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रविवार, 10 नवंबर 2013

self aware robots and machines 1


आज एक मजेदार कहानी शेयर कर रही हूँ रोबोटिक जनरेशन्स के बारे में।  असल में यह पोस्ट बहुत दिनों से मेरे मन में थी।  फेसबुक पर एक दिन आशीष श्रीवास्तव जी ने यह पूछा था की क्या मशीनें "सेल्फ अवेयर" हो सकते हैं।  तब से यह पोस्ट मेरे मन में थी।

एक बड़ी मजेदार कहानी है - लेकिन यह कहानी नहीं सच है :) रोबोट्स को सोचने समझने लायक बनाने के लिए बढे क़दमों में से तीन कदम आपके साथ आज शेयर करती हूँ :)

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मिस्टर एक्स नामक रोबोट जी को लोगों से बातचीत करना और सोचना सिखाया गया । उन्हें हर सोच के बाद कार्य करने से पहले "दो रूल" सिखाये गए  (ये दोनों रूल हर रोबोट कि रीड ओनली मेमोरी में होते हैं - जिन्हे हटाया या बदला नहीं जा सकता - आपको याद होगा की रोबोट पिक्चर में रजनीकांत के रोबोट कि मेमोरी चिप ही बदल दी गयी थी )

१. किसी इंसान को नुक्सान न पहुंचाओ (चाहे ऐसा हुक्म भी दिया जाए) ;
    यदि हो रहा हो तो मनुष्य को हो रहे नुक्सान को रोको
    (- यदि यह दुसरे इंस्ट्रक्शन के विरुद्ध न हो रहा हो तो ही )
२. अपने आप को नुक्सान न पहुंचाओ और अपने आप को हो रहे नुक्सान को रोको
    (- जब तक यह रूल एक के विरुद्ध न हो रहा हो।  )
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तो अब आगे कि कहानी।
मिस्टर एक्स को बताया गया कि जिस कमरे में उनकी बैटरी (रोबोट का जीवन बैटरी से ही है , बैटरी ख़त्म तो जीवन ख़त्म) रखी है उस कमरे में एक बम है।  रोबोट के सोचने की प्रक्रिया (ब्रेन) ने analysis किया तो पाया कि यदि बैटरी को बचाया न जाए तो मेरी ज़िन्दगी ख़त्म।  तो उसने निष्कर्ष निकाला कि कमरे से बम को बाहर निकालना आवश्यक है।  तो एक्स कमरे में गया, वहाँ उसने बम को वहाँ रखी एक ट्रॉली पर रखा और ट्रॉली को बाहर खींच लाया और दूर हट गया।

क्या समस्या सुलझा पाया रोबोट ?

:(
नहीं
:
:
:

क्योंकि जिस ट्रॉली पर वह उस बम को लाड कर बाहर खींच लाया वह ट्रॉली वह थी जिस पर बैटरी रखी थी।  बेचारा मिस्टर एक्स :(
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अगले जनरेशन के रोबोट की कहानी अब
मिस्टर वाय नामक रोबोट को अपनी की हुई गतिविधियों का कमरे के सामान पर होने वाले असर को भी analyse करना सिखाया गया और फिर उसे भी वही समस्या दी गयी।

इन्होने भी यही निर्णय निकाला कि बैटरी कमरे से निकाली जानी चाहिए।  फिर उसने analyse किया कि इस से कमरे पर क्या असर होगा।  तो उसने पाया की  इससे कमरे की दीवारों , फर्श खिड़कियों आदि पर कुछ भी फर्क नहीं पड़ेगा।  हाँ कमरे की स्पेस कुछ बढ़ अवश्य जायेगी और कार्पेट एरिया का खुलापन ट्रॉली जितना बढ़ जाएगा।  इससे न रूल एक न रूल दो टूटेगा।

तो मिस्टर वाय ने भी बम को ट्रॉली पर रखा और कमरे से बाहर ले आये :( अंजाम वही हुआ जो एक्स का हुआ था।

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अब जेड नामक रोबोट को यह सब सिखाया गया कि जो पहले वाले दोनों को सिखाया गया था।  इसके अलावा एक और रूल दिया गया
"ignore inconsequential details about the room "

और फिर जेड जी को भी यही समस्या दी गयी।
कुछ समय गुज़र जाने के बाद बम फूटने का समय पास आने लगा और जेड ने कुछ किया ही नहीं।  वैज्ञानिक रचयिता चिंतित होने लगे  . उन्होंने रोबोट जेड को query भेजी कि क्या हुआ - तुम्हारी बैटरी के कमरे में बम है - तुम्हे यह पता है - तुम कुछ करते क्यों नहीं ??????

उत्तर आया :

:
:
:
कर रहा हूँ न - मैं कमरे के बारे में हज़ारों inconsequential details को इग्नोर करने में बिज़ी हूँ - जिनमे यह भी एक डिटेल है की एक कमरे में एक बम रखा है - क्योंकि इससे रूल एक दो या तीन किसी के अंतर्गत कोई परेशानी नहीं .......

