फ़ॉलोअर

रविवार, 9 दिसंबर 2012

भक्ति और ज्ञान

पोथी पढ़ कर जग मुवा
पंडित भया न कोय
ढाई आखर प्रेम का
पढ़े सो पंडित होय ....

कितना सच है यह।

दो मार्ग हैं :-
वृहद् प्रेम (भक्ति) , और ज्ञान । 

ओशो हमेशा कहते हैं कि भक्ति प्रेम का ही शीर्षासन से सीधा खडा हो जाना होता है । प्रेम जब एक "व्यक्ति" पर केन्द्रित हो, तब वह बीज रूप है, और जब समस्त अस्तित्व से हो जाए - तब वही भक्ति का वृक्ष हो जाता है।

लेकिन अस्तित्व से प्रेम करना बड़ा कठिन है, क्योंकि वह अकेंद्रित है । भक्ति संसार के केन्द्रित रूप से करना आसान होता है - इसीलिए "राम", "कृष्ण","जीज़स", "GOD", "मातारानी", "गणपति बप्पा", "ईश्वर" या "शिव" ......ये "व्यक्ति" रूप में समूचे अस्तित्व का समन्वय प्रकट होते हैं, और भक्ति केन्द्रित हो जाती है , संभव हो जाती है ।

जब हम व्यक्ति से प्रेम में होते है (शीरी का फरहाद से , या मजनू का लैला से प्रेम) तो उस प्रेम के केंद्र के अलावा कोई वस्तु हमें नहीं खींच पाती - खींच ही नहीं सकती । पथ भ्रष्ट होने का प्रश्न होता ही नहीं , क्योंकि वह प्रेम इतना गहन है, इतना आकर्षक है, कि कोई और आकर्षण उससे अलग कर ही नहीं पाए । सोनी को चहुँ दिश महिवाल ही भासता है, और राधा को कृष्ण के अलावा कुछ नहीं दीखता । जब उद्धव गोपियों को ज्ञान का पाठ पढ़ाते हैं , तो वे हंसती हैं - कहती हैं कि आप तो पंडित हैं - हमारे "तुच्छ" प्रेम को आप क्या जानेंगे ? वह आते तो हैं उनके "तुच्छ" प्रेम को हटा कर उन्हें ज्ञान मार्ग दिखाने - किन्तु होता उल्टा यह है कि वे खुद ही भक्ति मार्ग पर चल पड़ते हैं ।

किन्तु ज्ञान मार्ग पर हम पोथियाँ पढ़ते हैं - जो हमें सिखाती हैं कि ज्ञानवान व्यक्ति को छोटी छोटी बातों से विचलित नहीं होना चाहिए , और यह सच भी है । तो हम वह सीख लेते हैं । परेशानी यह हो जाती है - कि यह बात ज्ञान मार्ग के यात्री को सिखाई जा रही थी - किन्तु वह यात्री इसे सभी पर लागू  कर देने लगता है । वह भूल जाता है कि उन पोथियों में लिखी बातें उसने (और संभवतः उसके परिवार जनों ने) तो जानी और पढ़ी हैं, किन्तु "सभी" ने नहीं पढ़ीं । वह सभी मनुष्यों से अपेक्षा रखने लगता है कि वे ज्ञानी हों, और उनके दर्दों को भावनाओं को नज़रंदाज़ करने लगता है , छोटा मानने लगता है (और ज्ञान का प्रकाश जहां हो वहां वे छोटे दुःख और दर्द तुच्छ हैं भी - किन्तु भूल यहाँ हो जाती है कि वह यात्री यह भूल ही जाता है कि ज्ञान का प्रकाश सबके पास है नहीं )। वह बड़े बड़े गूढ़ शब्द उपयोग करता है अपनी बातें कहने के लिए - यह भूलते हुए कि "सब" जो उतने ज्ञानी नहीं हैं - वे तो उन शब्दों को उक्तियाँ या मुहावरे भर नहीं समझेंगे - उन्हें वे शब्द शूल की तरह चुभ सकते हैं ।

गीता में कृष्ण- अर्जुन संवाद में भी यह बात आती हैं की ज्ञान मार्ग श्रेष्ट तो है - किन्तु इस मार्ग पर अहंकार के चलते च्युत हो जाने का भय बहुत है । वेदों की घुमावदार बातों में उलझना बहुत सामान्य है । अहंकार इतना दबे पाँव आता है कि मनुष्य जान ही नहीं पाता कि वह कब आ गया ।

अच्छा हो यदि व्यक्ति अपने दस साल पुराने और आज के चित्र देख कर मिलान करे और देखे कि दोनों चित्रों में उम्र के फर्क के अलावा कहीं आँखों में विनय की जगह अहंकार तो नहीं दिखने लगा है ?

एक कविता (यदि इसे कविता कहा जा सके तो ) प्रस्तुत है

आओ चले हम
ज्ञान से प्रेम की ओर
अहंकार से समत्व की ओर
मैं से हम की ओर

ज्ञान की गाडी में चलते
मार्ग चलते दूसरे पैदल राही
हमें मार्ग के कीड़े न दिखें

नेक रस्ते पर जब हम चलें
भूल से भी भूल न करें
दूसरों को जय नहीं ,
मन पर हम जय करें

आईने में जिस देख कर
खोज स्वयं की करें
पडी धूल उस आईने पर
उसे रोज़ साफ़ करें,
अपने बिम्ब की शुभ्रता पर
मन को मिहित न करें,
परिदृश्य में धूमिल पड़े,
श्याम बिम्ब भी हमें दिखें ..

गाय को हम पूजते
गाय सरीखे मन बनें
शांतता गौ के नेत्रों की
निज नेत्रों में उतार लें
गौ माता के प्रेम को
निज मनस में हम उतार लें ...

हम ज्ञान के मार्ग को
बस मार्ग भर ही रहने दें
उस ज्ञान को निज मस्तक पर
नहीं सवार हम करें

हे प्रभु हमें तुम प्रेम दो
हे प्रभु हमें तुम दे दो ज्ञान
असत से सत को
तमस से ज्योति को
बढ़ पाएं हम हो ज्ञानवान ...
  ...

