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मंगलवार, 3 मार्च 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग अट्ठाईस (28)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग अट्ठाईस (28)


भाग 28

अंशुमन


श्रेया दीपावली के दिन बरामदे में बैठना चाहती थी। मौसम साफ और ठंडा था। सूरज चमक रहा था, आसमान नीला था और हवा भी नहीं चल रही थी, मानो दीपावली पर आराम कर रही हो। नीलिमा ने उसकी कुर्सी को दो कंबलों में लपेटा और ऊपर ओढ़ने के लिए कुछ और कंबल भी रखे। मैंने श्रेया को गोद में उठा लिया। उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो गई थी, और एक सामान्य सर्दी भी उसे मार सकती थी। "पता नहीं कि तुम सब इस बात की चिंता क्यों कर रहे हो कि मैं बीमार पड़ जाऊंगी? मैं तो पहले ही बीमार हूं। मैं बहुत जल्द मर रही हूं।" जब मैंने श्रेया को बिस्तर पर लिटाया तो उसने शिकायत की।

"तुम अपना काम करो और हम लोगों को अपना करने दो", मैंने मुस्करा कर कहा।

थोड़ी देर बाद वह बोली, "जानते हो अंशुमन, मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं तुम्हें पसंद करूंगी। लेकिन अब, मिलने के बाद, समझ सकती हूँ कि वह तुमसे क्यों प्यार करने लगी।"

नीलिमा बगल की कुर्सी पर बैठ गई। "क्या आप पापा को तब से जानती हैं जब मम्मी उनसे डेट कर रही थीं?"

"नहीं। मैं तब पुणे में रहती थी।" श्रेया ने याद करते हुए बताया। "जब मैं एक वीकेंड पर मिलने आई थी, तो प्रियंका ने मुझे अंशुमन के बारे में बताया, वह कितना बढ़िया था। कितना हैंडसम। बाद में मुझे पता चला कि उसका बॉयफ्रेंड ‘अंशुमन राव-सिन्हा’ था। मैंने प्रियंका से बताया कि वह करोड़पति था, उसे तो यह पता भी नहीं था।"

नीलिमा हँसी। "मैंने माँ-पापा की शादी की तस्वीरें देखी हैं। उनमें आप नहीं थीं। ऐसा कैसे?"

श्रेया के जवाब देने से पहले ही मैंने सच बता दिया। आखिर मेरे परिवार ने ही तो यहाँ गड़बड़ की थी। "इसलिए कि दादी श्रेया को वहाँ नहीं चाहती थीं।"

नीलिमा ने भौंहें सिकोड़ीं, "क्यों? माँ का उनके अलावा कोई और परिवार नहीं था।"

"क्योंकि मैं तुम्हारी मां की तरह ही घटिया किस्म के गरीब परिवार की हूं।" आज उसका दिन अच्छा था और उसमें कुछ ऊर्जा थी, उसका तीखा हास्य भी सामने आया था।

"यह सब बकवास है, दादी रेसिस्ट थीं।" नीलिमा ने टिप्पणी की। "हाँ बेटा, तुम्हारी दादी में बहुत सारी खामियाँ थीं। मैंने भी प्रियंका के बहुत कहने पर भी उस की सहेली को बुलाने पर जोर नहीं दिया। मैं भी उनका ही बेटा था न!" मैंने सहमति दी।

"मिस श्रेया, मुझे बहुत दुख है कि मैंने आपसे पहले मिलने का समय नहीं निकाला।" नीलिमा ने ईमानदारी से कहा। "यह मेरी गलती थी... हम सब की गलती थी। इकलौती आप माँ का परिवार हैं, और हमने आपको अनदेखा किया... जैसे हमने उन्हें अनदेखा किया।"

