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बुधवार, 28 दिसंबर 2011

Does God Exist? - Christian story .... nice .....


The Atheist and the Bear

An atheist (one who does not beleive in God) was taking a walk through the woods. 'What majestic trees! What powerful rivers! What beautiful animals!', he said to himself. 
As he continued walking alongside the river he heard a rustling in the bushes. Turning to look, he saw a 7 foot grizzly charging towards him. 
He ran as fast as he could up the path. Looking over his shoulder he saw that the bear was closing in on him. His heart was pumping frantically and he tried to run even faster. 
He tripped and fell on the ground. He rolled over to pick himself up but saw the bear raising his paw to take a swipe at him.
At that instant the atheist cried out: 'Oh my God!...'
Time stopped.
The bear froze.
The forest was silent.
It was then that a bright light shone upon the man and a voice came out of the sky saying:
'You deny my existence for all of these years, teach others I don't exist and even credit creation to a cosmic accident.  Do you expect me to help you out of this predicament? Am I to count you as a believer?'
The atheist looked directly into the light.
'It would be hypocritical of me to suddenly ask you to treat me as a Christian now, but perhaps, could you make the BEAR a Christian?'
'Very well, 'said the voice. The light went out, and the sounds of the forest resumed.
And then the bear lowered his paw, bowed his head and spoke: 'Lord, bless this food which I am about to receive and for which I am truly thankful, Amen.'
............. courtesy - will and guy ....

बुधवार, 30 नवंबर 2011

श्रीमद्भगवद्गीता २.९, २.१०

संजय उवाच 
एवमुक्त्वा हृषीकेशं , गुडाकेशः परन्तप |
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ||

निद्रा को जीतने वाला अर्जुन ,  हृषीकेश (कृष्ण ) से , "हे गोविन्द, बस, मैं युद्ध नहीं करूंगा " ऐसा कह कर चुप हो गया |      

इतने सारे तर्क (या वितर्क ?){कि उसे युद्ध करना उचित क्यों नहीं है } देकर अर्जुन अपने आप को convince कर चुका है कि यह युद्ध नहीं करना ही उसके लिए उचित है | 

ध्यान दें कि 
(१) वह सुशिक्षित है, अपना कर्त्तव्य जानता है | यह भी जानता है कि धर्मयुद्ध से पलायन धर्म विरुद्ध है 
(२) यह भी कि वह "अहिंसा" के लिए नहीं, बल्कि प्रियजनों की मृत्यु के डर से यह कर रहा है | 
(३) यदि प्रिय पितामह और गुरुदेव (और कौरवों में से कुछ गिने चुने प्रिय भाई ) बच सकें, तो उसे युद्ध में होने वाली हिंसा / खो जाने वाली जानों ) से कोई आपत्ति नहीं है - वह कोई अहिंसावादी नहीं है - पहले भी कई सारे युद्ध कर चुका है, और आगे भी करेगा | 
(४) यह भी जानता है कि मैं प्रियजनों के मोह में पड़ कर अपने कर्त्तव्य से भाग रहा हूँ | अभी पीछे ही कृष्ण को गुरु कह कर उनकी शरण स्वीकारी है, अभी ही उन्ही गुरु को अपना निर्णय दे रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूंगा - कि यह उचित नहीं है | 
(५) अभी दो श्लोक पहले उसने कृष्ण को गुरु स्वीकारा और उनकी शरण में आया , यह कह कर कि "शिष्यस्ते अहम् , शाधिमाम त्वाम प्रपन्नम"

अब, जब तुम जानते ही हो कि क्या करना उचित है और तुम्हे क्या करना है, और तुम स्थिर हो कि तुम वही करोगे,  तो कैसी शरणागति ? यह ऐसा है कि बच्चा teacher से कहे कि मुझे maths नहीं आता, सिखाइए, फिर जब teacher कहे कि २+२=४ तो बच्चा बोले कि नहीं यह तो ३ होना चाहिए, ४ नहीं | :)

