ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग उनत्तीस (29)
भाग 29
प्रियंका
मैं डिनर के बाद हीटर चालू करके बरामदे में कोक का गिलास लेकर बैठी थी। यह एक शानदार दीपावली थी - परिवार और मेहमान अच्छी तरह से घुल मिल गए थे, और श्रेया खुश थी। मुझे पता था कि यह उसके लिए बहुत मायने रखता है कि वह आखिरकार छुट्टियों के लिए अपने घर पर मेरे परिवार की मेजबानी कर पा रही थी।
नीलिमा और शाश्वत वैसे ही थे जैसे वे पहले हुआ करते थे - मज़ेदार और मिलनसार। शाश्वत में पिछले कुछ सालों से जो तीखापन मैंने देखा था, वह अब नहीं रहा था। वह खुद को बेहतर ढंग से समझने और अपने व्यवहार को सुधारने के लिए ईमानदारी से प्रयास कर रहा था। डॉ. मिश्रा के अनुसार, सभी बच्चे अलग-अलग दौर से गुजरते हैं, और शाश्वत जिस तरह से व्यवहार कर रहा था, उसका कारण हमारे लालन पालन की कोई गलती नहीं थी। बल्कि, यह किशोरावस्था से वयस्कता की ओर बढ़ने की चुनौतियों के कारण था।
"क्या मैं तुम्हारे साथ शामिल हो सकता हूँ?" अंशुमन ने पूछा, खुद के बारे में इतना अनिश्चित कि इसने मुझे तोड़ दिया। मेरा पति एक आत्मविश्वासी व्यक्ति था, और अभी, मेरी वजह से, वह ऐसा अनिश्चित सा हो गया था। मेरे मन मेँ अचानक ग्लानि भर आई। मुझे शाश्वत अपना बच्चा होने से छोटा लगता था, मैंने उसकी गलतियाँ बिना प्रयास माफ कर दीं। फिर बेचारा अंशुमन भी तो करीब-करीब इसी उम्र का था न जब हमने शादी की थी? तो उसने भी कुछ गलतियाँ की थीं। वह अपनी माँ का विरोध नहीं कर पाया प्री-नेप के बारे मेँ, वह उनके अनुमोदन की आशा मेँ कोशिश करता रहा। फिर, बच्चों को मैंने जैसे प्यार दिया था, वे कहाँ अंशुमन को प्यार देती थीं? तो ठीक है, उससे गलतियाँ हुईं, लेकिन उसकी अकेले की गलती भी नहीं थी। मैंने भी तो कभी अपनी अपेक्षाओं के बारे मेँ उसे कुछ नहीं कहा। पिछले दो सालों मेँ जो हम दूर हुए वह उसकी अकेले की गलती नहीं थी, मेरी भी तो जिम्मेदारी थी कि मैं उससे गंभीरता से बात करती।
"हाँ, बिल्कुल, मेरे प्रिय अंशु..." मैंने खुद को उसे अपना ‘प्रिय अंशुमन’ कहने से रोका। हम अभी वहाँ नहीं पहुँचे थे, और मुझे चिंता थी कि हम कभी वहाँ नहीं पहुँच पाएंगे। यह सिर्फ़ उस अकेलेपन से छोटी सी राहत थी जो बच्चों और अंशुमन के अपने जीवन में वापस चले जाने के बाद होगा। बेशक, उसने कहा था कि वह यहाँ लंबे समय तक रहेगा, लेकिन मैं अपने पति को जानती थी, वह काम के प्रति बहुत ज़्यादा समर्पित था। उस काम के बिना, वह परेशान हो जाएगा, और फिर, मुझे डर था, वह मुझसे नाराज़ हो जाएगा, मुझे भागने के लिए दोषी ठहराएगा, क्योंकि उसे अपना काम छोड़ कर कहीं दूर तक मेरा पीछा करना पड़ा।
"यह एक खूबसूरत रात है," अंशुमन ने मेरे बगल में एक कुर्सी पर बैठते हुए कहा। इतना करीब कि मैं उसके इत्र की खुशबू महसूस कर रही थी, जिसकी खुशबू दो दशकों बाद भी मुझे अच्छी लगती है। मैंने सहमति की आवाज़ निकाली और कम्बल को अपने चारों ओर और कस लिया। वह सिर्फ़ जींस और स्वेटर में सहज था।
"अंशुमन, क्या तुम्हें मुझसे शादी करने का पछतावा है?" शब्द मेरे मुंह से निकल गए, इससे पहले कि मैं उन्हें रोक पाती। मैं हमेशा से पूछने से डरती थी, जवाब से भी डरती थी। लेकिन अब, मैं मजबूत महसूस कर रही थी - आगे जो भी आए उसे सुनने के लिए तैयार थी।
उसने मेरी ओर देखा। "मैंने तुमसे शादी की क्योंकि मैं तुमसे प्यार करता था। उस समय नहीं होती, तो हम बाद में शादी कर लेते, लेकिन करते। मुझे इस बात का पूरा यकीन है। मुझे लगता हैं हमने जल्दबाजी कर के गलती की, क्योंकि मैं समझदार नहीं था, अपनी पत्नी की अहमियत नहीं समझ पाया। शायद कुछ वर्षों बाद शादी करते तो मैं बेहतर पति होता?"
