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सोमवार, 26 जनवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग बारह (12)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग बारह (12)


भाग 12

अंशुमन




"काव्या" मैंने दहाड़ते हुए कहा।

देर हो चुकी थी, लेकिन हम अभी भी कार्यालय में थे और एक टेंडर का काम पूरा कर रहे थे, जिसकी समय सीमा समाप्त हो चुकी थी। उसने अपना सिर अंदर डाला। "लगभग पूरा हो गया है, और मैं इसे दस मिनट में अनुमोदन के लिए आपको ईमेल कर सकती हूँ।"

"आज मेरी पत्नी ने फोन किया था?"

"आपका मतलब पूर्व पत्नी से है?" वह मुस्कराते हुए अंदर आई।

मैं सच में इस औरत से नफरत करने लगा था। "मेरी एक ही पत्नी है, जो पूर्व नहीं वर्तमान पत्नी है, और रहेगी। मेरी पत्नी ने आज फोन किया?" "हाँ।" उसने अपनी आँखें घुमाईं।

“क्या उसने मेसेज छोड़ा था?" काव्या ने कंधे उचका दिए, "वह हमेशा मेसेज छोड़ती हैं।"

"क्या मेसेज था?" मैंने दांत पीसते हुए पूछा। "हमेशा जैसा। अंशुमन से कहो कि मुझे वापस कॉल करे।"

"तो तुमने मुझे क्यों नहीं बताया?"

वह हंस पड़ी "जब मैंने काम शुरू किया, अंशुमन, जब भी मैंने मेसेज बताया तो आप बड़बड़ा कर कहते थे कि काश वह इतनी बार फोन न करती। तो मैंने बताना बंद कर दिया।"

"लेकिन उस दिन मैंने तुम्हें बताया था न, कि वह चली गई है। तुम्हें पता था कि यह महत्वपूर्ण था," मैंने आरोप लगाया।

"यह तो और भी बड़ा कारण है, न बताने का।"

मुझे एहसास हुआ कि यह काव्या की गलती नहीं थी। यह मेरी गलती थी। मैंने अपने जीवन में हर किसी को अपनी पत्नी का तिरस्कार करने की पूरी छूट दे दी थी। "अगली बार जब वह फ़ोन करे, तो मुझे तुरंत बता देना। दरअसल, मैं अपने फ़ोन का रूट बदल दूँगा, ताकि अब से मैं खुद ही फ़ोन ले सकूँ।"

"अंशुमन, मैं आपकी सहायक हूँ; यह मेरा काम है .... " उसने विरोध किया।

“हाँ, यह तुम्हारा काम ही था काव्या, लेकिन तुमने इस फोन रूट का अपने स्वार्थ के लिए फायदा उठाया। मुझे मूर्ख मत समझो!! अब तुम्हें मेरे निजी सेल फ़ोन कॉल का जवाब नहीं देना पड़ेगा।" मैंने अपना फ़ोन उठाकर कॉल फ़ॉरवर्डिंग हटा दी, जो हमारे काम के लंबे घंटों के लिए सेट की गई थी। मेरे बच्चे कॉल करने से ज़्यादा मैसेज करते थे, मैं कभी नहीं चूका। लेकिन, मैंने प्रियंका के संदेशों को अनदेखा कर दिया क्योंकि मैं एक बुरा पति था।

"अंशुमन?" काव्या को जैसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था।

"काव्या, मैं ठीक नहीं हूँ। मैं अपनी पत्नी को वापस घर लाने की कोशिश कर रहा हूँ, इसलिए जब तुम उसका फोन और संदेश मुझसे छुपाती हो, तो इससे कोई मदद नहीं मिलती।"

काव्या ने आह भरी, "वह तो कई सप्ताह पहले ही चली गई हैं, अंशुमन ।"

मेरा जबड़ा कस गया। "वह टेंडर भेज दीजिए; टीम के सभी सदस्यों को कॉपी करना न भूलें ताकि वे सभी अपना इनपुट दे सकें। धन्यवाद।” वाह पलट कर जाने लगी। “और याद रखना काव्या, आगे से मेरे और मेरी पत्नी के बीच मेँ आने की कोशिश की, तो मुझे एचआर से इस व्यवहार की शिकायत करनी होगी।" सुन कर उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

जब मैंने प्रियंका को फ़ोन किया तो मैं एक तो पहले से ही गुस्से में था, और फिर मैंने आदतन उस पर अपना गुस्सा निकाला। किसी को मुझे यह बताने की ज़रूरत नहीं थी कि मेरी पत्नी के साथ तीन हफ़्तों में मेरी पहली बातचीत अच्छी नहीं रही। बल्कि हो सकता है कि मैंने उसे मुझे छोड़ने के अपने फ़ैसले के बारे में बेहतर महसूस करने में मदद की हो। और आज पहली बार उसने मुझे पलट कर जवाब दिया था, आईना दिखाया था। ठीक वैसे ही जैसे उसने शाश्वत का अपमान बर्दाश्त नहीं किया, मेरा भी नहीं किया। मेरे मन मेँ उसके लिए सम्मान और अपने लिए धिक्कार का भाव और गहरा हो गया।

मुझे मदद की ज़रूरत थी। शाश्वत की ही तरह मुझे भी एक मनोचिकित्सक से मिलना होगा। मुझे जरूरत थी - प्रियंका की। वह घर क्यों नहीं आ सकती? मुझे उसकी जरूरत थी..... मैंने शर्म से अपना सिर झुका लिया। मैं उस पर चिल्लाया। माफी मांगने के बजाय, यह कहने के बजाय कि, मैं तुमसे प्यार करता हूँ, घर आओ, मैंने उससे डाँट कर कहा कि वह पाँच हजार रख ले! असहाय महसूस करते हुए मैंने रक्षित को फोन किया। "मैंने उससे बात की।"

"फिर?"

"मुझे लगता है कि मैंने खुद को और भी ज़्यादा बर्बाद कर लिया है।" .....

"अच्छा!," उसने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा। "अब तुमने क्या किया है?" मैंने उसे सब बताया। "वाह! आप बहुत आगे बढ़ गए हैं, और जाहिर है, आपकी पत्नी घर नहीं आ रही है।"

"मुझे नहीं पता कि मैं क्या करूँ, रक्षित।" मैंने अपने जीवन में कभी इतना असहाय, इतना बेकाबू महसूस नहीं किया था।

"अंशुमन, क्या सच मेँ तुम अपनी पत्नी को वापस चाहते हो?"

"हाँ।"

"तो फिर हिम्मत करो और उससे मिलो। उसे बताओ कि तुम कैसा महसूस कर रहे हो। और ऐसा कुछ भी करने से पहले, अच्छे से समझ लो कि गलत तुमने किया है, उसने नहीं। अगर - सिर्फ अगर - अगर वह तुम्हें माफ़ कर देती है, तो ठीक है, तुम्हारी किस्मत। लेकिन नहीं, तो फिर अपने पैसे के गुरूर की बकवास अलग रख कर सुनिश्चित करना कि वह आर्थिक रूप से सहज हो और उसे शांति से जीवन जीने के लिए छोड़ देना।"

पता नहीं यह कब हुआ, लेकिन मेरा छोटा भाई मुझसे ज्यादा समझदार हो गया था।

"मैं उसके बिना साँस नहीं ले सकता," मैंने अपनी छाती को रगड़ते हुए कहा। प्रियंका के बिना रहना बहुत दुखदायी है। बहुत दुखदायी!”

"यदि वह माफ नहीं करे तो तुम्हें जीना सीखना होगा क्योंकि अब निर्णय उसे लेना है।"

"तुम प्रियंका के इतने बड़े प्रशंसक कब से बन गए?" मैंने नाराजगी जताते हुए कहा ।

"सालों पहले। हर बार जब हम साथ होते थे, और मैं देखता था कि कैसे वह तुम सब का ख्याल रखती थी। देविका नहीं रखती थी अंशुमन, तुम तो जानते ही हो। देविका से विवाह के कुछ समय बाद ही मुझे समझ आ गया था कि तुम कितने किस्मत वाले हो।

इसके बाद मैंने नीलिमा को फोन किया। उसने मुझे बताया कि यशस्वी मेरा या शाश्वत का चेहरा भी नहीं देखना चाहता था और वे दोनों दीपावली मनाने के लिए लक्षद्वीप जा रहे थे।

"यह तो अच्छी बात है" मैंने उससे कहा। ..... "क्या वास्तव में?"

