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शनिवार, 31 मई 2014

शिक्षा स्नातक ग्रेजुएट की डिग्री और नरेंद्र मोदी जी की मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी

स्मृति जी पर जो विवाद हुआ - फेसबुक पर कई चर्चाएँ हुईं । अपने versions यहाँ सहेज रही हूँ -

1. Most will choose to ignore this post. I am not asking you to comment either - just read it through with an open mind and think it over with an open mind. And let us leave smriti, modi, and congress (and their leaders' degrees) out of this. 

Of our population of about 100 crores (2001 census) meaning approximately 50 crore women, only about 12 million women are educated to graduate level. ONLY such women (12 millions = 1.2 crore out of about 100 crore people !!! ) can be ministers? Right?

So much for equality provided by the constitution irrespective of sex 

So much for the advocates of equality saying that despite her being "eligible" as per the CONSTITUTION, she should not get the post. And SHE here does NOT mean smriti irani - it means 48.8 crore women 

And don't say i am saying this because i am a woman - because i happen to be in the favored tinyyyyyyu bracket. Just think it over.

Also think why constitution writers did not give voting rights/ government forming rights only to higher education certified people. 






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2. 
When will our indian mentality learn to accept beautiful women as successful without throwing lot of mud disguised as concern about this and that? 


oh , she topped ?? - ohh the male teacher gave her more practical marks.oh , she got a promotion - ohhh she must have made the boss happy...

because, she can't have achieved anything on her own - because of course she has this and that limitations.... any man with similar qualifications would not be objected to - but how can SMRITI become the minister? 

i am really saddened. WHY do we have this mentality?

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3. अभी तक तो फेसबुक मित्र यह भी नहीं जानते कि मानव संसाधन मंत्रालय का सिर्फ एक हिस्सा है शिक्षा । सिर्फ शिक्षा मंत्रालय नहीं है वह । और यह किसी एक मित्र नहीं बल्कि कई कई वाल्स पर पढ़ रही हूँ की "शिक्षा मंत्रालय". सम्पूर्ण मानव संसाधन और "शिक्षा" में फर्क तक न जानने वाले एलिट पढ़े लिखे लोग भारत की 95% जनसंख्या (जो ग्रेजुएट नहीं है) से उनका संवैधानिक अधिकार छीन लेना चाहती है और चाहती है कि सिर्फ 5% एलिट पढ़ी लिखी जनसंख्या 95% पर मंत्री बन कर शासन करती रहे । और स्त्रियों में तो यह प्रतिशत और बुरा है 2% & 98%.

संविधान निर्माताओं ने सोच समझ कर ही मंत्री पद के साथ एजुकेशनल क्वालिफिकेशन लिंक नहीं की थी ।

जो भी इससे सहमत न हों वे संवैधानिक बदलाव की डिमांड लेकर पेटीशन शुरू कर सकते हैं । विपक्ष तो आपके साथ है ही (या होने की एक्टिंग तो कर ही रहा है) तो वह भी क्लियर हो ही जाएगा ।



4. 

5. 


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6. उच्च पढ़ाई की डिग्री सिर्फ और सिर्फ उस क्षेत्र में काबिलियत की परिभाषा है जिसमे काम करना हो । 
इंजीनियरिंग में डॉक्टरेट होना प्राथमिक स्कुल में पढ़ाने की काबिलियत नहीं देता । इकोनोमिक्स में पीएचडी कर के भी छठवी कक्षा में केमिस्ट्री पढ़ाने की काबिलियत नहीं आती ।

ऐसे ही मिनिस्टर बनने के लिए कोई "डिग्री" क्वालिफिकेशन नहीं होती, बल्कि प्रक्टिकल काम करने की रूचि और अभ्यास चाहिए । ग्रेजुएट होने न होने का किसी भी मिनिस्ट्री से कोई भी सम्बन्ध नहीं । मिनिस्टर या मंत्री बनने की न्यूनतम योग्यता है 
अ. भारतीय होना 
ब. लोकसभा या राज्य सभा का सदस्य होना (या ६ महीने में हो जाना)
स. तत्कालीन चुने गए प्रधानमन्त्री द्वारा चयनित होना। 

बस - इसके अलावा कुछ भी नहीं। अधिकाँश बहुत अच्छे और सक्सेसफुल राजनीतिज्ञ कोई बहुत डिग्रीधारी नहीं हैं । न ही इसका उलट है । दुनिया का सर्वश्रेष्ठ डांसर आवश्यक नहीं कि अच्छा पेंटर भी हो ।

हमारे देश में पढ़े लिखे लोगों को यह गलतफहमी हो गयी है कि कोई भी कार्यक्षेत्र हो, किसी भी क्षेत्र में योग्यता सिर्फ और सिर्फ "अकादमिक" डिग्रियां है । जबकि यह सच नहीं ।

इस दुनिया में सतरंगी प्रतिभाएँ हैं । हर प्रतिभा सिर्फ शैक्षणिक डिग्री की मोहताज नहीं । अधिकाँश डिग्रीधारी अच्छे राजनीतिज्ञ नहीं होते । साथ ही अधिकाँश अच्छे राजनीतिज्ञ आवश्यक नहीं कि डिग्रीधारी हों । आप डाटा चेक कर लीजिये चाहें तो ।