………

:) :) :)
फिर मिलेंगे :)

बुधवार, 11 सितंबर 2013

दूर संचार भाग २

पिछली पोस्ट में हम ने टेलीफोन पर बात की।  इस बार हम अपने घर पर रखे टीवी पर पिक्चर कैसे बनती है और चलती फिरती दिखती है इस पर एक नज़र डालते हैं।

बिलकुल पुराने टीवी पर चलते हैं। जब एशियन गेम्स के समय मैं छोटी सी थी तब हमारे शहर में नया नया टीवी आया था।  हमारे घर में तो खैर बहुत बाद में आया लेकिन टीवी तो आ गया थे - जान गए थे कि एक डब्बा होता है जिसमे फ़िल्मी गाने सुनाई नहीं बल्कि दिखाई देते हैं - फिल्मे भी दिखती हैं चलती फिरती।  बड़ी चकित होती थी मैं , और सोचती थी ये लोग कैसे इतने सारे डब्बों में एक साथ एक जैसे स्टेप्स पर नाचते गाते बोलते दिखते हैं ? आइये देखें यह कैसे होता है।

यह कंप्यूटर मॉनिटर भी एक स्क्रीन है, जिसपर आप ये अक्षर पढ़ रहे हैं।  नीचे यह इमेज देखिये।


यहाँ दो टीवी दिख रहे हैं।  पहले में रंगीन पट्टियाँ  हैं और दुसरे में एक काला सफ़ेद मुस्कुराता चेहरा।  आपने शायद कभी यह सोचा हो कि टीवी पर यह बनते कैसे हैं ? इसी पर आज की यह पोस्ट होगी : * पहले ब्लेक एंड वाइट पर चित्र कैसे बनता है  . 

अगले भाग में फिर कलर टीवी और फिर यह कि ये चित्र चलते फिरते कैसे दिखते हैं।  

हिंदी की कई टर्म्स मुझे नहीं आती हैं,  हिंदी की गलतियाँ माफ़ हों।  :) पहले आपको CRT  के बारे में बताती हूँ।  इंट्रेस्टिंग है - मुझे लगता है आप बोर नहीं होंगे।  :)

पुरानी टेक्नोलोजी के टीवी CRT पर चलते थे, और तब के कम्प्यूटर स्क्रीन भी।  ऐसा ही कुछ अभी भी अस्पताल के मोनिटर्स या हमारे ओफ़िसेज़ के पुराने कम्प्यूटर्स में दीखता है।  आपने ज़रूर ध्यान दिया होगा कि उन टीवी स्क्रीन्स के पीछे एक काफी गहरा डब्बा होता था।  जो टीवी चलते हुए गर्म भी काफी हो जाता था।  यह डब्बा CRT है - cathode ray terminal .

इस डब्बे के भीतर बहुत ज्यादा वोल्टेज का (+) और (-) टर्मिनल है (जैसा आप रिमोट कंट्रोल्स में प्रयुक्त होने वाले पेंसिल सेल में देखते हैं ) . इनमे से (+) को अनोड और (-) को कथोड कहते हैं /

टीवी के भीतर का (+) हमारे टीवी का आगे का जो कांच का स्क्रीन है (जिस पर हम पिक्चर्स देख पाते हैं ) वहां कनेक्टेड है और (-) सबसे पीछे की ओर।  यह ठीक किसी टोर्च के पीछे की और लगी इलेक्ट्रिक प्लेट और आगे लगी नन्ही बल्ब की तरह है।  जब हम टोर्च का बटन दबाते हैं तो पीछे से आगे का सर्किट पूर्ण होता है जिससे बिजली दौड़ने लगती है और बल्ब चमकता है।  लेकिन टोर्च से समरूपता यहीं ख़त्म हो जाती है।  इसके आगे टोर्च जैसा कुछ नहीं होता।

पहली बात तो यह कि टोर्च के भीतर बिजली तारों में दौड़ती है लेकिन टीवी की ट्यूब में पूरा vaccuum है।  जैसा कि हम जानते ही हैं - करंट तब ही दौड़ सकता है जब उसे तार या कोई और मेटल आदि कंडक्टर मिले।  लेकिन vaccuum या रिक्तता में बिजली नहीं दौड़ सकती।  फिर ? :)

फिर यह कि  टीवी के कथोड को हीटर से गर्म करते हैं जिससे इलेक्ट्रोन गर्मी के मारे बेचारे निकल भागते हैं।  इसे thermal emmission  कहते हैं।  ये जो इलेक्ट्रोन  र्म कथोड से बाहर आये वे स्कुल से घर की छुट्टी पर निकले बच्चों की तरह फ्री हैं - ये वहीँ इकट्ठे रहेंगे यदि इन्हें कोई न बुलाये।

आपको याद होगा कि मैंने पहले ही कहा था कि टीवी का कांच का स्क्रीन (+) से जुड़ा  हुआ है। और कथोड  (जिससे इलेक्ट्रोन निकले हैं) वह (-) से जुड़ा हुआ है।  तो ये स्कूल से छूटे बच्चों जैसे इलेक्त्रोन जैसे बच्चे स्कूल से दूर घर की और खिंचाव महसूस करते हैं वैसे ही ये इलेक्ट्रोन भी खुद निगेटिव हैं तो ये (-) कथोड से दूर (+) अनोड , यानी कि टीवी स्क्रीन की और दौड़ने लगते हैं।


यह इस चित्र में देखिये :

यह जो पूरा बंद ट्यूब दिख रहा है यह कांच का ट्यूब समझ लीजिये जिसके भीतर की हवा खींच कर vaccuum बना दिया गया है।  सबसे पीछे जो भीतर लाल रंग का अरेंजमेंट है वहां हीटर और काथोड हैं।  हीटर से गर्म हो कर जो इलेक्ट्रोन बाहर आये हैं वे नीले रंग में दिख रहे हैं।  ये इलेक्ट्रोन  किरणों की तरह सीधी रेखा में स्क्रीन (अनोड ) की तरह जाएँ इसके लिए उन्हें फोकस करना है - जिसके लिए एक्सिलरेटिंग और फ़ोकसिंग अनोड मदद करते हैं।

यह इलेक्ट्रोंन किरणें बहुत हाई वोल्टेज से खिंचती हुई अनोद (स्क्रीन) की तरफ दौड़ रही हैं।