"हाँ। मैं नहीं चाहता कि तुम्हारी माँ छुट्टियों में अकेली रहे। क्या तुम मुझे श्रेया के रिसॉर्ट का विवरण भेज सकते हो?" जानकारी मिलने के बाद, मैंने लक्षद्वीप और सनशाइन होम्स रिज़ॉर्ट के बारे में जानकारी ली। वेबसाइट पर मौजूद तस्वीरों में एक शानदार नज़ारा था, जो प्रियंका की सारी सिफ़ारिशों को पुष्ट करता था। उसने कई बार मुझे चलने के लिए मनाने की कोशिश की थी। श्रेया उसकी सबसे अच्छी दोस्त थी, वही उसका परिवार थी, और मैं उसे नहीं जानता था। मैं प्रियंका के जीवन के लोगों को नहीं जानता था, क्योंकि मैंने परवाह नहीं की थी। मैंने उसकी जरूरतों को हमेशा अनदेखा किया था। मुझे नहीं पता कि यह कब शुरू हुआ, लेकिन जितना प्रियंका एक बेहतर श्रीमती राव-सिन्हा बनने के लिए काम करती थी, जाहिर है, उतना ही अधिक मैं एक बड़ा बेवकूफ बनने के लिए बढ़ता था।

उस रात, जब मैं बिस्तर पर लेटा था, मैंने प्रियंका का पुराना फोन निकाला। उसमें पास कोड नहीं था। जब मैं उसे रखने को कहता, तो वह हंस पड़ती कि उसके पास छिपाने के लिए कुछ भी नहीं है, और यह सिर्फ़ एक परेशानी होगी। मुझे यह देखकर राहत मिली कि उसने अपना फोन डिलीट नहीं किया था, और मैंने सोचा कि काश मैंने पहले ही यह देख लिया होता।

संदेशों को देखा – मेरे और बच्चों की ओर से अनुत्तरित बहुत सारे मेसेज थे। मैंने तस्वीरें देखीं- पूरे परिवार की तस्वीरें, उसकी एक भी नहीं। एक सेल्फी भी नहीं। प्रियंका किसी सोशल मीडिया पर नहीं थीं और उस ने सिर्फ़ यादों को संजोने के लिए तस्वीरें लीं थीं। मैंने कई ऐप्स खोले और बंद किए। मैं फिर से उसके जीमेल ऐप में गया और उसके फ़ोल्डर्स को स्कैन करना शुरू किया। उनमें से एक का नाम सिर्फ़ “मेरा निजी” था। मैंने उसे खोला।

मेरी नजर पहली विषय पंक्ति पर पड़ी: पुनः अदृश्य महसूस कर रही हूँ।

दूसरी “आज फिर यही हुआ”

तीसरी “आज पार्टी मेँ सब महिलायें कह रही थीं कि मैं ‘पहली पत्नी’ हूं और अंशुमन ‘होने वाली दूसरी पत्नी’ के साथ समय गुजार रहे हैं”

आखिरी मेल हमारी सालगिरह के अगले दिन की थी। मुझे अपने आंसू पोंछने पड़े ताकि मैं स्क्रीन देख सकूं।

विषय: अपॉइंटमेंट रद्द करना

डॉ. मिश्रा,

कल हमारी 20वीं सालगिरह थी। यह भी अंशुमन की ओर से एक शब्द भी कहे बिना चली गई। कोई स्वीकृति नहीं, कोई पहचान नहीं। लगता है जैसे हम एक ही घर में अजनबी हैं। मैं सोचती रहती हूँ कि क्या उसने मुझे कभी सच मेँ प्यार किया भी होगा? मैं खुद को बहुत अलग-थलग महसूस कर रहा हूँ - अंशुमन से, अपने बच्चों से, उस जीवन से जिसे बनाने के लिए मैंने इतनी मेहनत की है। इसका कोई मतलब नहीं है। मैंने जाने का फैसला किया है। मैं श्रेया के साथ रहूँगी जैसा कि मैंने योजना बनाई थी। मैं कुछ पैसे ले रही हूँ, लेकिन आप तो प्री-नेपुटल समझौता के बारे में जानती ही हैं, इसलिए बस इतना ही ले रही हूँ कि कुछ दिन अपना गुजारा कर सकूँ। इसलिए अब फीस के लिए मेरे पास पैसे नहीं हैं। जैसे ही मैं फीस वहन कर पाऊँ, मैं आपके साथ टेलीथेरेपी की व्यवस्था करूँगी। लेकिन अभी मेरे पास आपकी फीस के लायक पैसे नहीं हैं। मुझे बहुत अफसोस है।

साभार,

प्रियंका

फिर मैंने डॉ. मार्लीन मिश्रा का उत्तर पढ़ा।

प्रिय प्रियंका,

मैं सभी भावी नियुक्तियों को टेलीथेरेपी में बदल रही हूँ। भुगतान के बारे में चिंता न करें। हम भविष्य में इस पर काम कर सकते हैं। हम अपनी साप्ताहिक सेशन की नियुक्तियाँ जारी रखेंगे। अगर समय बदलने की ज़रूरत है तो मुझे बताएँ। आपको खुद पर गर्व होना चाहिए कि आप वह व्यक्ति हो जो होना चाहिए। दवाइयाँ जारी रखना। बुधवार को बात करते हैं। जब ज़रूरत हो तो मुझे फ़ोन या मैसेज करो। आप कभी भी मुझसे संपर्क कर सकती हैं।

स-सम्मान,

डॉ. मार्लीन मिश्रा

दवाएं? स्पष्ट था कि मनोचिकित्सक अपने मरीज़ के बारे में इतनी चिंतित थी कि बिना पैसे लिए उसे देखती रहेगी। मैं इतना अमीर था और प्रियंका के पास इलाज के पैसे नहीं थे जिसके कारण वह अपॉइंटमेंट कैन्सल कर रही थी। धिक्कार है! मैंने उसे यह नहीं कहा कि मेरे पैसे तुम्हारे हैं, मैंने उसे चिल्ला कर भीख की तरह कार और पाँच हजार रुपए रखने को कहा था। मैंने डॉ. मार्लीन मिश्रा को ढूँढा। उनका क्लिनिक पास ही था। मैंने ऑनलाइन अपॉइंटमेंट लिया और शुक्र है कि अगले दिन तीस मिनट के परिचय सत्र के लिए उनके पास समय था। मुझे पता था कि वह मुझे प्रियंका के साथ अपनी बातचीत के बारे में कुछ नहीं बताएंगी, लेकिन उन्होंने मेरी पत्नी का ख्याल रखा और शायद वह मुझे एक बेहतर इंसान बनने में मदद कर सकती हों। मुझे प्रियंका की थेरेपी के लिए भुगतान करने का मौका भी मिल जाएगा।

अगले दिन, मैंने काव्या को यह बताने के लिया फोन किया कि मैं आज छुट्टी ले रहा हूँ। मैं काम के बारे में सोचना नहीं चाहता था और न ही काव्या की लालसा भरी निगाहें सहना चाहता था। मुझे कि उसे अपने जीवन से बाहर निकालना था। शायद ट्रांसफर? उस मेँ आत्म संतुष्टि दिखती थी जैसे कि वह मेरा इंतज़ार कर रही थी कि मैं उसे बताऊँ कि अब मेरी पत्नी चली गई है, और वह और मैं साथ रह सकते हैं। हे भगवान्!

फिर बच्चों को फोन किया। जब बच्चे वे वीडियो कॉल पर आए, तो शाश्वत रोआँसा था। "मैं किसी से बात कर रहा था। और उन्होंने कहा कि मैं माँ के साथ बुरा व्यवहार कर रहा था क्योंकि मैं अपनी असुरक्षाओं से जूझ रहा था। यह बहाना नहीं और स्पष्टीकरण भी नहीं है। कभी-कभी बच्चे ऐसा करते हैं, अपनी भावनाओं को माता-पिता पर निकाल देते हैं।"

"यशस्वी सोचता है कि हम सब उनके साथ ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि वह हमें ऐसा करने देती हैं, और .... मैं यह नहीं कह रही कि यह माँ की गलती है, क्योंकि माँ को अपने ही परिवार को उनका सम्मान करना नहीं सिखाना पड़ना चाहिए। मुझे विश्वास नहीं होता कि हम सब ने माँ को इतना दुखी किया और हमें एहसास तक नहीं हुआ। वे हमें छोड़ नहीं जातीं तो हम ऐसे ही बने रहते – हैं न?" नीलिमा ने नाक सिकोड़ते हुए कहा।

"और मैं उन्हें छोटा महसूस कराता रहा, कराता ही रहता," शाश्वत ने रोते हुए कहा। "मैं यह गलती कैसे पूरी कर सकता हूँ, पापा? कैसे?"