यदि आप गलत अफिदवित पर शिकायत करें/ करना चाहें, तो यह आपका नागरिक अधिकार है , यदि आपने उस उम्मीदवार को उस डिग्री के कारण वोट दिया हो ।

लेकिन सिर्फ इसलिए कि कोई व्यक्ति डिग्रीधारी नहीं तो उसकी काबिलियत और कार्य को पूर्णतः नकार देना और उस के संवैधानिक अधिकार पर हमले करना पूर्वग्रह के अतिरिक्त कुछ नहीं । यदि वे काम नहीं करें तो आपका पूर्ण अधिकार है आलोचना का । लेकिन सिर्फ डिग्रीधारी न होने से उन्हें काम करने देने से पहले ही नाकाबिल निकम्मा घोषित कर देना अनुचित है ।

लिटरेसी , एजुकेशन, और इंटेलिजेंस और काबिलियत सब की अलग अलग परिभाषाएं हैं मानव संसाधन मेनेजमेंट में । पढ़े लिखे डिग्री धारी लोग इतना तक नहीं समझ पा रहे की "hrd" का अर्थ "मानव संसाधन" है "शिक्षा" नहीं । न यह समझ पा रहे हैं कि मंत्री क्लास नहीं पढाता है, बल्कि योजनायें बनाता है । जो शिक्षा इतनी सहज बातें भी न सिखला सकी, उस शिक्षा को आप हर एक क्षेत्र में काबिलियत का कॉमन पैमाना समझ रहे हैं । शिक्षा इतना गुरूर लाती है क्या?

क्या आप लोग बाकी 95% पोपुलेशन को मानव संसाधन नहीं मानते? उनके कोई योगदान ही नहीं हैं? क्या आज़ादी की लड़ाई सिर्फ डिग्रीधारियों ने लड़ी? क्या मानव संसाधन सिर्फ डिग्रीधारी होते हैं? बाकियों का कोई योगदान नहीं होता ?

"शिक्षा" मानव संसाधन का एक बहुत बहुत महत्वपूर्ण भाग अवश्य है - किन्तु "सिर्फ" शिक्षा (या शिक्षित लोग) ही मानव संसाधन नहीं होता । न योजनाएँ सिर्फ शिक्षा या शिक्षितों के लिए बनती हैं । 




7. अधिकाँश लोग यही समझ रहे हैं कि यह सब मैं सिर्फ स्मृति जी से सम्बंधित लिख रही हूँ । हां वह भी एक कंसर्न अवश्य है । मुझे वे पसंद हैं - लेकिन वह मेरी निजी चोइस होगी । लेकिन यह स्टेटस जनरल है ।

हमारे मन में यह बात बहुत गहरी बैठ गयी है कि कोई हमसे कम पढ़ा है तो वह हमसे कमतर है । इस लायक नहीं और उस लायक नहीं । यह सच नहीं है - और यह एक नई जाती व्यवस्था को जन्म दे रहा है । मेरी कंसर्न यह है

शनिवार, 24 मई 2014

मोदी जी की होलोग्राफिक रैलियाँ - कैसे बनते हैं होलोग्राम ?


चुनावों के दौरान हमने देखा और सुना कि नरेंद्र मोदी जी ने "होलोग्राफिक रैली" की। इस आलेख में समझाने का प्रयास करती हूँ कि यह किस तरह काम करता है। विस्तृत जानकारी के लिए विकिपीडिया देखियेगा  :)

होलोग्राफी एक ऐसी तकनीक है जिससे त्रि-आयामी तस्वीरें बनती हैं।  इन तस्वीरों को होलोग्राम कहते हैं।  ये बनाने के लिए लेज़र, इंटरफेरेंस (प्रकाश की दो किरणों के एक दुसरे को काटने पर उनका एक फेज़ में होने से जुड़ कर बढ़ना या उलटे फेज़ में होने से घटना), डिफ्रैक्शन (विवर्तन), और लाइट इंटेंसिटी (प्रकाश की तीव्रता या मात्रा) को इस्तेमाल कर के रिकॉर्डिंग होती है।  

जिस प्रकार हम किसी को असलियत में देखते हुए अपने स्थान से दूसरी और जाते हुए उस व्यक्ति को अलग कोण से देखें तो वह हमें अलग दीखता है, उसी तरह या तस्वीर भी दूसरी तरफ से (दुसरे कोण से) देखि जाए तो उसी प्रकार अलग दृश्य देती है।  अर्थात तस्वीर और असल व्यक्ति जहाँ जो कर रहा है / था रिकॉर्डिंग के वक़्त - इन दोनों में कोई फर्क नहीं होता।  ये दो चित्र देखिये - एक ही ऑब्जेक्ट की एक ही होलोग्राफिक तस्वीर के एक ही समय लिए गए दो (साधारण २-डायमेंशनल) चित्र - जो अलग अलग कोण से लिए गए हैं - अलग अलग दिख रहे हैं : 




