ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग सत्ताईस (27)
भाग 27
प्रियंका
जब रंजीत ने मुझे बताया कि अंशुमन चट्टान के पास दीवार बनाने जा रहा है तो मैं गुस्से मेँ तेजी से सीढ़ियों से ऊपर पहुंची। आखिर उसने मुझसे बात किए बिना ऐसा कैसे सोचा? मैंने दरवाज़ा खटखटाया और बिना जवाब का इंतज़ार किए, अंशुमन के कमरे में घुस गई और अपने पीछे दरवाज़ा बंद कर लिया। मैं अभी अंदर गई ही थी कि वह बाथरूम से बाहर निकला, गीला और नग्न, तौलिया उसके हाथ में था।
मेरे फेफड़ों से सारी हवा निकल गयी। वह मुस्कराया। "यह किसी सस्ती फिल्म का दृश्य लग रहा है।" उसने खुद को ढकने की कोई कोशिश नहीं की। मैं अपनी नज़रें नहीं हटा पा रही थी। हमें अंतरंग हुए कई महीने हो गए थे। हम शादीशुदा थे, मैं उसे प्यार करती थी और वह मुझे, और मुझे उसके साथ अंतरंगता पसंद थी। मुझे उसकी हमेशा याद आती थी। हमेशा उसकी याद आती थी।
"कपड़े पहन लो और मुझसे बात करो। मैं पूछने आई थी कि तुम पीछे की दीवार पर काम क्यों कर रहे हैं?" मैं किसी तरह से बोल पाई।
उसने कपड़े पहनते हुए ही कहना शुरू किया। "रंजीत ने मुझे एक समस्या दिखाई, जो गंभीर है। और लगता है कि श्रेया के पास पहले से ही सारी सामग्री है। मैंने एक योजना बना ली है। हम कल साफ-सफाई करेंगे और खुदाई करेंगे और डिनर से पहले एक अस्थायी संरचना बनाएंगे। फिर..... "
"कल दीपावली का दिन है।"
"मुझे पता है। इसे श्रेया और तुम्हारे लिए मेरी तरफ से दीपावली का तोहफा समझो।" टी-शर्ट पहनते समय उसकी आवाज धीमी हो गई थी।
"अंशुमन, तुम बस ऐसे ही ऐसा नहीं कर सकते.... "
"मैं एक आर्किटेक्ट हूँ; मुझे पता है कि यह कैसे करना है। तुम मुझ पर भरोसा करती हो, है न? कम से कम दीवार को ठीक करने के लिए तो भरोसा कर सकती हो?" उसने मेरी तरफ इतनी गहराई से देखा कि मेरा सारा गुस्सा गायब हो गया। अब यह रोना-धोना शुरू करना क्षुद्र होगा कि तुमने अनुमति क्यों नहीं मांगी? वह मदद कर रहा था। यह ऐसा काम था जिसे श्रेया और मैं दोनों जानते थे कि हमें पूरा करना है। लेकिन हम छुट्टियों के दौरान मज़दूरों की बुकिंग नहीं कर पाए थे और रंजीत के पास यह हुनर नहीं था।
"मैं तुम पर भरोसा करती हूँ ... निर्माण संबंधी सामान के मामले में।" मैं वहाँ खड़ी एक बेवकूफ की तरह महसूस कर रही थी।
"धन्यवाद, बेब।" उसकी आँखों में खुशी दिख रही थी और वह दीपावली की सुबह के बच्चे जैसा लग रहा था। "मैं तुम्हें निराश नहीं करूँगा।"
भगवान! वह अब इतना प्यारा और अच्छा क्यों था? पिछले दो सालों का वह चिड़चिड़ा आदमी कहाँ गया, जो हमेशा मुझपर भड़कता रहता था? "जानती हूँ" मैंने कहा "रंजीत, लीला और मीनू हमारे साथ आज दीपावली के डिनर के लिए शामिल होंगे। मीनू जल्दी सो जाती है, इसलिए हम डिनर से पहले दीपावली के उपहार देने वाले हैं।"
पहले हम दीपावली की सुबह उपहार खोलने वाले थे। लेकिन चूंकि रंजीत और लीला, रंजीत की मां के साथ दोपहर के खाने के लिए जाने वाले थे, इसलिए हमने दीपावली की पूर्व संध्या पर ही उत्सव मनाने का निर्णय लिया था। मैंने नियम बनाया था: उपहार केवल बच्चों के लिए थे, जिसमें अब मेरे बच्चे और यशस्वी भी शामिल हो गए थे। सौभाग्य से, मेहमान आज एक घंटे देर से खाने पर आने वाले थे, इसलिए मुझे इस बात की चिंता नहीं करनी पड़ी कि वे अलग-थलग महसूस करेंगे या कुछ उपहार लाने के लिए बाध्य होंगे। हालाँकि, मैंने सभी के लिए सनशाइन होम्स की ओर से स्थानीय स्तर पर बने छोटे-छोटे उपहार खरीदे थे, जिन्हें मैं दीपावली की सुबह नाश्ते के समय उनकी थाली के साथ परोसने वाली थी।
