उसने पूछा। वह जींस और गहरे नीले रंग के कश्मीरी स्वेटर में अच्छा लग रहा था, जिससे उसकी आँखें और भी गहरी हो गई थीं। मैंने कुछ सालों पहले दीपावली पर उसके लिए वह स्वेटर खरीदा था। "वह आराम कर रही है, लेकिन मुझे लगता है कि वह रात के खाने के लिए तैयार हो जाएगी।"

"प्रियंका, मैं---"

"मिस प्रियंका," किसी ने मुझे पुकारा, और मैं उस युवा जोड़े का अभिवादन करने के लिए मुड़ी जो रिज़ॉर्ट में दीपावली के दिन तक के लिए ठहरे हुए थे। वे उत्तर भारत से थे, उन्होंने लक्षद्वीप आने का फैसला इसलिए किया क्योंकि मैंने यह विज्ञापन दिया था कि हम रिज़ॉर्ट में एक परिवार की तरह दीपावली कैसे मनाते हैं।

"हाय इंद्र, हे गीतिका। तट पर सैर कैसी रही?" वे प्यार में डूबे हुए थे। इंद्र एक सुंदर युवक था और हमेशा अपनी गीतिका का हाथ थामे रहना चाहता था। गीतिका मुखर और जीवन से भरपूर थी। वे पिछली रात आए थे और नाश्ते के दौरान अपने बारे में कहानियाँ सुना रहे थे तो बड़ा मजा आया था। "बहुत ठंड थी, लेकिन बहुत मज़ा आया।" गीतिका ने अपने हाथ आपस में रगड़े। "हमने एक व्हेल भी देखी, मिस प्रियंका," इंद्र ने उत्साह से कहा।

गीतिका ने मुझे बताया, "फिर हम रस्टी नेल गए और कुछ गर्म कॉफी पी। क्योंकि मेरे हाथ पूरी तरह से जम गए थे।" उन दोनों को एहसास हुआ कि हम अकेले नहीं थे और उन्होंने अंशुमन की तरफ देखा। वह उनके पास आया और अपना हाथ आगे बढ़ाया। "हाय, मैं अंशुमन राव-सिन्हा, प्रियंका का पति हूँ।" मुझे गुस्सा आया कि उसने अपना यह परिचय दिया। ‘भगवान के लिए, प्रियंका, कानूनी तौर पर हम अभी भी पति-पत्नी हैं’ मैंने अपने आप को डाँटा। लेकिन सच तो यह था कि भले ही मुझे गुस्सा आया, लेकिन यह सुनकर मुझे खुशी भी हुई कि वह खुद को मेरा पति कह कर संबोधित कर रहा है।

"अरे वाह। हमें नहीं पता था कि आप भी आ रहे हैं। मिस प्रियंका ने यही कहा था कि उनकी बेटी आने वाली है," गीतिका ने चहकते हुए कहा। सभी ने हाथ मिलाया और परिचय हुए। मैंने अपने हाथ अपनी जींस पर पोंछे क्योंकि ठंड के बावजूद वे पसीने से चिपचिपे थे। अंशुमन यहाँ था। इसका क्या मतलब था? और इसका कि वह छह महीने यहाँ है? वह आदमी जो एक सप्ताहांत की छुट्टी लेकर छोटी छुट्टी पर नहीं जाता था, वह पूरे छह महीने की छुट्टी ले रहा था। "मैं खाना देखने जा रही हूँ।" मैं आगे बढ़ने ही वाली थी, कि मैं रुक गई, न जाने क्यों, और कहा, "अंशुमन, क्या तुम इंद्र और गीतिका के लिए कुछ ड्रिंक्स बना सकते हो?" उसने मेरी ओर देखा, पहले आश्चर्य से और फिर कृतज्ञता से। "हाँ, बिल्कुल।"

"लिविंग रूम में पूरी तरह से भरा हुआ बार है।" मैंने मुख्य लिविंग एरिया की ओर हाथ हिलाया। "हाँ, जरूर।" वह लगभग खुश दिख रहा था, और मुझे खुद पर ही बुरा लगा। क्या मैं उसे बहका रही थी, उससे कह रही थी कि वह मेहमानों की वैसे ही देखभाल करे जैसे हम घर पर करते हैं? या मैं खुद को गुमराह कर रही थी?

अरे, किसके पास समय है यह सब सोचने समझने का? मैंने राजमा भिगो रखा था, खाना बनाना था।

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