होलोग्राफिक रिकॉर्डिंग अपने आप में इमेज नहीं होती।  यह प्रकाश की बदलती घटती तीव्रता का , उसके घनत्व का और उसके अलग अलग कोण से दीखते प्रोफाइल (पार्श्व चित्र) का एक स्ट्रक्चर (संरचना) होती है।  

इस तकनीक की खोज का श्रेय जाता है हंगरी / ब्रिटिश फिजिसिस्ट डेनिस गाबोर को।  इन्हे इसके लिए नोबल प्राइज भी मिला था।  इसकी शुरुआत एक्स-रे मायक्रोस्कोपि की नींव पर हुआ।  

पहले ये तस्वीरें स्ट्रक्चर पर लेज़र फेंक कर बनती थीं अब या साधारण सफ़ेद रौशनी से उजागर (illuminate) की जाती हैं।  इसे "रेनबो ट्रांसमिशन: इंद्रधनुषी प्रसारण या प्रकटन" कहा जाता है।  ये क्रेडिट कार्ड सेक्युरितु आदि में भी उपयोग होता है। एक और आम तौर पर इस्तेमाल किया जाने वाला होलोग्राम है डेंसियुक होलोग्राम, जिस पर देखने वाली दिशा से ही प्रकाश गिरता है और सतरंगी तस्वीर (गहराई लिए) उभरती है - ऐसे देवी देवताओं वाले चित्र आपने मंदिरों के आस पास कई दुकानों पर बिकते देखे होंगे।  

आरम्भ में यह सोचा गया कि हम एक्सरे से मॉलेक्युल्स के होलोग्राम बना कर उन्हें स्टडी कर सकेंगे, किन्तु यह अब तक नहीं हो पाया है।  

स्पेकुलर होलोग्राफी में दो आयामी सतह पर तीन आयामी चित्र उभारे जाते हैं (लिंक एक, लिंक दो ) . स्पेक्युलर रिफ्लेक्शन का अर्थ होता है अलग अलग ऑब्जेक्ट्स को प्रकाश बिंदु से जब प्रकाशित किया जाता है तो उसके अलग अलग curved सतहों से अलग अलग प्रतिबिम्बन होते हैं जिससे वह हमें तीन आयामी दिखता है - इसी तरह के प्रतिबम्बन इस तस्वीर में भी देखने मिलते हैं।  यह चित्र देखिये :

File:Specular highlight.jpg

अधिकाँश होलोग्राम स्थिर या अचल विषयवस्तु के भिन्न भिन्न दिशा और कोनों से ली गयी तस्वीरों को संघटित और संगठित कर के बनाए जाते हैं।  यानी जैसे आप साधारण टीवी देखते हैं तो आपके टीवी स्क्रीन पर किसी भी एक समय पर जो चित्र है वह एक कैमरा ने लिए है - लेकिन यहां अनेक कैमरा हैं सब ओर और सब की बाइनरी इमेज संघटित कर एक त्रि-आयामी इमेज (तस्वीर ) आपको दिख रही है।  होलोग्राम 

होलोग्राम प्रकाशिक जानकारी के भंडारण ; संसाधन और पुनः-प्रतिस्थापन ; के लिए भी इस्तेमाल होते हैं।  

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होलोग्राम कैसे बनते हैं ? : आइये एक नज़र देखते हैं :)

एक प्रकाश क्षेत्र को (सिर्फ उसमे स्थित वस्तुओं भर का नहीं बल्कि उनसे बिखरे प्रकाश का भी) रिकॉर्ड किया जाता है , और बाद में तस्वीर में संघटित कर त्रि आयामी चित्रण किया जाता है। 

रिकॉर्डिंग की विधि :


दोबारा संघटन की विधि 


 इसे आप आवाज़ की रिकॉर्डिंग की तरह समझ सकते हैं - जैसे एक स्रोत से प्रेषित ध्वनि तरंगों को हम रिकॉर्ड करते हैं और कहीं और (जहाँ वह स्रोत नहीं है) उन्ही तरंगों को दोबारा उत्पन्न करते हैं, उसी तरह यहां प्रकाश तरंगों के साथ होते है।  
होलोग्राम रिकॉर्ड करने के लिए लेज़र प्रकाश सीन पर फ़्लैश किया जाता है और रिकॉर्डिंग मीडियम पर इसका इंप्रिंट (छाप) ले ली जाती है - जैसे कोई चित्र लिया जाता है।  किन्तु एक फर्क है।  वह यह कि प्रकाश की बीम के एक भाग को भी को सीधे भी रिकॉर्डिंग मीडियम पर सीधे चमकाया जाता है - उसी समय।  इस दूसरी बीम को रिफरेन्स बीम (सन्दर्भ किरण) कहते हैं।  लेज़र प्रकाश इसलिए प्रयुक्त होता है क्योंकि उसमे वेवलेंथ (तरंगदैर्घ्य) नियंत्रित की जा सकती है जबकि साधारण प्रकाश (जैसे सूर्य का) में वेवलेंथ मिली जली रहती हैं। शटर टाइम को कड़ाई से नियंत्रित किया जाना आवश्यक है (जैसा साधारण केमेरा में भी होता है) . बाहरी रौशनी दखल न दे इसलिए होलोग्राफिक रिकॉर्डिंग या तो अँधेरे कमरे (डार्क रूम) में होती है या फिर लेज़र के रंग से बहुत अलग तरंगदैर्घ्य के हलके प्रकाश में।  

