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रविवार, 27 सितंबर 2026

सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी | Ramcharitmanas Balkand (192-195) | श्रीराम जन्मोत्सव 🕉️

🕉️ श्रीराम जन्मोत्सव 🕉️
 सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी |

श्रीरामचरितमानस: बालकाण्ड (दोहा 192 से 195)


इस संगीतमय प्रस्तुति को यूट्यूब पर यहाँ सुनें :  


यह भी रामचरितमानस की चुनी हुई चौपाइयों, छंदों और दोहों का संगीत मेँ दहला हुआ एक प्रस्तुतीकरण है । इस प्रसंग में प्रभु श्रीराम के दिव्य प्राकट्य और अयोध्या में मनाए गए भव्य जन्मोत्सव का वर्णन है। जब भगवान का जन्म हुआ, तो उनकी बाल ध्वनि सुनकर माताएं और दासियां आनंदित होकर दौड़ीं। महाराज दशरथ को ब्रह्मानंद का अनुभव हुआ, गुरु वशिष्ठ जी ने जातकर्म संस्कार कराए, और अयोध्या में ऐसा अपार आनंद छाया कि सूर्यदेव भी अपने रथ को रोककर एक महीने तक दर्शन करते रहे।



बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार ,
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार .

सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी , संभ्रम चलि आईिं सब रानी .
हरषित जहाँ तहूँ धाईिं दासी , आनंद मगन सकल पुरबासी .

दसरथ पुत्रजन्म सुनि काना , मानहुँ ब्रह्मानंद समाना .
परम प्रेम मन पुलक सरीरा , चाहत उठनि करत मति धीरा .

जाकर नाम सुनत सुभ होई , मोरें गृह आवा प्रभु सोई .
परमानंद पूरि मन राजा , कहा बोलाइ बजावहु बाजा .

गुरु बसिष्ठ कहूँ गयउ हँकारा , आए द्विजन्ह सहित नृपद्वारा .
अनुपम बालक देखेन्हि जाई , रूप रासि गुन कहि न सिराई .

नंदीमुख सराद्ध करि जातकर्म सब कीन्ह ,
हाटक धेनु बसन मनि नृप बिप्रन्ह कहूँ दीन्ह .

ध्वज पताक तोरन पुर छावा , कहि न जाइ जेहि भाँति बनावा .
सुमनबृष्टि अकास तें होई , ब्रह्मानंद मगन सब लोई .

बृंद बृंद मिलि चलीं लोगाईिं , सहज सिंगार किएूँ उठि धाईिं .
कनक कलस मंगल भरि थारा , गावत पैठहिं भूप दुआरा .

करि आरति नेवछावरि करहीं , बार बार सिसु चरनन्हि परहीं .
मागध सूत बंदीगन गायक , पावन गुन गावहिं रघुनायक .

सर्बस दान दीन्ह सब काहू , जेहिं पावा राखा नहिं ताहू .
मृगमद चंदन कुंकुम कीचा , मची सकल बीथिन्ह बिच बीचा .

गृह गृह बाज बधाई सुभ प्रगटे सुषमा कंद ,
हरषित सब जहाँ तहूँ नगर नारि नर बृंद .

कैकेयी सुमित्रा दोऊ , सुंदर सुत जनमत भईिं ओऊ .
वह सुख संपति समय समाजा , कहि न सकइ सारद अहिराजा .

अवधपुरी सोहइ एहि भाँती , प्रभुहि मिलन आई जनु राती .
देखि भानु जनु मन सकुचानी , तदपि बनी संध्या अनुमानी .

अगर धूप बहु जनु अँधिआरी , उड़इ अबीर मनहुँ अरुनारी .
मंदिर मनि समूह जनु तारा , नृप गृह कलस सो इंदु उदारा .

भवन बेदधुनि अति मृदु बानी , जनु खग मुखर समयूँ जनु सानी .
कौतुक देखि पतंग भुलाना , एक मास तेइिं जात न जाना .

मास दिवस कर दिवस भा मरम न जानइ कोइ ,
रथ समेत रबि थाकेउ निसा कवन बिधि होई .

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