"गलती मेरी है – शुरुआत मुझसे हुई, तुम दोनों ने मेरी देखा-देखी किया।" मैंने थके हुए स्वर में कहा और उन्हें प्रियंका के साथ अपने फोन कॉल के बारे में बताया। "ओह, पापा, आपने तो बहुत गड़बड़ कर दी," नीलिमा ने सहमति जताते हुए कहा "अब हम क्या करेंगे?" मैं एक योजना बना रहा था, लेकिन उसे अंतिम रूप देने के लिए मुझे कुछ दिन चाहिए थे। "हम यह साबित करेंगे कि हम उस से प्यार करते हैं और उसका ख्याल रखते हैं।"

शनिवार, 24 जनवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग ग्यारह (11)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग ग्यारह (11)



भाग 11

प्रियंका



“मिस प्रियंका, मैंने ज़िंदगी मेँ आज तक यही सबसे स्वादिष्ट भोजन खाया है" रिज़ॉर्ट की एक अतिथि कोयल त्रिवेदी ने मुझसे कहा, जब मैंने रात के खाने के बाद अपने बनाए पुदीने के ट्रफल्स के साथ कॉफी परोसी। इस सप्ताहांत, हमारे रिज़ॉर्ट के बारह में से नौ कमरे भरे हुए थे, और मैं व्यस्त थी। अपनी ज़रूरत महसूस होना अच्छा लग रहा था। दीपावली करीब आ गई थी, और मुझे परिवार की याद आ रही थी। अंशुमन के पास अब मेरा फ़ोन नंबर है, लेकिन उसने फ़ोन नहीं किया था। उसने मेरे संदेशों का जवाब भी नहीं दिया था।

ईशानी ने मुझे बताया कि वह उससे मिलने गई थी, और वह अभी भी इस तथ्य को समझ नहीं पा रहा था कि मैं उसे छोड़कर चली गई। उसने कहा कि वह उससे कहता रहा कि वह मुझसे प्यार करता है और मुझे वापस चाहता है, लेकिन मुझे पहले ही पता था कि वह ऐसा ही करेगा। यह उसकी अचानक प्रतिक्रिया होगी। अब, मैं तीन सप्ताह से अधिक समय से दूर थी, और मुझे लग रहा था कि कुछ और दिनों में, उसे एहसास होगा कि वह मेरे बिना खुश है। यह दुखद था, लेकिन मुझे पता था कि उसकी भावनाएँ इसी तरह विकसित होंगी। ऐसा नहीं था कि उसने हमारी शादी और मेरे प्रति अपनी अरुचि को गुप्त रखा था।

नीलिमा ने आखिरकार फोन किया था। मेरे बच्चों में से एक ने तो मुझसे संपर्क किया था, और मैं आभारी थी। मैं बस यही उम्मीद कर रही थी कि यह बातचीत शाश्वत के साथ हुई बातचीत जैसी न हो। शाश्वत से हुई उस बातचीत से मैं अभी भी घायल थी। "माँ, मुझे बहुत खेद है," उसने कहा, और मैं सुन सकती थी कि वह रो रही थी।

"ओह, नहीं, मेरी बच्ची। तुमने कुछ नहीं किया। कभी-कभी जोड़े अलग हो जाते हैं, बस इतना ही। तुम्हारे पिता अभी भी तुमसे और शाश्वत से प्यार करते हैं, और मैं भी।"

"नहीं-नहीं माँ, मैं इसकी बात नहीं कर रही। हां, मुझे इस बात का भी खेद है, लेकिन मैं सबसे ज्यादा इस बात पर शर्मिंदा हूं, कि मैं आपको कैसे नजरअंदाज करती रही हूं। पिछले कुछ सालों में शाश्वत और मैं जिस तरह से आपसे बात करते रहे हैं, उसके लिए मुझे बहुत खेद है। नहीं पता कि हम कब आपके प्रति इतने बुरे बच्चे बन गए। माफ कर दो माँ।"

"नहीं बेटी, तुम बुरे बच्चे नहीं हो," मैंने विरोध किया। "तुम तो मेरे प्यारे सबसे अच्छे बच्चे हो, जो किसी भी माँ को हो सकते हैं, और मैं भाग्यशाली हूँ और आभारी हूँ कि तुम मेरे जीवन में हो। अब, मुझे बताओ कि पढ़ाई में हालात कैसे हैं? जब मैंने श्रेया के डॉक्टर को बताया कि मेरी बेटी मेडिकल कॉलेज में है, तो वह बहुत प्रभावित हुए।"

मैंने सोचा कि इससे उसका ध्यान बंट जाएगा, लेकिन वह और रोने लगी।

"ओह, नीलिमा। नहीं, मेरी बच्ची, रोओ मत। सब ठीक है और ..... "

यशस्वी फोन पर आया, "हाय, मिसेज राव-सिन्हा, आप कैसी हैं?"

"मैंने कहा था यशस्वी, कि मुझे प्रियंका कहो। क्या नीलिमा ठीक है? भगवान, क्या मैंने ठेस पहुँचाने वाली कोई बात कही? तुम उसे कहो कि मुझे बहुत खेद है। मैं कभी नहीं...."

"नहीं आपने कुछ ग़लत नहीं कहा। नीलिमा दुखी है क्योंकि..., क्योंकि वह अब समझ पा रही है कि वह आपके साथ क्रूर रही है।"

"मेरी बेटी को क्रूर कहने की हिम्मत मत करना," मैंने चिल्लाकर कहा।

वह हंसा। "काश आप मेरी माँ होतीं। लेकिन सच तो यही है। और शाश्वत भी आपके साथ बहुत बुरा व्यवहार करता रहा है। नीलिमा को अब यह बात समझ में आ गई है, और वह खुद से बहुत शर्मिंदा है, जैसा कि होना भी चाहिए।"

"मेरे बच्चे ऐसे नहीं हैं, यशस्वी-"

"हाँ, वे हैं। इसीलिए तो आप चली गईं। मैंने अपनी आँखों से वह देखा था, और जब आप चली गईं तो मुझे आश्चर्य नहीं हुआ, लेकिन आपके बच्चे और पति आश्चर्यचकित थे।" चूंकि मेरे पास इस पर कहने के लिए कुछ नहीं था, इसलिए मैं चुप रही। शायद उन्हें यह भी नहीं पता था कि मैं मौजूद हूँ, तो अब मेरी अनुपस्थिति क्यों महसूस होने लगी? "आंटी?" यशस्वी ने कहा, क्योंकि उसकी बात से मैं कुछ देर चुप रह गई थी।

"हाँ, मैं यहाँ हूँ।"

"मैं पूछना चाहता था कि क्या हम दीपावली पर आपसे मिलने आ सकते हैं।" मैं चौंक गई। "लेकिन मैंने तो सोचा था कि तुम सब अंशुमन के पास जाओगे?"

"मैं अभी तो आपके पति या शाश्वत का चेहरा तक नहीं देखना चाहता। लेकिन अगर आप तैयार हों, तो नीलिमा और मैं आपके साथ छुट्टियाँ बिताना पसंद करेंगे।"

मैंने थूक गटका। "लेकिन यशस्वी, अंशुमन इंतजार कर रहा होगा .... "

"या तो हम आपके पास आएंगे, या हम यहीं रहेंगे। आपके पति के पास तो नहीं जाएंगे।”

यशस्वी के पास परिवार नहीं था और इसका मतलब था कि वे अकेले रहेंगे। मैं ऐसा नहीं कर सकती थी। "नहीं, नहीं। यहाँ आ जो। यहाँ रिज़ॉर्ट में रह सकते हो। यह बहुत सुंदर है। दीपावली के हफ़्ते में हमारे यहाँ ज़्यादा लोग नहीं होते, सिर्फ़ एक-दो जोड़े होते हैं। हम एक शानदार छुट्टी मनाएंगे। मैं सारी जानकारी मैसेज कर दूँगी, बस बताओ कब यहाँ पहुँचोगे?"

"धन्यवाद आंटी। नीलिमा अभी भी परेशान है, लेकिन मैं वादा करता हूँ कि वह बाद मेँ वापस कॉल करेगी।" कॉल खत्म होते ही मुझे लगा कि मैं उदासी में डूब गई हूँ। अंशुमन का दिल टूट जाएगा कि उसकी बच्ची उसके साथ दीपावली नहीं मनाना चाहती। भगवान! काश मैं उससे बात कर पाती, लेकिन मुझे पता था कि अगर मैंने कॉल किया तो क्या होगा - मुझे काव्या से बात करनी होगी और.....। नहीं, तलाक का यही मतलब है - अंशुमन की संपर्क जानकारी निकालते हुए मैंने खुद से कहा - कि कुछ और नहीं तो हमें अपने बच्चों के बारे में एक-दूसरे से बात करनी ही होगी।

मैंने श्रेया को खांसते हुए सुना और उसे देखने गई। मैं उसके पास बिस्तर पर बैठ गई।

"सब ठीक है?" उसने पूछा.