रिकॉर्डिंग माध्यम के लिए कई विकल्प उपलब्ध हैं।  एक है टोफ़ोटोग्राफिक फिल्म (सिल्वर हैलाइड) जो साधारण फोंटोग्राफी में भी प्रयुक्त होती है किन्तु इसमें प्रकाश से प्रतिक्रिया करने वाले ग्रेन्स अधिक  कॉन्सेंट्रेटेड होते हैं।  इससे रेज़ल्यूशन बढ़ जाता है।  

जब ये दोनों लेज़र किरणें माध्यम पर पड़ती हैं तो एक दुसरे को काटती हैं और interfere करती हैं।  इससे जो पैटर्न बनता है , वही माध्यम पर छप जाता है।  

यह प्रतिच्छाया देखने में एकदम ही अनियमित दीखता है और इसमें मूल वास्तु से कोई भी साम्य नहीं दीखता। जैसे ऊपर यह प्रतिच्छाया एक खिलौना वैन की है जो किसी भी तरह से एक वन नहीं लग रही। किन्तु जब दूसरी ओर यह सीन फिर से बनाना हो , तब वहां पहले वाले लेज़र जैसा ही (ठीक वैसा ही) प्रकाश सोर्स चाहिए होता है, और जब यह प्रकाश उस होलोग्राफिक (डेवलप्ड) चित्र पर चमकाया जाता है तब ठीक पहले जैसा प्रकाश सीन बन जाता है जो भ्रम देता है कि त्रि-आयामी विषय वस्तु यहीं मौजूद है।  

शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

श्रीमद भागवतम १ : नैमिशारण्य, नारद पूर्व जन्म कथा

व्यास शिष्य "रोमहर्ष" जी के पुत्र ज्ञानी उग्रश्रवा हिमालय पर्वत के दक्षिणी ढलावों पर नैमिषारण्य पहुंचे, जहां शौनक जी अन्य ऋषियों के साथ यज्ञ कर रहे थे जिससे वहां कलियुग का प्रवेश नहीं हुआ था।  ऋषियों ने श्री सूत जी से प्रार्थना की कि कलियुग के अशुभ प्रभाव से बचने का उपाय बताएं।  तब उन्होंने भागवत कथा आरम्भ की।
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व्यास जी के आश्रम के निकट सरस्वती नदी बहती थीं।  व्यास शून्य आँखों और अशांत मन से बहते जल को देख रहे थे, तभी नारद मुनि वहां पधारे।  व्यास जी ने अति विनम्रता से पूछा, :

"हे गुरुवर , आगे समयक्रम में कलि  के प्रभाव से मानव अति दुखी होगा।  इसीसे उसे बचाने के लिए मैंने एक ज्ञान को चतुर्वेदों में संपादित किया जिससे ज्ञान लुप्त न हो। कर्मकांडियों  के लिए वेद, और ज्ञानपिपासुओं के लिए उपनिषद संपादित किये।   फिर यह जानते हुए कि वेद पाठ हर मनुष्य को सुलभ नहीं, मैंने महाभारत कथानक लिखा, जिसमे गीता के माध्यम से वेदज्ञान का निचोड़ जान जान तक पहुंचाया।  महाभारत में मानव के हर शुभ अशुभ कर्म के लक्षण और फल पर चिंतन है।  यह सब होने के बाद भी मेरा मन अशांत क्यों है ? मुझे अधूरे कर्म की अनुभूति क्यों है ?

नारद मुनि ने कहा - हे ब्राह्मण - आपको यह अनुभूति इसलिए ही है कि आपका निश्चित कर्म अभी भी अधूरा ही है।

वेदव्यास जी ने विनीत भाव से इसका कारण और उपाय पूछा।  नारद जी बोले - वेदों, उपनिषदों, महाभारत और गीता के माध्यम से आप ने कर्मकांड, ज्ञान योग, सांख्य और कर्म योग तो कहा - लेकिन भक्तियोग जो सबसे सुलभ और शीघ्र फलदायी है - उस पर कुछ नहीं कहा।  ज्ञान कर्म एवं निष्काम योग की साधना हर मानव के लिए संभव नहीं।  भक्ति स्वयं फलदायी और सुलभ है - इसलिए अब आप एक नवीन ग्रन्थ की रचना करें , जिसमे सिर्फ और सिर्फ प्रभु की अनंत लीलाओं का भक्ति प्रकाश में वर्णन हो , जिसे सुन / गन / पढ़ कर मानव के मन में सहज ही उसके प्रति प्रेम और निश्छल भक्ति का प्रस्फुटन हो।  इससे ही कलिकाल में मानव कलिप्रभाव की अग्नि से शीतलता पा सकेगा।

नारद जी बोले - हे ऋषि - मेरे पूर्व जन्म की कथा कहता हूँ - सुनो।  इस पर व्यास मुनि चकित स्वर में बोले - आप तो ब्रह्मा जी की संतान हैं और इस सृष्टि के आरम्भ में आपका।   आपका पूर्व जन्म  हुआ ? तब नारद जी बोले - इस सृष्टि से पूर्व भी सृष्टि थी।  उस कल्प में मैं एक दरिद्र माता का इकलौता पुत्र था।  मेरी माता शूद्र थीं और ऋषि आश्रम में सेविका थीं।

एक बार कुछ वैष्णव भक्त चातुर्मास के लिए वहां पधारे।  मैं नन्हा बालक था इसलिए उनके ज़रूरतें पूछने के लिए उनके आस आपस रहने का कार्य मुझे सौंपा गया  (  पाठक ध्यान दें - शूद्रा ऋषि सेवा में थीं और उनका बालक वैष्णवों के साथ था - छुआ छूत  कहीं नहीं दिखती न?)

