ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग तेईस (23)
भाग 23
प्रियंका
जब मैंने श्रेया को नहला लिया और उसे जैम और मक्खन के साथ आधा बिस्कुट खाने के लिए मना लिया, तब उसे पुदीने की चाय के साथ उसकी कुर्सी पर बिठाने के बाद, समुद्र को देखते हुए, मैं अंशुमन की तलाश में चली।
वह ओशन व्यू रूम में से एक में तकियों को सीधा कर रहा था। यह कोई मजाक नहीं, वह तकिये जमा रहा था! उसने मेरी तरफ देखा और कमरे की तरफ में हाथ हिलाया। उसने बिस्तर बिछा दिया था, वैक्यूम कर दिया था, और फर्श पर पहले की निकली हुई चादरें और गंदे तौलिये पड़े थे। "क्या सब ठीक हुआ है?" उसने एक बच्चे की तरह पूछा, जो जानना चाहता था कि क्या वह अच्छा काम कर रहा था। यह आदमी था कौन?
"मदद के लिए धन्यवाद, अंशुमन ।" मैं सचमुच मन से यह कह रही थी। जब मैंने श्रेया को बताया था कि अंशुमन क्या कर रहा था, तो वह हंस पड़ी थी। मुझे अच्छा लगा कि वह अभी भी अपनी एक जोरदार हंसी हंस सकती है। जब जीने के लिए बहुत कुछ था, तो भगवान ने उसे हमसे दूर कर दिया, यह अन्याय था।
"मुझे खुशी है बेबी। मैंने पहले ही मेरिनर्स रेस्ट कमरे का काम ख़त्म कर लिया है। क्या तुम उसे देखना चाहोगी?" मैंने न मेँ सिर हिलाया। मैं उसके पास जाकर उसे गले लगाना चाहती थी। सच मेँ, मैं उसे गले लगाना चाहती थी। बताना चाहती थी कि मैं गुस्सा नहीं करना चाहती, और हमें घर चले जाना चाहिए। इतना कमज़ोर पड़ जाना डरावना था, क्योंकि जैसा कि मेरे मनोचिकित्सक ने कहा था, हमारा विवाह मेरी ज़रूरतों को पूरा नहीं कर रहा था।
"क्या तुम्हारे पास मेरे लिए कुछ और काम है? मैं तुम्हारी सेवा में हूँ।" वह मुस्कराया।
अंशुमन एक सुंदर आदमी था। वह लंबा, सुडौल शरीर वाला था और इस उम्र में, उसके बालों में थोड़ा सफेद रंग भी था, और उस पर बहुत अच्छा लगता था। उसकी गहरी आँखों और उस प्रभावशाली जबड़े के साथ वह हीरो जैसा दिख रहा था। शाश्वत अंशुमन जैसा था, जबकि नीलिमा भूरी आँखों वाली एक श्यामला थी, मेरी तरह। वह बहुत सुंदर थी। हमारे बच्चे हम दोनों से बेहतर दिखते थे। शायद अधिकांश लोग अपने बच्चों के बारे यही सोचते हैं।
"बेबी?" अंशुमन ने गंदे कपड़े उठाते हुए पूछा। "क्या और कुछ करना है?"
मैं इस नये अंशुमन को लेकर बहुत उलझन में थी। "मुझे दोपहर का खाना बनाना है," मैंने अचानक कहा। "मैं... दोपहर का खाना।"
"ठीक है। मैं ये वहाँ मेँ रख आता हूँ" उसने तौलियों की ओर इशारा किया- "और आकर तुम्हारी मदद करूँगा। मैं सब्जी काट सकता हूँ, धो सकता हूँ... जो भी तुम्हें चाहिए हो।" वह कपड़ों को ले गया, और मैं कक्ष का दरवाजा बंद करके, बिना हिले-डुले दरवाजे से टिकी खड़ी रही। जब वह वापस आया तो उसने मेरी ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा।
"तुम कर क्या रहे हो?" मैंने संदेह से पूछा। "तुम यहाँ क्यों हो? यह क्यों कर रहे हो?"