"भले ही आप माँ जी से डरते थे?" मैं व्यंग्यात्मक नहीं थी; यह सच्ची जिज्ञासा थी।
"मुझे लगता है कि अगर मैं उम्र मेँ बड़ा होता, कॉलेज में नहीं होता, अपने दम पर कमा रहा होता, तो अपनी पसंद खुद चुन पाना आसान होता।" उसने थोड़ी वाइन पी। "मैं तब अपने परिवार पर आर्थिक रूप से निर्भर था। इस निर्भरता से उनसे दबता था और कुछ समय के लिए तुमसे नाराज़ था। और यह नाराजगी बेवकूफी भी थी क्योंकि मैं अपने जीवन, अपने घर, अपने बच्चों और तुमसे प्यार करता था। लेकिन मैं कुछ समझ नहीं पाता था और इस बेचैनी की भावना को मैंने अपने अंदर समा जाने दिया।"
"क्या ऐसा इसलिए था क्योंकि मैं एक अच्छी पत्नी नहीं थी?" मैं इस सवाल का जवाब भी नहीं सुनना चाहती थी। इस बार वह क्या कहेगा? "तुम सबसे अच्छी पत्नी थीं, और हो, जो कोई भी आदमी चाह सकता है। और यह तथ्य कि मैं आदतन नाराजगी रखता था, मेरी कमज़ोरी है, मेरी कायरता है, इसका इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि तुम कितनी अद्भुत हो।" उसने स्पष्ट, शांत और सौम्यता के स्वर से यह बात की।
"तुम ये बातें ऐसे कहते हो तो लगता है जैसे तुम उन पर विश्वास करते हो।"
"हाँ। हाँ मैं यह मानता हूँ।" उसने मेरे हाथ पर हाथ रखा। "प्रियंका, तुमने मेरी ज़िंदगी बेहतर बना दी। तुमने हमेशा यही किया। मुझे पता था कि अगर मैंने हमारे समाज की किसी लड़की से शादी की होती, तो मैं भी अपने सभी दोस्तों की तरह दुखी जीता, जैसे रक्षित है। सचमुच, मेरा हर दोस्त तुम्हें ‘संत प्रियंका’ कहता है। उन्हें लगता है कि मैं एक क्रूर माँ का क्रूर लेकिन भाग्यशाली बेटा हूँ। सब को तुम्हारे साथ सहानुभूति है कि तुम ऐसे मूर्ख के साथ हो।"
मैं मुस्कराई. "मूर्ख?" ..... "हाँ, बेब! मैं ऐसा ही तो रहा हूँ”
"हमेशा तो मूर्ख नहीं थे।"
"नहीं," उसने सहमति जताई, "लेकिन हमारी शादी का टूटना, मुझे बिना यह तक पता चले कि हम मुश्किल मेँ भी हैं, बड़ी गलती है। मैं तो इस खुश-फहमी मेँ था कि हम बढ़िया हैं। "
मैं सारा दोष उस पर नहीं मढ़ सकती थी। यह उचित नहीं था। "मैंने भी तो कभी कुछ नहीं कहा। कभी तुम्हें नहीं बताया कि मैं कैसा महसूस कर रहा हूँ। मैं... नहीं जानती थी कि अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए तुम्हें कैसे कहूँ।"
"मैंने तुम्हें कभी भी मुझसे बात करने के लिए सुरक्षित जगह नहीं दी," उसने जवाब दिया। "मुझे यह पता है।"
"हम दोनों को देखो, हम दोनों थेरेपी में हैं और बिल्कुल ऐसे बात कर रहे हैं जैसे हम दोनों थेरेपी में हों," मैंने अपना ग्लास नीचे रखते हुए हंसते हुए कहा। वह अभी भी मेरा खाली हाथ पकड़े हुए था, और मुझे यह अच्छा लगा। मैं उसे जाने नहीं देना चाहती थी।
“क्या तुम मेरे साथ जोड़े की थेरपी मेँ चलना चाहोगी? शायद बातें करना आसान हो?” वह धीरे से हंसा, "मैं तुम्हारी डॉक्टर मिश्रा से मिलने गया था।"
"क्या?"