पर कृष्ण तो सद्गुरु हैं न? वे कैसे अपनी शरण में आये अर्जुन को गलत राह पर जाने देंगे ? तो वे उसे समझाते हैं अब |
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तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत |
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ||

उसकी इन बातों को सुन कर, हँसते हुए से, श्री कृष्ण ने , दोनों सेनाओं के मध्य खड़े हुए ,उस दुखी (अर्जुन) से ,ये वचन कहे  |


कृष्ण हंस रहे हैं | किन्तु यह हंसी शिष्य की हंसी उड़ने वाली हंसी नहीं, बल्कि उसे encouragement देने के लिए, उसका tension कम करने के लिए है | उन्हें अर्जुन के सारे विरोधाभास दिख रहे हैं, जो उसे स्वयं को नहीं दिख रहे |


युद्ध से पहले जब कृष्ण युद्ध टालने के प्रयास कर रहे थे - तब यही अर्जुन युद्ध के लिए लालायित था | उस पर तब प्रतिशोध का भूत सवार था | तब भी यह विदित था कि युद्ध होगा तो किनसे लड़ना होगा, कौन प्रिय जन जान हथेली पर ले कर युद्ध करेंगे | किन्तु तब उसने युद्ध चुना | इसलिए नहीं कि यह न्यायोचित या धर्मोचित था, बल्कि इसलिए कि उसे द्रौपदी के अपमान का बदला लेना था |


कृष्ण और युधिष्ठिर युद्ध टालना चाहते थे, किन्तु चारों छोटे पांडव भाई युद्ध चाहते थे | अब युद्ध छिड़ गया है, भेरियां बज गयी हैं | अब युद्ध छोड़ देने का अर्थ है, अन्याय को धर्म पर जीत जाने देना | 


यहाँ से असल गीता का ज्ञान दिया जाता है | यह सब सिर्फ भूमिका थी | अब कृष्ण का गीत है - जिसे श्रीमद (श्री)- भगवद (भगवान की) गीता (गीत) कहते हैं | यह दिव्य गीत अगले श्लोक से शुरू होगा |


इस गीता आलेख के बाकी भागों (इससे पहले और बाद के) के लिए ऊपर गीता tab पर क्लिक करें 
जारी 

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disclaimer:
कई दिनों से इच्छा थी, कि भगवद गीता की अपनी समझ पर लिखूं - पर डर सा लगता है - शुरू करते हुए भी - कि कहाँ मैं और कहाँ गीता पर कुछ लिखने की काबिलियत ?| लेकिन दोस्तों - आज से इस लेबल पर शुरुआत कर रही हूँ - यदि आपके विश्लेषण के हिसाब से यह मेल ना खाता हो - तो you are welcome to comment - फिर डिस्कशन करेंगे .... यह जो भी लिख रही हूँ इस श्रंखला में, यह मेरा interpretation है, मैं इसके सही ही होने का कोई दावा नहीं कर रही  
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मेरे निजी जीवन में गीता जी में समझाए गए गुण नहीं उतरे हैं । मैं गीता जी की एक अध्येता भर हूँ, और साधारण परिस्थितियों वाली उतनी ही साधारण मनुष्य हूँ जितने यहाँ के अधिकतर पाठक गण हैं (सब नहीं - कुछ बहुत ज्ञानी या आदर्श हो सकते हैं) । गीता जी में कही गयी बातों को पढने / समझने / और आपस में बांटने का प्रयास भर कर रही हूँ , किन्तु मैं स्वयं उन ऊंचे आदर्शों पर अपने निजी जीवन में खरी उतरने का कोई दावा नहीं कर रही । न ही मैं अपनी कही बातों के "सही" होने का कोई दावा कर रही हूँ।   मैं पाखंडी नहीं हूँ, और भली तरह जानती हूँ  कि मुझमे अपनी बहुत सी कमियां और कमजोरियां हैं । मैं कई ऐसे इश्वर में आस्था न रखने वाले व्यक्तियों को जानती हूँ , जो वेदों की ऋचाओं को भली प्रकार प्रस्तुत करते हैं । कृपया सिर्फ इस मिल बाँट कर इस अमृतमयी गीता के पठन करने के प्रयास के कारण मुझे विदुषी न समझें (न पाखंडी ही) | कृष्ण गीता में एक दूसरी जगह कहते हैं की चार प्रकार के लोग इस खोज में उतरते हैं, और उनमे से सर्वोच्च स्तर है "ज्ञानी" - और मैं उस श्रेणी में नहीं आती हूँ ।