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

उपनिषद् सन्देश 4 प्रस्तावना 4



पिछला भाग 

सत्य के चार रूप उभर कर प्रकट हो आते हैं : ब्राह्मण , इश्वर , हिरण्यगर्भ , और विराज (संसार) । इसलिए ब्राह्मण को चतुष्पात कहा गया । फिर संसार रचना कर्म , पालन कर्म , और विलयकर्म के अनुरूप इश्वर के भी तीन रूप कहे गए - ब्रह्मा, विष्णु , महेश ।

बुद्ध इस सत्य को "शून्यता" कहते हैं - जो न स्थूल है न सूक्ष्म , न प्रकाश है न अन्धकार, न चमक है न छाया, भीतर है न बाहर .... या यह कहें की किसी भी एक परिभाषा में बंधा नहीं है - या यूँ कहें कि यह सब कुछ है । किन्तु यह कहना कि ब्राह्मण के स्वभाव को , प्रकृति को परिभाषित नहीं किया जा सकता - इसका यह अर्थ नहीं  की ब्राह्मण का कोई निज स्वभाव है ही नहीं । वह सत चित और आनंद के रूप में परिभाषित होता है - किन्तु यह भी हमारी भाषा की लघुता है - इसमें भी वह पूर्ण रूप में नहीं उतरता , बस सिर्फ एक सन्निकटन है ।

सूत्रकार में अपुरुष विधा  (ब्राह्मण) और पुरुष विधा (इश्वर) को प्रथक प्रथक बताया गया है । ब्राह्मण श्रवण ,जागृति, और स्वप्न स्थितियों से परे हैं । कार्य ब्राह्मण और कारण ब्राहमण की प्रथक अवधारणायें हैं । वैदिक देवतागण इश्वर के अधीन हैं ।

फिर आत्मन क्या है ? आत्मन वह है जो "मैं" के अतिरिक्त सब कुछ निकालते जाने के पश्चात बचा रहता है । जो अजन्मा है, अमृत्य है । आत्म ज्ञान होने के पश्चात ही वह अनावृत्त होता है - तब तक वह अहंकार के परदे में छिपा रहता है । चांदोज्ञ उपनिषद् में देवगण और दानवगण प्रजापति के पास आते हैं - जो कहते हैं कि  आत्मन हर पाप और पुण्य से परे है । वे देव और दानवगण क्रमशः इंद्र और विरोचन जी को अपने अग्रणी बना कर प्रश्नकार के रूप में भेजते हैं । पहला संकेत होता है कि आत्मन वह है जो हमें जल पड़ती छाया में, या सामने वाले की आँख में , या फिर आईने में दिखे । किन्तु प्रजापति कहते हैं कि अब तुम अपने सबसे अच्छे परिधान पहन कर आईने में छवि देखो । तब इंद्र कहते हैं कि तब तो वह रूप बदल जाएगा जो हम देख रहे थे । तब तो यह अपरिवर्तनीय नहीं - और जो परिवर्तनशील हो वह आत्मन नहीं हो सकता ।

दूसरा सुझाव है - कि यदि यह शरीर जिसकी छाया जल में र्पतिबिम्बित होती है - वह आत्म नहीं तो क्या इसके भीतर बैठा स्वप्नदर्शी आत्मन है ? जो इस जीवन का "स्वप्न" देख रहा है ? इंद्र फिर से कहते हैं कि  यद्यपि यह भीतर बैठा दृष्टा इस शरीर रुपी वस्त्र के बदलाव से प्रभावित नहीं होता, तथापि, हम स्वप्न में भी जब हमें चोट लगती है तब हम दर्द भी महसूसते हैं और अश्रु भी बहाते हैं । स्वप्न में हम क्रोधित भी होते हैं, सुखी और दुखी भी । तब तो आत्मन "स्वप्न बोधिता" भी नहीं हो सकती ... आत्मन हमारी मानसिक स्थितियों का संयोग भर ही नहीं है - भले ही वे मानसिक परिस्थितियाँ कितनी ही अलग अलग प्रतीत होती हों । इंद्र फिर प्रजापति से प्रश्न करते हैं, जो अब तीसरी बार सुझाते हैं कि शायद गहरी निद्रा (जिसमे सपने नहीं आते) की स्थिति का भीतर से बोध कर्ता ही आत्मन हो ? इंद्र का विचार है कि इस स्थिति में न हम स्वयं को जानते हैं, न संसार को - सब कुछ विलय हो चुका होता है, किन्तु तब भी अस्तित्व तो है ही । विषय-वस्तु / परिलक्ष्य के न होने पर भी इस स्थिति में आत्मपरकता या विषय तो होता ही है । आखिर में इंद्र  कहते हैं कि आत्मन "सक्रिय सार्वभौमिक चेतना" है , जो न शारीरिक रूप में चेतना की सीमित अवस्था है, न स्वप्न का अशरीरी सोता हुआ स्व बोध, और न ही गहन निद्रा का सुशुप्त बोध है ।

यह आत्मन प्रकाशों का प्रकाशक है, यह सतत , स्थायी, आलोक है, जो न जीता है न जन्मता है न मरता है । न यह गतिशील है, न स्थावर है , न परिवर्तनशील है न अपरिवर्तनीय है । यह अव्यक्त, अचिन्त्य और अविकारी है । यह द्रष्टा भी है और दृश्य भी । यह साक्षी है और साक्ष्य भी । 

जारी ....