इसके आगे लगी हैं हॉरिजॉन्टल डिफ्लेक्टिंग प्लेट्स ।  इन हॉरिजॉन्टल डिफ्लेक्टिंग प्लेट्स मे वोल्टेज क्रमशः कम से अधिक होता रहता है जिससे ये इलेक्ट्रोन  किरणें कभी उलटे हाथ को और कभी सीधे हाथ को खिंचाव महसूस करती हैं - लगातार इस खिंचाव के प्रभाव से दिशा बदलती हैं।  ये बहुत तेज़ हैं और दायीं बायीं और घूम तो जाती हैं लेकिन आगे बढती जाती है। इस कारण ये उलटे हाथ से सीधे हाथ की तरफ बहुत तेजी से स्क्रीन को कवर करती हैं।  इससे कुछ कम गति से वेर्टिकल डिफ्लेक्टिंग प्लेट्स लगातार किरणों को ऊपर से नीचे की तरफ दौडाती रहती हैं ।  तो किरणें स्क्रीन पर एक जगह न पड़ कर, लगातार, उलटे हाथ से सीधे की तरफ और साथ ही ऊपर से नीचे की तरफ बढती रहती हैं।  कुछ ऐसे :

इस तरह से बड़ी तेज़ी से पूरी स्क्रीन किरणों द्वारा स्केन होती है - जिसे रास्टर सकेन कहते हैं। 

स्क्रीन के कांच की भीतरी तरफ एक फोटो सेंसिटिव मटेरियल पुते हुए है , जो तेज़ गति से आते इलेक्ट्रोन की ऊर्जा सोख कर चमकता है।  जिस बिंदु पर उस वक्त किरण पड़ रही है सिर्फ वही बिंदु चमकता है, लेकिन यह इतनी तेज़ी से रिपीट होता रहता है लगातार, कि हमारी आँखें भ्रम में पड़ जाती हैं, कि पूरी स्क्रीन लगातार चमक रही है।  यदि आपने कभी किसीके फोटो तेज़ स्पीड शटर वाले केमरा से टीवी के आगे खींचे हों , तो आप देखेंगे कि उसमे स्क्रीन का कुछ ही भाग रोशन है - क्योंकि जितनी देर केमरा का शटर खुला था , उतनी देर में सिर्फ उतने ही भाग को किरणों ने स्कैन किया।  इसे ऐसे समझिये कि जैसे छत पर घूमता पंखा हमें ऐसे आभास देता है कि पूरे सर्कल में पंखा लगातार मौजूद है , असल में तो पंखे के ब्लेड्स एक समय में एक ही जगह हैं - किन्तु तेज़ी से घूम रहे होने से आँखों को निरंतरता का भ्रम होता है।  कभी रात को अँधेरे में लाइट बंद कर के टीवी की रौशनी में पंखे का घूमना देखिये - कुछ अलग स्पीड दिखेगी।  

अब यह होने से तो पूरी स्क्रीन बराबर चमकनी चाहिए न ? फिर ? चित्र कैसे बनेगा ?

फिर से CRT  का चित्र देखिये।  कथोड  के आगे एक ग्रिड है।  इस ग्रिड में तस्वीर के अनुसार वोल्टेज कम ज्यादा करने से इलेक्ट्रोन बीम की गति कम ज्यादा होती है।  जितनी कम गति उतनी कम ऊर्जा - उतनी कम चमक स्क्रीन पर - इसके लिये ग्रिड को थोडा निगेटिव वोल्टेज देंगे जिससे इलेक्ट्रोन बीम की गति कम हो। इससे उलट - यदि ज्यादा चमक चाहिए तो गति बढाने के लिए ग्रिड को अधिक पोजिटिव वोल्टेज दिया जाएगा।  

रास्टर स्केन की गति के अनुसार हमें यह पहले से पता है कि समय के किस बिंदु पर बीम स्क्रीन के किस स्थान पर गिरेगी।  उस बिंदु पर सफ़ेद रंग देखना हो, तो अधिकतम पोजिटिव वोल्टेज , पूरा काला बिंदु देखना हो तो पूरा निगेटिव वोल्टेज , और बीच का कोई ग्रे शेड देखना हो तो उस हिसाब का वोल्टेज ग्रिड को देते हैं।

जैसे ऊपर की टीवी पिक्चर में पहली दो तिरछी रेखाओं में ग्रे रंग है, …… तीसरी रेखा में पहला तिहाई भाग ग्रे फिर काला बिंदु। ……. फिर ७-८ ग्रे बिंदु  ……. फिर से एक काला बिंदु और। …… फिर एक तिहाई भाग फिर से ग्रे है।

हमारे भारत में स्क्रीन पर ६२५ हॉरिजॉन्टल रेखाएं हैं, और हॉरिजॉन्टल वर्टिकल अनुपात ४:३ का है।  HDTV में यह अनुपात १६:९ का होता है।  अमेरिका में पहले रेखाएं ५२५ होती थीं, भारत जापान आदि में ६२५। अर्थात भारत में एक रास्टर स्क्रीन में (६२५) x (६२५ x  ३ / ४ ) अलग अलग बिंदु हैं -जिनमे से हर एक बिंदु को काला सफ़ेद या ग्रे देखा जा सकता है, उस समय ग्रिड को अलग अलग वोल्टेज दे कर।

आपके इलेक्ट्रोनिक केमरा में इससे ठीक उलटी प्रक्रिया होती है।  रास्टर स्कैन तो वही होता है - लेकिन पड़ती हुई रौशनी के अनुसार स्क्रीन पर लगा फोटो सेंसिटिव पदार्थ अलग अलग वोल्टेज पैदा करता है - जो बाद में टीवी की ग्रिड को उसी क्रम में दिए जाते हैं।