सोमवार, 28 नवंबर 2011

श्रीमद्भगवद्गीता २.८

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्यात
यच्छ्होकमुच्छोषणमिन्द्रियाणां |
अवाप्यभूमावसपत्नंरिद्धं
राज्यं सुराणामपिचाधिपत्यं ||

अर्जुन ने कहा : मैं ऐसा कोई उपाय नहीं देख पा रहा जो मेरे इस इन्द्रियों को सुखा डालने वाले शोक को दूर कर सके (जो शोक प्रिय जनों की आसन्न हत्याओं के भय से उत्पन्न हुआ है ) | चाहे मुझे इस विजय से धरती का समृद्ध शत्रुविहीन साम्राज्य मिल जाये , या स्वर्ग का अधिपति ही बन जाऊं, तब भी यह गहन शोक न जाएगा |
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अर्जुन पिछले श्लोक (जिसमे उसने कार्पण्य से उपहत हो कर विवेक खो बैठा हूँ - यह स्वीकार कर के अपने को कृष्ण के शिष्य रूप में समर्पित कर दिया है ) आगे कह रहा है अब | वह अभी कह आया है (पिछले श्लोक में ) कि वह कृष्ण की शरण में है - जो वे कहेंगे वह करेगा | और अभी ही कह रहा है कि मुझे कोई उपाय नहीं दीखता | यह ऐसा नहीं की अर्जुन धोखा दे रहा है कृष्ण को, या विरोधाभास हो उसकी बातों में | वह इतना दुखी है - हाथ पाँव ठन्डे हुए जा रहे हैं, दिमाग काम नहीं कर रहा , खड़े नहीं हो पा रहा , हाथ से गांडीव गिर रहा है |

वह बेचारा (कृपया "बेचारा" शब्द पर विवाद न हो - बेचारा का अर्थ दया का पात्र नहीं होता - इसका अर्थ होता है - वह जिसे कोई चारा / उपाय न सूझ रहा हो ) समझ ही नहीं पा रहा कि मैं अब क्या करूँ, क्या कहूँ, कहाँ जाऊं ....... | सोचिये- उसे किसे मारना है - अपने प्रिय दादा, अपने प्रिय भाइयों, अपने प्रिय भतीजों आदि को - अपने आप को अपने सगे सम्बन्धियों के साथ सोचये - अर्जुन पर क्या गुज़र रही होगी, समझ में आएगा थोडा थोडा |

परन्तु - यह कर्म - यह परीक्षा - आवश्यक है | उसके अपने लिए नहीं - वरन धर्म की जीत के लिए आवश्यक है | यह विषाद ही उसे प्रभु के प्रति समर्पण के लिए तपा कर कुंदन कर रहा है | और जब ऐसा संपूर्ण समर्पण होगा - तब ही गीता ज्ञान आत्मसात हो पायेगा | नहीं तो तर्क कुतर्क के सिलसिले का क्या है - वह तो अनंत है |

आज की स्थिति में तो आये दिन लोग सिर्फ एक मकान भर के लिए सगे भाई की हत्या कर देते हैं | कोई लोग अपने अहंकार के पोषण के लिए पिता तुल्य व्यक्ति को व्यंग्य बाण मार मार कर इतनी मानसिक प्रतारणा देते हैं की वे खून के आंसू रोयें | पुत्र और पुत्रियाँ ( और पुत्रवधुएँ और दामाद) अपने जीते जागते बुजुर्गों को मानसिक आघात कर कर के इतना दुखित कर देते हैं की वह बुज़ुर्ग ईश्वर से मृत्यु मांगने लगे | इसी मानसिकता के कारण आज हमारी भारत भूमि पर old age homes स्थापित हैं :( |

