ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग तैंतीस (33)
भाग 33
प्रियंका
दीपावली से पहले मेरे बैंगलोर से चले जाने के बाद, हम पहली बार मई महीने के अंत में बैंगलोर आए। अंशुमन आधिकारिक तौर पर कंपनी की बागडोर प्रभाकर को सौंप रहा था, और एक आलीशान होटल के बड़े कॉन्फ्रेंस हॉल में इस से जुड़ा कार्यक्रम चल रहा था।
मैं अंशुमन के साथ बैंगलोर आने को लेकर कुछ घबराई हुई थी। मुझे चिंता थी कि एक बार हम यहाँ आ गए, तो मेरा प्रिय अंशुमन फिर से उसी अजनबी व्यक्ति में बदल जाएगा जिससे मैं पिछले कुछ सालों से परेशान हो गई थी। मैंने उससे इस बारे में खुलकर बात की, अब हम बातचीत करने लगे थे। हम जोड़ों की काउंसलिंग के लिए भी गए थे, जिससे हमें एक-दूसरे से बेहतर संवाद करना सीखने में मदद मिली। बातचीत करना एक बहुत ही सरल काम है, और फिर भी खुल कर बात करना सीखने में हमें बीस साल लग गए। हमारे यहाँ मानसिक चिकित्सकों के पास जाने के विरुद्ध एक पूर्वाग्रह है। सौभाग्य से हम इस पूर्वाग्रह से निकल कर यह मदद ले पाए थे।
हमारे घर पहुँचने के अगले दिन रक्षित ने हमें अपने घर पर दोपहर के खाने के लिए आमंत्रित किया था। देविका ने अपने खूबसूरत बगीचे में भोजन का आयोजन किया था। उनके घर पर एक बड़ा कर्मचारी दल था, जिसमें एक रसोइया, या यूँ कहें कि शेफ, शामिल था, जैसा कि देविका उसे संबोधित किया करती थी।
रक्षित ने पारिवारिक व्यवसाय में बिल्कुल हाथ नहीं डाला था और अपना अलग रास्ता चुन कर बड़ी मात्रा में धन कमाया था। जब अंशुमन ने अपने पिता से कार्यभार संभाला, तब रक्षित ने राव-सिन्हा-आर्किटेक्ट्स-एण्ड-बिल्डर्स कंपनी की अपनी पूरी हिस्सेदारी अंशुमन को बेच दी थी। देविका अभी भी इस बात से परेशान होती थी, क्योंकि तब से अब तक कंपनी बहुत बड़ी हो गई थी। उसे लगता था कि उसे और रक्षित को हिस्सा मिलना चाहिए। रक्षित को इसकी परवाह नहीं थी। मैं समझ नहीं पाती थी कि देविका को इसकी परवाह क्यों थी, जबकि उनके पास पहले से ही बहुत धन था। इस महिला का लिए इतना कुछ पर्याप्त क्यों नहीं था? "मेरा भाई एक नया आदमी बन गया है, प्रियंका," रक्षित ने मुझे कहा, जब हम शैंपेन का साथ एक खूबसूरत मेज का चारों ओर बैठे थे। “मुझे तो यह वही पुराना आदमी लगता है।" मैं अंशुमन की ओर झुकते हुए मुस्कराई, जिसने अपना हाथ मेरे गले में डाल रखा था।
"क्या तुम्हें उस उजड़े हुए द्वीप पर बैंगलोर की रौनक याद नहीं आती?" देविका ने कहा।
"वह उजड़ा हुआ नहीं है। और हाँ, कभी-कभी याद आती भी है, इसीलिए तो हम यहाँ हैं।" अंशुमन बोला। वह वैसा ही स्नेही हो गया था, जब हम पहली बार मिले थे। लेकिन अब कुछ अलग था। हमारे रिश्ते में एक परिपक्वता, एक शांति विकसित हुई थी, जो पहले नहीं थी, एक दूसरे पर विश्वास और आस्था पर आधारित एक स्थिरता की भावना।
