ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग तीस (30)
भाग 30
अंशुमन
दीपावली के बाद मेहमान लौट गए थे। बच्चे भी जा चुके थे। प्रियंका ने अभी के लिए रिज़ॉर्ट बंद किया हुआ था, क्योंकि वह अभी किसी भी तरह से व्यस्त नहीं रहना चाहती थी। वह श्रेया के साथ समय गुजारना चाहती थी; जो मेहमानों के रहते संभव नहीं होता, खासतौर पर क्रिसमस और नव वर्ष के समय।
श्रेया को सम्हालने मेँ मदद के लिए एक अंतिम चरण के नर्स को रखने के निर्णय ने हमें राहत के साथ कड़वी वास्तविकता की याद भी दिलाई, जिसका हम सामना कर रहे थे। विजय मध्यम आयु का व्यक्ति था, सौम्य व्यवहार, सक्षम और संवेदनशील। वह हर सुबह सूरज की पहली किरण के साथ आता, और एक मुस्कान से हमारा अभिवादन कर के श्रेया की देखभाल में जुट जाता। उसकी उपस्थिति हमारे दैनिक जीवन की बदलती परिस्थितियों में एक सुकून लाई थी। वह अपने कर्तव्यों को सावधानी से करता, दवाओं का प्रबंधन करता और श्रेया के आराम का स्तर की निगरानी करता। वह अपना हर काम बखूबी कर रहा था, जिसमें वह वर्षों से विशेषज्ञता रखता था। श्रेया के साथ उसका व्यवहार नर्म और अपनत्व भरा था, बातचीत विनम्र थी, जो उसकी वास्तविकता की कठोरता को कम करती थी।
प्रियंका और मैं अक्सर दिन भर श्रेया का साथ बैठते, उसका साथ देते, कहानियाँ साझा करते, या बस उस शांतिपूर्ण मौन मेँ रहते, जिसे बनाए रखने में विजय ने मदद की थी। प्रियंका की तरह श्रेया के साथ बैठने की अब मेरी बारी थी। कुछ ही दिनों में वह मेरी भी दोस्त बन गई। एक रात जब मैं श्रेया का साथ था, तो उसने मुझसे कहा, "वह तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकती है।" वह लेटी हुई थी और मैं उसका बगल में बैठ गया। मैंने उसका हाथ वैसे पकड़ा जैसे मैंने प्रियंका को करते देखा था। "वह तुमसे बहुत प्यार करती है।"
"मैं जानता हूँ” .... “लेकिन उसे तब ही अपने लिए कुछ करने देना, जब तुम्हें लगे कि तुम इस लायक हो।" मैंने श्रेया का माथा को चूमा, काश कि वह जीवित रहे और मेरे पास रहे ताकि मुझे उसे जानने का मौका मिले; उसे अपने जीवन में शामिल करूँ, उससे सीखूँ। लेकिन विजय ने हमें बताया था कि यह अब कुछ ही हफ़्तों की बात है।
"मैं हर संभव प्रयास करूंगा," मैंने वादा किया।
"हम अतीत को ठीक नहीं कर सकते, अंशुमन। केवल वर्तमान को सुधारने और भविष्य को बेहतर बनाने का लिए कड़ी मेहनत कर सकते हैं।" मेरे दिल में उसके लिए बहुत सम्मान था। वह पक्का करना चाहती थी कि उसके जाने का बाद उसकी दोस्त का ख्याल रखा जाए। "तुम्हें उसके लिए उसकी ‘श्रेया’ बनना होगा" कहते हुए वह सो गई थी।
"मैं वादा करता हूँ।" विजय कमरे में वापस आया, और मैंने उसे सिर हिलाकर संकेत दिया। "वह सो गई है।"
"हाँ, वे थक गई हैं।" और उसका शरीर बंद हो रहा है, मैंने सोचा। विजय सक्षम था, और जब मैंने उसे श्रेया की देखभाल करते देखा, तो मैं उसकी करुणा की गहराई और उसकी लाई गई सूक्ष्म शक्ति से दंग रह जाता था। वह सिर्फ नर्स भर नहीं था; वह उस गरिमा का संरक्षक था जिसका हर कैंसर से लड़ता मरीज अपने अंतिम दिनों में हकदार होता है।