"हाँ। तुम्हें मेरा बनाया खाना पसंद आया?" .... “बिल्कुल आया मेरी जान” मैं जानती थी कि दवाइयों के कारण उसे किसी चीज का स्वाद नहीं आता।

"खैर, मैं सनशाइन होम्स रिज़ॉर्ट के भोजन विकल्पों को और बढ़ा रही हूँ।" मैंने आँखें मटकायीं और अपनी बात कहने के लिए बहुत ही खराब फ्रेंच लहजे में बात की।

श्रेया ने हंसते हुए कहा, "मैंने आज वकील से बात की है, और वह सब व्यवस्थित कर रहा है, जब रिज़ॉर्ट तुम्हारे नाम करें, तो बहुत ज्यादा बेकार करों का भुगतान नहीं करना पड़े।"

मैंने उसके गंजे सिर को प्यार से सहलाया। उसे गर्मी और ठंड दोनों लगती थी। जब उसे गर्मी लगती थी, तो वह अपनी टोपी उतार देती थी और जब गर्मी, तो उसे वापस पहन लेती थी। कैंसर के साथ जीने का मतलब था कि उसके शरीर का तापमान नियंत्रण टूट गया था। "मैं नहीं चाहती कि तुम मरो श्रेया" मैंने फुसफुसाते हुए कहा।

उसने मेरा हाथ पकड़ा और हल्के से दबाया। "मैं भी मरना नहीं चाहती, प्रियंका, लेकिन ऐसे जी भी तो नहीं सकती। मैं सिर्फ हड्डी-मांस रह गई हूँ, और हर जगह दर्द होता है।"

"मुझे कैंसर से नफरत है।"

उसने गर्दन हिला कर सहमति जताई। "ईशानी की अंशुमन से बातचीत कैसी रही?"

"अंशुमन तो अंशुमन ही था।" मैंने उसका माथा चूमा। "लेकिन नीलिमा ने आखिरकार संपर्क किया। वह और यशस्वी दीपावली के लिए यहाँ आ रहे हैं।"

"ओह, यह तो अद्भुत है, प्रियंका। ओह वाह! मैं तुम्हारी बच्ची से मिलने के लिए इंतजार नहीं कर सकती," श्रेया ने उत्सुकता से कहा। बच्चे श्रेया से मिल चुके थे, लेकिन तब वे छोटे थे। मैं हमेशा अकेले ही उससे मिलने आती थी। और बड़े होने के बाद भले ही मैंने श्रेया से मिलने आने के लिए कहा था, लेकिन बच्चे नहीं आते थे। मैंने भी उस पर दबाव नहीं डाला क्योंकि मैं उसके साथ यहाँ रिज़ॉर्ट में ज़्यादा सहज थी, और मुझे पता था कि वह भी मेरे साथ ही सहज है। "उसका मंगेतर एक अच्छा लड़का है। वह मेडिकल पूरी कर के मनोविज्ञान में मास्टर्स कर रहा है।"

"तुम्हारे घर में हर कोई बड़ी डिग्री प्राप्त कर रहा है। तुम्हें इस पर गर्व होना चाहिए।" गर्व तो था, लेकिन समस्या यह थी कि उन्हें मुझ पर गर्व नहीं था। उन्हें अपनी माँ पर शर्म आती थी, जो उनकी तरह समझदार या शिक्षित नहीं थी। "कौन सोच सकता था कि झोंपड़ पट्टी से हम दोनों एक दिन हमारी तरह रह रहे होंगे।" मुझे लगा कि वह कांप रही है, इसलिए मैंने उसे वापस टोपी पहना दी और पक्का किया कि वह ठीक से ओढ़े हुए है। "जब मैं मर रही होऊं तो तुम लोग मुझे अस्पताल नहीं भेजोगे, है न? मैं यहीं अपने घर में मरना चाहती हूँ, प्रियंका।" मैं उसकी आवाज़ में डर को सुन सकती थी। उसने अपनी ज़िंदगी को लेकर मुझ पर भरोसा किया था, लेकिन जब वह कमज़ोर और थकी हुई महसूस करती थी, तो उसके मन में संदेह पैदा हो जाता था। "तुम्हें पूछने की भी जरूरत नहीं है, प्रिये। तुम्हें पता है कि मैं ऐसा कभी नहीं करूंगी।"

"वादा?" ..... "हाँ मेरी जान। मैं वादा करती हूँ।"

"भले ही तुम बैंगलोर वापस जाओ...बस...सुनिश्चित करो...." उसकी आँखें बंद होने लगीं, और मैंने एक बार फिर उसके माथे को चूमा, क्योंकि वह नींद में डूब गई थी। मैं वापस नहीं जा रही थी। मैं श्रेया के साथ लक्षद्वीप में तब तक रहूँगी जब तक वह चली नहीं जाती। उसके बाद, मैं यहाँ अपना नया जीवन बनाऊँगी और अपनी दोस्त को श्रद्धांजलि अर्पित करूँगी। मैं अपने कमरे में गई और गहरी साँस ली। करीब सात बज रहे थे, शायद इतनी देर हो जाने के कारण अंशुमन अपना फ़ोन उठा लेगा? मैं इतना भाग्यशाली नहीं थी।

"हाय, प्रियंका, मुझे डर है कि अंशुमन व्यस्त है। क्या मैं आप का संदेश ले सकती हूँ?" जब मैंने उसके बॉस के बारे में पूछा तो काव्या ने कहा।

"आह... हाँ, धन्यवाद, काव्या। क्या तुम अंशुमन से कह सकती हो कि वह मुझे इस नंबर पर कॉल करे...?" मैंने उसे अपना नंबर दिया।

"जैसे ही वह मुक्त हो जाएंगे।"

मैंने फोन रख दिया और मुझे पता था कि वह फोन नहीं करेगा। मुझे यह भी यकीन नहीं था कि काव्या ने उसे मेरा संदेश दिया है या नहीं। उसने शायद उससे कहा होगा कि जब तक मेरी जान को खतरा न हो, तब तक उसे परेशान न करे।

ईशानी ने मुझे बिस्तर पर जाने के लिए तैयार होने के समय फोन किया। तब मैं सोच रही थी कि मैं कुछ घंटे पढ़ने या बेकार के टीवी देखने में गुज़ारूँ। मैंने हर रात नाश्ते के लिए रसोई और डाइनिंग रूम को व्यवस्थित करने के बाद यह करना शुरू कर दिया था, डिनर हम सप्ताह के दिनों में सात से दस बजे और सप्ताहांत में आठ से ग्यारह बजे तक परोसते थे। यह शुक्रवार की रात थी, इसलिए मैं एक अतिरिक्त घंटे सो सकती थी, जिसका मतलब था कि मैं पाँच के बजाय छह बजे उठ सकती थी। ऐसा नहीं है कि मुझे जल्दी उठने में कोई आपत्ति थी। मैं बहुत अच्छी तरह से नहीं सो पाती थी और काम करने से मेरा ध्यान मेरी ज़िंदगी से हट जाता था। कम से कम मुझे जीविकोपार्जन के लिए पैसे कमाने की ज़रूरत नहीं थी। मैंने रिज़ॉर्ट का हिसाब किताब लिखते हुए सोचा। इसलिए मुझे पता था कि श्रेया और मैं ठीक-ठाक रहेंगे, राव-सिन्हा की तरह अमीर तो नहीं लेकिन आराम से जीयेंगे। मैंने सुबह-सुबह गर्म पानी के पूल में तैरने जाना शुरू कर दिया था। मुझे पूल की गर्मी और ठंडी हवा के बीच का अंतर पसंद आता था। यह मेरे दिन की शुरुआत करने का एक स्फूर्तिदायक तरीका था।

मैं जब अपने फोन पर अलार्म लगा रही थी, तभी ईशानी का फोन आया। "अंशुमन ने अभी फोन करके कहा है कि जब तक वह तुम से बात नहीं कर लेंगे, तब तक वह किसी भी चीज पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे।"

"मैंने अभी उन्हें फोन किया और उनकी सहायक ने बताया कि वे व्यस्त हैं।"

ईशानी ने कराहते हुए कहा, "उसे मैसेज करो।"

"मैंने किया, लेकिन उत्तर नहीं आया। सच तो यह है, ईशानी, उत्तर कभी नहीं आता।"

"वह आदमी बहुत ही घटिया इंसान है," ईशानी ने बड़बड़ाते हुए कहा। "मैंने अभी उसे मैसेज किया है, और उम्मीद है कि वह तुम्हें कॉल करेगा। मुझे बताओ कि क्या हुआ।" मैं उसे बताना चाहती थी कि वह फोन नहीं करेगा, लेकिन उसने फोन काट दिया।

चमत्कार!! पाँच मिनट बाद अंशुमन का नाम मेरे फोन की स्क्रीन पर चमक उठा।

"मेरे प्रिय ... अंशुमन, कैसे हो?"