"उन्होंने ही मुझे मेरे मनोचिकित्सक की सिफारिश की थी। उन्होंने, बेशक, तुम्हारी गोपनीयता बनाए रखी, लेकिन मुझे मेरे बारे में कुछ दिलचस्प बातें बताईं। उसने कहा कि मैं एक पुरुष मनोचिकित्सक के साथ बेहतर करूँगा क्योंकि मेरे भीतर एक पूर्वाग्रह है, पेशेवर भूमिकाओं में महिलाओं के खिलाफ अंतर्निहित पूर्वाग्रह।" मैंने सिर हिलाया और उसके आगे बोलने का इंतजार करने लगी। "तुम्हें आश्चर्य नहीं हुआ?" उसने आह भरी।
मैं मुस्करा दी। "यह जाहिर नहीं होता, लेकिन यह है। मुझे नहीं लगता कि तुम उनके साथ भेदभाव करते हो, लेकिन... शायद एक महिला को अपनी क्षमताओं के बारे में समझाने के लिए, तुम्हारे सामने एक पुरुष से ज्यादा प्रयास करना पड़ता है।"
"डॉ. मिश्रा से यह सुन कर मेरी अपने बारे मेँ गलतफहमी ध्वस्त हो गईं। धिक्कार है प्रियंका, मेरी एक बेटी और एक पत्नी है।"
"खैर, मैं तो नौकरीपेशा नहीं हूँ।" मैंने मजाक किया।
"तुम श्रेया को इस रिसॉर्ट को सफल बनाने में मदद कर रही हो, जब से यह खुला है।"
"नहीं, मैं तो बस----"
"बही खाते रखती हो, वेबसाइट चलाती हो, और सोशल मीडिया का प्रबंधन करती हो। मुझे नहीं पता कि तुमने ये सब करना कब और कैसे सीखा? और हम सब की देखभाल करते हुए कब काम करती थीं। अपनी खूबियों को स्वीकार करो बेब। तुम अपने आप को हल्के मेँ लोगी तो दूसरे भी यही करेंगे।" .. यह तारीफ़ सुनकर मुझे लगा कि मैं दस फीट ऊँची हो गई हूँ। मैंने सोचा था कि अगर उसे या बच्चों को कभी पता चलेगा तो वे मुझे नीची नज़र से देखेंगे; इसे एक छोटा सा शौक़ समझेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। तब मैं श्रेया को वित्तीय स्थिरता और सुरक्षा दिलाना चाहती थी। और अब? अब उलटे श्रेया ने ही मेरी मदद की।
मैं उसकी तारीफ को नजरअंदाज करने ही वाली थी, लेकिन मैंने खुद को रोक लिया। "मैंने यह इसलिए किया ताकि उसके पास पैसे हों। और आज यही मेरे भी काम आया। अगर किसी दिन मुझे ज़रूरत पड़े, तो मेरे पास भी पैसे होंगे अब।" वह उदास और हताश लग रहा था। "तुम्हें चिंता थी कि अगर तुम चली गईं तो तुम्हारे पास कुछ नहीं होगा। और श्रेया के अलावा कोई नहीं होगा।"
मैंने जवाब दिया, "मेरे पास उसके अलावा कुछ भी नहीं है और कोई भी नहीं है।" मुझे उम्मीद थी कि अब वह चीखेगा-चिल्लाएगा और मुझे बताएगा कि मैं कितनी कृतघ्न हूं, क्योंकि वह और बच्चे मेरे साथ रहने के लिए यहां आए थे।
"तुम्हारे पास मैं हूँ, बेब।" वह शांत सौम्य था। "तुम्हारे पास हमारे बच्चे हैं। यशस्वी है। तुम अकेली नहीं हो। मैं तुम्हें कभी भी पैसे के लिए संघर्ष नहीं करने दूँगा, कभी नहीं।"
"मुझे बार-बार लगता है कि अब तुम अगली बात पर मुझसे नाराज़ हो जाओगे, लेकिन तुम नहीं होते।" मैंने स्वीकार किया।