अब बहुत हुआ - आगे रंग और चलती फिरती तस्वीरों की तकनीक अगली पोस्ट में।  अभी बताऊंगी तो आप बोर हो जायेंगे।

फिर मिलते हैं :)

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

दूर संचार भाग १

इस श्रंखला की भी बड़े दिनों से प्लानिंग चल रही है। अन्य श्रंखलाओं की तरह यह भी अधूरी न रह जाय इस आशा से शुरुआत कर रही हूँ।

:)
:(
 :)

हम सब सॅटॅलाइट कम्युनिकेशन शब्द से परिचित हैं । हम टीवी देखते हैं - जी टीवी , स्टार प्लस आदि सेटेलाईट चेनल कहलाते हैं। इन पर केबल ओपरेटर को एक निश्चित दिशा में एंटीना रखने पर सिग्नल मिलने की बात होती है। फिर आजकल डायरेक्ट टू होम टीवी हैं  । जासे टाटा स्काई  , डिश टीवी आदि। जिनके लिए हम अपने घर एक नन्ही डिश लगवाते हैं एक निश्चित दिशा में। ये डिश कैसे काम करती है? रेडिओ , टीवी , फोन आदि को अपनी अपनी तरह के सिग्नल कैसे मिलते हैं? टीवी में फोटो और लोग कैसे चलते फिरते दीखते हैं?

इस श्रंखला में मैं इस पूरे सिस्टम पर बात करुँगी।

दूरसंचार की शुरुआत से शुरू करती हूँ फिर धीरे धीरे आगे बढूँगी।सिर्फ तरीके भर पर। मेथेमेटिकल डिटेल्स नही। ( मैं चिट्ठियों आदि नहीं बल्कि सिर्फ दूरसंचार / टीवी आदि इलेक्ट्रोनिक कम्युनिकेशन की बात कर रही हूँ।)

सबसे पहले तो हम मनुष्य सिर्फ अपने समीप मौजूद व्यक्तियों से ही बात कर पाते थे। फिर  dots and dashes का उपयोग कर दूर सन्देश भेजे जाने लगे। फिर तारों के द्वारा जुड़े दो टेली फोंस पर बात होनी शुरू हुई।

फोन मशीन के काम करने के बारे में अभी एक संक्षिप्त परिचय । मोटे तौर पर सिर्फ इतना है कि टेलीफोन में चार अलग भाग हैं।

1. - माइक। जैसे माइक पर गायक गीत गाते हैं और नेता भाषण देते हैं :) ।माइक के भीतर मैगनेट का इंतज़ाम रहता है जिसके कारण यह हमारी कही बात को बिजली की लहरों में परिवर्तित करता है। हमारी आवाज़ से हुए कम्पन के कारण वोल्टेज के बदलाव होते हैं , जिन्हें तकनीकी भाषा में ऑडियो सिग्नल कहते हैं।

2. - स्पीकर। जी हाँ वही जो नेता के कहे शब्दों को पूरे मैदान में सुनाने के लिए जगह जगह लगे होते हैं। या गायक के गीत को आपके कानों तक पहुंचाते हैं। दुबारा वही ध्वनि जनरेट कर कर। जो म्युज़िक सिस्टम या टीवी के शब्द को कमरे में फिर से बनाते हैं। इन स्पीकरों में परदे और चुम्बक होते हैं। चुम्बक और बिजली की लहरों का आपस में ऐसा असर होता है की स्पीकर में लगा पर्दा कम्पन करता है और ध्वनि तरंगों को जन्म देता है।  मूल तौर पर माइक और स्पीकर एक ही सिद्धांत पर काम करते हैं। एक ध्वनि तरंगों को विद्युत् तरंगो में बदलता है तो दूसरा विद्युत् तरंगों को ध्वनि तरंगो में। लेकिन सिद्धांत दोनों का एक ही है - विद्युत् और चुम्बक के आपसी सम्बन्ध और एक ताना हुआ स्क्रीन।

3. - तीसरा हिस्सा है वह भाग जो ऊपर बताई माइक की विद्युत् लहरों को टेलीफोन एक्सचेंज तक और टेलीफोन एक्सचेंज से अति हुई विद्युत् लहरों को स्पीकर तक आने का विद्युत् रास्ता बनाता है। ये बेसिकली तार और स्विच हैं।

4. आखरी हिस्सा हमारी आपस में की जा रही बातचीत से सम्बन्धित नही । यह सिग्नलिंग के लिए है। फोन उठाने पर आने वाली डायल टोन, किसी को फोन करने पर सुनाई देने वाली रिंगिंग या बिजी टोन, कोई हमें फोन करे तब बजने वाली घंटी, ये सब सिग्नलिंग के हिस्से हैं

ये सब तो था हमारे प्यारे घर में लगे टेलीफोन जी के नन्हे से डब्बे जी के भीतर। यह डब्बा हमारे घर के अन्य सामान की ही तरह हमारा है, यह खुद अपने आप में कम्युनिकेशन नेटवर्क का हिस्सा नहीं । आगे ये विद्युत् तरंगे कैसे एक से दूसरी जगह पहुँचती हैं, वह कम्युनिकेशन का हिस्सा है।

यह कैसे होता है यह अगले भाग में। सॅटॅलाइट तक पहुँचते पता नहीं कितने भाग हो चुके होंगे।

चलिए फिर मिलते हैं एक ब्रेक के बाद

:

रविवार, 21 जुलाई 2013

श्रीमद्भगवद्गीता २. १५

इस श्रंखला की पिछली पोस्ट में हमने इस श्लोक पर बात की ।

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः |
आगमापायिनोSनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत || १४ ||