सोमवार, 26 नवंबर 2012

उपनिषद सन्देश 3 - प्रस्तावना 3

भाग 1 , 2

पिछला भाग 
.... संसार की रचना कोई "अचानक" साकार होने जैसी घटना नहीं, बल्कि प्राकृतिक और समयक्रम में हुआ विकास है । ...... evolution theory से इसमें एक बुनियादी फर्क है । वह फर्क यह है कि evolution विज्ञान कहता है की निर्जीव तत्त्वों के अलग अलग गठजोड़ों से धीरे धीरे जीवन "उत्पन्न" हुआ, यह आकस्मिक था । .... इसके विपरीत वैदिक मान्यता यह है की तत्त्वों में जीवन उत्पन्न नहीं हुआ , बल्कि पहले से था और अब सिर्फ अप्रकट से "प्रकट" हुआ । ---- उत्पन्न नहीं, सिर्फ प्रकट । ----- ऋग्वेद में "उत्पन्न" होना, "प्रकट" होना और "जन्म" लेना पृथक घटनाएं हैं । इसी प्रकार से,जब प्रलय के बाद जीवन "समाप्त" हो जाता है, तब भी वह "समाप्त" नहीं, सिर्फ "अप्रकट" होता है ...
अब आगे ..
_____________________

वेदों में संहिताएं, ब्राह्मण , आरण्यक और उपनिषद् हैं । संहिताएं देवताओं की स्तुतियाँ आदि कहती हैं, इनमे यज्ञादि में कहे जाने वाले मन्त्र आदि संकलित हैं । ब्रह्मचारी शिष्य अपने पठन काल में इन स्तुतिगीतों को सीखते हैं । ब्राह्मण इन यज्ञ कर्म कांडों के महत्व के बारे में बताते हैं - जिन उपदेशों के अनुरूप पारिवारिक गृहस्थ अपने दैनिक जीवन के धर्माधीन कर्म, और यज्ञकर्म, करें । वानप्रस्थ जन आरण्यकों के उपदेशों पर मनन चिंतन करें और संन्यास को प्राप्त हों । सन्यासी जन, जो मोह माया से परे हो चुके होते हैं, वे उपनिषदों के दार्शनिक सूत्रों के चिंतन, मनन और कथन में अपना समय लगाते हैं । उपनिषद् कोई पूर्व निष्पन्न किताबें नहीं थीं जो सन्यासी पढ़ते हों , बल्कि जब संन्यास सच में घटित हो जाता - तब ये उनके आत्म में स्वतः प्रकट होते, स्वानुभव से आये, सत्य परिचय हैं । 

यहाँ पहुँच कर रूचि अब उद्देश्य उन्मुख की अपेक्षा व्यक्तिपरक और आतंरिक उन्मुख हो जाती है । यात्रा बाहर की जगह अब भीतर की और अग्रसर होती है । उपनिषदों में सिर्फ सूखे कर्मकांड वादिता की समालोचना दिखती है । यज्ञकर्म सिर्फ उच्च लोकों की और ले जायेंगे - जहां से इन सत्कर्मों का सुखमय फल भोगने के बाद यहीं धरा पर इस जीवन में लौटना होगा । स्तुतियों की जगह अब प्रश्न ले लेते हैं । सत्य की खोज - वह कौन / क्या है जिसे जान लेने से सब कुछ ज्ञात हो जाए ? इससे अधिक कुछ है ? कुछ नहीं है ? सनातन सत्य की प्राप्ति कैसे हो ?  जब सब कुछ इश्वर का ही है - तो फिर यही सब उन्हें ही भेंट करने का क्या अर्थ ? ............. सोम आहुतियों की जगह अब "स्व" आहुति की बात उभरती है । यज्ञ की आहुति के समय कहा जाने वाला शब्द "स्वाहा" अब "स्व + आहुति" या स्वत्व हनन का अर्थ ले लेता है । जीवन के तीन कालखंड अब सोम आहुतियों का स्थान ले लेते हैं । मेध अब पुरुषमेध या सर्व मेध हैं : अपने आप को इश्वर को सौंपना, अपना ही स्व आहूत कर देना । बृहद आरण्यक उपनिषद् में अश्वमेध यज्ञ की व्याख्या इस तरह से है कि यजमान सारे ब्रह्माण्ड को त्याग दे - सिर्फ वचन से नहीं - मन से । प्रार्थना यज्ञ और त्याग, अब निमित्त भर हैं सत्य की खोज के लिए । ये अपने भीतर से पूर्ण परम संसार में प्रविष्ट होने के मार्ग के प्रवेशद्वार की तरह हैं ।

वैदिक दृष्टा जाती बंधनों से बंधे हुए नहीं हैं । सत्यकाम जाबाल - जिन्होंने अपने पिता का नाम बताने में असमर्थता कही - उन्हें भी दीक्षित किया गया । "तत् त्वं असि" इतने सामान्य से शब्द आभासित होते हैं - कि इन्हें पढ़ने के बाद भी इनमे समाहित ज्ञान मुट्ठी से फिसल जाता है । उपनिषद् वेदों का जिक्र अक्सर सम्मान के साथ करते हैं - किन्तु सिर्फ स्तुतियों तक सीमित नहीं रहते । ये वेदों की शिक्षाओं का सदुपयोग करते हुए भी याज्ञवल्क्य और शांडिल्य जैसे आत्मसाक्षातकारियों के स्वानुभव का परिचय देते हैं । गुरुकुल से लौटे श्वेतकेतु बेझिझक स्वीकार करतेहैं - कि वैदिक शिक्षा पूरी सीख लेने के बाद भी उन्हें वह ज्ञान नहीं मिला है जिससे हर जानने योग्य हर वस्तु जान ली जाती है ।

उपनिषदों के अग्रणी ऋषियों के आगे प्रश्न हैं - संसार के मूल में क्या / कौन है ? किसे जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है ? मूलभूत एक सत्य क्या है ? यह माना गया कि, यदि मानव ब्रह्मज्ञान प्राप्त करता है तो उसके भीतर ब्रह्म ने ही अपने आप को पहचाना है - यह सिर्फ साक्षात्कार / परिचय है उस "स्व" से जो पहले से था - लेकिन ज्ञात नहीं था । "अहम् ब्रह्मास्मि" का उद्घोष - बिना इस स्वानुभूति के सिर्फ अहंकार है, और स्वानुभूति के बाद निर्विवादित सत्य ।