"मैंने खुद से वादा किया है कि अब मैं आपा नहीं खोऊँगा, इससे मेरे इरादे झूठे पड़ जाएंगे।" उसने अपना हाथ मेरे गाल पर हाथ फेरा। "मैं अपनी पत्नी को वापस पाने की कोशिश कर रहा हूँ। मैं तुम्हारे लिए अपने घुटनों पर हूँ, बेब। मैं इसे बिगाड़ने नहीं वाला।"
"मैं नहीं चाहती कि तुम अपने आप से अलग कोई और बन जाओ," मैंने धीरे से कहा।
“मैं अपना ही बेहतर रूपान्तरण करने की कोशिश कर रहा हूँ, और यह मनोचिकित्सकों के शब्द हैं” आखिरी शब्द कहते हुए उसके चेहरे पर हंसी थी। मैं भी हंस पड़ी। वह अब भी मुझे हंसा सकता है, हमारे जीवन में हंसी भर सकता है। मुझे तो डर था कि हम इतने टूट चुके हैं कि फिर से ठीक नहीं किया जा सकता। "यह आदमी, वह आदमी जो चुटकुले सुनाता है और मेरे साथ समय बिताता है, यह अंशुमन कुछ साल पहले गायब हो गया था।" वह मेरे साथ ईमानदार होने का इतना प्रयास कर रहा था, तो मुझे भी वैसा ही करना पड़ा।
"मुझे पता है।" वह नीचे झुका और मेरे गाल को चूमा। "तुम्हारी त्वचा बहुत रेशमी है। जानती हो कि मैं तुम्हारे आस-पास इतना उत्तेजित हो जाता हूँ कि दर्द होता है?" मुझे लगा कि मेरे अंदर गर्मी बढ़ रही है। "मैं तुम्हें हर समय चाहता हूँ। यह वासना नहीं है, प्रियंका, यह प्यार है। इतने सालों के बाद यह वासना नहीं। तुम मेरे लिए सबसे आकर्षक हो और----"
"तुम मुझे उन सभी कार्य पार्टियों में अकेला क्यों छोड़ देते थे, जहाँ तुम मुझे जबरदस्ती घसीट कर ले जाते थे? तुम उस काव्या के साथ रहते थे और मुझे अकेला छोड़ देते थे।" ये शब्द और दर्द मेरे अंदर से बह निकले।
"जब तक कि रक्षित और प्रभाकर ने मुझे इस बारे में नहीं बताया, तब तक मुझे पता भी नहीं था कि मैं ऐसा कर रहा हूँ। हाँ, प्रियंका, मैं सच ही मेँ नहीं जानता था।" वह मुझे छूता रहा, मेरे गाल पर हाथ फेरता, मेरे कंधे पर हाथ रखता, या मेरे हाथ पर हाथ रखता जैसे कि वह रुक ही नहीं सकता, जैसे मुझे जाने नहीं देना चाहता। "मुझे बाद मेँ पता चला कि काव्या को भी लगा कि हमारे बीच कुछ चल रहा है। लेकिन जब मैंने कहा कि मैंने उसे ऐसा कोई संकेत नहीं दिया था, तो उसने स्वीकार किया कि मैंने कुछ नहीं किया था।"
"तो फिर उसने ऐसा क्यों सोचा?" मैंने पूछा।
"उसने कहा कि मैं एक ‘सभ्य भला आदमी’ हूं और अपनी पत्नी को धोखा नहीं दूंगा, इसलिए जब मेरी पत्नी चली जाएगी, तो उसने सोचा कि मैं उसके साथ हो जाऊंगा"
"यह तो थोड़ा काल्पनिक है, है न?" काव्या हमेशा से इतनी शांत चित्त दिखती थी कि यह बात उसके लिए आश्चर्य की बात थी।