जैसे-जैसे शाम होने लगी और सूर्यास्त की सुनहरी छटा आसमान में फैलने लगी, विजय ने अपना सामान पैक कर लिया। वह हमेशा प्रियंका और मुझसे बात करने का लिए कुछ समय निकालता, हालातों की जानकारी और सौम्य आश्वासन देता और धैर्य और सहानुभूति से हमारे प्रश्नों का उत्तर देता। आज भी कुछ अलग नहीं था। "वे सहज हैं।" उसने हमें बताया, उसकी आवाज़ धीमी और शांत थी। "और अच्छी मनोदशा में हैं। यह अच्छा है कि आप लोग उन के साथ यहाँ हैं; इसका मतलब उससे कहीं ज़्यादा है जितना आप लोग सोच भी सकते हैं।" मैंने, उन शब्दों का वजन महसूस करते हुए सिर हिलाया। "धन्यवाद, विजय," मैंने कहा।
“आप श्रेया के लिए जो करते हैं उसके लिए धन्यवाद।” प्रियंका ने उसे गले लगा लिया।
विजय की अनुपस्थिति में घर चुप लग रहा था। हमारे चारों ओर का स्थान श्रेया का साथ बिताए गए समय के महत्व से भरा हुआ था। मैंने प्रियंका की तरफ देखा, उसके चेहरे पर प्यार और दुख दोनों था और वह श्रेया का कमरे की तरफ देख रही थी। आगे बढ़ते हुए, मैंने उसका हाथ थाम लिया, उसके स्पर्श की कंपन को महसूस किया। हम साथ-साथ श्रेया का पास वापस बैठ गए, हमारे चारों ओर का सन्नाटा खाली नहीं था, बल्कि अनकहे शब्दों और साझा दिल की धड़कनों से भरा हुआ था, हर पल पिछले पल से ज़्यादा कीमती था।
वर्ष का अंतिम दिन की अंतिम रोशनी फीकी पड़ रही थी, जब प्रियंका और मैं नवनिर्मित दीवार का पास खड़े समुद्र की ओर देख रहे थे। ताजी हवा में नमक की खुशबू और नए साल का वादा था। विजय श्रेया का साथ अंदर था, और प्रियंका मुझे दीवार पर काम खत्म करते देखने आई थी। "तुम इन कपड़ों मेँ बहुत सेक्सी लग रहे हो" उसने मुस्करा कर खुद से फुसफुसाया, लेकिन मैं सुन पाया था।
“अच्छा? तुम कहो तो मैं हर वक्त ये ही पहना करूँ?” उसने खुद ही मुझ पर हाथ रखा। यह अंतरंग था। हम पहले वाली स्थितियों मेँ वापस नहीं आए थे, लेकिन अब मुझे उम्मीद हो चली थी कि शायद वापस आ सकते हैं। काश, पहले भी हम इसी तरह बातें करते होते, जैसे अब करते हैं। लेकिन पुरानी बातें हमेशा वर्तमान से कहीं अधिक स्पष्ट होती हैं।
प्रियंका की आँखें क्षितिज को देखते हुए चिंतनशील थीं, जहाँ आकाश गोधूलि रंगों की बौछार में समुद्र से मिल रहा था। "मैं यहीं रहना चाहती हूँ, अंशुमन," उसने अचानक कहा, उसकी आवाज़ दृढ़ थी, फिर भी विनम्र "मैं यहाँ, इस रिसॉर्ट में, इस द्वीप पर जीना चाहती हूँ।" इन शब्दों ने मुझे चकित नहीं किया; मैंने उसे यहां जीवंत होते देखा था, जो मैंने वर्षों से नहीं देखा था। मैं कुदाल को नीचे रखा और उसके पास चला गया।
"ठीक है," मैंने जवाब दिया, मेरा हाथ उसका हाथ पर था, हमारी उंगलियाँ स्वाभाविक रूप से एक दूसरे में उलझ गईं। "फिर मैं भी तुम्हारे साथ यहीं रहूँगा।" वह मेरी ओर देखने लगी, उसकी आँखों में आश्चर्य और अनकहे सवाल थे। मैंने गहरी साँस ली और पिछले कुछ दिनों से मेरे मन में जो चल रहा था, उसे साझा करने के लिए तैयार हो गया। "प्रियंका, मैं इस बारे में बहुत सोचता रहा कि मेरे लिए क्या असल मायने रखता है। मैं वर्षों काम में डूबे रहकर सही मायने में जीने से वंचित रह गया। मैं सिर्फ़ चालीस साल का हूँ, रिटायर होने के लिए बहुत छोटा हूँ, लेकिन अब बदलाव का समय आ गया है।"