वह मेरे करीब आया और मेरे चेहरे से कुछ बाल हटा दिए। "मैं अपने जीवन के प्यार को वापस पाने, उसे मनाने के लिए आया हूँ।" अब जब मैंने आखिर उसे छोड़ने का साहस जुटा लिया है, तो अब आकर वह ऐसी बातें नहीं कह सकता। एक आंसू बह निकला, और उसने उसे पोंछ दिया, उसकी आंखें भी नम थीं। "मैं अपनी पत्नी को यह दिखाने आया हूं कि वह मेरे लिए कितनी मायने रखती है, और उसे मुझे वापस लेने के लिए राजी करना चाहता हूं।" मैंने अपना सिर हिलाया और मेरे चेहरे पर और आँसू बहने लगे। वह उन्हें पोंछता रहा। "मैं अपनी पत्नी को यह बताने आया हूँ कि मैं मूर्ख था। कि मैं एक साम्राज्य खड़ा कर रहा था और अपनी रानी का ख्याल रखना भूल गया।" वह नीचे झुका और अपने होंठ मेरे माथे पर रगड़े। "मैं यहाँ तुम्हें, प्रियंका, फिर से अपने प्यार मेँ पड़वाने के लिए, और मुझे गलतियाँ सुधारने का मौका देने के लिए मनाने आया हूँ।" मैं जड़-वत खड़ी रही। मैं कल्पना भी नहीं कर सकती थी कि वह आदमी जो हमेशा मेरे प्रति खीजा रहता था, हमेशा जल्दी में रहता था, अब यहाँ मुझसे वे सारी बातें कह रहा था, जिनके बारे में मैंने सपने देख सकती थी लेकिन कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वह कभी कहेगा। मैंने अपने आप को मानसिक रूप से तमाचा मारा और अंशुमन की बुनी जा रही कल्पना से बाहर आ गई।
उसके जीवन का प्यार? यह सच नहीं था। "मुझे लगता है कि तुम मुझसे प्यार नहीं करते," मैंने जैसे ज़हर उगलते हुए कहा। मेरे दिल के चारों ओर कालापन छा गया था, जिस दिल को उसने अपनी बेरुखी और लापरवाही से तोड़ दिया था। "मैं... यह नहीं कर सकती।" मैं उससे दूर भागी। सीढ़ियों से नीचे उतरकर रसोई में पहुँची - मेरी शरणस्थली। बिलकुल वैसे ही जैसे बैंगलोर में हमारे घर में थी। वह मेरे पीछे-पीछे आया, और अगर मैंने सोचा होता कि वह यह बातचीत जारी रखे (पता नहीं निराशा होती या राहत?) तो उसने यह नहीं किया।
"हम दोपहर के भोजन के लिए क्या बना रहे हैं?" उसने सहजता से पूछा।
"मैं सैंडविच बनाने वाली थी.... हूँ। दूसरे मेहमान यहाँ दोपहर का खाना नहीं खाते," मैंने उससे कहा। "लेकिन अभी...मुझे पहले रात के खाने की तैयारी करनी है।"
"रात के खाने में क्या है?" वह रसोई के काउंटर पर हाथ रखे झुका हुआ था, आराम से, जैसे कि अभी-अभी कोई भावनात्मक बातचीत हुई ही नहीं हो।
"मैं चावल के साथ हरी बीन्स के साथ शेजवान बिरयानी बनाने वाली हूँ। श्रेया का पेट चावल को सबसे अच्छी तरह से पचा पाता है, इसलिए मैं इसे अपने मीनू में ज़्यादा शामिल करती हूँ।" मैं खाने जैसी सांसारिक बकवास के बारे में बात क्यों कर रही थी? हमें अपना जीवन सुलझाना था। उसने कहा था कि वह नहीं चाहता कि मैं दीपावली के लिए अकेली रहूँ। दीपावली दो दिन दूर थी। लेकिन फिर उसने यह भी कहा कि वह छह महीने के लिए यहाँ है। छह महीने? इसका क्या मतलब था?
"सुनने मेँ बड़ा स्वादिष्ट चुनाव लगता है।"
"मुझे नई रेसिपी मिली है जिसे मैं आजमाना चाहती हूँ। मैं इसे बहुत मसालेदार या कुछ भी नहीं बनाने वाली।" अंशुमन को बहुत मसालेदार खाना पसंद नहीं था, और जब मैंने कुछ व्यंजनों के साथ प्रयोग किये थे, तो उसने बहुत शिकायत की थी। "प्रियंका, तुम जो भी बनाओगी, मैं खुशी से खाऊँगा। मुझे तुम्हारा पकाया खाना बहुत पसंद है।" ओह प्लीज!
