ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग बाईस (22)
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भाग 22
अंशुमन
"तुम कर क्या रहे हो?" उसने पूछा, जब मैं अपने नाश्ते के बर्तन वापस रसोईघर में ले जा रहा था। "सफाई।" उसने अपनी मुट्ठियाँ कमर पर बाँध लीं। उसका रुख एक साथ आक्रामक और कमज़ोर दोनों था।
"तुम मेहमान हो, अंशुमन। तुम्हें यह करने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं है।"
"मैं ‘पेइंग’ गेस्ट नहीं हूँ, बेब। तुम मेरा पैसा नहीं ले रही, न श्रेया ही। याद है न?"
उसने होंठ चाटे "तो, इसलिए तुम मुझे काम करने में मदद करने वाले हो? तुम्हें आता भी है?" मैं जानता था उसके आश्चर्य का कारण । मैंने घर पर कभी कुछ नहीं किया था। मेरा हिसाब सीधा था; मैं पैसे कमाता, और वह घर संभालती। वह नौकर रख सकती थी, लेकिन उसने नहीं रखे। हमारे घर एक हाउस कीपर था जो साफ-सफाई करता, कपड़े धोता और बाहर के काम करवाता था, और माली बगीचे मेँ काम करता था। लेकिन प्रियंका रसोई के सब काम खुद करती थी। वह खाना बनाती, और रात के खाने के बाद, चुपचाप और अकेले सफाई करती थी, जब बच्चे और मैं टीवी देखते थे, या साथ में घूमते थे। मैं उदासीन रहा था, लेकिन मुझे अब ऐसा बने रहने की ज़रूरत नहीं। डॉ. वर्मा से बात करने से मुझे अपना दिमाग साफ़ करने और अपने जीवन को समझने में मदद मिली। फिर मैंने खुद से एक सवाल पूछा था: अगर नीलिमा के साथ उसका पति वैसा ही व्यवहार करे जैसा मैंने प्रियंका के साथ किया तो मुझे कैसा लगेगा? जवाब मुझे अच्छा नहीं लगा।
"हाँ, बेबी। मैं बर्तन पानी से धोकर उन्हें डिशवॉशर में डाल सकती हूँ।"
उसने आश्चर्य से पलकें झपकाईं और फिर भौंहें ऊपर उठाईं। "तुम्हें पता भी है कैसे करना होता है?" उसने व्यंग्यात्मक लहजे में पूछा। मैं मुस्कराया। ऐसा नहीं था कि प्रियंका कभी हम में से किसी पर गुस्सा नहीं करती हो या झल्लाती नहीं हो; वह करती थी, लेकिन बहुत कम। हालाँकि, मुझे छोड़ने के चार हफ़्ते बाद मैं एक ज़्यादा मुखर प्रियंका को देख रहा था। जो खुद पर ध्यान दे रही थी क्योंकि उसके पति ने उसे पहले स्थान पर नहीं रखा था।
"हाँ, बेब।"
मैंने खुद से एक वादा किया था कि मैं उसके साथ अपना आपा नहीं खोऊँगा। मैंने फोन कॉल पर गुस्सा किया था, और इससे मुझे कोई मदद नहीं मिली; बल्कि, इसने हमारे बीच एक और बड़ी खाई पैदा कर दी, उसे और चोट पहुँचाई। मैंने फैसला किया कि मैं आवाज़ कम रखूँगा और धैर्य रखूँगा, चाहे कुछ भी हो। प्रियंका बीस साल से मेरी सच्ची साथी रही है; अब मेरी बारी है कि मैं उसे वैसा ही महसूस कराऊँ। जो वह चाहती थी, जिसकी उसे ज़रूरत थी, मैं वह कहूँ या करूँ। मैं उससे बेहद प्यार करता था। और अब देख सकता था कि मैंने उसे दुख पहुँचाया है, और इससे मैं खुद भी आहत हुआ हूँ। एक अंधे व्यक्ति की तरह, जिसने अभी-अभी दृष्टि पाई हो, मेरी आँखें चारों ओर उज्ज्वल सत्य से की रोशनी से दुखती थीं।
उसने मुझे बर्तन धोने की मशीन में बर्तन रखने दिए, जबकि वह स्वयं रसोईघर साफ कर रही थी। "मैं वहां चाकू या स्पैटुला नहीं रखती," जब मैंने डिशवॉशर ट्रे पर रखने के लिए चाकू उठाया तो उसने जल्दी से मुझसे कहा।
"क्यों?"