"ईशानी ने कहा कि तुमने फ़ोन किया? किससे बात की?" उसकी आवाज़ कर्कश थी। उसमें कोई कोमलता नहीं थी; आवाज़ वही थी, मैं व्यस्त हूँ, तुम मुझे क्यों परेशान कर रही हो।

"काव्या। उसने कहा कि तुम व्यस्त हो, और वह तुम्हें बता देगी।"

"ठीक है। मुझे... माफ करना, मैं-"

"अंशुमन, नीलिमा ने मुझे फोन किया था, और वह और यशस्वी यहीं लक्षद्वीप में दीपावली मनाना चाहते हैं, या उन्होंने कहा कि वे वहीं रहेंगे। मैंने हाँ कहा, लेकिन मैं नहीं चाहती थी कि तुम अचंभित हो जाओ। तुम्हें उससे और यशस्वी से बात करनी चाहिए।"

"मैं दीपावली के बारे में बात नहीं करना चाहता," उसने कहा। "मैं हमारे बारे में बात करना चाहता हूँ। क्या बकवास है, प्रियंका?" मैंने अपने होंठ चाटे. "अंशुमन ---"

"तुम ऐसे ही चली गईं और मेरे पास संपर्क करने का कोई रास्ता नहीं था।"

“मैंने कुछ दिन पहले अपना नंबर मैसेज से भेजा था। तुमने मुझे कभी जवाब नहीं दिया।"

"क्या?" मैंने उसे इधर-उधर सरसराते हुए सुना, और फिर वह फिर से फ़ोन पर आ गया। "अरे यार। मैंने मेसेज नहीं देखा।" .... वैसे ही तो, जैसे उसने कभी मेरा कोई संदेश नहीं देखा। मैं कभी भी कटु व्यक्ति नहीं थी, कम से कम मैंने कभी नाराजगी को बनाए रखने की कोशिश नहीं की, और मुझे ऐसी बातें कहने से नफरत थी जिनके लिए मुझे बाद में पछताना पड़े। यही कारण है कि मैंने अपने गुस्से को इस हद तक नियंत्रित रखा। लेकिन अभी, मेरे अंदर कुछ टूट गया। "बेशक तुमने नहीं देखा। तुम मेरे किसी मेसेज को कभी नहीं देखते।"

"क्या कहना चाहती हो?"

"बिलकुल वही जो कहा है, अंशुमन। मैंने बताने के लिए फोन किया था कि नीलिमा और यशस्वी दीपावली पर मेरे साथ रहेंगी, और मैं... छोड़ो जाने दो! कोई फर्क नहीं पड़ता। तुम अपनी बेटी से खुद बात करो और इस बारे में पता लगाओ। भाड़ मेँ जाओ।"

"क्या कहा???"

"हाँ, अंशुमन। मैं तुमसे तंग आ चुकी हूँ। मैं तुम सभी के लिए जीते-जीते थक गई हूँ, और मेरे लिए कोई भी वहाँ नहीं है। मुझे नहीं पता ..... "

"मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहा हूँ," वह चिल्लाया। "क्या मैंने तुमसे शादी नहीं कर ली। तुम्हें और क्या चाहिए?"

ओह, लेकिन दिल तो बार-बार टूट सकता है। "हाँ, अंशुमन, तुम हमेशा मुझे एहसान जताते रहे हो कि शादी कर के तो तुमने जैसे मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया। लेकिन बीस साल तक तुम्हारे जैसे बेपरवाह पति के साथ रहना, तुम्हारी माँ और बहन की क्रूरता सहना, तुम्हारे बच्चों का पालन-पोषण करना, तुम्हारा घर संभालना, और जब तुम्हारा मन हो तब तुम्हारा बिस्तर गर्म करना, जबकि तुम मुझे हर दिन अपमानित करते रहे, मुझे लगता है कि तुम्हारे उस शादी करने के उपकार के लिए यही भुगतान से काफी ज्यादा ही है, नहीं क्या?"

यह मैं नहीं थी। मैंने कभी किसी से इस तरह बात नहीं की। मुझे पता भी नहीं था कि मेरे अंदर यह है। श्रेया को मुझ पर गर्व होगा। सच में, मुझे खुद पर गर्व हुआ। "यह क्या हो रहा है? यह बातें तुम जैसी नहीं। क्या वह श्रेया तुम्हें इसके लिए उकसा रही है? वह तुम्हारे परिवार के साथ खिलवाड़ कर रही है ताकि जब वह...."

"ताकि जब वह मर रही होगी?" मैंने चीखते हुए उसकी बात पूरी की, अभी मैं अंशुमन से नफरत कर रही थी। "हाँ, यही तो उसकी चाल थी: पैंतीस साल की उम्र में कैंसर करवा लेना और उनतीस साल की उम्र तक इसे फैला देना ताकि मरने से ठीक पहले वह मुझे अपने आस-पास रख सके। तुम खुद को सुन भी रहे हो? कितने गिर गए हो तुम अंशुमन?" हमने कभी झगड़ा नहीं किया था। मैंने उससे कभी सवाल ही नहीं किया। मैंने शांति बनाए रखी। लेकिन मैं पीछे हटने और रियायतें देने वाली व्यक्ति होने से बहुत थक गई थी। मैं कभी न सुनी जाने या न देखी जाने से थक गई थी।

"प्रियंका, मेरे मुंह से यह बात ग़लत निकली। मुझे माफ़ कर दो। श्रेया कैसी है?"

"परवाह करने का दिखावा मत करो, अंशुमन, तुम ऐसे ही हो – हमेशा ही तुम मेरे साथ ऐसे रहे हो। तुम्हारे मुंह से वही निकला जो तुम हमेशा सोचते रहे, जैसा मेरे साथ हमेशा बर्ताव करते रहे। अब यह भलमनसाहत का नाटक तो मत करो।"

"मुझे इस बात की चिंता है कि इसका तुम पर क्या असर होगा, प्रियंका," उसने धीरे से जवाब दिया। "तुम कैसी हो?"

"मैं ठीक हूँ। ईशानी ने मुझे बताया कि वह तुम से मिली थी। आह ...... अब मुझे बताओ कि तुम कार के साथ क्या करना चाहते हो।"

"उसका भुगतान हो चुका है, प्रियंका। अपने पास रख लो।"

"मैं इसका बीमे का खर्च भी नहीं उठा सकती, मैं इतनी अमीर नहीं हूँ। भगवान का शुक्र है कि मैं एक क्रूर स्वार्थी अमीर इंसान नहीं हूँ। मुझे तुम्हारी कार नहीं चाहिए। मेरे पास श्रेया का ट्रक है।"

"बीमा का भुगतान मैं करूंगा।" .... ओह! ‘मैं’ पैसे चुका दूंगा। वह हमेशा यही कहता था। ‘मेरा’ पैसा। कभी ‘हमारा’ नहीं। कभी नहीं, हमेशा ‘मैं’ और ‘मेरा’। मैं बीस साल तक इस आदमी के साथ रही, और मैं बीस साल और रहती, तो यह जीवन कितना बेकार चल जाता। यह बातचीत ही सबूत थी मुझे यह जताने के लिए कि मैंने उसे छोड़कर सही निर्णय लिया था। तीन सप्ताह के बाद आज पहली बार जब उसने मुझसे बात की, तो वह मुझ पर चिल्ला रहा था, आरोप लगा रहा था कि मेरे मित्र ने मुझे यहां रखने के लिए अपनी जान दे दी।

"मैं इसे बेचकर पैसे भेज सकती हूँ, मुझे नहीं पता कि यह यहाँ कितने में बिकेगी लेकिन—"

"मुझे इतनी छोटी रकम की कोई परवाह नहीं है। और तुम्हें मुझे पाँच हज़ार वापस देने की भी कोई ज़रूरत नहीं है।"