"कब से?" मेरी आवाज़ सामान्य प्रियंका से कुछ सप्तक ऊँची थी। "तुमने हमेशा हर चीज़ के बारे में शिकायत की है। हमेशा ही। यह मध्यम रूप से पका हुआ क्यों नहीं है? यह इतना नमकीन क्यों है? इसमें बहुत ज़्यादा मक्खन क्यों है? धिक्कार है, अंशुमन, अब जब मैं चली गई हूँ, तो तुम यहाँ आकर ऐसी बकवास नहीं कर सकते।"
उसने सिर हिलाया। "मुझे लगता है कि तुम एक बेहतरीन पकाती हो। मुझे खेद है कि मैंने हमेशा नुक्स निकाला - मुझे तुम्हारा खाना वाकई बहुत पसंद है, प्रियंका। सच मेँ। मैं हमेशा सबके सामने इसकी डींग हाँकता रहता हूँ।"
मैं दर्द को बाहर आने से नहीं रोक सकी। "ओह-हो, मुझे यकीन है कि तुमने ऐसा किया होगा। ‘वह बहुत अच्छी कुक है, इसके लिए भगवान का शुक्र है, क्योंकि बाकी सुधार का काम अभी चल रहा है’ ठीक यही तुम्हारी माँ ने कहा था, और तुम वहीं बैठे थे और ऐसे सिर हिलाया जैसे कि उनकी बात बिल्कुल सही हो।" वह तब मेरे करीब आया, और मैंने खुद को किसी भी चीज़ के लिए तैयार कर लिया। यदि मैं उसकी माँ के बारे में शिकायत करती थी तो उसे बहुत बुरा लगता, और वह मुझे करने भी नहीं देता था। इतना नीचा दिखाता था कि मैंने कुछ भी कहना बंद कर दिया और बस उनसे बचने के तरीके ढूँढ़ने लगी।
उसने मेरे कंधों पर हाथ रखा। "मुझे तुम्हारा उनसे बचाव करना चाहिए था। मुझे अपने माता-पिता को तुम्हारे साथ वैसा व्यवहार नहीं करने देना चाहिए था जैसा उन्होंने किया। मैं यह जानता हूँ। बदसूरत सच्चाई यह है कि मैं तब भी यह जानता था। लेकिन मेरे लिए उनसे शांति बनाए रखना आसान था, इसलिए मैंने ऐसा किया, यह सोचते हुए कि तुम संभाल लोगी। तुम्हें मनाना मेरे लिए आसान था, उनसे मैं डरता था।"
मैंने अपने हाथ उसकी छाती पर रखे और उसे दूर धकेल दिया। वह दो कदम पीछे हट गया। "संभाल लूँगी? वे मेरे साथ लगातार क्रूरता करते थे। लगातार अंशुमन। और तुमने उन्हें मुझे हर पल छोटा महसूस करवाने दिया, बल्कि उनकी हाँ मेँ हाँ मिलाते रहे। फिर, जब वे मर गए, तो जैसे मेरे बच्चों और तुमने उनकी जगह मुझे परेशान करने की जिम्मेदारी संभाल ली है।" मेरी छाती क्रोध से धड़क रही थी। "मैं पर्याप्त शिक्षित नहीं हूँ। पर्याप्त परिष्कृत नहीं हूँ। मैं बस पर्याप्त नहीं हूँ। इसलिए, अब मैंने तुम्हें छोड़ दिया है। जाओ कोई ऐसी पत्नी खोजो जो पर्याप्त हो।" मैं अब चिल्ला रही थी। “शायद तुम्हारी वह सहायक, जिसके बारे में हर कोई कहता है कि तुम उसके साथ हो। मुझे पता है कि वह तुम्हें चाहती है।"
"नहीं, प्रियंका, मैं---"
"तुम मज़ाक कर रहे हो, है न? उसने मुझे कभी तुमसे बात नहीं करने दी। उसने कभी मेरे संदेश तुम तक नहीं पहुँचाए। ऐसा नहीं है कि हम पति पत्नी के बीच संदेश सहायक को पहुंचाने की जरूरत पड़नी चाहिए थी। तुमने ही तो उसे यह अधिकार दिया न, कि वह तुम्हारी पत्नी के कॉल रोके, उसके संदेशों पर ध्यान न दे, न संदेश तुम्हें पहुंचाने की जहमत उठाए? यह छूट तुमने उसे दी, गलती उसकी नहीं, गलती तुम्हारी