उसने बताया, "चाकू जंग खा जाते हैं और लकड़ी के स्पैटुला टूट जाते हैं।"
"ठीक है," मैंने कहा और उसके निर्देशों का पालन किया। वह मुझे बाज की तरह तो नहीं देख रही थी, लेकिन वह इसके करीब थी, जैसे कि एक गलती का इंतजार कर रही हो। मैं उसके अंदर की उलझन देख सकता था। हम एक दूसरे को सालों से जानते थे; मैं उसे जानता था, उसके मूड को जानता था। फिर मैं कैसे नहीं समझ पाया था कि वह कितनी अकेली है? लेकिन, मैं आखिरकार फिर से साँस ले पा रहा था, कि मैं उसके पास था। मैं अब उसे दिखाना चाहता था कि वह मेरे लिए क्या मायने रखती है, मैं उसकी कितनी कद्र करता हूँ।
रसोई में काम खत्म होने के बाद (हमने एक टीम के रूप में अच्छा काम किया) उसने पूछा कि क्या मैं एक और कप कॉफी लूँगा। चूंकि इसका मतलब था कि मुझे उसके साथ ज़्यादा समय बिताने मिलेगा, इसलिए मैंने हामी भर दी। उसने मुझे कॉफी दी और फिर अपनी कलाई घड़ी देखी। मुझे खुशी थी कि उसने उस घड़ी को पीछे नहीं छोड़ा, क्योंकि उसने अपने सब गहने छोड़ दिए थे। यह एक प्राचीन घड़ी थी जो मैंने बच्चों के जन्म पर उसे दी थी। उसे हाथी दांत की नाजुक नक्काशी बहुत पसंद आई थी और वह इसे हमेशा पहनती थी।
"श्रेया देर से उठती है।" वह मेरे सामने बैठ गई। "क्या वह अब बहुत ज्यादा सोती है?"
प्रियंका ने सिर हिलाया। "वह रात मेँ बार-बार जागती रहती है। इसलिए दिन मेँ ज़्यादातर समय सोती रहती है। मैंने उसके साथ सोना शुरू कर दिया है, जिससे मुझे पता चले कि वह कब जाग रही है।"
"प्रियंका, तुम एक बहुत अच्छी दोस्त हो और तुम्हारा दिल बहुत बड़ा है।" लेकिन क्या यह इतना बड़ा है कि तुम अपने पति को माफ कर सको?
"हम एक दूसरे का ख्याल रखते हैं।" उसने चाय पी। "शाश्वत ने मुझसे बात की।"
"मुझे पता है। उसने मुझे बताया। वह... आभारी है कि तुमने उसे माफ़ कर दिया।" मेरा क्या, प्रियंका? क्या तुम मुझे माफ़ करोगी? क्या तुम मुझे एक और मौका दोगी ताकि मैं तुम्हें दिखा सकूँ कि मैं कितना अच्छा पति हो सकता हूँ?
उसने कंधे उचका दिए "वह मेरा बच्चा है, इसमें माफ़ करने जैसी कोई बात नहीं है।"
"हाँ, बेब, है।" मैं उसे इस बात को छिपाने नहीं देना चाहता था। हम इस बारे में बात करना शुरू करने वाले थे कि हम इस परिवार में एक दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। हम ईमानदारी से बताना शुरू करने वाले थे कि हम कैसा महसूस करते हैं। "उसने तुम्हारे साथ बुरा व्यवहार किया। उतना बुरा नहीं जितना मैंने किया, लेकिन वह निश्चित ही अपनी हद से लगातार बाहर जा रहा था। मुझे कुछ कहना चाहिए था, लेकिन मैं अपनी बिजनेस की दुनिया में इतना व्यस्त था कि मैंने इस पर ध्यान ही नहीं दिया। और यह मेरी गलती है।"
उसने मेरी ओर ऐसे देखा जैसे मैंने उससे कहा हो कि मैं पागल हो गया हूँ। "मुझे समझ नहीं आ रहा," वह फुसफुसायी।
"हाँ, तुम्हें समझ आ रहा है। और इसीलिए तुमने मुझे छोड़ दिया। तुमने ठीक किया।"
"क्या?" उसने पूछा, जाहिर तौर पर स्तब्ध। "मुझे यकीन था कि तुम मुझे ही दोषी ठहराओगे। जब उस दिन फोन पर हमने बात की तो तुमने-----"
"एक बिगड़े हुए अमीर बच्चे की तरह व्यवहार किया," मैंने उसका वाक्य पूरा करते हुए कहा "यह मेरी गलती थी; मेरी गलतियों की लंबी कतार में से एक और, बेब। मुझे नहीं पता कि मैं इसकी भरपाई कर पाऊंगा या नहीं। बस मुझे आदत हो गई थी अपनी हर बात की खीज तुम पर निकालने की – तुम मेरी सेफ स्पेस, शान्त शरणस्थली थीं। मैं समझ ही नहीं पाया कि तुम्हें भी चोट लगती होगी। लेकिन मैं ठीक से समझना चाहता हूं कि मैंने तुम्हें कैसे-कैसे चोट पहुंचाई। मैं शर्मिंदा हूं, प्रियंका। लेकिन मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता।" मुझे शब्द बोलने में परेशानी हो रही थी क्योंकि मैं रो रहा था। वह मुस्करा नहीं रही थी। वह अपना सिर भी नहीं हिला रही थी। वह अविश्वास से मेरी ओर देख रही थी। इससे मुझे और भी अधिक बुरा महसूस हो रहा था। हम लोग काफी देर तक चुप रहे।
"मैं... मैं नहीं जानती क्या कहूँ," अंततः वह बोल ही पड़ी।
"मुझे बताओ तुम क्यों चली गईं। प्लीज।"
उसने अपनी घड़ी देखी, "मुझे श्रेया का हालचाल देखना है।"
"मैं किस तरह मदद कर सकता हूँ, मुझे बताओ?"