इस श्रंखला के बाकी भाग देखने चाहें / पहले भाग से पढ़ना चाहें तो ऊपर गीता टैब पर क्लिक करें । या फिर ये लिंक देखें

1.1 , 1.2 , 1.3

उस पोस्ट पर एक चर्चा चली जिसमे महाभारत युद्ध में दोनों ही पक्षों का अधर्म पथ पर होने की बात हुई । इस पर मैं कोई टिप्पणी नहीं कर रही हूँ । सिर्फ यह कह रही हूँ कि इस श्रंखला में मैं महाभारत ग्रन्थ पर नहीं बल्कि गीता पर बात कर रही हूँ । गीता महाभारत युद्ध के दौरान पुनः कही गयी है लेकिन यह महाभारत का हिस्सा नहीं । 

श्री कृष्ण (आगे गीता में) अर्जुन से कहते हैं कि यह गीता ज्ञान मैंने पहले सूर्य देव को दिया था जिन्होंने अपने पुत्र को दिया और परम्परा से वह ज्ञान आगे बढ़ा - लेकिन समय के साथ यह लुप्तप्रायः हो चला है इसलिए मैं आज इसे फिर से तुझे कह रहा हूँ ।

कृपया गीता की चर्चा पर बने रहे । महाभारत की (औचित्य और अनौचित्य ) चर्चा उसी महाभारत श्रंखला पर रहे तो बेहतर रहेगा । जब हम केमिस्ट्री की क्लास में बैठते हैं तो फिजिक्स की बात नहीं करते । लेकिन जीवन मूल्य सिखाने वाली गीता पर हम जज और ज्यूरी बन कर अपने निर्णय देने लगते हैं ।
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अब अगला श्लोक :
यं हि न व्यथ्यन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ् |
सं दुःख सुखं धीरं सोSमृतत्वायकल्पते ||

भावार्थ: 
जिसे ये सब व्यथित नहीं करते और जो इन सब (शारीरिक या मानसिक) परिस्थितियों में सम रहता है (और अपना निश्चित कर्म करता रहता है) वह पुरुष श्रेष्ठ है, और मुक्त है ।  
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गीता का दूसरा अध्याय पूरी गीता का summarization सा लगता है मुझे  । पहले दस श्लोकों में अर्जुन की व्यथा  थी । वह अपने रिश्ते नातेदारों को देख आकर विचलित हो जाता है और युद्ध को छोड़ देने की बातें कहता है । अब कृष्ण उसे समझा रहे हैं ।

पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि जैसे हमारी इन्द्रियां (sense of touch etc) हमें (हमारे शरीर को भिन्न शारीरिक परिस्थितियों में ) सर्दी और गर्मी का अनुभव कराती हैं , उसी तरह हे कुन्तीनन्दन, हमारे मन को भी सुख और दुःख का अनुभव होता है (भिन्न मानसिक परिस्थितियों में) । जैसे सर्दी और गर्मी (ऋतुएँ ) आती जाती रहती हैं और स्थायी नहीं हैं उसी तरह हे अर्जुन ये सुख दुःख के अनुभव भी आते जाते हैं और स्थायी नहीं हैं । (अपने मन से) इन्हें (जैसे शरीर गर्मी और सर्दी को सहन करता है) सहन कर ।

इस श्लोक में कृष्ण कह रहे हैं कि  जिस किसी मनुष्य को ये सब स्थितियां डावांडोल नहीं कर सकें वही मनुष्य मनुष्यों में श्रेष्ठ है और मोक्ष में है । आगे जाकर कहीं मुक्ति नहीं - अभी इसी जीवन में यदि कोई दुःख सुख से अनछुआ है तो अभी की ही स्थिति अमृतमय मुक्ति है ।

अब यह दोनों श्लोक सिर्फ महाभारत के सम्बन्ध में नहीं है  । दुःख और सुख को समान मान कर कर्म करने वाले ही सच में कर्तव्य कर्म कर सकते हैं । जो दुःख सुख से चलायमान होंगे वे कटु कर्तव्य कर ही नहीं सकते । क्योंकि वे तो दुःख से बचने और सुख की ओर जाने वाली ही राह चुनेंगे । ध्यान देने की बात है कि यहाँ कहीं भी युधिष्ठिर या दुर्योधन के सही गलत होने पर कुछ नहीं कहा गया है । बल्कि व्यक्ति के निजी कर्त्तव्य की बात कही जा रही है  ।

एक योद्धा जो युद्ध भूमि में आ चुका है, जिसके रण कौशल के भरोसे उसके राजा युद्ध में उतरे हैं - वह अब पीठ दिखा कर भागना चाहता है क्योंकि विरोध में उसके अपने खड़े हैं ।

कृष्ण कह रहे हैं कि अपने निजी दुःख सुख को आने जाने वाला (ऋतुओं की तरह परिवर्तन शील) मान ले, और अपना (योद्धा का - अर्जुन का नहीं, पुत्र का नहीं, शिष्य का नहीं) कर्म कर । जो व्यक्ति अपने निजी दुःख सुख को परे कर कर्म कर सके वही मानवों में श्रेष्ठ होता है।

यह सब कृष्ण कब कह रहे हैं  ? कई लोग कहते हैं कि कृष्ण यदि अर्जुन को न समझाते , तो युद्ध रुक जाता , कई कई लोग न मरते। लेकिन वे भूल जाते हैं कि कृष्ण ने युद्ध से पहले तक बहुत समझाया था किन्तु अर्जुन तब अपने क्रोध (द्रौपदी का अपमान , वनवास का अपमान, आदि आदि) से क्रुद्ध हुआ युद्ध को उद्धत था। तब क्या अर्जुन नहीं जानता था कि युद्ध में कौन सामने होंगे ? भीष्म और द्रोण तो द्यूत क्रीडा के समय ही उसे अपना पक्ष बता चुके थे, और सारे पांडव जानते थे कि वे कौरवों के साथ खड़े दिखेंगे । फ़िर अब नया क्या हुआ ?