है। क्योंकि एक प्यार करने वाला सभ्य पति मेरे संदेशों को खुद ही पढ़ता और मुझे जवाब देता। अपनी सहायक को निर्देश देता, कि कोई भी स्थिति हो मेरी पत्नी के कॉल तुरंत कनेक्ट हों। लेकिन बात तो यह है, अंशुमन, तुमने उसे उलटे यह निर्देश दिया कि वह मेरी कॉल की परवाह न करे। तुमने मेरे संदेश पढे, बस तब तक जवाब नहीं दिया जब तक कि उसका ‘तुमसे’ कोई लेना-देना न हो। इसलिए कि तुम पति तो थे, लेकिन ‘प्यार करने वाले’ पति नहीं थे।" मैंने उसके भड़कने का इंतज़ार किया। जब हम छोटे थे, तो हम ऐसी स्थिति में झगड़ते थे, लेकिन मुझे एहसास हुआ कि कोई भी चिल्लाने की प्रतियोगिता नहीं जीत सकता और मैंने लड़ना छोड़ दिया। भगवान, मैंने इतनी सारी चीज़ों को जाने दिया कि मुझे यह भी नहीं पता था कि मैं क्या बन गई हूँ। "मुझे मालूम है, मेरी गलतियाँ हैं।" उसने धीरे से कहा।
इससे मैं और भी चिढ़ गई "तो? मालूम है फिर तुमने ऐसा क्यों किया?" मेरे दोनों हाथ मुट्ठियों में बंधे हुए थे, मेरा शरीर चट्टान की तरह कड़ा था।
"क्योंकि मैं तुम्हें हल्के में ले रहा था," उसने कहा, उसके व्यवहार में पछतावा साफ़ झलक रहा था। "क्योंकि मैं बेवकूफ़ और मूर्ख था। मुझे लगता था कि हमारी शादी खुशहाल है क्योंकि मैं खुश था, तुम्हारे साथ शादी करके बहुत खुश था। मैं तुमसे प्यार करता हूँ, और मुझे पता था कि तुम भी मुझसे प्यार करती हो। हमने अच्छा सेक्स किया। मुझे सच मेँ नहीं लगा कि हमारे बीच कोई परेशानियाँ हैं। मैं अंधा था, मैं सिर्फ पछता सकता हूँ अब।"
"लेकिन फिर हमने सेक्स करना बंद कर दिया, अंशुमन, क्योंकि तुम गेस्ट रूम में सोने लगे," मैंने बताया। "कोई और पत्नी सोचती कि तुम किसी और के साथ सेक्स कर रहे हो।"
"क्या तुमने ऐसा सोचा?" मैं झूठ बोलना चाहती थी और उसके पापों में इज़ाफा करना चाहती थी, लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकी। मैंने अपना सिर ‘न’ मेँ हिलाया।
"क्योंकि तुम मुझे जानती हो। मैं तुमसे प्यार करता हूँ, प्रियंका। किसी और से कभी नहीं किया... मैंने कभी नहीं किया, कभी नहीं। ... मैं ऐसा क्यों करूँगा प्रियंका? इतनी प्यार करने वाली पत्नी, तुम मेरे घर पर थीं, गर्मजोशी से भरी और इच्छुक, प्यार से भरी हुई। मैं ‘तुम्हारा प्रिय अंशुमन’ था, और इससे मुझे हर दिन बहुत खुशी मिलती थी। सच मेँ तुम मेरा स्वर्ग थीं प्रियंका।” उसकी आवाज मेँ आँसू थे।
"तो फिर क्यों?" मेरे अंदर की सारी लड़ाई खत्म हो गई थी, और मैं लगभग गिरने ही वाली थी "तो फिर क्यों, अंशुमन?" मैंने दयनीय भाव से पूछा।
उसने अपने होंठ चाटे। "उस दिन जब... मैं देर से घर आया था; मैंने मार्सेल के यहाँ डिनर किया था। मैं तुम्हें बहुत चाहता था। मैं - मैं जल्दी .... मैं .... मैं शर्मिंदा हो गया था।" उसका चेहरा लाल हो गया था और वह अनिश्चित दिख रहा था, बिल्कुल वैसा ही जैसा उस दिन शाश्वत दिख रहा था जब उसने इसी रसोईघर में मुझसे माफ़ी मांगी थी।
"तुमने मुझसे कुछ क्यों नहीं कहा?"