"प्रियंका, अच्छा हुआ कि तुमने अंशुमन को वापस पा लिया, है न? क्योंकि तुम लोग अलग हो जाते तो तुम्हारे पास कुछ भी नहीं बचता।" देविका की आँखों में जलन और दुर्भावना भरी चमक थी। और मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा। वह मेरे लिए कोई नहीं थी, कोई मायने नहीं रखती थी, पहले भी नहीं रखती थी। मैं उसे सिर्फ इसलिए बर्दाश्त करती थी, क्योंकि वह परिवार की सदस्य थी, लेकिन उसने मुझे कभी प्रभावित नहीं किया। खासकर अब, जब मैं अपनी शादी में इतना सुरक्षित महसूस कर रही हूँ।
"देविका," अंशुमन की आवाज़ तीखी थी, उसने मेरे कंधे को अपने हाथ से दबाया, "प्रियंका अगर चली गई होती तो हमारी सारी संपत्ति का आधा हिस्सा उसे मिलता।"
देविका ने उपहास किया। "मैं तुम्हारे प्री-नेपुटल समझौते का बारे में सब जानती हूँ, अंशुमन। श्रीमती राव-सिन्हा ने मुझसे कहा था ---"
"उस प्री-नेपुटल समझौते का अब कोई अर्थ नहीं है। मैं खुद अपनी पत्नी को जीवन के बीस वर्षों बाद ऐसे नहीं जाने देता। और हाँ देविका, यह याद रखना कि मैं उसे मनाने वहाँ गया था, वह मुझे मनाने नहीं आई थी। उस समझौते का अब कोई अर्थ ही नहीं रह गया है। यदि मेरे मनाने से वह राजी न होती, तो मैं अपनी हर चीज का आधा हिस्सा उसे देता" उसने बीच में ही बात काट दी, और मैंने देविका की आँखों में आश्चर्य और निराशा देखी।
"क्या? लेकिन वह कानूनी समझौता था, जिसके अनुसार ...." उसने विरोध किया।
“क्यों नहीं? वह समझौता प्रियंका पर बाध्य था, मुझ पर नहीं। मैं उसे आधा हिस्सा देना चाहता, तो कोई समझौता मुझे नहीं रोक सकता था। वैसे भी, मैंने उसे रद्द कर दिया है” अंशुमन ने कंधे उचका दिए। "अब ऐसा कोई समझौता नहीं है। वैसे भी, तुम्हें नहीं लगता कि एक सुखद लंच के दौरान ऐसी बातें उठाना अशिष्टता है?"
"क्या तुम पागल हो गए हो?" देविका ने झल्लाकर रक्षित की ओर देखा। "क्या तुम्हें इस बारे में पता है?" रक्षित ने आह भरी। "हाँ, देविका, पता है। इसमें हमारा कोई लेना-देना नहीं है, इतनी शिष्टता तो समझती होगी? अंशुमन का पैसा उसका है, बल्कि उन दोनों का है।"
"तुम ने अंशुमन को ऐसा मूर्खता पूर्ण काम करने की अनुमति कैसे दी?" देविका ने ऊंची आवाज में कहा। फिर वह अंशुमन की ओर मुड़ी। "तुम ऐसी मूर्खता कैसे कर सकते हो?"
अंशुमन उठ गया और उसने अपना हाथ मेरी ओर बढ़ाया। मैंने भी हाथ पकड़ लिया और खड़ी हो गई। "हम जा रहे हैं," अंशुमन ने घोषणा की।
"लेकिन हमने अभी तक खाना नहीं खाया है," देविका चिल्लाई।
अंशुमन ने उसे अनदेखा किया और अपने भाई की ओर मुड़ा। "मैं तुमसे मिलूंगा, हाँ?"