लेकिन यहाँ अर्जुन कह रहा है कि (इन सब प्रिय जनों के बिना जीवन की कल्पना से भी ) जो मुझे कलेजे को चीर देने वाला दुःख हो रहा है- यह संताप तो स्वर्ग प्राप्त भी हो जाए - पर फिर भी नहीं जा सकता | वह धर्म अधर्म सब भूल गया है अभी इस मार्मिक दुःख से | यह भी भूल गया है कि इस युद्ध से वह ये सारे साम्राज्य जीतने को प्रयत्नरत भी नहीं है | उसे सिर्फ और सिर्फ अँधेरा नज़र आ रहा है |

इसके विपरीत दुर्योधन है - जिसकी और से पितामह लड़ रहे हैं | पर दुर्योधनी मानसिकता उन्हें सिर्फ एक योद्धा के रूप में देखती है | यदि उनकी मृत्यु हो गयी इसमें - तो जो नुक्सान होगा - वह सैनिक दृष्टी से तो उसे चोट देगा, किन्तु भावनात्मक कोई चोट न लगेगी | उसके लिए अपने बुज़ुर्ग सिर्फ शतरंज की बिसात की गोटियाँ हैं (या कहें कि द्यूत की ?) - जिन्हें वह सिर्फ अपनी जीत के उद्देश्य से उपयोग में ला रहा है | उसे उनकी भयंकर मानसिक पीड़ा से ( जो उसके कर्मों से उत्पन्न हो रही है ) या उनकी संभावित मृत्यु से भी - कोई तकलीफ नहीं होती है |

ध्यान देने की बात है कि - सिर्फ गीता के गायन से और उसके श्रवण भर से ही इस पीडादायी मनोस्थिति में पड़ा यह अर्जुन इस विषाद से निकल सका | यह इसलिए संभव हुआ कि उसने पूरी श्रद्धा से सुना, समझा और मनन किया |

ऐसा नहीं है कि उसने प्रति प्रश्न पूछे न हों - पूछे - अवश्य पूछे - बार बार पूछे | परन्तु उन प्रश्नों का उद्देश्य कृष्ण की बात काटना नहीं था, बल्कि उनकी बात समझना था |

मैं बार बार यही कहती रहती हूँ कि - हम क्या कर रहे हैं - इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि हम वह क्यों कर रहे हैं, किस भावना से प्रेरित हो कर कर रहे हैं |

यह सिर्फ अर्जुन पर उस वक़्त नहीं - बल्कि हम में से हर एक पर - हर वक़्त, हर स्थति में लागू होता है | कई बार हमारा कर्त्तव्य ऐसा कुछ होता है - जो हमें कड़वा भी लगता है | तब - उस कर्त्तव्य को सामने देख कर ही हम मोहवश पस्त पड़ जाते हैं | कुतर्क भी करते हैं - ज्ञानियों जैसी बातें भी बनाते हैं | परन्तु यह ज्ञान नहीं होता, ज्ञान का छलावा भर होता है | परन्तु यदि कृष्ण जैसा सदगुरु मिले - और अर्जुन सा समर्पित शिष्य - तो संशय दूर होते समय नहीं लगता |