मेरे बालक रूप में भी रुचियाँ अलग थीं और मैं खेलना कूदना न कर के श्रवण में अधिक रूचि रखता था।  उन वैष्णव भक्तों को मुझसे बहुत प्रेम हो गया और उनके  रहते उनकी भक्ति  श्रवण से मेरे मन में महाविष्णु जी के प्रति अनंत प्रेम उत्पन्न हुआ।  उन सभी  के जाने का समय होने पर मैं प्रभु वियोग की कल्पना से सिहर उठा और बहुत रोने लगा।  उन्होंने मुझ बालक को सप्रेम कहा कि मेरे मन में भक्ति है , एवं अब मैं प्रभु से अलग नहीं हूँगा , और उन्होंने मुझे अपना शिष्य स्वीकारा।

इस असीम कृपा के बाद भी , मेरा माता से मोह छूट जाने के उपरान्त भी , मैं यह जानता था कि जिस माता का मैं पुत्र हूँ वह मुझसे बहुत मोह रखती हैं एवं मेरे बिना नहीं जी पाएंगी।  सो मोहरहित होते हुए भी पुत्र धर्म से बंधा मैं माँ से दूर और उन गुरु महात्माओं के संग न जा सका।

समय क्रम में सर्प दंश से मेरी माता जी सीधारीं , जिसके बाद मैं  से  प्रभु की साधना में लगा।

एक दिन जब मैं ध्यान में बैठा तो मेरे अंतर्मन में प्रभु की आकृति बनी जिस से मैं आनंदमग्न हो विभोर हो उठा।   उसी आनंदातिरेक में मेरा ध्यान टूट गया।  फिर दुबारा मुझे वह आकृति नहीं दिखी और मैं वियोग में विक्षिप्त सा हो इधर उधर उन्हें खोजने लगा।  तब आकाशवाणी हुई कि यह दृश्य मुझे अब इस जन्म में नहीं दिखेगा, यह सिर्फ मुझे यह विश्वास दिलाने को दिखा था कि वे हैं और एक बार यह देखने के बाद मनुष्य के मायाभ्रमित होने की कोई संभावना ही नहीं रहती।

वह जीवन मैंने भक्तिमय हो गुज़ारा और क्षीर सागर की तरफ आया।  प्रलय के समय मैं ब्रह्मा में लीं हुआ और इस सृष्टि के आरम्भ में उन्होंने मुझे अपने मानस पुत्र के रूप में व्यक्त किया।

यह बताने के पश्चात नारद जी वहां से चले गए और वेदव्यास जी ध्यानमग्न हो भक्ति रचना के लिए प्रभु के विभिन्न अवतरणों के ध्यान में स्थिर हो गए।

जारी .......

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

ब्रेन मशीन इंटरफ़ेस

गिरिजेश राव जी से काफी समय पहले यह पोस्ट लिखने का कहा था - फिर भूल गयी।  अभी पिछले हफ्ते कॉलेज में मिनी प्रोजेक्ट "अविष्कार" प्रतियोगिता में एक बैच ने यही प्रोजेक्ट लगाया था (वे प्रथम भी आये) तो याद आया की यह पोस्ट लिख लेनी चाहिए अब तो।

यह एक प्रोजेक्ट है जो परललाइज़ड लोगों के लिए और उनके अटेन्डर्स के लिए बहुत मददगार होगा - उनके लिए जो बोल तक नहीं सकते अब किसी भी वजह से।

यह प्रोजेक्ट ब्रेन वेव्स को सेन्स करता है।  व्यक्ति के आगे एक स्क्रीन होगी जिस पर पानी, खाना, टॉयलेट कपडे आदि के icons दीखते होंगे।  व्यक्ति इनमे से जो भी चाहे उस पर देखे और ध्यान केंद्रित करे - और उसके ब्रेन के तरंगों को समझ कर यह सिस्टम समझ सकेगा की वह क्या चाह रहा है। आजकल के स्मार्ट फोन्स में भी "रेटिना" सेंसर" होते हैं जो देखते हैं कि व्यक्ति सतह को देख रहा है या नहीं।  इससे एक कदम आगे यह सिस्टम यह भी देखता है कि व्यक्ति का ध्यान स्क्रीन के किस हिस्से (आइकॉन) पर है।

फिर या तो रोबोटिक अटेंडर या फिर मानव अटेंडर को पेशेंट की यह requirement  बताई जायेगी - मानव अटेंडर हो तो व्यक्ति के विचारों की तरंगों को पढ़ कर शब्दों में बदलने के भी सिस्टम हैं।