रक्षित ने उदास होकर अपना शैंपेन का गिलास उठाया। "हाँ, अंशुमन। देविका के इस व्यवहार के लिए माफ़ करना, प्रियंका। और यह जान लो कि आप लोगों ने भले ही तलाक का विचार रद्द कर दिया है लेकिन मैं देविका को तलाक दे रहा हूँ। हमारा समझौता रद्द नहीं हुआ है और अब मैं इस क्रूरता के स्वभाव के साथ गुजारा नहीं कर सकता। "
"यहाँ क्या हो रहा है?" देविका ने चीखते हुए पूछा।
"तुम बहुत बुरा व्यवहार कर रही हो, देविका। और हमेशा से करती रही हो। यही हो रहा है, और मैं नहीं चाहता कि मेरे भाई की पत्नी तुम्हारी बकवास का शिकार बने, इसी अशिष्टता और क्रूरता की बात मेरा वकील तलाक के मुकदमे मेँ ‘कारण’ के रूप मेँ लिखेगा।"
“मैं भी तुम्हें अब अपनी पत्नी के लिए इस अपमानजनक व्यवहार की अनुमति नहीं दे सकता। तो अब यह बकवास बिल्कुल पूरी तरह बंद कर दो। इसका ध्यान रखना कि कहीं मुझे तुम पर प्रियंका की मान हानि का मुकदमा न करना पड़े।” अंशुमन ने शांति से कहा, लेकिन उसकी आवाज में कठोरता साफ झलक रही थी। देविका दंग रह गई। उसे पुराने अंशुमन की आदत थी। वह अंशुमन जो बातचीत को आगे बढ़ाने का लिए बात टाल देता था और मेरे अपमान को अनदेखा करता था। उसे इस सख्त अंशुमन की अपेक्षा नहीं थी। "मैं आपकी पत्नी के साथ अपमानजनक व्यवहार नहीं कर रही हूँ----"
"हाँ, तुम कर रही हो, देविका," मैंने धीरे से कहा। "तुम हमेशा से ऐसा ही करती रही हो। मुझे नहीं पता क्यों। शायद तुम्हें अच्छा लगता हो, लेकिन अब यह नहीं चलेगा। शुभ दिन।" घर जाते समय मैं हंस रही थी। "मैं ऐसी नहीं हूं, लेकिन यह बहुत अच्छा लगा," मैंने कहा।
अंशुमन ने मेरा हाथ अपने हाथ में लिया। "मुझे खेद है कि मैंने यह पहले नहीं किया। मुझे यह काम सालों पहले करना चाहिए था।"
"पुरानी बुरी यादें छोड़ कर हम आगे देख रहे हैं, है ना?"
"हाँ, बेब।" उसने मेरा हाथ अपने मुँह पर ले जाकर उसे चूम लिया। तभी उसका फ़ोन बज उठा, और उसने कार का ब्लूटूथ पर फ़ोन उठाया। "रक्षित, तुम स्पीकर पर हो। प्रियंका मेरे साथ है," उसने अपने भाई को चेतावनी दी।
"यार, मुझे माफ़ कर दो।"
"हम दोनों को तुमसे तो कोई शिकायत ही नहीं है रक्षित" अंशुमन ने कहा।
"प्रियंका? क्या तुम ठीक हो?"
"इससे बेहतर कभी नहीं थी, रक्षित। पूछने का लिए धन्यवाद।"
वह हंसा। "लग रहा है कि तुम दोनों एक जोड़े के रूप मेँ पहले कभी इतने अच्छे नहीं रहे। शायद मुझे लक्षद्वीप आना चाहिए, शायद मेरे मानसिक स्वास्थ्य के लिए अच्छा होगा"
"अपने बच्चों को भी लाना, उन्हें बहुत पसंद आएगा। गर्मियों का मौसम बहुत मजेदार होता है। और अंशुमन जल्द ही एक बड़ी नौका खरीदने वाला है," मैंने उत्साह से कहा।
अंशुमन ने मुझे सही करते हुए कहा, "नहीं प्रियंका। ‘मैं’ नहीं, ‘हम’ एक नौका खरीद रहे हैं। हाँ, रक्षित, तुम्हें आना चाहिए।"
"देविका को भी साथ ले आना। तलाक के बारे मेँ जल्दबाजी मत करो, जोड़े मेँ मनोचिकित्सक से मिल कर देखो। शायद कुछ बदल जाए?" मैंने कहा। वह परिवार की सदस्य थी।
"प्रियंका, तुम्हारा दिल बहुत बड़ा है" रक्षित ने आह भरते हुए कहा। कॉल खत्म होने का बाद, जब हम लाल बत्ती पर रुके, अंशुमन ने मेरी तरफ देखा। "वह सही कह रहा है। तुम्हारा दिल सच मेँ बहुत बड़ा है।" "वह सब भूल जाओ अंशुमन" मैंने कहा। अंशुमन हँस पड़ा। "हाँ, श्रेया," मैंने सोचा, "तुम सही थीं। वह मुझसे सच्चा प्यार करता है ।"
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