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जारी
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कई दिनों से इच्छा थी, कि भगवद गीता की अपनी समझ पर लिखूं - पर डर सा लगता है - शुरू करते हुए भी - कि कहाँ मैं और कहाँ गीता पर कुछ लिखने की काबिलियत ?| लेकिन दोस्तों - आज से इस लेबल पर शुरुआत कर रही हूँ - यदि आपके विश्लेषण के हिसाब से यह मेल ना खाता हो - तो you are welcome to comment - फिर डिस्कशन करेंगे .... यह जो भी लिख रही हूँ इस श्रंखला में, यह मेरा interpretation है, मैं इसके सही ही होने का कोई दावा नहीं कर रही
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मेरे निजी जीवन में गीता जी में समझाए गए गुण नहीं उतरे हैं । मैं गीता जी की एक अध्येता भर हूँ, और साधारण परिस्थितियों वाली उतनी ही साधारण मनुष्य हूँ जितने यहाँ के अधिकतर पाठक गण हैं (सब नहीं - कुछ बहुत ज्ञानी या आदर्श हो सकते हैं) । गीता जी में कही गयी बातों को पढने / समझने / और आपस में बांटने का प्रयास भर कर रही हूँ , किन्तु मैं स्वयं उन ऊंचे आदर्शों पर अपने निजी जीवन में खरी उतरने का कोई दावा नहीं कर रही । न ही मैं अपनी कही बातों के "सही" होने का कोई दावा कर रही हूँ। मैं पाखंडी नहीं हूँ, और भली तरह जानती हूँ कि मुझमे अपनी बहुत सी कमियां और कमजोरियां हैं । मैं कई ऐसे इश्वर में आस्था न रखने वाले व्यक्तियों को जानती हूँ , जो वेदों की ऋचाओं को भली प्रकार प्रस्तुत करते हैं । कृपया सिर्फ इस मिल बाँट कर इस अमृतमयी गीता के पठन करने के प्रयास के कारण मुझे विदुषी न समझें (न पाखंडी ही) | कृष्ण गीता में एक दूसरी जगह कहते हैं की चार प्रकार के लोग इस खोज में उतरते हैं, और उनमे से सर्वोच्च स्तर है "ज्ञानी" - और मैं उस श्रेणी में नहीं आती हूँ ।

एको राम इक ओंकार

यह कहानी निरामिष ब्लॉग पर comment में लिखी है - सोचा - यहाँ भी शेयर करूँ :) | राम एक ही हैं - दो नहीं | इस सिलसिले में श्री तुलसी रचित रामचरितमानस से ही कथा कहती हूँ | यह कथा शिवपुराण में भी है | 

तुलसी रामायण - बालकाण्ड में यह प्रसंग आता है ->

शिव जी राम जी के भक्त थे - तब श्री सती माँ उनकी संगिनी थीं | उनके मन में भी यही सवाल उठा की "क्या यह सीता सीता कह कर जंगलों में बिलखता भटकता हुआ साधारण मानव वे राम हो सकते हैं जो मेरे शंकर जी के पूज्य हैं ?"

जद्यपि प्रगट न कहेउ भवानी। हर अंतरजामी सब जानी॥
सुनहि सती तव नारि सुभाऊ। संसय अस न धरिअ उर काऊ॥

वे कुछ बोल नहीं रही थीं, किन्तु सर्वज्ञ शिव शम्भू उनके मन की बात समझ गए थे - की नहे शंका है | उनकी यह शंका शिव जी को अच्छी न लगी - और उन्होंने सती माँ को समझाया भी | किन्तु सती माई का मन न माना | उन्होंने परीक्षा लेने के लिए सीता का रूप धरा और वन में "हे सीते" कहते रोते भटकते राम के सामने गयीं, की यदि यह मानव भ्रमित हुआ तो जान जाऊंगी की ये "सृष्टिकर्ता राम" नहीं हैं |

पुनि पुनि हृदयं बिचारु करि धरि सीता कर रूप।
आगें होइ चलि पंथ तेहिं जेहिं आवत नरभूप॥

उन्हें देखते ही श्री राम (जो सब कुछ जानते हैं ) बोले "आप यहाँ अकेली क्या कर रही हैं माते ? शिव शम्भू कहाँ हैं ?"