"क्या?" उसने मेरी ओर देखा और फिर अपना सिर हिलाया जैसे कि मैं कोई भूत-प्रेत हूँ। लहरें धीरे-धीरे किनारे से टकरा रही थीं, हमारी बातचीत का लिए एक सौम्य पृष्ठभूमि बना रही थी। मैंने उसका मुंह धीरे से चूमा क्योंकि उसने मुझे ऐसा करने दिया, और हर बार जब वह ऐसा करती, तो वह मेरे लिए सूर्योदय की किरणों की तरह होती।
"मैं कंपनी का रोज़मर्रा का कामों से पीछे हटने पर सोच रहा हूँ, ताकि प्रभाकर को कार्यकारी सीईओ और अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया जा सके," मैंने आगे कहा। "मैं इसके बजाय बोर्ड के सीनियर सदस्य का रूप में अपनी भूमिका निभाऊँगा, और सिर्फ़ कुछ चुनिंदा प्रोजेक्ट संभालूँगा। इससे मुझे ज़्यादा खाली समय मिलेगा, प्रियंका। यहाँ, तुम्हारे साथ, इस रिज़ॉर्ट का हिस्सा बनने, जीने का समय।" प्रियंका की आँखें मेरी आँखों में कुछ तलाश कर रही थीं, निश्चितता की तलाश, शायद उस आदमी का संकेत भी जिसे वह जानती थी, जिसने कभी ऐसे विचार मन में नहीं लाए होंगे। "तुम बाद मेँ मुझसे नाराज़ हो जाओगे। मैं बस यह जानती हूँ," उसने कहा, उसकी आवाज़ एक पीड़ा भरी फुसफुसाहट थी।
"भविष्य में क्या होगा, इसका मैं वादा नहीं कर सकता; कोई भी नहीं कर सकता। लेकिन मैं गारंटी दे सकता हूँ कि मैं इसके लिए कभी भी तुम से नाराज़ नहीं होऊँगा। मैं खुद भी यही चाहता हूँ" मैंने उसे आश्वस्त करने की कोशिश की। "यहाँ बिताए इन दिनों ने मुझे दिखाया है कि मैंने कितना कुछ खो दिया है। मैं एक दिन पीछे मुड़कर देखते हुए यह महसूस नहीं करना चाहता कि मैंने न केवल अपने जीवन का कुछ हिस्से खो दिए हैं, बल्कि यह सब कारोबार जैसी एक महत्वहीन चीज़ ले लिए खोया है।"
उस ने कहा, "लेकिन तुम्हें बैंगलोर का तुम्हारा जीवन याद आएगा, तुम्हारे बिजनेस की व्यस्तता और जीत की उत्तेजना याद आएगी।"
"हमारा जीवन। हमारा बिजनेस। हम घर रखेंगे, जब मन करेगा तब वहाँ आएंगे जाएंगे।"
"लेकिन रिसॉर्ट?"
"बेब, हमारे पास मदद के लिए लोग रखने के लिए काफी धन संसाधन हैं।"
"नहीं अंशुमन। तुम्हारे पास संसाधन हैं, मेरे पास----"
"यह बात फिर से मत करो," मैंने उसकी बात काटते हुए चेतावनी दी।
"क्या बात?"
मैं उसका हाथ पकड़ उसे खींच कर अंदर ले गया। "अंशुमन," उसने विरोध किया। लेकिन मैं यह पैसे का भेद खत्म करना चाहता था। मुझे अपना फोन रसोई में मिला और मैंने तुरंत वकील को फोन किया। प्रियंका ने अपना हाथ मुझसे छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन मैंने नहीं छोड़ा। मैं नाश्ते का कोने में बैठ गया और उसे अपनी गोद में बिठा लिया।
"मुखर्जी हियर" मेरे पारिवारिक वकील राजेश मुखर्जी की आवाज आई। विवेक कंपनी का वकील था लेकिन राजेश कि फर्म थी जो हमारे परिवार के मामले देखते थे।
"अरे राजेश, यहाँ राव-सिन्हा। नए साल की छुट्टियों मेँ फोन करने के लिए क्षमा करना।"
"नहीं-नहीं, ठीक है। मैं वैसे भी काम कर रहा हूँ। तुम ठीक हो?" प्रियंका शांत हो गई थी, लेकिन उसने मुझे घूर कर देखा। मैंने उसे आँख मारी, जिससे वह और भड़क गई।
"मुझे एक मदद चाहिए, यह ज़रूरी है और जल्द से जल्द होना चाहिए।"
"बताओ?"
"क्या तुम उस विवाह-पूर्व समझौते को जानते हो जिस पर हम ने हस्ताक्षर किये थे?"