"मुझे ऐसा लगा कि यह पहली बार नहीं था जब यह हुआ हो। तुम्हें सुख नहीं मिला। मुझे डर लग रहा था कि मैं तुम्हें सुख नहीं दे पाता हूँ।"
"डर गए? और तुम??" अंशुमन राव-सिन्हा कभी डरता नहीं, कभी कमजोर नहीं पड़ता।
उसने झेंपते हुए मुस्करा कर कहा, "मुझमें तुमसे बात करने की हिम्मत नहीं थी; तुमसे पूछने की कि क्या---"
"मैंने कभी तुम्हारे साथ दिखावा नहीं किया।" मैं चाहती थी कि वह यह जान ले। "मैंने कभी भी दिखावा नहीं किया। हम बीस साल साथ रहे, अंशुमन, और मेरे लिए हमारा समागम सिर्फ यौन सुख या मुक्ति के बारे में नहीं था। यह अंतरंगता के बारे में था। इस बारे में था.... "
"बस इस बारे मेँ कि हम साथ थे," उसने मेरे लिए बात पूरी की।
"हाँ, और तुमने मुझसे यह छीन लिया, और यही वह आखिरी चीज़ थी जो हमें एक साथ बांधे हुए थी।"
"नहीं।" वह मेरी ओर बढ़ा। "नहीं। नहीं। नहीं प्रियंका। मैं तुमसे प्यार करता हूँ। तुम मुझसे प्यार करती हो। सिर्फ यही बात हमें एक साथ रखती है। तुम हमेशा कहती रहीं, मैंने जाने कब कहना बंद कर दिया। प्रियंका, भले ब्रह्मचारी बनना पड़े, (वैसे इस के लिए मैं अभी बहुत छोटा हूँ) फिर भी मैं तुमसे हमेशा प्यार करूँगा, करता रहूँगा।" जैसा कि मैंने श्रेया से कहा, ऐसा नहीं था कि हमारे साथ बिताए गए सभी बीस साल बुरे रहे हों। नहीं, हमने एक जोड़े और एक परिवार के रूप में खूब मज़ा भी किया था। यह आखिरी दो सालों का समय था जब यह सब और भी ज़्यादा मुश्किल होने लगा, क्योंकि बच्चे चले गए थे, और हमने एक साथ समय नहीं बिताया। वह कह रहा है, और शायद सोचता भी है, कि वह मुझसे प्यार करता है। लेकिन अगर वह करता, तो मुझे उसका प्यार महसूस होता, और यह नहीं हुआ।
"मुझे ऐसा महसूस नहीं होता कि तुम मुझसे प्यार करते हो," मैंने दोहराया।
"और यह मेरी ही गलती है। मैं इससे सुधारने का इरादा रखता हूं।" मैंने सिर हिलाया "तुमने कहा था कि कागज़ात पर हस्ताक्षर कर रहे हो? क्या हुआ?"
"मुझे तलाक नहीं चाहिए, प्रियंका। मैं सच कह रहा हूँ। मैं यहाँ हूँ, तुम्हारे साथ हूँ।"
"तुम यहाँ इसलिए आए हो क्योंकि बच्चे यहाँ हैं। तुम्हें पता था कि नीलिमा आ रही है, इसलिए तुमने आने का फैसला किया।" मैं उन व्यंग्यों को कैसे रोकूँ जो उसे झकझोर रहे हैं? मुझे एहसास भी नहीं था कि मेरे अंदर इतना गुस्सा है, जो सब बाहर आ रहा था।
“नहीं बेब, नहीं प्रिये! मैं ‘तुम्हारे साथ’ समय बिताना चाहता हूँ। वे दीपावली के बाद चले जाएंगे, लेकिन मैं महीनों यहाँ रहूँगा। मैं कहीं नहीं जा रहा, प्रियंका, तुम्हारे बिना नहीं।"
वह इतना दृढ़ लग रहा था कि जिस उम्मीद को मैंने एक बड़े पत्थर के नीचे कुचल दिया था, उसकी कोंपलें फूट कर बाहर आने लगी। मैं उसी उम्मीद को रोकने के लिए उस बड़े पत्थर पर बैठ गई क्योंकि यह एक खतरनाक भावना थी, जो मेरी भलाई के लिए अच्छी नहीं थी।
"मुझे तुम पर विश्वास नहीं है," मैंने अंततः स्वीकार किया। मुझे उस पर भरोसा नहीं था, यही सच्चाई थी। उसने अपने माता-पिता के खिलाफ़ मेरे लिए आवाज़ नहीं उठाई। उसने हमारे बच्चों को मेरे साथ बुरा व्यवहार करने दिया। उसने खुद मेरे साथ बुरा व्यवहार किया।
"मुझे पता है कि मैंने तुम्हारा विश्वास खो दिया है। मैं इसे वापस अर्जित करूँगा।" वह इतना ईमानदार था कि यह बात मुझे दुख पहुँचाती थी। "मुझे रात के खाने की तैयारी करनी है।" मैंने उससे मुंह मोड़ लिया, और जब उसने मुझे कुछ करने के लिए पूछा, तो मैंने उसे ढेर सारी हरी बीन्स की फलियाँ साफ करने को कहा। और उसने बिना शिकायत किए वैसा ही किया जैसा मैंने कहा था।
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