"वास्तविकता" और "सत्य" एक ही नहीं हैं - वास्तविकता होते हुए भी सीमित वास्तविकता परम सत्य से बहुत लघु है । सत्यों का परम सत्य ब्राह्मण है । उसी एक से अनेकता हुई - पंचतत्त्व (आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी) और इनसे बहुरंगी संसार निर्मित हुआ । किन्तु वह सिर्फ इतना ही नहीं है । ये सब हैं - और चिर हैं - और उसी एक से प्रकट और में उसी एक में विलीन होते रहते हैं ।(विलीन होने का अर्थ विनष्ट होना नहीं, अप्रकट होना है)

एक शिष्य गुरु से पूछता है और ब्राह्मण के विषय में प्रश्न करता है । उसे परिभाषित करने के उपरांत गुरु उसी से समझाने को कहते हैं । तब शिष्य शुरुआत में कहता है "अन्न" (matter) ही सब है , जिससे सब कुछ बना है । किन्तु सिर्फ पदार्थ ही तो जीवन के हर रूप को नहीं समझा सकता न ? फिर वह कहता है -"प्राण" (life) ही सर्व है । किन्तु फिर से - जीवन के हर रूप में एक सा बोध तो नहीं होता (चल जीवों का और अचल पेड़ पौधों का बोध स्तर अलग है ) ? फिर कहता है "मनस" (consciousness) ही सर्वस्व है । फिर से प्रश्न उठता है - कि पशुओं का बोध स्तर और मानव का एक ही है क्या ? फिर कहता है  बुद्धियुक्त मन "विज्ञान" (intellectual consciousness) ही ब्राह्मण है । सिर्फ मानव ही अपने वैज्ञानिक बुद्धियुक्त मन के कारण अपने आप को अपने से ऊपर उठा सकता है । लकिन यह भी तो द्वैत्पूर्ण है ? तो आखिर शिष्य आत्मिक मुक्ति और आनंद पर आता है । तो वास्तविकता है सत्य, ज्ञान और अनंतता। आनंद भी परम सत्य का समीप अनुमान भर ही है । अन्न , जीवन, मानस , बुद्धियुक्त बोध मन , ये सब सीढियां है - जो सत्य के निकट जाती हैं ।

एक प्रजनन कोशिका में इतनी संसूचना होती है की वह पदार्थ को शिशु शरीर के आकार में ढाल लेती है - और हर भ्रूण अपनी ही प्रजाति के शारीरिक रूप में ही आकार लेता है - जिसमे प्राणों का प्राकट्य होता है । ठीक उसी तरह से वैदिक मान्यता है कि  पदार्थ इस रूप में विकसित हुए कि जीवन का प्राकट्य हो सके - तो यह इसलिए हुआ कि बोध पहले से था और वही पदार्थ को प्रेरित करता रहा उस रूप में आने के लिए । यह जो वैज्ञानिक अवधारणा है कि संसार सिर्फ पदार्थों के एक तरह से स्व-विकसित होने से बना, इससे यह प्रतीत होता है कि पदार्थ के आकस्मिक गठजोड़ से जीवन उत्पन्न हुआ, और वैदिक अवधारणा यह है कि यह हुआ तो ऐसे ही, किन्तु आकस्मिक नहीं था - यह तो होना नियत ही था , क्योंकि जीवन अपने प्राकट्य के लिए पदार्थ को उस रूप में आने के लिए प्रेरित कर रहा था ।

बोध भीतरी परत है, बुद्धि सत्त्व है । जिसपर रजस और तमस की परतें हैं । एक ओर तो अहंकार का प्रकटन होता है - जिससे पांच ज्ञानेन्द्रियाँ और पांच कर्मेन्द्रियाँ होती हैं । ब्राह्मण परम सत्य हैं, इश्वर और संसार द्वैत रूप में बोध और पदार्थ को दर्शाते हैं । संसार की रचना दिव्य मन की इच्छा मात्र से हुई है, और इच्छा मात्र से ही इसका पुनः पुनः निर्माण और विलय होता रहता है ।  इश्वर की दिव्य इच्छा से यह ब्रह्माण्ड हिरण्य गर्भ के रूप में (अव्यक्त से)  व्यक्त हुआ । यह अभिव्यक्ति कोई बाहर से आई या थोपी हुई नहीं है, बल्कि यह समाहित ही है ।  परम सत्य को न तो अभिव्यक्ति की  आवश्यकता है,न ही वह इस प्रतीत होती हुई अभिव्यक्ति तक सीमित ही है । यह सिर्फ मन की मौज है । संसार हर बार, हर सृष्टि में, इसी रूप में होगा यह भी आवश्यक नहीं - क्योंकि यह भी तो उस ब्रह्म की रचनात्मकता पर सीमा बाँधने जैसा ही है ।

... जारी ...

बुधवार, 14 नवंबर 2012

उपनिषद सन्देश 2 - प्रस्तावना 2


पिछला भाग
.....चार वेद हैं : ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद और अथर्व वेद । प्रत्येक में संहिताएं, ब्राह्मण, आरण्यक, और वेदान्त-उपनिषद् हैं । ब्राह्मण "कर्म" काण्ड पर जोर देते हैं, उपनिषद् "ज्ञान" काण्ड पर । वेदों में देवताओं की स्तुतियाँ हैं : इंद्र, सूर्य, सोम, अग्नि ...
उपनिषद सन्देश 1 - प्रस्तावना 1

...अब आगे
-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
 जहां जहां नीले रंग के अक्षर हैं - वह सब मेरे अपने निष्कर्ष और समझ हैं - यह उपनिषदों से नहीं है 
-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
जब किसी एक वैदिक देवता की स्तुति होती है, तो उन्हें ही "परम" देव के रूप में देखा जाता है, उस समय के लिए अन्य सभी उनकी ही शक्ति के विस्तृत प्रकटन हो जाते हैं । यह न तो monotheism है, न polytheism ही, इसे henotheism कहते हैं ।