"हाँ," वह हँसा, "तुम्हारी माँ एक क्रूर अमीर महिला थी... वैसे, हाँ, मुझे याद है।"
"मैं उस समझौते को रद्द करना चाहता हूं।"
"क्या?" राजेश को जैसे झटका लगा। "यार, क्या तुम क्या कह रहे हो? मैंने तो सुना है कि प्रियंका जी तुम्हें छोड़कर चली गई हैं, और तुम... सब कहते हैं कि तुम अपनी उस हॉट असिस्टेंट का साथ संबंध बनाने की योजना बना रहे हो।" प्रियंका ने नाक भौंह सिकोड़ी।
"राजेश, मेरा किसी और के साथ कोई संबंध नहीं है और जब से मैं बीस साल पहले अपनी पत्नी से मिला हूं, तब से मेरा कभी भी किसी का साथ कोई संबंध नहीं रहा" राजेश चुप हो गया। "मैं प्रियंका से प्यार करता हूँ। और मैं चाहता हूँ कि यह समझौता रद्द हो जाए।"
"यह इसके लिए सही समय नहीं है अंशु—"
"राजेश, मैं मुवक्किल हूँ और जानता हूँ कि मैं क्या कह रहा हूँ। इस प्री-नेपुटल समझौते को रद्द करवा दो और मुझे जिन कागज़ात पर हस्ताक्षर करने हैं, उन्हें ईमेल कर दो।"
मैंने राजेश को गहरी साँस लेते सुना। "पैसा तुम्हारा है, दोस्त। लेकिन अगर तुम दोनों बिना प्री-नेपुटल समझौते के अलग होते हो, तो सब कुछ आधा-आधा बँटेगा, क्योंकि तुम इतने लंबे समय से शादीशुदा हो। तुम्हारा घर, तुम्हारी विरासत भी, व्यवसाय भी।"
"मुझे पता है।" राजेश स्तब्ध और परेशान था। "तुम कर क्या रहे हो?"
प्रियंका ने मेरी ओर ऐसे देखा जैसे वह भी यही सोच रही हो। "हमारी शादी को बीस साल हो गए हैं, राजेश। अगर हम अलग हो गए, तो उसे हर चीज़ का आधा हिस्सा मिलना ही चाहिए, क्योंकि उसका बिना मेरे पास यह होता भी नहीं। इसलिए, इस अनुबंध को रद्द कर दो।"
"ठीक है," राजेश ने धीरे से कहा, "कल तक तुम्हें ईमेल मिल जाएगा। डिजिटल हस्ताक्षर के लिए डॉक्यूसाइन से आएगा।"
"क्या प्रियंका को कुछ साइन करने की ज़रूरत होगी?"
"नहीं। तुम्हारी माँ ने मेरे पेशेवर जीवन में अब तक का सबसे एकतरफा प्री-नेपुटल समझौता तैयार किया है।"
"धन्यवाद, राजेश, और नव वर्ष की शुभकामनाएं।" मैंने फोन रख दिया और प्रियंका को गले लगा लिया। "तो, प्यारी पत्नी जी, हमारे पास मदद का लिए संसाधन हैं," मैंने हमारी पिछली बातचीत को जारी रखा जैसे कि मैंने अभी-अभी अपने वकील से बात नहीं की थी।
"तुम पागल हो गए हो क्या?" वह फुसफुसाई।
"मैं तुमसे प्यार करता हूँ," मैंने उससे कहा। "बेशक- मैं - प्यार- करता- हूँ- तुमसे ।"
"तो, श्रीमान वर्कहॉलिक, तुम लक्षद्वीप में करोगे क्या?"
"अगर मेरी पत्नी मुझे इजाजत दे तो मैं हर रात उसके साथ प्यार करूंगा। मैं खाना बनाने और सफाई करने में उसकी मदद करूंगा। मैं उसके साथ सैर पर जाऊंगा। दिन में मैं यहीं से प्रोजेक्ट पर काम करूंगा। वैसे, हमें एक मजबूत वाई-फाई राउटर की जरूरत होगी। और मुझे घर में कहीं एक ऑफिस भी बनाना होगा" मैंने उसका मुंह को धीरे से चूमा। "जब मुझे यात्रा करनी हो, तो मैं चाहता हूं कि मेरी पत्नी मेरे साथ आए ताकि हम समय का आनंद ले सकें। मैं चाहता हूं कि जब भी मुझे ऑफिस जाना हो तो वह मेरे साथ बैंगलोर आए और हमारे परिवार के घर में रहे।" उसके आँसू बहने लगे। "बेबी?"
उसके प्यारे भीगे चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान फैल गई, जिससे उसके सुंदर चेहरे पर चमक आ गई। "यह एक बढ़िया योजना लगती है, अंशुमन।" उसने अपना सिर मेरे कंधे पर टिकाया और रोने लगी। लेकिन मैं जानता था कि वह दुखी नहीं थी, बस अभिभूत थी। मैंने उसे सांत्वना दी। वह आश्रय जैसा स्नेह, जो उसने मुझे हमेशा दिया था।
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