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सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग सत्तरह (17)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग सत्तरह (17)

 


भाग 17

प्रियंका




मैं अपनी खुशी रोक नहीं पा रही थी कि नीलिमा और यशस्वी कल यहां होंगे। चौबीस घंटे से भी कम समय में सनशाइन होम्स में उनके पहुँचने की आशा से मुझे ऊर्जा मिल रही थी, जिस से मैंने रिसॉर्ट को उत्सव के अजूबे में बदल दिया। यह पहली दीपावली थी जो मैं श्रेया और अपने बच्चों में से सिर्फ़ एक के साथ मनाने वाली थी। यह श्रेया की आखिरी दीपावली भी थी। मैं चाहती थी कि यह हम सभी के लिए जितना संभव हो उतना खास और यादगार हो। मैं कभी यह पछतावा नहीं चाहती थी कि मैंने श्रेया के लिए उसके आखिरी दिन जितना संभव हो सके उतने अच्छे नहीं बनाए।

रिज़ॉर्ट का हर कोना मौसम की रौनक से जगमगा उठा था। लीला और मैंने मुख्य लाउंज में चांदी के रंग की झालरें लटकाई थीं, प्रत्येक कोण रोशनी से चमक रहा था। लाल और सुनहरे रंग के गहने मालाओं से लटके हुए थे। त्यौहार के पके हुए मजेदार व्यंजनों के कारण मीठी नमकीन खुशबू हवा में फैली हुई थी। विशाल लिविंग रूम के खिड़की-दरवाजों पर दीपावली की रोशन झालरें जगमगा रही थीं। सब कुछ श्रेया के वर्षों से एकत्र किए गए सजावट के सामानों के मिश्रण से सजा था। सबसे ऊपर, एक चांदी का सितारा प्रकाश बिखेर रहा था, जिससे पूरे कमरे में कोमल प्रतिबिंब नाच रहे थे।

बाहर, रंजीत की बदौलत, छत और खिड़कियों के किनारों पर सफ़ेद रोशनी लगी हुई थी, जिससे रिज़ॉर्ट खुशी का प्रतीक बन गया था। मैंने चारों ओर के बरामदे पर आलीशान कालीन और कंबल बिछा रखे थे, जहाँ मेरी कल्पना मेँ नीलिमा, श्रेया और मैं तारों भरी रात में गर्म कोको साथ बैठ कर पीएंगे। रिज़ॉर्ट की दूसरी तरफ नीले रंग की झालरें थीं और नीली रोशनी में लिपटा हुआ सब कुछ बहुत सुंदर लग रहा था।

मुख्य लाउंज में कंप्यूटर के सामने मुझे अपने हाथों के काम को देख कर बहुत संतुष्टि हुई। यह जगह, जो मेरा घर बन गई थी, अब मुझे एक सच्चे घर जैसी लग रही थी, प्यार और गर्मजोशी से भरपूर! मैं अपनी बेटी और उसके मंगेतर का इस शानदार रिट्रीट में स्वागत करने के लिए तैयार थी। क्या मैं चाहती थी कि शाश्वत और अंशुमन भी यहाँ होते? बिल्कुल। मुझे छुट्टियाँ बहुत पसंद थीं और मैंने बैंगलोर में अपने घर को हमेशा सजाया था, जिससे वह आरामदायक और उत्सवपूर्ण लगे। मैं दीपावली से पहले और दीपावली की पूर्व संध्या तक पूरे सप्ताह मिठाइयां बनाती थी और एक दीपावली के व्यंजन सब को खिलाती थी।

इस साल, मैं यशस्वी और नीलिमा के लिए उपहार खरीदने के लिए पास मेँ छोटे शहर के चौराहे पर गई। मैंने श्रेया, रंजीत, लीला और उसकी लड़की मीनू के लिए पहले ही उपहार खरीद लिए थे। अंशुमन और शाश्वत के लिए कुछ चीजें भी खरीदीं, यह सोच कर कि नीलिमा और यशस्वी मेरे लिए ले जाएंगे। वे यहाँ के लिए सीधी उड़ान भर रहे थे, और हवाई अड्डे से कार किराए पर लेने वाले थे। मुझे पता था कि यशस्वी शाश्वत और अंशुमन से नाराज़ है, लेकिन उम्मीद थी कि वे बाद मेँ घर वापस जाएंगे, जिससे नीलिमा अपने परिवार से मिल सके। और मुझे नीलिमा के हाथ से शाश्वत को यह संदेश देने का मौका मिलेगा कि भले ही अंशुमन और मैं साथ न हों, लेकिन वे दोनों मुझे बहुत प्रिय थे।

मेरा दिल दुख रहा था। मैंने अपनी छाती रगड़ी। अंशुमन के बिना मैं जीवन कैसे जियूँगी? श्रेया के अनुसार, शाश्वत मेरे पास वापस आने का अपना रास्ता खोज लेगा - लेकिन मुझे पता था कि अंशुमन ऐसा नहीं करेगा। वह आगे बढ़ जाएगा। उसे अपने लायक कोई पत्नी मिल जाएगी। मुझे लगा कि आंसू आ रहे हैं, और मैंने पलकें झपकाईं। नहीं, मैं पछतावे के रास्ते पर नहीं जाऊँगी। मैंने अपने लिए सही किया है। मैंने कंप्यूटर पर फिर से देखा और नोट किया कि श्रेया के दोस्त जल्द ही आ रहे हैं। नोट में लिखा था कि वे शाम तक यहाँ आएंगे और हमारे साथ डिनर पर शामिल होंगे।

मैं रात के खाने के लिए काला राजमा बना रही थी। मैं एक बार अंशुमन के साथ एक रेस्टोरेंट में गई थी, जहाँ उन्होंने राजमा को केसर चावल के साथ भुनी हुई सब्जियों सुंदर सलाद के साथ परोसा था। श्रेया ने तब मजाक किया था जब उसने मुझे भोजन कक्ष में चॉक बोर्ड पर लिखते देखा था कि अगले दिन रात के खाने और नाश्ते में क्या मिलेगा। "तुम बढ़िया खाना बनाती हो, प्रियंका। अब मेहमान भी इसकी उम्मीद करेंगे और तुम खुद से ही प्रतिस्पर्धा करोगी," उसने मुझे छेड़ते हुए कहा।

"मुझे पकाने का बहुत शौक है; तुम जानती ही हो।" मैंने नाश्ते का मीनू लिखने पर ध्यान केंद्रित किया: मिर्च सॉस के साथ कढ़ाई पनीर और मूसली, ब्लू बेरी और शहद के साथ दही।

"क्या तुम्हारे परिवार को तुम्हारा खाना पसंद आता था?" वह चिमनी के पास लगी कुर्सी पर बैठ गई। ठंड होने लगी थी। बैंगलोर की यादें, वहाँ इस समय बहुत ठंड नहीं पड़ती। हमारे साथ बिताए गए जीवन के सभी बीस साल बुरे नहीं थे। प्यार और हंसी-मज़ाक भी था। वास्तव में, बुरे सालों और दिनों से ज़्यादा अच्छे साल और दिन थे। पिछले कुछ सालों में, खासकर बच्चों के जाने के बाद से, सब मुश्किल हो गया था और मेरी ज़िंदगी असहनीय हो गई थी। .... ओह अंशुमन, मुझे तुम्हारी याद आती है।

दरवाज़े पर लगी घंटी की आवाज़ से मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई; श्रेया के रहस्यमयी दोस्त पहुँच गए थे, मैंने खुशी से सोचा। लेकिन जब अंशुमन को अंदर आते देखा तो मेरी मुस्कान गायब हो गई।

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