वैदिक चिन्तक परिपक्व थे, और उन्होंने यह सत्य समझा कि इस संसार के निर्माण और शासन करने का श्रेय सिर्फ एक ही परम का हो सकता है । इससे भी अधिक परिपक्वता इसमें प्रदर्शित होती है की उन्होंने कभी कोई "मूर्ती भंजक" मिशन चलाने की आवश्यकता नहीं समझी । उनके लिए यह बात सहज बोधगम्य थी कि शक्ति के और वैभव के अनंत रूप में अनंत प्रतीतियाँ होने से जनमानस के लिए अनेक देवताओं को मानना और पूजना स्वाभाविक है । उन्होंने कभी मूर्ती पूजन को महाविनाशकारी त्रुटी न तो समझा, न ही बताया । बहुदेव-वादियों को एकेश्वरवादी बनाने के जबरन प्रयासों की अपेक्षा, उन्होंने व्यक्ति के अपने इष्ट देव में ही विश्वास को और गहरा करते हुए , व्यक्ति के मन को तार्किक मनन चिंतन, पुनर्व्याख्या, सुलह-संतोष से एक परम ईश्वर की संकल्पना की ओर ढाला । { गीता में भी कृष्ण कहते हैं कि मैं मनुष्य की अपने ही इष्ट देव में निष्ठां प्रगाढ़ करता जाते हूँ, और उन सबके प्रति की गयी प्रार्थना और भक्ति मुझ तक ही पहुँचती है । }उन्होंने इस बात को समझा और जाना कि उग्रवादी लड़ाका धर्म यदि विश्वासों के पुराने जंगलों और वनों के ऊंचे पेड़ों को काट भी दें, तब भी नीचे की छुट पुट खरपतवार (undergrowth) हमेशा बची रहती है, क्योंकि वह ह्रदय भूमि में पुरातन समय से बहुत गहरे विश्वासों के बीजों में छुपी है, जो लाख काटने पर भी फिर फिर उगती रहेगी । वैदिक यज्ञों में मन्त्रों में भी बारम्बार ऐसी बातें उठती है (उदाहरण ) "क्या इंद्र हैं? क्या किसी ने इंद्र को देखा है? फिर हम यह स्तुति गीत किसके प्रति गायें?" आदि । जब इस विचार और मीमांसा से विश्वास कमज़ोर होने लगता है - तब फिर से श्रद्धा (जो स्वयं एक पूज्य देव हैं) से प्रार्थना की जाती है की "हे श्रद्धा ! हमें विश्वास प्रदान करें" ।

यह माना गया कि  सर्जन से पहले और विलय के बाद भी सिर्फ निर्जीव पदार्थ ही नहीं, बल्कि "बोध" भी बचा रहता है । किन्तु वह अव्यक्त रूप में रहता है और निर्जीव पदार्थ को सहज भौतिक और रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा बारम्बार सृजन को तैयार करता है । जब निर्जीव पदार्थ समयक्रम में फिर से जीवन धारण करने योग्य रूप में परिवर्तित हो ( हैं अरबों वर्षों के बाद) तब फिर उन में प्राण रूप में यह बोध प्रकट होता है । और यह सृजन और प्रलय की प्रक्रिया अनंत समय तक चलती रहती है, चलतीरहती है ...

रचना के पहले अनंत अन्धकार में डूबा अन्धकार है, और प्रलय के बाद भी (my dear physics and astronomy loving scientific friends - remember black-hole?) लम्बे "तप" के बाद यह स्वप्रकाश से खुद अपने आप में से प्रकट होता है और विस्तृत हो कर फ़ैल  जाता है (physicists - the black hole has no nuclear reactions going on inside, as all the hydrogen /helium fuel is exhausted . hence the only force active is the gravity - which keeps pulling in the heavy mass tighter and tighter. The word "तप" means withstanding physical pressure and temperature) । विष्णु की नाभि से कमल निकलता है , जिसपर ब्रह्मा बैठे होते हैं । blackhole  का कोई चित्र देखिये इन्टरनेट से, और साम्य स्वयं देख सकते हैं - या फिर इस सन्दर्भ में एक विज्ञान सम्बंधित पोस्ट श्रंखला मैंने लिखी थी - एक सितारे की जीवन यात्रा  (इसमें तीन भाग हैं - पहला भाग page में नीचे है, तीसरा सबसे ऊपर) ।

सम्पूर्ण संसार "प्रकृति" ( विस्तृत किन्तु प्राणहीन तत्व , हर तत्व के अपने गुण या "प्रकृति") और "पुरुष" (बोध / प्राण / ज्ञान ) के संयोग से संभव हुआ माना गया है । "सृष्टि" से पहले की "असत" प्रकृति, प्रसव पूर्व स्त्री की तरह कही गयी है । परम पुरुष के दिव्य मन में पहला फल उगा - "काम" - सृष्टि रचने की इच्छा / कामना । तब उस कामना पर चिंतन" हुआ और कर्म रूप में (सत और असत के संयोग से ) प्रभु की "इच्छा" से जीव संसार की रचना हुई । ऋचा रचने वाले ऋषियों में इतना विनय और विनम्रता है, कि वे बेझिझक यह स्वीकार करते हैं कि  "यह सब सिर्फ एक अनुमान है, क्योंकि मानव ज्ञान से इतने परे की बातें हम निश्चित रूप से नहीं जान सकते । "ईश्वर" ( परमेश्वर ) और "ब्राह्मण" (परम सत्य) को पृथक कहा गया है । इश्वर और ब्राह्मण के साथ फिर "हिरण्यगर्भ" का प्रकटन बताया गया । "पुरुष" ने अपने आपको प्रकृति के साथ जोड़ कर सृष्टि को सजीव बनाया, फिर भी वे स्वयं इसमें / इससे निर्लिप्त ही रहे । ब्रह्मा के "रचना" करने के बाद, जबकि विराट संसार रचा जा चुका , फिर भी वह सम्पूर्ण होकर भी निर्जीव ही रहा । तब "पुरुष" उसमे जीव रूप में प्रविष्ट हुए, तब संसार "सचेत" हुआ । (यूँ कहा जाए कि  प्रकृति+पुरुष = जीव संसार सृष्टि ।  प्रकृति और पुरुष दोनों ही स्वतंत्र इकाइयां हैं, जिनके संगम से संसार संभव होता है, लेकिन ये अलग अलग इकाइयां हैं ।)