"मदद?"
मैंने मुस्कराते हुए कहा, "हां, प्रियंका। मैं यहां मदद करने के लिए हूं। मैं यहीं रहने वाला हूं और मैं इस जगह को चलाने में मदद करूंगा और जो भी जरूरत होगी, वह करूंगा।" उसने मुझे संदेह भरी नजरों से देखा।
"कृपया" मैंने कहा।
"ठीक है," उसने झट से कहा। "ओशन व्यू वाले कमरे, जहाँ मेहमान ठहरे हुए हैं, उन्हें साफ करने की ज़रूरत है।"
"ठीक है। लेकिन मैं नहीं जानता कि इसका क्या मतलब होता है?"
"कमरे में वैक्यूम करो, बिस्तर ठीक करो, बाथरूम साफ करो और सामान पर से धूल साफ करो।" वह मुझे चुनौती दे रही थी, परीक्षा ले रही थी।
"सफाई का सामान कहां रखा है?" मैंने उसकी आँखों में अनिश्चितता देखी, और फिर, जैसे उसने कोई निर्णय ले लिया हो, उसने अपना गला खँखार के साफ़ किया। "ऊपर गलियारे के अंत में एक दरवाज़ा है जिस पर लिखा है स्टाफ; यह सप्लाई कोठरी है। वहाँ सब है। ओह, और तौलिये भी बदलने होंगे। उस कमरे में गंदे कपड़ों की टोकरी में पुराना निकाला हुआ सब कुछ वापस डाल देना, और लॉन्ड्री रूम मेँ रख देना। वहाँ नई टोकरी रख देना।"
"ठीक है।" .... उसने आँखें सिकोड़ लीं। "तुम्हें पता भी है कि कमरा कैसे साफ़ किया जाता है, अंशुमन? तुमने आखिरी बार कब कमरा साफ़ किया था? क्या कभी किया भी है?" भले ही पहले न किया हो, लेकिन मैं कर लूंगा। अगर बाकी सब विफल हो गया, तो मदद के लिए हमेशा यूट्यूब था ही! "मैं एक बड़ी कंपनी चला रहा हूँ, बेब; मुझे लगता है कि मैं एक कमरे को साफ तो कर ही पाऊँगा। हो सकता है कि बिस्तर को तुम्हारी तरह अच्छी तरह से न सजा सकूँ, लेकिन वादा करता हूँ कि तुम्हारे मेहमानों को कोई शिकायत नहीं होगी।"
"महान आर्किटेक्ट अंशुमन राव-सिन्हा अब बाथरूम साफ करने वाले हैं?" उसने अपनी दोनों बाहें क्रॉस करके, और अपना रुख नकारात्मक रखते हुए पूछा। अब वह मुझे गुस्सा दिलाने की कोशिश कर रही थी, मुझसे प्रतिक्रिया पाने की कोशिश।
"बेब, वह आदमी महान नहीं कहलाता जिसने अपनी पत्नी को परेशान करके भगा दिया। और, हाँ, मैं बाथरूम साफ कर सकता हूँ और करूँगा। मैं सब कुछ करूंगा जिससे तुम्हें यह दिखा सकूँ कि मैंने गलतियाँ भले ही की हों, लेकिन मैं तुमसे प्यार हमेशा करता रहा। तुम मेरे साथ नहीं रहो, तुम खुश नहीं रहो, तो मेरी किसी जीत का कोई अर्थ नहीं रह जाता।" जब मैं सफाई का सामान ढूंढने के लिए जा रहा था, तो उसे मेरी ओर ताकते देखना मेरे लिए बहुत संतोषप्रद था।
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