सती कपटु जानेउ सुरस्वामी। सबदरसी सब अंतरजामी॥
सुमिरत जाहि मिटइ अग्याना। सोइ सरबग्य रामु भगवाना॥

जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामू। पिता समेत लीन्ह निज नामू। 
कहेउ बहोरि कहाँ बृषकेतू। बिपिनि अकेलि फिरहु केहि हेतू॥ 

वे अपनी भूल जान कर सहम गयीं, की पति के समझाने के बावजूद मैं समझ न पायी और सत्य की परीक्षा ली | शिव जी के बार बार समझाने से भी मेरे मन को भ्रम बना रहा की जिस मानव को यह नहीं मालूम की उसकी पत्नी कहाँ है - वह सर्वज्ञ राम ? पति ने समझाया भी था कि जो प्रभु इस संसार का सृजन कर सकते हैं - क्या वे मानव रूप नहीं धर सकते - किन्तु मेरा मन न माना | 


इधर अब शिव जी कशमकश में पड़े - सती पत्नी को त्याग भी नहीं सकते, और जब यव मेरे प्रभु की पत्नी का रूप ले कर उनके सामने गयीं - तो मेरी माता हो गयीं - तो पत्नी रूप में स्वीकार भी नहीं सकते | क्या करें ?


तो शिवभोले करोडो वर्षों की तपस्या में ध्यानरत हुए | सती भी जान गयीं कि पति क्यों ताप में बैठ गए हैं | तो उन्हें अपना शरीर त्यागना ही था - जो दक्ष के यज्ञ में उन्होंने अग्निसमाधि लेकर किया | 

फिर पार्वती बन कर फिर से जन्मीं - तपस्या कर शिव को पाया - और उनसे कहा कि "परभो - पिछली बार हमने दशरथ नंदन राम जी को सृष्टिकर्ता राम न मानने की जो भूल की -उससे इतना कुछ हुआ | तो फिर से हम माया से भ्रमित न हों - इसके लिए हमें रामकथा सुनाइए |"

तब शिव जी ने उन्हें रामकथा सुनाई - जो रामायण नाम से हम सुनते और पढ़ते हैं |

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यह टिप्पणी भी निरामिष पर ही है - दूसरी पोस्ट पर


देखती हूँ कि वेदों की बातें घुमा फिर कर यह साबित करने के प्रयास किये जाते हैं कि (१) वेद मांसाहार सिखाते हैं, (२) राम और कृष्ण सिर्फ महापुरुष मात्र हैं आदि | ................ दिखावा ये - कि हम वेदों का सम्मान करते हैं - और यह कह कर उन्ही वेदों के अर्थों के अनर्थ करने का निरंतर प्रयास चलता रहता है | 


२. फिर - एक बात और भी है | कई बातें वेदों में नहीं भी हैं - बाद में "भाष्य" में जोड़ी गयी हैं, उन बातों को highlight कर कर के उन्हें वेदों की मूल भावना से भी अधिक महत्व देने का प्रयास |

३. श्री कृष्ण गीता में कहते हैं -"पत्रं पुष्पं फलं तोयम " अर्थात ये चार चीज़ें ही स्वीकार्य हैं प्रभु को चढाने के लिए | यह नहीं कहते की "अंडम मीटम मटनम " :)

४. यज्ञ के बारे में श्री कृष्ण गीता के श्लोक २.१४ में कहते हैं - जीव अन्न से होते हैं, अन्न वर्षा से और वर्षा यज्ञ से - इसलिए यज्ञ करो | 

५. एक बहुत महत्वपूर्ण बात है - गीता ३.३४
वेदवाणी {या किसी भी बताये हुए कर्मकांड} को समझने के लिए सद्गुरु (अर्थात जो गुरु परम्परा से हों और सत्य जानते हों, जो सिर्फ भाषाई खेल न खेल रहे हों, बल्कि सच ही वेदों में क्या है यह जानते हों } के आश्रय में जाओ, उनकी कृपा मांगो, उनकी सेवा करो, और फिर विनम्र प्रश्न कर के, और अपनी लगातार जिज्ञासाएं पूछ कर कही बात का अर्थ समझने का प्रयास करो | ..... प्रश्न का उद्देश्य अपनी बात स्थापित कर के गुरु को हराना नहीं , बल्कि गुरु की बात समझ कर ज्ञान पाना हो | 

