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गुरुवार, 17 सितंबर 2026

Ramcharitmanas Stuti Song - Balkand 35.185

श्री राम चरित मानस बाल कांड 35.185  

श्री रामचरितमानस में अनेक स्तुतियाँ हैं। यह स्तुति बालकांड में आती है। 

श्री शिव जी यह कथा माता पार्वती को सुना रहे हैं। वे कहते हैं कि श्री राम अवतार से पूर्व धरती माता पापियों के पापों का बोझ न उठा पाने की बात लेकर, गौ रूप धारण कर देवताओं और संतों के पास गईं । वे सब मिलकर ब्रह्मा जी के गए। शिव जी गिरिजा जी से कहते हैं कि उस चर्चा में मैं भी था और मैंने ब्रह्मा जी से कहा कि श्री नारायण सब भक्तों की प्रार्थना सुन कर उन्हें तारते हैं। 

यह सुन ब्रह्मा जी भक्ति भाव में लीं हुए और उन्होंने नारायण स्तुति गाई जिसके बाद श्री विष्णु ने राम अवतार की रूप में आने का आश्वासन दिया । 

यह विडिओ यूट्यूब पर हैं और मानस जी के दोहों और छंदों को ही एक गीत के रूप मेँ ढाला गया है । आशा है आप लोगों को पसंद आएगा । 

 
The sacred Hari Stuti (जय जय सुरनायक जन सुखदायक) from Goswami Tulsidas Ji's Sri Ramcharitmanas (Bala Kanda, Doha 185 and Chhands 1–4). 🌸 STORY CONTEXT: Lord Shiva explains to Goddess Parvati how Lord Brahma rejoiced upon hearing that Lord Vishnu is omnipresent and revealed through pure love. Overflowing with devotion and tears of joy, Lord Brahma raises his hands in prayer to praise Lord Narayan on behalf of all Devas, Sages, and Mother Earth. सुनि बिरन्चि मन हरष तन पुलकि नयन बह नीर। अस्तुति करत जोरि कर सावधान मतिधीर ॥ जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवन्ता। गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिन्धुसुता प्रिय कन्ता॥ पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरमु न जानइ कोई। जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोई ॥ जय जय अबिनासी सब घट बासी व्यापक परमानन्दा। अबिगत गोतीतम् चरित पुनीतम् मायारहित मुकुन्दा॥ जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगतमोह मुनिबृन्दा। निसि बासर ध्यावहिं गुनगन गावहिं जयति सच्चिदानन्दा ॥ जेहिं सिरिष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाइ न दूजा। सोइ करउ अघारी चिन्त हमारी जानिय भगति न पूजा॥ जो भव भय भन्जन मुनि मन रन्जन गन्जन बिपति बरूथा। मन बच क्रम बानी छाड़ि सयानी सरन सकल सुर जूथा ॥ सारद श्रुति सेषा रिषय असेषा जा कहुँ कोउ नहिं जाना। जेहि दीन पिआरे बेद पुकारे द्रवउ सो श्रीभगवाना॥ भव बारिधि मन्दर सब बिधि सुन्दर गुनमन्दिर सुखपुन्जा। मुनि सिद्ध सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पद कन्जा ॥

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