यह प्रोजेक्ट परलाइज़ड लोगों के लिए एक वरदान सिद्ध होगा ऐसा मुझे लगता है।  डिटेल में फिर कभी चर्चा करुँगी इसके पीछे की टेक्नोलोजी की।  अभी इतना ही :)


मंगलवार, 18 मार्च 2014

श्रीमद भगवद गीता २.१५

इस श्रंखला की पिछली पोस्ट में हमने इस श्लोक पर बात की ।

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः |
आगमापायिनोSनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत || १४ ||

इस श्रंखला के बाकी भाग देखने चाहें / पहले भाग से पढ़ना चाहें तो ऊपर गीता टैब पर क्लिक करें । या फिर ये लिंक देखें

1.1 , 1.2 , 1.3
2.1, 2.2, 2.3, 2.4, 2.5, 2.6, 2.7, 2.8, 2.9and 2.10,

उस पोस्ट पर एक चर्चा चली जिसमे महाभारत युद्ध में दोनों ही पक्षों का अधर्म पथ पर होने की बात हुई । इस पर मैं कोई टिप्पणी नहीं कर रही हूँ । सिर्फ यह कह रही हूँ कि इस श्रंखला में मैं महाभारत ग्रन्थ पर नहीं बल्कि गीता पर बात कर रही हूँ । गीता महाभारत युद्ध के दौरान पुनः कही गयी है लेकिन यह महाभारत का हिस्सा नहीं । श्री कृष्ण (आगे गीता में) अर्जुन से कहते हैं कि यह गीता ज्ञान मैंने पहले सूर्य देव को दिया था जिन्होंने अपने पुत्र को दिया और परम्परा से वह ज्ञान आगे बढ़ा - लेकिन समय के साथ यह लुप्तप्रायः हो चला है इसलिए मैं आज इसे फिर से तुझे कह रहा हूँ ।

अजीब बात यह है कि , यह सब "अर्जुन को कृष्ण न लड़वाते तो हिंसा रूकती" कहने वाले लोग वे ही हैं जो कुछ महीने पहले दामिनी के गुनाहगारों को सड़क पर जंगली से जंगली सजाओं की वकालत कर रहे थे। क्या वे कहेंगे कि जज की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को यदि कटघरे में खड़ा बलात्कारी अपना गुरु या परिवारजन दिखे (या शक्तिशाली राजपुत्र दिखे) तब जज को "अहिंसावादी" बन कर पीछे हट जाना चाहिए ? ............. लेकिन यह रक्त का उबाल राजपुत्र दुर्योधन के अनेकानेक स्त्रियों के शोषण पर उबाल नहीं खाता , क्योंकि वह सब तो "पुरानी बात" है  । दुर्योधन की नज़र न सिर्फ अपनी भाभी (राजपरिवार की बहू )पर ही पड़ी बल्कि यदि आपको याद हो तो पांडवों के वनवास के दौरान एक और राजकन्या के साथ उसने यही किया था । जब राज कन्या के साथ  का यह  होता था तो जन साधारण की तो सोच ही सकते हैं  ।

लेकिन नहीं -  ये सब   भूल कर ये "ज्ञानीजन" अचानक "अहिंसावाद" पर चल देते हैं और गीता कह कर अर्जुन को प्रेरित करने के लिए कृष्ण को "अपराधी" घोषित कर देते हैं । वे यह भी भूल जाते हैं कि अक्सर साधारण स्थितियों में अहिंसा की बात करने वालों को वे स्वयं ही मूर्ख / डरपोक / आदि आदि  ... घोषित करते हैं ।

लेकिन जब गीता की बात होती है तब अचानक सब न्यायप्रियता और वीरता "अहिंसावाद" की ओट  में छुप जाती है  । तब उन्हें अचानक लगने लगता है कि यदि बलात्कारियों के साथ अपने पितामह / गुरु / भाई दिखें तब न्याय की रक्षा को भूल कर युद्ध से पीठ दिखा देना "भला और सही रास्ता " हो जाता है  ।

कृपया गीता की चर्चा पर बने रहे । महाभारत की (औचित्य और अनौचित्य ) चर्चा उसी महाभारत श्रंखला पर रहे तो बेहतर रहेगा । जब हम केमिस्ट्री की क्लास में बैठते हैं तो फिजिक्स की बात नहीं करते । लेकिन जीवन मूल्य सिखाने वाली गीता पर हम जज और ज्यूरी बन कर अपने निर्णय देने लगते हैं ।
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अब अगला श्लोक :

यं हि न व्यथ्यन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ् |
सं दुःख सुखं धीरं सोSमृतत्वायकल्पते ||


भावार्थ: 
जिसे ये सब व्यथित नहीं करते और जो इन सब (शारीरिक या मानसिक) परिस्थितियों में सम रहता है (और अपना निश्चित कर्म करता रहता है) वह पुरुष श्रेष्ठ है, और मुक्त है ।  
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गीता का दूसरा अध्याय पूरी गीता का summarization सा लगता है मुझे  । पहले दस श्लोकों में अर्जुन की व्यथा  थी । वह अपने रिश्ते नातेदारों को देख आकर विचलित हो जाता है और युद्ध को छोड़ देने की बातें कहता है । अब कृष्ण उसे समझा रहे हैं ।

पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि जैसे हमारी इन्द्रियां (sense of touch etc) हमें (हमारे शरीर को भिन्न शारीरिक परिस्थितियों में ) सर्दी और गर्मी का अनुभव कराती हैं , उसी तरह हे कुन्तीनन्दन, हमारे मन को भी सुख और दुःख का अनुभव होता है (भिन्न मानसिक परिस्थितियों में) । जैसे सर्दी और गर्मी (ऋतुएँ ) आती जाती रहती हैं और स्थायी नहीं हैं उसी तरह हे अर्जुन ये सुख दुःख के अनुभव भी आते जाते हैं और स्थायी नहीं हैं । (अपने मन से) इन्हें (जैसे शरीर गर्मी और सर्दी को सहन करता है) सहन कर ।

इस श्लोक में कृष्ण कह रहे हैं कि  जिस किसी मनुष्य को ये सब स्थितियां डावांडोल नहीं कर सकें वही मनुष्य मनुष्यों में श्रेष्ठ है और मोक्ष में है । आगे जाकर कहीं मुक्ति नहीं - अभी इसी जीवन में यदि कोई दुःख सुख से अनछुआ है तो अभी की ही स्थिति अमृतमय मुक्ति है ।

अब यह दोनों श्लोक सिर्फ महाभारत के सम्बन्ध में नहीं है  । दुःख और सुख को समान मान कर कर्म करने वाले ही सच में कर्तव्य कर्म कर सकते हैं । जो दुःख सुख से चलायमान होंगे वे कटु कर्तव्य कर ही नहीं सकते । क्योंकि वे तो दुःख से बचने और सुख की ओर जाने वाली ही राह चुनेंगे । ध्यान देने की बात है कि यहाँ कहीं भी युधिष्ठिर या दुर्योधन के सही गलत होने पर कुछ नहीं कहा गया है । बल्कि व्यक्ति के निजी कर्त्तव्य की बात कही जा रही है  ।

एक योद्धा जो युद्ध भूमि में आ चुका है, जिसके रण कौशल के भरोसे उसके राजा युद्ध में उतरे हैं - वह अब पीठ दिखा कर भागना चाहता है क्योंकि विरोध में उसके अपने खड़े हैं ।

कृष्ण कह रहे हैं कि अपने निजी दुःख सुख को आने जाने वाला (ऋतुओं की तरह परिवर्तन शील) मान ले, और अपना (अपना का अर्थ है अपन कर्म - योद्धा अर्जुन का कर्म - व्यक्ति अर्जुन का नहीं, पुत्र अर्जुन का नहीं, शिष्य अर्जुन का नहीं) कर्म कर । जो व्यक्ति अपने निजी दुःख सुख को परे कर कर्म कर सके वही मानवों में श्रेष्ठ होता है।

यह सब कृष्ण कब कह रहे हैं  ? कई लोग कहते हैं कि कृष्ण यदि अर्जुन को न समझाते , तो युद्ध रुक जाता , कई कई लोग न मरते। लेकिन वे भूल जाते हैं कि कृष्ण ने युद्ध से पहले तक बहुत समझाया था किन्तु अर्जुन तब अपने क्रोध (द्रौपदी का अपमान , वनवास का अपमान, आदि आदि) से क्रुद्ध हुआ युद्ध को उद्धत था। तब क्या अर्जुन नहीं जानता था कि युद्ध में कौन सामने होंगे ? भीष्म और द्रोण तो द्यूत क्रीडा के समय ही उसे अपना पक्ष बता चुके थे, और सारे पांडव जानते थे कि वे कौरवों के साथ खड़े दिखेंगे । फ़िर अब नया क्या हुआ ?

जो लोग हज़ारों प्राणों के खोने की बातें करते हैं वे यह भूल जाते हैं कि वे खुद अपने देश के शत्रु देश के शुरू हो चुके युद्ध के दौरान मुख्य सेनानायक/ जनरल / सेनाध्यक्ष .... के अर्जुन की तरह "अहिंसावादी" बन कर संन्यास ले कर युद्ध भूमि छोड़ देने को वे खुद क्या कहेंगे ???? वे यह भी भूल जाते हैं कि हर आतंकवादी घटना के बाद वे खुद युद्ध छेड़ने की गुहार लगाते हैं - यह भूल कर की युद्ध में कितनी "हिंसा" होगी और कितने "निर्दोष सैनिक" मारे जायेंगे। कितनी औरतें विधवा होंगी, और कितने बच्चे अनाथ हो जायेंगे  ।

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यदि हमें गीता समझनी है तो अपने आप को महाभारत के मायाजाल से निकाल कर इसे देखना होगा  । गीता जीवन पथ प्रदर्शिका है - यह महाभारत या अर्जुन तक सीमित नहीं है  । कृपया काँटों में उलझे रह कर गुलाब से मुंह न मोडें - इसे समझने के प्रयास करें ।