"हाँ। छुट्टी लेने का फैसला करने से पहले ही, मुझे पता चला कि मुझे काव्या के बारे मेँ कुछ करना होगा। वह अफवाह बना रही थी कि हम साथ रहने वाले हैं। मुझे नहीं पता कि उसे क्या परेशानी है, लेकिन यह मेरी समस्या नहीं है और मैं इससे निपटना नहीं चाहता।"
मैंने आह भरी। "मेरे मनोचिकित्सक ने मुझसे पूछा, कि मैंने तुम्हें पहले क्यों नहीं बताया कि तुम मुझे इन आयोजनों में अकेला छोड़ रहे हो, और मुझे यह पसंद नहीं आता।" मैं बहुत देर तक चुप रही। "मैंने कहा कि मैं चुप रहती थी क्योंकि मुझे डर था कि तुम मुझसे उत्तर दोगे कि तुम मेरे साथ समय नहीं बिताना चाहते।"
"हे भगवान, प्रियंका," उसने कराहते हुए कहा। "मुझे तुम्हारे साथ समय बिताना बहुत पसंद है। हम हमेशा मौज-मस्ती करते हैं। तुम समय को बहुत मजेदार बना देती हो। बात यह है कि जब मेरे पिता बीमार पड़ने लगे, तो मुझे उन्हें यह दिखाने की ज़रूरत थी कि मैं उनसे कितना बेहतर था। उनके जाने बाद, मैं रुक नहीं पाया। मुझे और प्रोजेक्ट चाहिए थे, और प्रतिष्ठा... बस और-और-और। और फिर तुम चली गईं, तब जाकर मुझे एहसास हुआ कि इनमें से कोई भी बात मायने नहीं रखती। मैं सिर्फ तुम्हें चाहता हूँ।"
"तो, तुम्हें मेरी कीमत का एहसास तब तक नहीं हुआ जब तक मैं तुम्हें छोड़कर नहीं गई?" मैंने पूछा। "अगर मुझे पता होता, तो मैं सालों पहले ही तुमसे दूर न चली जाती?"
वह हंसा और मेरे बालों को सहलाया। "मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता। मैंने भले ही हर समय काम किया हो, लेकिन सच तो यह है कि तुम मेरा इंतज़ार कर रही थी, अपनी बाहें फैलाए हुए, मुझे ‘मेरा प्रिय अंशुमन’ कहकर पुकारती थीं, यही मेरा आश्रय था। तुम मेरे लिए सुरक्षित स्थान थी, और हो। इतना कि मैं स्वार्थी हो गया था और तुम्हारी चुनौतियों को समझना नहीं चाहता था। मैं तुम्हारे साथ की शांति, और शांत रहना चाहता था। तुम्हारी चिंताएँ और परेशानियाँ नहीं। मैं तुम्हारा आश्रय नहीं बना, जबकि तुम मेरा शान्त आश्रय थीं।" वह खुद को बेपरदा कर रहा था - मुझे ऐसी बातें बता रहा था जो उसे अच्छी रोशनी में नहीं दिखाती थीं। अंशुमन जैसे स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए, यह आसान नहीं था। "कठिन हिस्सा तुम्हें बताना नहीं है, बेबी। कठिन हिस्सा था खुद को देखना, अपनी कमियों को स्वीकार करना। मुझमें कोई गर्व नहीं, तुम्हारे आगे मेरे लिए कोई अहंकार नहीं। तुम मेरी शरणस्थली हो, मेरा आश्रय हो। मैं तुम्हारे साथ जी सकता हूँ, मेरी सांसें पूरी आती हैं। यह हमेशा सच रहा है। तुमने मुझे वैसे ही स्वीकार किया जैसा मैं था। तुम ही वह व्यक्ति हो जो मुझे जानता है और मुझसे सच्चा प्यार करता है।"
मैंने उसके हाथ पर हल्के से मारा, "तुममें इतना बुरा कुछ भी नहीं है।"