६. किन्तु यह जो अभी वेद वाणी को घुमा फिर कर बलि को स्थापित करने का प्रयास चल रहा है - यह सब सिर्फ भाषानुवाद के आधार पर है | इसके लिए गीता में श्लोक है २.४२ से २.४६ तक
२.४२ - यामिमां पुष्पितां ....
२.४३ - कामात्मानः स्वर्गपरा ...
२.४४ - भोगैश्वर्य प्रसक्तानाम ....
२.४५ - त्रैगुन्य विषया वेदा ....
इस का अर्थ है , जिन कम बुद्धि वाले लोगों की बुद्धि वेदों की flowery (घुमावदार ) भाषा में ही फंस कर रह गयी है - वे वेदों के सन्दर्भ दे कर 
" 'न अन्यत अस्ति इति ' ....वादिनः " 
अर्थात -
वे कहते हैं कि 'बस इतना ही है - और कुछ नहीं' " | 

तो बेहतर हो कि हम गीता के सन्दर्भ में समझने का प्रयास हो कि वेद असलियत में कह क्या रहे हैं | जो यह कहें कि राम एक महापुरुष हैं सृष्टिकर्ता नहीं, कृष्ण एक महापुरुष हैं - क्या उनके कहे अनुसार वेदों को समझने का प्रयास किया जाए - तो वह प्रयास कभी भी सफल हो सकता है ?? क्या ये स्वयंभू ज्ञानी जन वेदों को कृष्ण से भी बेहतर समझते हैं और समझा सकते हैं ?

राम, हनुमान केले का पत्ता - अद्वैतवाद एवं द्वैतवाद



आजकल "अद्वैतवाद" और "द्वैतवाद" पर बड़ा वाद विवाद होता रहता है | [[[कोई लोग तो कहते हैं कि ईश्वर हैं ही नहीं, तो वे इस वाद विवाद का हिस्सा नहीं हैं | ]]]  तो दूसरी ओर, जो मानते भी हैं कि ईश्वर हैं - वे भी दो तरह के हैं | एक वे जो मानते हैं कि ईश्वर एक अलग एंटिटी " परमात्मा " हैं और हम "जीवात्माएं" अलग जो उन्हें पूजें आदि ; और दूसरे वे जो मानते हैं कि "अहम् ब्रह्मास्मि" अर्थात - जब मैं अपने ज्ञान पर पड़े परदे से मुक्त हो जाऊंगा - तो मैं ही "ब्रह्म" हो जाऊंगा | मैं कोई व्यक्तिगत राय नहीं दे रही इस बारे में - दोनों ही दर्शन अपनी जगह सही हो सकते हैं | पर यहाँ इस जगह यह कहानी इस सिलसिले में सुनने में आती है | भूमिका यह है कि जहाँ हम रहते हैं, यह वह जगह है जहाँ किष्किन्धा थी - तो यह हनुमान जी की भूमि है - यहाँ वे "आंजनेय " नाम से अधिक जाने जाते हैं - उनकी माँ अंजना के नाम से ... तो कहानी कुछ यूँ है ....

जब रावण की सेना को हरा कर और सीता जी को लेकर श्री राम चन्द्र जी वापस अयोध्या पहुंचे - तो वहां उन सब के लौटने की ख़ुशी में एक बड़े भोज का आयोजन हुआ | वानर सेना के सभी लोग भी आमंत्रित थे - और बेचारे सब ठहरे वानर ही न ? तो सुग्रीव जी ने उन सब को खूब समझाया - देखो - यहाँ हम मेहमान हैं और प्रभु के गाँव के लोग हमारे मेजबान | तुम सब यहाँ खूब अच्छे से पेश आना - हम वानर जाती वालों को लोग शिष्टाचार विहीन न समझें, इस बात का ध्यान रखना | 