"नहीं। नहीं-नहीं-नहीं अमीर खानदानी आदमी। मुझे ‘तुम्हारा’ पैसा या ‘तुम्हारा’ एहसान या ‘तुम्हारा’ कुछ नहीं चाहिए। तुम्हें बिल्कुल शर्म नहीं आती है न अंशुमन?” मैं फिर से चीख रही थी!! “शादी के बीस साल बाद भी तुम हफ्तों बाद मुझसे पहली बार बात कर रहे हो और फिर से चिल्ला कर बात कर रहे हो? कोई माफी नहीं मांगना चाहते?? अहंकार से कह रहे हो कि ‘तुम’ भुगतान कर दोगे? तुम्हारे मन मेँ यह नहीं आया कि यह बीस साल से मेरी पत्नी है और मेरे बच्चों की माँ है, तो ये सब कुछ ‘मेरा’ नहीं ‘हमारा’ है? तुम कह सकते थे, प्रियंका सब तुम्हारा है कुछ लौटाने की जरूरत नहीं है, मेरा सब कुछ तुम्हारा ही है। लेकिन नहीं अमीर इंसान!! तुम सिर्फ ‘मैं और मेरा’ मेँ ही जीते हो। मुझे ‘तुम्हारा’ कभी कुछ पहले भी नहीं चाहिए था, अब भी नहीं चाहिए। तुम अपनी कार वापस ले लो। मैं इसका उपयोग नहीं कर रही हूँ।"

"..... " वह कुछ बोल नहीं पाया था – शायद मेरा यह रूप अपेक्षित नहीं था न? उसे चुप रह कर सहने वाली प्रियंका की आदत थी। मैं हमेशा से यह जानती थी कि उसके मन मेँ मेरे लिए सम्मान नहीं था; लेकिन मुझे यह समझने में सालों लग गए कि अगर सम्मान नहीं है तो मैं प्यार कभी नहीं पा सकती। किसी भी रिश्ते में, वे दोनों एक साथ चलते थे। "क्या और कुछ बचा हुआ है कहने को?" मैंने हताश और थके हुए स्वर मेँ पूछा।

"हाँ, तुम अपने घर वापस आ सकती हो, प्रियंका। मैं तुम्हें तलाक नहीं दे रहा हूँ ।" खुद को दी गई तमाम चेतावनियों के बावजूद मेरे सीने में उम्मीद की किरणें फूट पड़ीं। "क्यों?"

"क्योंकि मैं ऐसा चाहता हूँ। पहले से ही हर कोई सोच रहा है कि मैं अपनी असिस्टेंट के साथ सो रहा हूँ, अगर हम तलाक ले लेते हैं तो वे सोचेंगे कि यह सच है।"

"तो तुम चाहते हो कि मैं इसलिए वापस आ जाऊं ताकि लोग यह न सोचें कि तुम्हारा किसी से अफेयर चल रहा है?"

"मुझे इसकी परवाह नहीं कि तुम वापस क्यों आओ, बस वापस आ जाओ।"

उसने फिर वही किया। मेरा सम्मान, मेरी भावनाओं का, मेरे दिल का सम्मान नहीं किया। मुझे नहीं पता था कि क्या कहना है जब मेरे अंदर सब कुछ बस मरना चाहता था क्योंकि यह दर्द अपनी तीव्रता में चकनाचूर कर देने वाला था।

"प्रियंका, हम शादीशुदा हैं। हमारे दो बच्चे हैं। घर आओ और हम बात कर सकते हैं, पता लगा सकते हैं कि जो कुछ भी तुम्हें गलत लगता है उसे कैसे ठीक किया जाए?" जो कुछ भी ‘मुझे लगता है’ कि टूटा हुआ है??? मैं फोन को दीवार पर पटकना चाहती थी। जो कुछ भी ‘मुझे’ गलत लगता है? मुझे? उसे अभी भी अपनी तरफ से कुछ गलत नहीं लग रहा? मैं गुस्से में थी। लेकिन इससे भी ज़्यादा गुस्सा मुझे उस गहरे दुख से था जो मुझे तब महसूस हुआ जब मुझे आखिरकार समझ में आया कि मेरी शादी खत्म हो चुकी है। सारी उम्मीदें, जिन्हें पाने की मैंने असफल कोशिश की थी, एक सपना बनकर रह गई थीं। कुछ भी नहीं बदला था। अंशुमन को मेरी याद नहीं आई, जबकि मैं चली गई थी। उसका दिल नहीं टूटा था। वह सिर्फ नाराज़ था। वह अपनी पत्नी को वापस चाहता था, प्रियंका को नहीं, बल्कि श्रीमती राव-सिन्हा को, दुनिया को दिखाने के लिए। खैर, भाड़ में जाए! "जो ‘मुझे’ गलत लगता है अंशुमन? क्या तुम्हें खुद नहीं लगता कि हमारी शादी में कुछ भी गलत है?" मैंने पूछा, मेरी आवाज़ जितनी मैं चाहती थी उससे अधिक कठोर थी।

"नहीं," उसने कहा। "हमारी शादी ठीक है। तुम हमेशा की तरह ज़रूरत से ज़्यादा प्रतिक्रिया कर रही हो। मुझे बताओ कि तुम्हें नहीं लगता कि मैं तुम्हें धोखा दे रहा हूँ?"

क्या मैंने ऐसा सोचा था? नहीं, मैंने ऐसा नहीं सोचा था। लेकिन सच तो यह था कि वह मेरा और हमारी शादी का सम्मान नहीं करता था, तो फिर वह काव्या या किसी और महिला के साथ क्यों न सोता? और भले ही उसने धोखा दिया हो या नहीं, लेकिन इससे हमारी शादी की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आ सकता। "मैं ज़रूरत से ज़्यादा प्रतिक्रिया नहीं कर रही हूँ, अंशुमन। लेकिन, मैं आखिरकार बीस साल के तुम्हारे दुर्व्यवहार और उपेक्षा पर पहली बार सही प्रतिक्रिया कर रही हूँ।" वह मेरी भावनाओं को मान्यता नहीं देता, इसलिए मुझे खुद ही यह करना पड़ा; नहीं तो मैं उसके पास वापस चली जाती और फिर से दुखी हो जाती। "मैं अब तुमसे शादी मेँ नहीं रहना चाहती।"

"प्रियंका, जीवन कैसे बिताओगी? तुम्हारे पास न पैसा है, न शिक्षा। तो तुम करोगी क्या?"

फिर छिपी धमकी? इतने सालों तक, मैंने इंतज़ार किया और कभी-कभी यह भी मान लिया कि वह मुझे साथी के रूप में देखता है, लेकिन उसने कभी ऐसा नहीं किया। उसने मुझे अपने से नीचे के किसी व्यक्ति के रूप में देखा, ऐसा कोई जो उसके साथ इसलिए था क्योंकि मेरे पास पैसे और शिक्षा नहीं थी। मैंने ईशानी से कहा था कि मुझे कोई पैसा नहीं चाहिए, लेकिन मेरे एक हिस्से ने सोचा था कि अंशुमन नहीं चाहेगा कि उसकी पत्नी, उसके बच्चों की माँ, बेसहारा हो जाए - कि वह जोर देगा कि मैं कुछ पैसे ले लूं ताकि मैं आराम से रह सकूं। मुझे पता होना चाहिए था। श्रीमती राव-सिन्हा ने मुझे बार-बार बताया था कि विवाह-पूर्व समझौता परफेक्ट था, और ऐसा लग रहा था कि अंशुमन उसका पालन करना चाहता था।

जब मैं कुछ नहीं बोली, तो उसका स्वर नरम और अनुनय पूर्ण हो गया। मैं इससे भी परिचित थी। आमतौर पर, इससे मुझे लगता था कि मेरी परवाह की जाती है, लेकिन अब, मुझे लगा कि मेरे साथ चालाकी की जा रही है। "प्रियंका, घर चलो, बेब। तुम्हारी जगह यहीं है।" वह कभी नहीं जान पाएगा कि दूर जाने के लिए कितनी ताकत की जरूरत होती है क्योंकि उसे तो यह भी विश्वास नहीं था कि मैं दूर चली गई हूँ। उसे लगा कि मैं सिर्फ नाराज़ हूँ। इतने सालों के बाद भी वह मुझे वास्तव में नहीं जानता था। "मैं इस शादी मेँ खुश नहीं हूँ, अंशुमन, तुम्हारे साथ खुश नहीं हूँ। लौटने का प्रश्न ही नहीं।"

"क्या तुम सच कह रही हो कि मैं तुम्हें इतना दुखी करता हूँ?" उसकी आवाज़ में गुस्सा फोन पर भी झलक रहा था।

"हाँ।"

"जानती हो प्रियंका, मैंने तुम्हें सब कुछ दिया। एक बढ़िया घर और वो सब कुछ जो तुम चाहती थी, और यही आभार है? तुम कहती हो कि मैं इतना घटिया पति हूँ? तो ठीक है, जो करना है करो। मैं कागज़ों पर दस्तखत करके उन्हें भेज दूँगा। कार और पाँच हज़ार रुपये रख लो। तुमने ये पैसे ‘कमाए’ हैं।" उसने गुस्से से फ़ोन पटक दिया।