जो लोग हज़ारों प्राणों के खोने की बातें करते हैं वे यह भूल जाते हैं कि वे खुद अपने देश के शत्रु देश के शुरू हो चुके युद्ध के दौरान मुख्य सेनानायक/ जनरल / सेनाध्यक्ष .... के अर्जुन की तरह "अहिंसावादी" बन कर संन्यास ले कर युद्ध भूमि छोड़ देने को क्या कहेंगे ? वे यह भी भूल जाते हैं कि हर आतंकवादी घटना के बाद वे खुद युद्ध छेड़ने की गुहार लगाते हैं - यह भूल कर की युद्ध में कितनी "हिंसा" होगी और कितने "निर्दोष सैनिक" मारे जायेंगे। कितनी औरतें विधवा होंगी, और कितने बच्चे अनाथ हो जायेंगे  ।

यह सब "अर्जुन को कृष्ण न लड़वाते तो हिंसा रूकती" कहने वाले लोग वे ही हैं जो कुछ महीने पहले दामिनी के गुनाहगारों को सड़क पर जंगली से जंगली सजाओं की वकालत कर रहे थे। क्या वे कहेंगे कि जज की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को यदि कटघरे में खड़ा बलात्कारी अपना गुरु या परिवारजन दिखे (या शक्तिशाली राजपुत्र दिखे) तब जज को "अहिंसावादी" बन कर पीछे हट जाना चाहिए ? ............. लेकिन यह रक्त का उबाल राजपुत्र दुर्योधन के अनेकानेक स्त्रियों के शोषण पर उबाल नहीं खाता , क्योंकि वह सब तो "पुरानी बात" है  । दुर्योधन की नज़र न सिर्फ अपनी भाभी (राजपरिवार की बहू )पर ही पड़ी बल्कि यदि आपको याद हो तो पांडवों के वनवास के दौरान एक और राजकन्या के साथ उसने यही किया था । जब राज कन्या के साथ  का यह  होता था तो जन साधारण की तो सोच ही सकते हैं  ।

लेकिन नहीं -  ये सब   भूल कर ये "ज्ञानीजन" अचानक "अहिंसावाद" पर चल देते हैं और गीता कह कर अर्जुन को प्रेरित करने के लिए कृष्ण को "अपराधी" घोषित कर देते हैं । वे यह भी भूल जाते हैं कि अक्सर साधारण स्थितियों में अहिंसा की बात करने वालों को वे मूर्ख / डरपोक / आदि आदि  ... घोषित करते हैं ।

लेकिन जब गीता की बात होती है तब अचानक सब न्यायप्रियता और वीरता "अहिंसावाद" की ओट  में छुप जाती है  । तब उन्हें अचानक लगने लगता है कि यदि बलात्कारियों के साथ अपने पितामह / गुरु / भाई दिखें तब न्याय की रक्षा को भूल कर युद्ध से पीठ दिखा देना "भला और सही रास्ता " हो जाता है  ।

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यदि हमें गीता समझनी है तो अपने आप को महाभारत के मायाजाल से निकाल कर इसे देखना होगा  । गीता जीवन पथ प्रदर्शिका है - यह महाभारत या अर्जुन तक सीमित नहीं है  । कृपया काँटों में उलझे रह कर गुलाब से मुंह न मोडें - इसे समझने के प्रयास करें ।

गीता की असल शुरुआत मुझे लगती है २.११ से । कई विद्वान् ऐसा मानते हैं तो कई नहीं मानते । यह मेरा अपना विचार था की यहाँ से श्री भगवान् का कथन शुरू होता है और पहले बैकग्राउंड है - और पहली बार मुझे श्रीविनोबा भावे जी का version  श्री अनुराग शर्मा जी की आवाज़ में सुनते हुए यह पता चला कि यह और भी लोग मानते हैं  । और यहाँ से कृष्ण का गीत आता है । पूरी महाभारत में न उलझें - इस पर आयें । दुसरे अध्याय के ग्यारहवे श्लोक से जो पोस्ट  लिखी हैं उनके भावार्थ फिर से पेस्ट कर रही हूँ  (ऊपर पूरी पोस्ट्स के लिंक भी हैं ।) :  :

11 श्री भगवान् ने कहा - तू न सोचने योग्य बातों पर इतना सोचा रहा है, और पंडिताई की भाषा प्रयुक्त करता है | किन्तु जो सच ही में पंडित हो - वह तो जिनके प्राण चले गए, या जिनके नहीं भी गए, उन दोनों के ही लिए शोक नहीं करते |

12 (श्री कृष्ण आगे अर्जुन से बोले - )
निश्चित ही पूर्व में ऐसा कोई काल नहीं था जब तू नहीं था, या मैं नहीं था या ये सब राजागण नहीं थे । न ही आगे ऐसा कोई काल होगा जब हम सब नहीं होंगे ।


13 जैसे शरीर में रहने वाला आत्मा अपरिवर्तित ही रह कर लगातार बदलते हुए शरीर में वास करता है (शरीर बालक से जवान होता है, फिर बूढा भी परन्तु उसके भीतर रहने वाला व्यक्ति वही रहता है ) उसी तरह मृत्यु के समय भी वही आत्मा एक से दूसरे शरीर में पुनर्वास कर लेता है | जो यह जानते हैं , वे मोहित नहीं होते ।