वानर भी अपनी जाती का मान रखने के लिए तत्पर थे, किन्तु एक वानर आगे आया और हाथ जोड़ कर श्री सुग्रीव से कहने लगा " प्रभो - हम प्रयास तो करेंगे कि अपना आचार अच्छा रखें, किन्तु हम ठहरे बन्दर | कहीं भूल चूक भी हो सकती है - तो अयोध्या वासियों के आगे हमारी अच्छी छवि रहे - इसके लिए मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप किसी को हमारा अगुवा बना दें, जो न सिर्फ हमें मार्गदर्शन देता रहे, बल्कि हमारे बैठने आदि का प्रबंध भी सुचारू रूप से चलाये, कि कही इसी चीज़ के लिए वानर आपस में लड़ने भिड़ने लगें तो हमारी छवि धूमिल होगी |"

अब वानरों में सबसे ज्ञानी, व श्री राम के सर्वप्रिय तो हनुमान ही माने जाते थे - तो यह जिम्मेदारी भी उन पर आई |

भोज के दिन श्री हनुमान सबके बैठने वगैरह का इंतज़ाम करते रहे , और सब को ठीक से बैठने के बाद श्री राम के समीप पहुंचे, तो श्री राम के उन्हें बड़े प्रेम से कहा कि तुम भी मेरे साथ ही बैठ कर भोजन करो  | अब हनुमान पशोपेश में आ गए | उनकी योजना में प्रभु के बराबर बैठना तो था ही नहीं - वे तो अपने प्रभु के जीमने के बाद ही प्रसाद के रूप में भोजन ग्रहण करने वाले थे | न तो उनके लिए बैठने की जगह ही थी ना ही केले का पत्ता (अपने हिंदी भाषी साथियों को बताना चाहूंगी - जैसे उत्तर भारत में पत्तलों में भोज परोसे जाने का रिवाज़ है - उसी तरह यहाँ केले के पत्तों में भोजन परोसा जाता है उत्सवों में और भोजों में |)

तो हनुमान बेचारे पशोपेश में थे - ना प्रभु की आज्ञा ताली जाए, ना उनके साथ खाया जाए | प्रभु तो भक्त के मन की बात जानते हैं ना ? तो वे जान गए कि मेरे हनुमान के लिए केले का पत्ता नहीं है , ना स्थान है | उन्होंने अपनी कृपा से अपने से लगता हनुमान के बैठने जितना स्थान बढ़ा दिया (जिन्होंने इतने बड़े संसार की रचना की हो - वे कर सकते हैं ज़रा से और स्थान की रचना ) | लेकिन प्रभु ने एक और केले का पत्ता नहीं बनाया |

उन्होंने कहा " हे मेरे प्रिय अति प्रिय छोटे भाई या पुत्र की तरह प्रिय हनुमान | यूं मेरे साथ मेरी ही थाली (केले का पत्ता) में भोजन करो | क्योंकि भक्त और भगवान एक हैं - तो कोई हनुमान को भी पूजे तो मुझे ही प्राप्त करेगा (यह ऐक्वाद का शब्द है) |"

इस पर श्री हनुमान जी बोले - "हे प्रभु - आप मुझे कितने ही अपने बराबर बताएं, मैं कभी आप नहीं होऊँगा, ना तो कभी हो सकता हूँ - ना ही होने की अभिलाषा है | (यह है द्वैतवाद) - मैं सदा सर्वदा से आपका सेवक हूँ, और रहूँगा - आपके चरणों में ही मेरा स्थान था - और रहेगा | तो मैं आपकी थाल में से खा ही नहीं सकता | "

तब श्री राम ने अपने सीधे हाथ की मध्यमा अंगुली से ( मिडल फिंगेर ऑफ़ द राईट हैंड ) केले के पत्ते के मध्य में एक रेखा खींच दी - जिससे वह पत्ता एक भी रहा और दो भी हो गया | एक भाग में प्रभु ने भोजन किया -और दूसरे अर्ध में हनुमान को कराया | तो जीवात्मा और परमात्मा के ऐक्य और द्वैत दोनों के चिन्ह के रूप में केले के पत्ते आज भी एक होते हुए भी दो हैं - और दो होते हुए भी एक है |
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