फिर वही एहसान! मेरा ‘आभार’? मैंने अपना अलार्म सेट किया, फोन को चार्ज करने के लिए बेडसाइड टेबल पर रख दिया और बिस्तर पर चली गई। अँधेरे में मैंने अपने आँसू बहने दिये। मैं इतने सालों झूठी आशा मेँ शादी मेँ बनी रही, मैं मूर्ख हूँ जो उससे प्यार करती रही जो मुझसे ‘आभार’ की मांग करता रहा हो। इस बात ने मुझे फिर से अपने फैसले पर दृढ़ किया।

सोमवार, 19 जनवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग दस (10)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग दस  (10)


भाग 10

अंशुमन




"वह कैसी है? क्या वह ठीक है?" मैंने पूछा जब शाश्वत ने मुझे फोन करके बताया कि उसने अपनी माँ से बात की है।

"मुझे नहीं पता। मैंने बहुत गलती कर दी, पापा।" .... "क्या हुआ?" मैंने घबरा कर पूछा।

"मैंने माँ से अपनी आदत की तरह चिढ़ते हुए पूछना शुरू किया कि वह क्या बकवास कर रही है। माँ ने मुझसे कहा कि अगर मैं अनादर करूंगा तो वह मुझसे बात नहीं करेगी।"

"शाश्वत?"

"मैं बेवकूफ़ जैसा महसूस कर रहा हूँ। वह इतनी दुखी और प्यार भरी लग रही थी कि ‘मैं हमेशा तुमसे प्यार करूँगी’ और इससे मैं भभक गया।"

मैं अपने दफ़्तर में अपनी कुर्सी पर पीछे झुक गया और अपनी आँखें बंद कर लीं। "यह तुम्हें परेशान क्यों करता है कि तुम्हारी माँ तुमसे प्यार करे?"

"बात बस इतनी है कि वह हमेशा इतनी ज्यादा उदार रहती है कि वह इसे संतुलित करना कठिन बना देती है, आप समझ रहे हैं न?"

मैंने एक पल के लिए इसके बारे में सोचा और अचानक अपनी आँखें खोलीं। "नहीं बेटा, मैं नहीं समझ रहा। तुम्हारी माँ का तुम्हें प्यार करना? आखिर तुम इतना नाराज़ क्यों हो?"

"मैं... बस... मैं नहीं जानता।"

"क्या तुम उसके साथ ऐसे इसलिए हो गए कि मुझे उसके साथ बुरा व्यवहार करते देखा है?" मुझे यह प्रश्न पूछना अच्छा नहीं लगा, लेकिन मैं जानता था कि यह पूछना ही होगा।

"आप माँ के साथ बुरा व्यवहार नहीं करते, पापा। आप उन के साथ बहुत धैर्यवान हैं; आप उन के साथ बहुत अच्छे हैं।"

"वास्तव में? मैं ‘धैर्यवान’ हूँ? तुम्हें क्या लगता है कि उसने क्या गलतियाँ की हैं जो मुझे ‘धैर्यवान’ होना पड़ा हो? .... वैसे शाश्वत, सभी लोगों में से, केवल तुम ही ऐसा कह रहे हो। बाकी सभी लोग मुझे बधाई दे रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि मैं जान-बूझ कर तुम्हारी माँ के साथ घर के कोने मेँ पड़ी हुई किसी गंदगी जैसा व्यवहार करता रहा हूँ, क्योंकि मैं चाहता था कि इसके कारण वह मुझे छोड़ कर चली जाए।"

"मुझे तो ऐसा नहीं लगता।"

"और सब को लगता है कि मैं काव्या के साथ खिलवाड़ कर रहा हूँ।" मैंने यह बात इसलिए कही क्योंकि मैं निराश था।

.... फोन पर लम्बा विराम था।

"शाश्वत?"

"नीलिमा और मैं भी ऐसा सोच रहे थे। यह हमसे संबंधित बात नहीं है, पापा, और-"

"क्या मतलब है तुम्हारा? कैसे बच्चे हो तुम? तुम्हें यह स्वीकार्य लगा कि तुम्हारी माँ के साथ मैं धोखा करूँ? तुम्हारे मन मेँ अपनी माँ के लिए बस इतनी ही फिक्र है कि तुम्हारे पिता का बाहर अफेयर हो और यह ‘तुमसे संबंधित बात नहीं’ हो? इस बात पर तो बच्चे अपनी माँ के समर्थन में अपने पिता को छोड़ देते हैं!!" मैंने चिल्लाकर कहा।

"मुझे नहीं मालूम। ठीक है? मुझे नहीं मालूम, पापा।" वह भी व्याकुल लग रहा था।

"नहीं बेटे, मैंने प्रियंका को कभी धोखा नहीं दिया। मैं ऐसा नहीं चाहता था। मैं अब भी नहीं चाहता। मैंने हमेशा उससे प्यार किया। मुझे लगता है कि मैं एक अलग दुनिया में हूँ जहाँ मुझे लगता है कि मेरी शादी अच्छी है, वैसी नहीं जैसी मेरे आस-पास के लोग सोचते हैं। और, सबसे बुरी बात यह है, कि मुझे नहीं पता कि प्रियंका क्या सोचती है।"

"पता तो है ही, पापा," शाश्वत ने थके हुए स्वर में कहा। "माँ चली गई न?"

यह बात मेरे मन एक वज्रपात की तरह लगी। "हाँ, वह चली गई"

"मैं माँ का नंबर भेज दूँगा।"

"थैंक्स"

"पापा, मुझे नहीं पता कि मैं उनसे माफी कैसे मांगूं।"

"तुम और मैं दोनों ही नहीं जानते, बेटा।"

"पापा?" शाश्वत की आवाज़ एक छोटे लड़के जैसी थी। "हाँ?"

"क्या मैं बहुत ही बुरा बेटा हूँ?"

लानत है! "मेरे लिए नहीं, लेकिन, हाँ, तुम अपनी माँ के साथ बुरा व्यवहार करते रहे हो, और मैं भी यह नोटिस करने में विफल रहा। लेकिन बाकी सभी ने देखा, जिसमें ‘हमेशा नशे में रहने वाला यशस्वी’ भी शामिल था।" इस पर शाश्वत हंस पड़ा, जैसी मुझे उम्मीद थी।

"मुझे लगता है कि मुझे किसी मनोचिकित्सक से बात करनी चाहिए। मुझे ऐसा लगता है। मेरा एक दोस्त किसी समस्या से गुज़रा था, और वह एक मनोचिकित्सक के पास गया था। उसने कहा कि इससे मदद मिली। जानते हैं पापा, जब मैंने माँ से बात की तो वह नाराज़ नहीं थी। वह थकी हुई थी, लेकिन नाराज नहीं। लेकिन मेरे बकवास करने के बाद उन्होंने कहा कि अब वह मेरा अनादर बर्दाश्त नहीं करेगी। इसके बाद ही मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मैं माँ के साथ हमेशा ऐसा करता रहता हूँ। वे कभी कुछ नहीं कहती थीं तो मुझे बलवान महसूस होता था। इस बार वे चुप नहीं रहीं तो मुझे पहली बार समझ आया कि प्यार करने वाले से ऐसा सुनना कैसा लगता है। माँ ने कहा कि वह मुझसे प्यार तो करती है लेकिन अब वे मेरा अनादर बर्दाश्त नहीं करेगी। मुझे अपने आप पर बहुत शर्म आ रही है।"

मैंने उसकी आवाज़ में आँसू सुने। मेरे बेटे ने मेरी नकल भर की थी।

"शाश्वत, इसकी शुरुआत मुझसे हुई। मैंने तुम्हारी माँ की अनदेखी की और अनजाने मेँ तुम्हें ऐसा करना सिखाया। गलती मेरी है। तुम किसी मनोवैज्ञानिक से बात करो, और मैं...मैं माँ से बात करूँगा। मैं सब ठीक कर दूँगा।" मुझे नहीं पता था कि यह कैसे करना है, लेकिन मैं पिता था, है न? चाहे चीजें कितनी भी खराब क्यों न हों, उन्हें ठीक करना मेरा काम था।

"सच?" उसकी आवाज मेँ आशा थी।

"मेरे पास कोई विकल्प नहीं है, बेटा। मैं तुम्हारी माँ के बिना नहीं रह सकता। पिछले दो सप्ताह नरक जैसे रहे हैं। मैं अपनी प्रियंका के बिना साँस नहीं ले सकता।" यह एक कड़वी सच्चाई थी। मैं उसके बिना मर जाऊँगा। शाश्वत से बात खत्म करने के बाद, मैं अपने ऑफिस की खिड़की के पास गया और बैंगलोर शहर का नजारा देखा, मेरा पेट खोखला सा हो रहा था। मैं किस तरह का आदमी था?