वेदों के अनुसार संसार की रचना कोई "अचानक" साकार होने जैसी घटना नहीं, बल्कि प्राकृतिक और समयक्रम में हुआ विकास है । लेकिन विकास वादी evolution theory  से इसमें एक बुनियादी फर्क है । वह फर्क यह है कि evolution विज्ञान कहता है की निर्जीव तत्त्वों के अलग अलग गठजोड़ों से धीरे धीरे जीवन "उत्पन्न" हुआ । इसके विपरीत वैदिक मान्यता यह है की तत्त्वों में जीवन उत्पन्न नहीं हुआ , बल्कि पहले से था और अब सिर्फ अप्रकट से "प्रकट" हुआ । जीवन "उत्पन्न नहीं होता - वह पहले से है, और वह निर्जीव पदार्थ को अपने ही उत्थान के लिए प्रेरित करता रहता है, जिससे पदार्थ उस रूप में बदल सके जिसमे जीवन लक्षणों का उदघाटन हो सके । उपनिषद कहते हैं की तत्त्व कभी भी अपना उत्थान स्वयं नहीं करता । उसमे जीवन (अर्थात बोध) इसलिए प्रकट होता है कि उसमे बोध का बीज पहले से ही उपस्थित  था । इस बीज ने ही निर्जीव तत्त्व को ऐसे रूप में आने के लिए प्रेरित किया जिसमे जीवन का प्रकटन हो सके । फिर - जब पदार्थ इस रूप में ढला की जीवन प्रकट हो सके - तब उनमे बोध प्रकट हुआ - उत्पन्न नहीं, सिर्फ प्रकट । ऋग्वेद में "उत्पन्न" होना, "प्रकट" होना और "जन्म" लेना पृथक घटनाएं हैं । इसी  प्रकार से,जब प्रलय के बाद जीवन "समाप्त" हो जाता है, तब भी वह "समाप्त" नहीं, सिर्फ "अप्रकट" होता है । गीता के दूसरे अध्याय में कृष्ण कहते हैं कि सभी जीव  से पहले अप्रकट थे, फिर प्रकट हुए, और मृत्यु के बाद अप्रकट हो जायेंगे । फिर इस में शोक क्या करना है ?

बोध के भी अलग अलग स्तर के हैं । एक अचल पेड़ का, एक चलते हुए कीड़े का, एक बिल्ली का, गाय का , हाथी का, मानव का बोध का स्तर भिन्न होता है । मानवों में भी अलग अलग बौद्ध स्तर हैं । इस बात को समझने वाले विद्वानों ने बड़े सहज तरीके से जाति व्यवस्था बनायी - जो जिस तरह की रूचि रखता हो - वह उस प्रकार के कर्म में संलग्न रह सके । जो पूजा पाठ पठन आदि में रूचि न रखता हो उस पर कोई जबरदस्ती न हो कि उसे यह करना ही पड़े ।

ऋग्वेद के ही अनुसार, मानव का "स्वरुप" शरीर नहीं है, आत्मा है - जो शरीर के और उसके द्वारा किये गए कर्मों का कर्ता और नियंत्रक है । यह अजन्मा और अमृत है, जो जन्म नहीं लेता न मरता ही है । यह "जीव" भी नहीं है । एक प्रसिद्द उदहारण है - जो गीता में कृष्ण भी अर्जुन को कहते हैं - जैसे एक डाल पर दो चिड़िया होती हैं, एक भोगती है (फल खाना आदि) और दूसरी सिर्फ उसे देखती है । यही "जीवात्मा और परमात्मा" का फर्क है । जब जीव यह फर्क जान कर सिर्फ द्रष्टा / निष्क्रिय दर्शक / या साक्षी हो जाए - तब वह परमात्मा में मिल सकता है । यह स्थिति प्राप्त होने के उपरांत ही व्यक्ति "अहम् ब्रह्मास्मि" का उद्घोष कर सकता है । (जो इस साक्षी स्थिति को आये बिना ही अपने अभिमान (ज्ञान / शारीरिक शक्ति / या धन - किसी से भी अहंकार हो सकता है) के कारण यह उद्घोष करते हैं, वे असुर हैं । यह भी जन्म नहीं बल्कि कर्म से सम्बंधित है ) वामनदेव ने कहा "मैं ही मनु हूँ, मैं ही सूर्य हूँ" कृष्ण ने कहा "मैं ही सब कारणों का कारण हूँ" महाराज त्रसदस्यु ने कहा "मैं ही इंद्र और वरुण हूँ"- तब यह सब अहंकार से नहीं, बल्कि आत्मानुभूति से बोल रहे हैं ।

वैदिक मनीषियों ने मानवों को "ब्राह्मण (पठन / पाठन / चिंतन / मनन करने वाले ) , क्षत्रिय (युद्ध / समाज रक्षा / राज्य सम्बंधित कार्य करने वाले )  वैश्य (धनोपार्जन सम्बंधित कार्यों को करने वाले ) व् शूद्र (उपरोक्त तीन कार्य नहीं , लेकिन इन्हें करने वालों से सहयोग करने वाले ) में विभक्त किया - जो सिर्फ "कर्म" की आधार पर था । समय के साथ यह जन्मे से जुड़ गया ।  सब को एक रूचि नहीं होती । किसी को पूजा पाठ अच्छा लगता है, तो कोई मजबूरी में करता है ; किसी को पढना अच्छा लगता है . तो कोई शिक्षक के डंडे के जोर पर पढता है , किसी को लड़ाई करके जीतना पसंद है तो कोई शान्ति प्रिय है, कोई अपनी नौकरी मी आगे बढना चाहता है, कोई उद्योग लगाना चाहता है) इसी तरह देवता भी पृथक रुचियों वाले हैं : इंद्र युद्ध प्रिय और शक्ति द्योतक रूप में दर्शाए गये, तो सूर्यादि देव आत्मोत्थान सम्बंधित । आश्विन सेहत और कुबेर धन देव हुए, तो यम पितरों के प्रदेश के सम्राट हुए ।