14 इन्द्रिय अनुभूति (और मन की भी ) - गर्मी, सर्दी,सुख और दुःख की अनुभूति कराती हैं । जैसे ये मौसम के असर आने जाने वाले हैं, स्थायी नहीं, वैसे ही सुख दुःख भी आने जाने वाले हैं । हे भारत, इनसे प्रभावित हुए बिना इन्हें सहन करना (अनुभव करते हुए भी उपेक्षा करना) सीख । 

15 जिसे ये सब व्यथित नहीं करते और जो इन सब (शारीरिक या मानसिक) परिस्थितियों में सम रहता है (और अपना निश्चित कर्म करता रहता है) वह पुरुष श्रेष्ठ है और मुक्त है ।  

इन श्लोकों में जीवन का ज्ञान है - अपने मानस में इन्हें कृपया सिर्फ पांडव कौरव युद्ध के सन्दर्भ भर तक सीमित न रखें  ।

इस गीता आलेख के बाकी भागों (इससे पहले और बाद के) के लिए ऊपर गीता tab पर क्लिक करें 
जारी 

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disclaimer:
कई दिनों से इच्छा थी, कि भगवद गीता की अपनी समझ पर लिखूं - पर डर सा लगता है - शुरू करते हुए भी - कि कहाँ मैं और कहाँ गीता पर कुछ लिखने की काबिलियत ?| लेकिन दोस्तों - आज से इस लेबल पर शुरुआत कर रही हूँ - यदि आपके विश्लेषण के हिसाब से यह मेल ना खाता हो - तो you are welcome to comment - फिर डिस्कशन करेंगे .... यह जो भी लिख रही हूँ इस श्रंखला में, यह मेरा interpretation है, मैं इसके सही ही होने का कोई दावा नहीं कर रही  
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मेरे निजी जीवन में गीता जी में समझाए गए गुण नहीं उतरे हैं । मैं गीता जी की एक अध्येता भर हूँ, और साधारण परिस्थितियों वाली उतनी ही साधारण मनुष्य हूँ जितने यहाँ के अधिकतर पाठक गण हैं (सब नहीं - कुछ बहुत ज्ञानी या आदर्श हो सकते हैं) । गीता जी में कही गयी बातों को पढने / समझने / और आपस में बांटने का प्रयास भर कर रही हूँ , किन्तु मैं स्वयं उन ऊंचे आदर्शों पर अपने निजी जीवन में खरी उतरने का कोई दावा नहीं कर रही । न ही मैं अपनी कही बातों के "सही" होने का कोई दावा कर रही हूँ।   मैं पाखंडी नहीं हूँ, और भली तरह जानती हूँ  कि मुझमे अपनी बहुत सी कमियां और कमजोरियां हैं । मैं कई ऐसे इश्वर में आस्था न रखने वाले व्यक्तियों को जानती हूँ , जो वेदों की ऋचाओं को भली प्रकार प्रस्तुत करते हैं । कृपया सिर्फ इस मिल बाँट कर इस अमृतमयी गीता के पठन करने के प्रयास के कारण मुझे विदुषी न समझें (न पाखंडी ही) | कृष्ण गीता में एक दूसरी जगह कहते हैं की चार प्रकार के लोग इस खोज में उतरते हैं, और उनमे से सर्वोच्च स्तर है "ज्ञानी" - और मैं उस श्रेणी में नहीं आती हूँ ।

शुक्रवार, 10 मई 2013

सौर मंडल ५ : एस्टेरोइड पट्टी

हममें से अधिकतर जन बचपन से पढ़ते आये हैं :
"मरकरी , वीनस , अर्थ ; 
मार्स जुपिटर सेटर्न ; 
युरेनस नेप्चून प्लूटो ।"

लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है ।

एक तो प्लूटो अब ग्रहों में नहीं गिना जाता - यह एक क्षुद्रग्रह के रूप में नामांकित कर दिया गया है ।
इसके अलावा , मार्स और जुपिटर (मंगल और बृहस्पति) के बीच एक और कक्षा है - जिसमे "ग्रह" नहीं हैं - लेकिन रेगुलरली कक्षा में घूमते हुए कई शिलाखंड से हैं ।
इसके अलावा भी दूसरे अस्तेरोइड्स / कोमेट्स/ मीटियरोइट्स / कोमेट्स  आदि आदि खगोलीय पिंडों /वस्तुओं के बारे में सुना होगा आपने - लेकिन इस भाग में उन सब पर बात नहीं कर रही । यहाँ सिर्फ मेन एस्टेरोइड बेल्ट की ही बात करूंगी ।

बहुत पहले विटेंनबर्ग नामक खगोल प्रेक्षक ने तब तक ज्ञात ग्रहों (मरकरी से सेटर्न ) की विभिन्न कक्षाओं में एक तरह की समानता देखी और उस हिसाब से उन्हें लगा कि मंगल और गुरु के बीच एक और कक्षा होनी चाहिए । इस सिद्धांत का नाम हुआ टिटियस बोड सिद्धांत और बाद में  जब युरेनस ग्रह की खोज हुई तो उसकी कक्षा बिलकुल इस सिद्धांत के अनुरूप (मैच) हुई । इसके बाद एक समूह बनाया गया "खगोलीय पुलिस" { :)))) } जिन्होंने इस 360 डिग्री की कक्षा के 15 - 15 डिग्री के भागों में उस गुमशुदा गृह को खोजने का काम सम्हाला  । आश्चर्य जनक है कि इस खगोलीय पुलिस की और से पहला एस्टेरोइड नहीं खोजा गया, बल्कि किसी गैर सदस्य ( गिसेप पियाजी ) ने पहला शिलाखंड खोजा (वे पहले इसे कोमेट समझे लेकिन पूंछ न होने से इसे पुच्छल तार न मान कर ग्रह मान लिया गया) - जिसका नाम उन्होंने रखा "सेरेस" । और इसे वह खोया हुआ ग्रह समझा गया  ।