"ओह, अपनी दुख भरी छोटी सी अपराध बोध की दुनिया से बाहर निकलो," श्रेया ने चिढ़कर कहा। "मैं मर रही हूँ। मैं दुख भरी कहानियाँ नहीं सुनना चाहती। अब मुझे यशस्वी के बारे में बताओ, वह कैसा आदमी है? दिखता तो सुंदर है।” कुछ देर बाद श्रेया ने आँखें बंद कर लीं, और मुझे पता था कि वह किसी भी क्षण सो जाएगी। मैं उसे उठाकर अंदर ले जाने ही वाला था, तभी मैंने उसकी धीमी आवाज सुनी, "मुझे खुशी है कि तुम सब यहाँ हो। आज प्रियंका के पास उसके परिवार का होना अच्छा है।" वह हमें एक परिवार की तरह मानती थी क्योंकि हम प्रियंका के थे। ऐसी बिना शर्त स्वीकृति से मैं परिचित नहीं था। मेरे परिवार मेँ कभी किसी को इस बात की परवाह नहीं थी कि प्रियंका मेरी पत्नी थी और उसकी खुशी और दुख मेरे भी साझे हैं। और उन्होंने अपनी नाराजगी और नापसंद छिपाने की कभी परवाह नहीं की थी। मेरे माता-पिता ने अपनी मृत्यु तक प्रियंका को स्वीकार नहीं किया। यहाँ श्रेया थी, जिसे हमने तिरस्कृत किया था; जिसे प्रियंका की शादी में आने तक की अनुमति नहीं दी थी। और उसने हमारा पूरी तरह से और खुले दिल से स्वीकार किया। जब मैं श्रेया को उसके कमरे में ले गया तो नीलिमा और प्रियंका भी मेरे पीछे आ गई थीं।

"थक गई?" प्रियंका ने श्रेया के बिस्तर पर जगह बनाई ताकि मैं उसे लिटा सकूं। जैसे ही मैंने उसे लिटाया, प्रियंका ने उसके गरम जूते उतार कर उसे रजाई उढ़ा दी, उसके गालों को सहलाया और मुझे देखा। "काश मैं उसके लिए और कुछ कर पाती," उसने फुसफुसाते हुए कहा। "उसे सहज बनाने के लिए और कुछ। मैं बस...."

"बेबी, गुस्सा मत होना ...," मैंने कहा, और उसने मेरी तरफ चिंता भरी निगाहों से देखा। मैंने आह भरी। वह हमेशा मुझसे सबसे बुरा करने की ही आशंका करती थी। और मैं भी यही कर रहा था, हर समय उससे गुस्सा होने की आशंका करता था। हम दोनों ही को इसे रोकने की जरूरत थी। क्या हम दोनों को अलग-अलग थेरपी के अलावा जोड़े की थेरपी भी लेनी चाहिए? "गुस्सा मत होना, लेकिन मैंने श्रेया के लिए एक नर्स को रखा है। उसे ऐसे मरीजों का अनुभव है। वह सुनिश्चित करेगा कि उसे घर पर ही इंजेक्शन मिल जाए, ताकि हमें उसे क्लिनिक में न ले जाना पड़े जिससे उसे यात्रा की तकलीफें न झेलनी पड़ें। और—--"

प्रियंका उछल कर मेरे पास आई और रोते हुए जैसे मेरी बाँहों में कूद पड़ी। मैंने उसे और खुद को बड़ी मुश्किल से संभाला। उसने मेरे मुंह को चूमा। "धन्यवाद। थैंक्स, थैंक्स, थैंक्स।"

"प्रियंका, मैं कम से कम इतना तो कर ही सकता हूँ।" मैंने उसे अपनी बाँहों में भर लिया। मुझे परवाह नहीं थी कि वह मेरी बाँहों में क्यों थी; मैं बस आभारी था कि वह थी। और मुझे यह बहुत अच्छा लगा था। "नहीं" उसने अपना सिर हिलाया, और उसके गालों पर आँसू बह निकले "तुम्हें उसके लिए कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं है। वह तुम्हारी कुछ नहीं है।"

"आंटी परिवार हैं माँ," नीलिमा ने कहा, और हमारे तीन-तरफा आलिंगन में जुड़ गई।

यशस्वी, रंजीत और मैंने सुबह रिटेनिंग वॉल तैयार करने और अस्थायी सपोर्ट लगाने में बिताई। नहाने के बाद, मैं नीचे आया तो खाने और खाना पकाने की खुशबू आ रही थी। पहले, जब प्रियंका खाना बनाती थी, तो नीलिमा, शाश्वत और मैं अपना काम करते थे। प्रियंका अकेले ही हमारे लिए खाना बनाती थी - हमारी छुट्टियाँ सुंदर बनाती थी।

यह पहले से ऐसा नहीं रहा था। बच्चे छोटे थे तो उसके साथ रसोई में घूमते थे, और मैं भी। जैसे-जैसे वे बड़े होते गए, वे मेरी ओर अधिक आकर्षित होते गए। यह सब इतना धीरे-धीरे और स्वाभाविक रूप से हुआ कि मुझे कभी पता ही नहीं चला कि कब हमने प्रियंका को अकेला छोड़ दिया। अब नहीं। न इस दीपावली पर न ही और फिर कभी। अब नहीं!