[ शूद्र का अर्थ यह नहीं था कि वह ब्राह्मण से "नीच" है - उसका अर्थ था कि  उस पर पठन और पूजन का "नियम" नहीं है । लेकिन समय के साथ यह "न चाहने पर न करने की अनुमति" धीरे धीरे "चाहने पर भी न कर सकने की बाध्यता" में बदल गयी । ब्राह्मण पढने लिखने वाले थे - सो बौद्धिक रूप से सशक्त थे । क्षत्रिय युद्ध कुशल थे - सो राजनैतिक रूप से सशक्त थे। और वैश्य धनोपार्जन करने से आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त थे । लेकिन शूद्र के पास इनमे से कोई भी "शक्ति न थी, सो समयक्रम में उनकी यह शक्तिहीनता उनकी लाचारी बन गयी । मनुष्य को, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य "जन्म" से नहीं, "कर्म" से होना चाहिए थे, किन्तु समय के साथ और "संतान मोह" के चलते ब्राह्मण अपनी संतति को "ब्राह्मण" पद सिर्फ जन्म से ही नवाजने लगे , क्षत्रिय क्षत्रिय पद आदि । 

और एक बात रही होगी - कि जैसे वातावरण में मनुष्य रहता है, काफी स्वाभाविक है कि उसकी रुचियाँ और काबिलियतें भी उसी ओर हो  जाएँ । हम आज की अपनी फिल्म इंडस्ट्री को या राजनीति को देख कर इसके अनेकानेक उदाहरण देख सकते हैं - नेताओं के बच्चे नेता, अभिनेताओं के बच्चे अभिनेता बनने के कैन उदाहरण हैं - लेकिन हर बार यह हो यह आवश्यक नहीं (जो दुर्भाग्य से जाति व्यवस्थ के साथ हुआ)। फिर शिक्षा दीक्षा भी उसी वातावरण के अनुसार ढालने के लिए होती - तो प्रक्रिया कुछ पीढियां जाते जाते स्थूल और कठोर होती गयी होगी । जैसे कक्षा में प्रथम आने वाले छात्र को बाकी छात्र स्वयं से श्रेष्ठ स्वीकार कर लेते हैं, इसी प्रकार जिनकी रूचि पढने लिखने (ब्राह्मण कर्म) / युद्ध करने (क्षत्रिय कर्म) / धनोपार्जन करने (वैश्य कर्म) में न हो कर "नीचे" समझे वाले कार्यों में (जूते बनाना आदि) (शूद्र कर्म) होती वे इन बाकियों को अपने से श्रेष्ठ स्वीकार लेते होंगे - और ये लोग भी कहीं न कहीं खुद को इन "क्षुद्र" कर्म में रत लोगों से क्रमशः श्रेष्ठ - और श्रेष्ठतर - और श्रेष्ठतम मानने लगे होंगे । इस प्रकार कर्म के अनुसार बनी जातियां समयक्रम में जन्म से जुड़ गयीं होंगी ।]

ऋग्वेद में पुनर्जन्म शब्द नहीं आता - किन्तु इसकी झलकियाँ दिखती हैं । आत्मा का एक शरीर से दुसरे शरीर को स्थानान्तरण, और तरह के रूपों / अस्तित्वों में वास करना, इस जीवनकाल के उपरान्त का अस्तित्व इस जीवन के कर्मों से सम्बंधित होना, "मित्र" देव का पुनः जन्मना, उषा का बारम्बार जन्म लेना - ये सब पुनर्जन्म की ओर संकेत तो करते हैं, किन्तु सीधे शब्दों में पुनर्जन्म की बात नहीं आती ।

वैदिक विद्या त्रयी विद्या कहलाई - ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद । अथर्व वेद तक आते आते तो देवताओं के लिए यज्ञ करना (कर्म स्वयं) यज्ञ के देवता से भी अधिक महत्वपूर्ण होने लगा । "पहले से शक्तिमान जो है उस देवता की प्रसन्नता के लिए" यज्ञ होने से उलट, "देवता स्वयं ही यज्ञ प्रताप से शक्ति पाए हुए" से प्रतीत होने लगे । ऋग्वेद के देवता स्व-आनंदित प्रतीत होते थे, जो पहले से प्रसन्न और कृपालु ही थे, यज्ञ करने से और अधिक कृपा बरसाते थे  । अथर्व वेद तक आते आते देवता क्रोधी से प्रतीत होने लगे, जिन्हें प्रसन्न करने के लिए यज्ञ न हो तो अकृपा बरसने का भय सा स्थापित रहे ।

....
जारी ...

सोमवार, 12 नवंबर 2012

उपनिषद सन्देश 1 - प्रस्तावना 1

सभी को दीपोत्सव की हार्दिक शुभेच्छाएं , बधाईयाँ । यह पर्व आपके जीवन में रौशनी, सुख, शान्ति और सौहार्द्र की सौगात लाये
----------------------------------------------------------------------------------
आज से उपनिषदों पर यह शृंखला आरम्भ कर रही हूँ - कितनी नियमित रह पाऊंगी, पता नहीं ।

प्रस्तावना 1

भारत के इतिहास में, आत्म उत्थान के प्रयासों में , दर्शनशास्त्र, तत्त्वविज्ञान आदि के क्षेत्रों में , उपनिषदों के प्रबल प्रभाव रहा है । अलग अलग समयखंडों में, अनेक प्रकार के लोगों को, विविध प्रकार के कारणों से , उपनिषद अपनी अद्वितीय विविधता से आकर्षित करते रहे हैं । ये अगोचर, अव्यक्त, अप्रत्यक्ष, अविकारी परम सत्य के विषय में हमें सम्यक रूप से जानकारी देते हैं । मानव अस्तित्व, दर्शन, और धर्म के बारे में इनसे बेहतर ज्ञान देय, या इनके समानान्तर भी, इस जगत के किसी और ग्रन्थ / साहित्य आदि में मिलना असंभव सा लगता है ।