लेकिन 15 महीने बाद एक और शिलाखंड दिखा जिसका नाम पालास हुआ । तब सोचा गया कि शायद ये लघु सितारे हैं ? लेकिन ये टिमटिमाते नहीं थे - तो तारे भी नहीं हो सकते थे । इसके बाद मिला जूनो , फिर वेस्ता और फिर एस्त्रिया । इसके बाद बड़ी तेज़ी से इस कक्षा में दूसरे शिलाखंड मिलने लगे ।  तब इस कक्षा का नाम "एस्टरोइड बेल्ट" रख दिया गा और इन सब शिलाखंडों को "अस्टरोइड्स" कहा गया ।

बाद में नेप्चून की खोज ने टिटियस बोड  सिद्धांत को वैज्ञानिकों की नज़र में खारिज कर दिया क्योंकि इसकी कक्षा उसके अनुरूप नहीं थी । लेकिन इसके कारण अस्टरोइड्स की खोज हो चुकी थी । 

पहले समझा गया कि इस कक्षा में एक गृह था जो किसी खगोलीय टक्कर के कारण टूट कर बिखर गया और टुकड़े कक्षा में घूमते रहे  । लेकिन यह सिद्धांत जल्द ही खारिज कर दिया गया , क्योंकि इन टुकड़ों की बनावट आदि असमान थी  और ये बहुत छोटे थे (इस कक्षा में पाए गए सारे पिंडों का द्रव्यमान जोड़ कर भी हमारे चन्द्रमा से ४ % ही आता है) । अब यह माना जाता है कि जब सूर्य और सौर मंडल बन रहे थे तब ग्रह पूरी तरह से बने नहीं थे , बल्कि अलग अलग पिंड थे जो अपनी अपनी कक्षाओं में आने के बाद भी अलग थे  । जब ये आपस में टकराते तो "स्टिकी कोलिज़न" से जुड़ जाते और धीरे धीरे "प्लेनेटीसिमल" बने और बहुत बाद में प्लेनेट । लेकिन इस कक्षा के शिलाखंड जुपिटर के गुरुत्वाकर्षण के कारण ठीक से जुड़ ही नहीं पाए  ।

यह बेल्ट अधिकाँश रूप से खाली ही है । ये शिलाखंड इतने अधिक विस्तार क्षेत्र में फैले हुए हैं और इतने छोटे हैं कि इन तक पहुँचने के लिए बहुत ही सटीक निशाना लगाना होगा । इनकी कुल संख्या दस लाख से भी अधिक है, जिनमे अधिकाँश बहुत ही छोटे हैं ( त्रिज्या / रेडियस माइक्रो मीटर में )। कुछ तो धूल के कणों की तरह बारीक भी हैं । करीब २०० टुकड़े १०० कि.मी. से बड़े हैं ।   ७ और १७ लाख के करीब शिलाखंड ऐसे हैं जो १ कि.मी. से बड़े हैं ।  लेकिन पूरी कक्षा का कुल द्रव्यमान हमारे चन्द्रमा के द्रव्यमान का ४ प्रतिशत भर है। सबसे बड़े चार खंड "सेरेस , वेस्टा , पाल्लास , और हयजिया में ही कुल द्रव्यमान का आधा भाग समाया है । बल्कि अकेले सेरेस में ही एक तिहाई द्रव्यमान समाया है।

ये टुकड़े कार्बन , सिलिकेट, और मेटल प्रधान श्रेणियों में आते हैं । आश्चर्यजनक रूप से किसी भी शिलाखंड पर ज्वालामुखीय प्रधान चट्टानें या किसी भी तरह के ज्वालामुखीय पर्वतों के आसार नहीं मिलते (जबकि वेस्टा और उससे बड़े शिलाखंडों पर इनके पाए जाने की वैज्ञानिक अपेक्षा होती है । )

पुच्छल तारों पर विस्तार में बात किसी और जगह करूंगी । यहाँ सिर्फ इतना कहूँगी कि , माना जाता है कि  बाहरी शिलाखंडों पर बर्फ होगी जो टक्कर आदि से उदात्तीकृत हो जाती होगी जिससे ये धूमकेतु बनते होंगे , क्योंकि इनमे हाइड्रोजन ड्युटेरियम का अनुपात शास्त्रीय धूमकेतुओं से अलग है । यह भी माना जाता है (मतभेदों के साथ) कि  शायद इसी बेल्ट के कोमेट्स से पृथ्वी के सागर बने हों ।

अस्टरोइड्स आपस में टकराते भी रहते हैं । कुछ टक्करें "स्टिकी कोलिज़न" होती हैं - अर्थात दोनों जुड़ जाते हैं , तो कुछ टक्करें एक शिलाखंड को बिखेर भी देती है । इनमे से कुछ टूटे टुकड़े मीटीयरोइड बन जाते हैं  । ऐसे ही मीटीयरोइड की टक्कर से माना जाता है कि  पृथ्वी पर डायनोसौर प्रजाति का विनाश हुआ ( अटकलें ? ) ।

यह बेल्ट इतनी खाली है कि धरती के अनेक अंतरिक्ष वाहन इससे होकर गुज़र चुके हैं और अब तक कोई टक्कर नहीं हुई है । सबसे पहले पायोनियर १० इससे होकर गुजरा था ( July 16, 1972) जिसके बाद कई और वाहन गुज़र चुके हैं । डौन तो बाकायदा वेस्ता के उपग्रह की तरह घूमा July 2011 से September 2012 तक ।

आगे के भागों में आगे बात होगी ।