सनशाइन होम्स रिज़ॉर्ट के रसोईघर में बहुत चहल-पहल थी, दीपावली के खाने की सुगंध और दीवारों से गूंजती हंसी की आवाजें। प्रियंका चूल्हे के पास खड़ी थी और एक बर्तन को संभाल रही थी। शाश्वत और नीलिमा किचन आइलैंड पर साथ थे, सब्जियाँ काट रहे थे और एक दूसरे को चिढ़ा रहे थे जैसा कि सिर्फ़ भाई-बहन ही कर सकते हैं। यशस्वी हाथ में वाइन का गिलास लिए किचन आइलैंड पर बैठा था। नीलिमा के अनुसार यशस्वी अच्छा कुक नहीं था और उसे खाने के आस-पास भी नहीं आने देना चाहिए, क्योंकि वह पता नहीं क्या कर देगा। मैं नीचे झुका और प्रियंका के गालों पर अपने होंठ फेर दिए। मैं तब तक स्वतंत्रता ले रहा था जब तक वह मुझे न रोके। उसकी मुस्कान और चेहरे की लाली देख कर मुझे भगवान से तोहफा मिलने जैसा लगा। "मैं कैसे मदद कर सकता हूँ?" मैं बुदबुदाया।

वह घबरा गई और उसने बच्चों की तरफ देखा जो हमें देख रहे थे। नीलिमा ने मुझे समझदारी और शैतानी भरी मुस्कान दी और शाश्वत तो ऐसा लग रहा था कि वह रो पड़ेगा। मैं जानता था कि प्रियंका के चले जाने के लिए वह खुद को दोषी मानता है। मैंने समझाया भी था कि गलती मेरी है, लेकिन उस पर बोझ था, और यह कोई बुरी बात भी नहीं थी। अच्छा ही था कि उसने अपने व्यवहार की जिम्मेदारी ली, जिससे वह हमेशा लोगों के साथ व्यवहार मेँ सावधान रहेगा। मैंने ईमानदारी से प्रियंका से कहा था कि वही हमारे परिवार का केंद्र है। उसके बिना, चाहे हम उसके साथ कैसा भी व्यवहार करते रहे हों, हम खोये हुए थे। उसकी शांत उपस्थिति हमारे जीवन में सब तरफ व्याप्त थी, भले ही हमने गलतियाँ की हों। "आलू छील सकते हो।" प्रियंका ने सिंक के पास रखे एक बैग की ओर इशारा किया। मैं काउंटर पर खड़ा होकर आलू छील रहा था, अपने परिवार को एक साथ काम करते हुए देख रहा था, कमरे में घर जैसा अहसास हो रहा था।

शाश्वत ने गलती से गाजर गिरा दी और नीलिमा ने उसे खूब चिढ़ाया। यह हंसी संक्रामक थी, जैसे वे फिर बच्चे थे, बेफिक्र, खुश, जैसे कि केवल बच्चे ही हो सकते हैं। प्रियंका की और मेरी नज़र मिली और वह मुस्कराई, एक सच्ची, दिल से निकली मुस्कान जो मेरे अंदर तक पहुँच गई, जिससे खुशी और अफसोस दोनों का एहसास हुआ। पिछले कुछ सालों में साथ समय न गुजर कर हमने कितना कुछ खो दिया! प्रियंका हमेशा हमारी पारिवारिक परंपराओं को जीवित रखने में अहम भूमिका निभाती रही। अब उसे देखकर, उत्साहित, व्यस्त, और बच्चों से घिरी हुई, पूरी तरह उनके सौहार्द का हिस्सा, जैसे मेरा स्वर्ग लौट आया हो। "आलू छीलने में मदद चाहिए, पापा?" शाश्वत की आवाज ने मेरे विचारों को तोड़ दिया, और मैंने उसे भी एक छिलका उतारने वाला चाकू थमा दिया। मैं इस अवसर के लिए ईश्वर का आभारी था, जिसमें हम सब शामिल थे। हम एक आरामदायक दिनचर्या में सरलता से छीलने और बात करने लगे, कमरा हंसी-मजाक से भर गया, पारिवारिक प्रेम का एक स्वर्ग। हम रसोई में साथ थे, हर कोई योगदान दे रहा था। मुझे एहसास हुआ कि यह खाना बनाने से कहीं ज़्यादा हमारे परिवार को एक धागे में पिरोने जैसा था, जो पिछले सालों से ज़्यादा मजबूत और जीवंत लग रहा था। यही तो छुट्टियों का मतलब है, यह एकता, यह हँसी, और मिलकर खाना बनाना, जो सिर्फ़ मेज़ पर रखे खाने से पेट भर लेने से कहीं ज़्यादा का प्रतीक था।

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