गीता की असल शुरुआत मुझे लगती है २.११ से । कई विद्वान् ऐसा मानते हैं तो कई नहीं मानते । यह मेरा अपना विचार था की यहाँ से श्री भगवान् का कथन शुरू होता है और पहले बैकग्राउंड है - और पहली बार मुझे श्रीविनोबा भावे जी का version  श्री अनुराग शर्मा जी की आवाज़ में सुनते हुए यह पता चला कि यह और भी लोग मानते हैं  । और यहाँ से कृष्ण का गीत आता है । पूरी महाभारत में न उलझें - इस पर आयें । दुसरे अध्याय के ग्यारहवे श्लोक से जो पोस्ट  लिखी हैं उनके भावार्थ फिर से पेस्ट कर रही हूँ  (ऊपर पूरी पोस्ट्स के लिंक भी हैं ।) :  :

11 श्री भगवान् ने कहा - तू न सोचने योग्य बातों पर इतना सोचा रहा है, और पंडिताई की भाषा प्रयुक्त करता है | किन्तु जो सच ही में पंडित हो - वह तो जिनके प्राण चले गए, या जिनके नहीं भी गए, उन दोनों के ही लिए शोक नहीं करते |

12 (श्री कृष्ण आगे अर्जुन से बोले - )
निश्चित ही पूर्व में ऐसा कोई काल नहीं था जब तू नहीं था, या मैं नहीं था या ये सब राजागण नहीं थे । न ही आगे ऐसा कोई काल होगा जब हम सब नहीं होंगे ।


13 जैसे शरीर में रहने वाला आत्मा अपरिवर्तित ही रह कर लगातार बदलते हुए शरीर में वास करता है (शरीर बालक से जवान होता है, फिर बूढा भी परन्तु उसके भीतर रहने वाला व्यक्ति वही रहता है ) उसी तरह मृत्यु के समय भी वही आत्मा एक से दूसरे शरीर में पुनर्वास कर लेता है | जो यह जानते हैं , वे मोहित नहीं होते ।

14 इन्द्रिय अनुभूति (और मन की भी ) - गर्मी, सर्दी,सुख और दुःख की अनुभूति कराती हैं । जैसे ये मौसम के असर आने जाने वाले हैं, स्थायी नहीं, वैसे ही सुख दुःख भी आने जाने वाले हैं । हे भारत, इनसे प्रभावित हुए बिना इन्हें सहन करना (अनुभव करते हुए भी उपेक्षा करना) सीख । 

15 जिसे ये सब व्यथित नहीं करते और जो इन सब (शारीरिक या मानसिक) परिस्थितियों में सम रहता है (और अपना निश्चित कर्म करता रहता है) वह पुरुष श्रेष्ठ है और मुक्त है ।  

इन श्लोकों में जीवन का ज्ञान है - अपने मानस में इन्हें कृपया सिर्फ पांडव कौरव युद्ध के सन्दर्भ भर तक सीमित न रखें  ।

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जारी 

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disclaimer:
कई दिनों से इच्छा थी, कि भगवद गीता की अपनी समझ पर लिखूं - पर डर सा लगता है - शुरू करते हुए भी - कि कहाँ मैं और कहाँ गीता पर कुछ लिखने की काबिलियत ?| लेकिन दोस्तों - आज से इस लेबल पर शुरुआत कर रही हूँ - यदि आपके विश्लेषण के हिसाब से यह मेल ना खाता हो - तो you are welcome to comment - फिर डिस्कशन करेंगे .... यह जो भी लिख रही हूँ इस श्रंखला में, यह मेरा interpretation है, मैं इसके सही ही होने का कोई दावा नहीं कर रही  
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मेरे निजी जीवन में गीता जी में समझाए गए गुण नहीं उतरे हैं । मैं गीता जी की एक अध्येता भर हूँ, और साधारण परिस्थितियों वाली उतनी ही साधारण मनुष्य हूँ जितने यहाँ के अधिकतर पाठक गण हैं (सब नहीं - कुछ बहुत ज्ञानी या आदर्श हो सकते हैं) । गीता जी में कही गयी बातों को पढने / समझने / और आपस में बांटने का प्रयास भर कर रही हूँ , किन्तु मैं स्वयं उन ऊंचे आदर्शों पर अपने निजी जीवन में खरी उतरने का कोई दावा नहीं कर रही । न ही मैं अपनी कही बातों के "सही" होने का कोई दावा कर रही हूँ।   मैं पाखंडी नहीं हूँ, और भली तरह जानती हूँ  कि मुझमे अपनी बहुत सी कमियां और कमजोरियां हैं । मैं कई ऐसे इश्वर में आस्था न रखने वाले व्यक्तियों को जानती हूँ , जो वेदों की ऋचाओं को भली प्रकार प्रस्तुत करते हैं । कृपया सिर्फ इस मिल बाँट कर इस अमृतमयी गीता के पठन करने के प्रयास के कारण मुझे विदुषी न समझें (न पाखंडी ही) | कृष्ण गीता में एक दूसरी जगह कहते हैं की चार प्रकार के लोग इस खोज में उतरते हैं, और उनमे से सर्वोच्च स्तर है "ज्ञानी" - और मैं उस श्रेणी में नहीं आती हूँ ।