"हाँ प्रियंका, है। मैं पैसे पर गर्वित एक क्रूर माँ का सच्चा बेटा रहा हूँ - इतना हकदार कि मैंने कभी तुम्हारी सबसे अच्छी दोस्त से मिलने की जहमत नहीं उठाई, क्योंकि वह तुम्हारे अतीत से थी जब तुम लोग गरीब थे।" मुझे इसकी आशंका थी। लेकिन उसे श्रेया को ले जाते हुए, उसके लिए एक नर्स को नियुक्त करते हुए, उसकी देखभाल करते हुए देखना - यह स्पष्ट करता था कि वह यह भी जानता था कि लोगों का सम्मान उनके होने के आधार पर करना चाहिए, न कि इस आधार पर कि वे कहां से आए हैं।
"मुझे जाकर सिर्फ चार सप्ताह हुए," मैंने माहौल को हल्का करने के लिए कहा, "इतने ही समय मेँ तुम बहुत बदल गए हो।"
"तुम भी तो बदली हो बेबी।" उसने मुझे तुरंत जवाब दिया। "तुमने कभी मुझे नहीं डाँटा था। मुझ पर कभी चिल्लाई नहीं थीं। अब, तुम यह दोनों ही काम कर रही हो। और यह अच्छा है। मुझे अच्छा लग रहा है कि तुम अब अपने लिए खड़ी हो रही हो। अपनी सच्ची भावनाएं दिखने दे रही हो। मुझे यह सुनना अच्छा लगता है। मैं जानना चाहता हूँ।" उसने मेरे गाल को सहलाया, और मैं उसके स्पर्श में पिघल गई। "हमें एक और मौका दो, प्रियंका," उसने विनती की। "प्लीज बेबी, तुम जितना सोच सकती हो, उतना अच्छा पति बनूँगा।"
मैं हाँ कहना चाहती थी। मेरे अंदर सब कुछ अंशुमन को स्वीकार करने के लिए तैयार था। मेरा प्यार अथाह, गहरा था। लेकिन ..... "मैं इसके लिए अभी तैयार नहीं हूँ," मैं सच बोलते हुए फुसफुसाई।
यह साफ था कि मेरे शब्दों ने उसे चोट पहुंचाई, लेकिन वह अभी भी उदास मुस्कराहट मुस्करा रहा था। "लेकिन यह 'नहीं' तो नहीं ही था न? मैं इसे 'शायद' मानूँगा।"
"हाँ," मैंने कहा।
"मैं तुम्हारे लिए यहाँ हूँ। लेकिन मैं यहाँ ‘हमारे’ लिए भी हूँ। मुझे बहुत पछतावा है और—"
"चलो आगे बढ़ते हैं," मैंने उसे बीच में ही रोक दिया। "हम दोनों माफ़ी मांग सकते हैं या आरोप लगा सकते हैं या... जो भी हो। लेकिन मैं आगे बढ़ना चाहती हूँ। मैंने यही शाश्वत से कहा, और तुम्हें भी कह रही हूँ। पुरानी बातें भूल कर आगे की ओर देखते हैं, है न?"
"क्या तुम ऐसा कर सकती हो, उस सब के बाद भी?
मैंने अपना हाथ उसके गाल पर रखा और दिल से कहा, "हां, मुझे लगता है कि मैं कर सकती हूं। लेकिन इसमें समय लगेगा। क्या तुम धैर्य रख कर इंतजार कर सकते हो?"
"हां, प्रियंका, मैं तुम्हारा इंतजार कर सकता हूं, जैसा वह गाना है न ताजमहल फिल्म का। हम इंतजार करेंगे, तेरा कयामत तक, खुदा करे के कयामत हो और तू आए" उस ने वादा किया। फिर वह हंसा। “तो मैं इंतजार कर सकता हूँ, लेकिन धैर्य से नहीं, मैं तुम्हारे लिए बड़ा अधीर हूँ”। इस पर हम दोनों सहज होकर हंस पड़े।
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