इन्हें कहने वाले निष्कपट महात्माओं के बारे में निर्विवाद छवि यही है कि इन्होने सत्य की खोज में ध्यानमग्न होकर परमसत्य को जाना और आत्मसात किया है, तब ही ये बातें कही हैं । वे इस व्यतीत होते  क्षणभंगुर संसार के पीछे के सत्य नित्य संसार को, ( जो है, किन्तु अव्यक्त है, अचिन्त्य है ) हम पर अभिव्यक्त करने के प्रयास करते हैं । वह संसार प्रतीत तो ऐसे होता है जैसे सिर्फ एक सुदूर संभावना हो, किन्तु वह हर सांसारिक सच्चाई को टिमटिमाता दिया सा दर्शा देने वाला सौर्य तेज सा प्रखर परम सत्य है ।  सैद्धांतिक स्पष्टीकरण की आध्यात्मिक जिज्ञासा , मुक्ति और सत्य की लालसा , प्रबुद्ध मन और आत्मा के उत्थान का पथ हैं हमारे दिव्य उपनिषद ।

यदि उपनिषद हमें इस स्थूल अस्तित्व से ऊपर उठाने का सन्देश दे रहे हैं, तो इसके पीछे कारण हैं वे महान लोग, जो हमेशा दिव्यता की और उद्यमरत रहे । उपनिषदों का आदर सिर्फ इसलिए नहीं है कि ये "श्रुति" का हिस्सा हैं । बल्कि यह इसलिए वन्दनीय एवं श्रद्धेय हैं , कि ये पीढ़ियों से सत्य मार्ग के पथिकों को प्रेरित करते रहे हैं, उन्हें राह दर्शाते रहे हैं । इनका महत्त्व अक्षय और अटूट है । भारतीय विचारधारा पथ प्रदर्शन के लिए हमेशा इन प्रकाश्पुन्जों की और देखती रही है । देखने और खोजने में मन रखने वालों के लिए ये परमज्ञान का स्रोत हैं ।

"उपनिषद्" शब्द को ज्ञानी महापुरुष जन अलग अलग व्याख्याएं देते हैं  ।
एक व्याख्या है : उप = near +नि = down +षद=sit  = sitting down near
तो दूसरी है : षद = loosen / reach /destroy , जिसमे 'उप' और 'नि' उपसर्ग रूप में जुड़े हैं  : वह ब्रह्म ज्ञान जिससे अन्धकार और अज्ञान विनष्ट हो जाए ।

उपनिषदों के लिए वेदांत शब्द भी प्रयुक्त होता रहा है, जिसका शाब्दिक का अर्थ है "वेदों के अंत में आने वाले" । वेदों में अन्तर्निहित ज्ञान और विज्ञान का निष्कर्ष हैं ये महान सन्देश । चार वेद हैं : ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद और अथर्व वेद । प्रत्येक में संहिताएं, ब्राह्मण, आरण्यक, और वेदान्त उपनिषद् हैं । जहां मन्त्र और ब्राह्मण "कर्म" काण्ड पर जोर देते हैं, वहीँ उपनिषद् "ज्ञान" काण्ड पर । वेदों में देवताओं की स्तुतियाँ हैं : इंद्र, सूर्य, सोम, अग्नि, द्यौस , मारुत, पृथ्वी , वायु, मित्र, वरुण, विष्णु, अश्विन, आदि जो प्राकृतिक शक्तियों के अधिष्ठाता देव हैं । इसके अतिरिक्त, अमूर्त भाव - जैसे श्रद्धा, मन्यु आदि, की भी स्तुतियाँ हैं । विद्या प्राप्त कर चुके शिष्य को परीक्षित करने के उपरांत गुरु द्वारा वेदान्त की गुप्त शिक्षा मिलती थी । यह विज्ञान सिर्फ वह सीख सकता था जो विशुद्ध ज्ञानपिपासु होता । प्रार्थनाएं, शुद्ध ज्ञानार्जन , त्याग बलिदान के कर्म (काण्ड) ये सब सीख लेने के बाद जब पात्र सत्य प्राप्ति का सच्चा पात्र बन सके, तब ही वह उपनिषद् सीखने की स्थिति में आता था ।

उपनिषद 200 से अधिक कहे जाते हैं,  लेकिन भारतीय परम्परा के अनुसार ये 108 कहे गए हैं । वैदिक सन्दर्भों में इन्हें श्रुति या प्रकट सत्य कहा  गया है । ये सनातन, स्मरणातीत, और कालातीत हैं । इन्हें परमात्मा के श्वास से ऋषियों को गोचर हुआ कहा गया है - जिन्होंने अपने देखे हुए "सत्य" को शब्दों में प्रकट किया, जिससे ये "ऋचा" कहाए । ये साधारण दृष्टि से दृश्य नहीं है, न ही ध्यान या सोच विचार से पहुंचे गए निष्कर्ष हैं । ये असंदिग्ध प्राकट्य हैं उन "सत्य" का , जो महान ऋषियों ने दिव्य दृष्टि से प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर किये (देखे) और शिष्यों से कहे। ये व्यवस्थित सोच से निकाले गए निष्कर्ष नहीं , बल्कि आत्मिक प्रकाश के वाहक हैं । ये हमें एक समृद्ध और विविध आध्यात्मिक अनुभव देते हैं,  सिर्फ एक अमूर्त दार्शनिक श्रेणी का काल्पनिक विचरण भर नहीं । परम का सत्यापन व्यक्तिगत अनुभव, और तर्क दोनों ही कसौटियों पर हुआ है । उद्देश्य सिर्फ काल्पनिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक है । ब्रह्म विद्या सिर्फ एक "दर्शन" भर नहीं, बल्कि जीवन का तरीका होना ही ज्ञान का उद्देश्य जाना गया है ।