हमारे साथ रहने वाले दोनों जोड़े दीपावली के अगले दिन लौट रहे थे, और उसके बाद हम नए साल तक मेहमान नहीं लेने वाले थे। नीलिमा और शाश्वत अभी कुछ दिन रहने वाले थे, जब तक उसके कॉलेज मेँ छुट्टियाँ थीं। इससे मैं बहुत खुश थी। अंशुमन? खैर, वह तो कह रहा था कि वह महीनों यहीं रुका रहेगा।
"मैं मान रहा हूँ कि तुमने सबके उपहारों का ध्यान रखा होगा," उसने धीरे से कहा, और मैंने उसकी आँखों में कुछ हलचल देखी।
"हाँ।" अंशुमन हमेशा उपहारों मेँ मुझे आभूषण देता था। अच्छे गहने, लेकिन मैं उस अमीर समाज की पत्नियों मेँ से एक नहीं थी। मैं गहने पसंद तो करती थी, लेकिन गहनों से ज्यादा मैं हमेशा कुछ और निजी चाहती थी। अंत में, जब मैं बाहर निकली तो मैंने सब कुछ पीछे छोड़ दिया। मैं उपहार के रूप में अनुभव खरीदती थी। एक साल, मैंने नीलिमा के लिए एक समुद्री गोताखोरी का एडवेंचर खरीदा ताकि वह व्हेल देख सके। एक साल, मैंने शाश्वत के लिए रेस-ट्रैक का गिफ्ट सर्टिफिकेट खरीदा था ताकि वह फेरारी गाड़ी चला सके। अंशुमन के लिए, मैं हमारे लिए छुट्टियाँ खरीदती थी। लेकिन उनमें से कई को रद्द करने के बाद, मैंने यह बंद कर दिया और सिर्फ़ उसके लिए अनुभव खरीदना शुरू कर दिया। उसे गोल्फ पसंद था, इसलिए मैंने उसके लिए ओपन फाइनल के दो टिकट खरीदे थे। और वह मेरे बजाय रक्षित को ले गया था, जो ठीक ही था। मुझे तो गोल्फ कोई खेल ही नहीं लगता था।
इस साल, मैंने पुराने तरीके से खरीदारी की, सुगंधित मोमबत्तियाँ, लोशन, परफ्यूम, हाथ से पेंट किए गए मेज़पोश, हाथ से बना कांच का फूलदान, सब स्थानीय रूप से बनी चीज़ें। श्रेया के लिए मैंने कश्मीरी शॉल खरीदा था ताकि वह उसके शरीर पर नरम रहे। मैं बस यह चाहती थी कि उसके पास खोलने के लिए उपहार हो, वह दीपावली की खुशी आखिरी बार महसूस कर सके। अंशुमन ने मेरे गाल पर हाथ रखा और मेरे होंठों पर एक चुम्बन दिया। "हमेशा यह सुनिश्चित करने के लिए धन्यवाद कि सभी को ऐसे उपहार मिले जो उन्हें पसंद आए। तुम बहुत विचारशील हो, बेब। तुम बेमिसाल हो।"
“तुम पहले यह सब क्यों नहीं कहते थे अंशुमन?” मेरी आँखों मेँ आँसू भर आए थे। अब क्यों? क्यों अब वह वैसा प्रेमपूर्ण आदमी बन गया है जैसा मैं हमेशा चाहती थी?
"मैं एक बिगड़ा अमीर लड़का था जो तुम्हें हल्के में लेता था, और फिर आदत बन गई।" जिस सहजता से वह खुद को उजागर कर रहा था, अपने व्यवहार की जिम्मेदारी ले रहा था, वह ईमानदारी से अप्रत्याशित था। मैं अंशुमन को जानती थी। मुझे पता था कि अगर वह इन बातों पर विश्वास नहीं करता तो ये बातें नहीं कहता। "मैं तुम्हें बहुत चाहता हूँ - हर समय। लेकिन मैं तब तक अपने आप को रोके रखूँगा जब तक तुम्हारा भरोसा नहीं जीत लूँ बेबी। क्योंकि मैं अब ‘तुम्हारा प्रिय अंशुमन’ नहीं हूँ।" उसकी आवाज़ में उदासी थी। "मुझे उस जगह को वापस पाना होगा।"
"मुझे तुम्हारे साथ रहना बहुत याद आता है," मैंने स्वीकार किया।
"लेकिन उतना भरोसा नहीं रहा, है न? मैं नहीं चाहता कि तुम्हें ऐसा लगे कि मैं तुमसे हमेशा की तरह कुछ ले रहा हूँ, बिना कुछ दिए।"
जब मैं नीचे रसोई में गई, तो मैं मुस्कराये बिना नहीं रह सकी। मैंने अपने पति के साथ फ़्लर्ट किया और अब मैं एक किशोरी की तरह हँसना चाहती थी।
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