"तुम सबसे अच्छे आदमी हो जिन्हें मैं जानती हूँ, मेरे प्यारे अंशुमन ।"

"तुम मुझे हमेशा ऐसा क्यों कहती हो? मेरे प्यारे अंशुमन?" मैंने उसके होंठों को चूमा

"क्योंकि तुम हो, मेरे प्रिय ... मैं... तुम्हें यह पसंद नहीं है क्या?"

"ऐसा नहीं है। बात बस इतनी है...तुम मुझे सालों से इसी नाम से बुलाती आ रही हो।"

"शुरुआत से ही।"

"क्या तुम मुझसे प्यार करती हो?" मैंने उसे घुमाया। वह मुझे चूमकर मुस्कराई।

"मैं तुमसे प्यार करती हूँ, मेरे प्यारे अंशुमन।"

मेरा दिल इतना भर गया कि मुझे लगा कि यह उसके लिए प्यार से फट जाएगा।

अब, मुझे एहसास हुआ कि मैंने उसे यह बात नहीं कही। मैंने उसे यह नहीं कहा कि मैं भी उससे प्यार करता हूँ। आखिरी बार कब मैंने उससे कहा था कि मैं उससे प्यार करता हूँ? मुझे याद तक नहीं आ रहा। क्या मैंने ऐसा कहना बंद कर दिया था? पहले तो मैं कहता था। मैं हमेशा अपने बच्चों से कहता था, लेकिन मुझे नहीं लगता कि पिछले कई सालों मेँ मैंने प्रियंका से कहा था। ऐसा क्यों? मैं अभी भी उससे प्यार करता था। यह बात इस बात से स्पष्ट हो गई कि मैं अभी मुश्किल से ही कुछ कर पा रहा था। मुझे उसकी ज़रूरत थी। मैं यह जानता था। मैंने उससे पूछा, बल्कि आदेश दिया, कि वह कहे कि वह मुझसे प्यार करती है। और मैंने उसे यह शब्द नहीं दिए। न ही अपने व्यवहार से उसे यह दिखाया कि मुझे उसकी फिक्र है – फिर वह यह कैसे नहीं सोचती कि मैं उसे नहीं चाहता?

मेरे अंदर गुस्सा उमड़ आया। मैंने अपनी मुट्ठी दीवार पर दे मारी, जिससे विभाजन की दीवार पर एक हल्का गड्ढा बन गया और मेरी अंगुलियों पर चोट लग गई। काव्या ने मेरे दरवाज़े पर दस्तक दी और मेरे जवाब का इंतज़ार किए बिना ही दरवाज़ा खोल दिया। मैंने पलटकर उसकी तरफ़ देखा और पाया कि उसकी नज़र सीधे दीवार की दरार पर गई थी। "हाँ?" आज मेरे पास उसके लिए वाकई समय नहीं था, न ही धैर्य। यह तथ्य कि उसे लगा कि मैं उसमें दिलचस्पी रखता हूँ, मुझे गुस्सा दिला रहा था। वह मेरा दाहिना हाथ थी। एक करीबी सहकर्मी। मैं अब से केवल पुरुष असिस्टेन्ट को ही काम पर रखने वाला था ताकि लोग चुप हो जाएँ। या शायद अगली अफवाह यह हो कि मैं समलैंगिक हूँ!

"ईशानी अस्थाना आपसे मिलने आई हैं। "

मेरा दिल धड़कना बंद हो गया, फिर वह फिर से धड़कने लगा। मैंने ईशानी से संपर्क करने का सोचा था, ताकि पता चल सके कि श्रेया का रिसॉर्ट कहां है, लेकिन उसके यहाँ होने से मुझे उम्मीद हुई कि आखिरकार ब्रह्मांड मुझे एक सकारात्मक संकेत भेज रहा है।

"अंदर भेजो। धन्यवाद।" उसने सिर हिलाया और बाहर निकल गई।

मुझे उम्मीद थी कि काव्या नौकरी छोड़ देगी क्योंकि अगर मैंने उसे नौकरी से निकाल दिया तो मेरे लिए एचआर समस्या खड़ी हो जाएगी क्योंकि आधी दुनिया को लगता था कि मैं उसके साथ संबंध बना रहा हूँ। मेरे पास उसे नौकरी से निकालने का कोई कारण भी नहीं था क्योंकि उसने अपना काम अच्छे से किया था। लेकिन मैं उसके साथ कैसे पेश आऊँ, इस बारे में भी ज़्यादा सावधान रहूँगा।

ईशानी अंदर आई और मेरी फटी हुई उँगलियों और दीवार को देखकर बोली - "क्या आप मरम्मत करवा रहे हैं?"

मैं उसके पास आया और उसे गले लगा लिया। "मैं आपको फ़ोन करने वाला था।"

वह भौंचक्की हुई और बोली, "सच मेँ?"

मैंने उसे कुर्सी पर बैठने को कहा और अपनी मेज के पीछे बैठ गया।

"हाँ... यह शर्मनाक है, लेकिन.... क्या आपको पता है कि प्रियंका की दोस्त श्रेया कहाँ रहती है?" मैंने उससे पूछा, मुझे पूरी तरह से असफल महसूस हो रहा था।

"आपको नहीं पता कि आपकी पत्नी की सबसे अच्छी दोस्त कहाँ रहती है?" उसका स्वर तीखा था। मैंने आह भरी। "मुझे पता है कि यह एक द्वीप है, और उसके पास एक रिसॉर्ट भी है, लेकिन बस इतना ही।"

ईशानी ने सिर हिलाया और अपना बैग टेबल पर रख दिया। उसने कुछ दस्तावेज निकाले। "साफ समझ में आता है कि वह तलाक क्यों चाहती है।" मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे दिल में चाकू घोंप दिया हो क्योंकि मैं साँस नहीं ले पा रहा था। मुझे अब जाकर एहसास हुआ कि ईशानी यहाँ क्यों थी। वह एक पारिवारिक वकील थी। मुझे पता होना चाहिए था।

"नहीं," मैंने विलाप किया। "नहीं। नहीं। नहीं। बिलकुल नहीं। यह नहीं हो सकता" मैं अपने आँसुओं को रोक नहीं सका। यह कहना कि ईशानी चौंक गई थी, कमतर विवरण होगा। अगर मैं अपने दफ़्तर में चिम्पांजी के साथ नाच रहा होता तो उसे कम झटका लगता।

"अंशुमन?"

मैंने आँसू पोंछे और सिर हिलाया। "नहीं। कृपया। नहीं। वह ऐसा नहीं कर सकती।"

ईशानी ने अपने होंठ चाटे और आह भरी। "क्या बकवास है, अंशुमन? अगर आप नहीं चाहते थे कि वह आपको तलाक दे, तो आप उसके साथ ऐसा बर्ताव क्यों कर रहे थे कि ..... "

"कृपया मेरी असिस्टेंट के साथ सेक्स के बारे में मत कहिए क्योंकि मैंने ऐसा नहीं सोचा। मैं कभी नहीं करूंगा। मैं अपनी पत्नी से प्यार करता हूं। मुझे कोई दूसरी नहीं चाहिए। मैं क्यों करूंगा? क्या आपने प्रियंका को देखा है? कोई भी पुरुष दूसरी महिला के साथ सेक्स क्यों करना चाहेगा, जब वह उसके घर पर हो?" मैं चीख रहा था। कैसी बकवास थी मेरी ज़िंदगी? मैं सोचता रहा कि सब ठीक है और मैं खुश हूँ, ज़िंदगी इस हालत पर कब पहुँच गई?

ईशानी ने अपना सिर हिलाया। "मुझे नहीं पता आप क्या कर रहे हैं अंशुमन, लेकिन भगवान की कसम, अगर आप मेरे साथ बकवास कर रहे हैं तो ..... "

"ईशानी, मैं प्रियंका से प्यार करता हूँ। मैं उससे बहुत प्यार करता हूँ। मुझे नहीं पता कि मेरी ज़िंदगी में क्या हो गया?" मैंने अपना सिर नीचे कर लिया।

"अंशुमन, ..... हे भगवान! यदि यह सच है तो .. लेकिन....। अंशुमन मैं बहुत नाराज हूँ।"

मैंने अपना सिर उठाया और ईशानी को उदास भाव से देखा। "नाराज हो? कल्पना करो कि मैं अपने आप पर कैसा क्रोध महसूस कर रहा हूँ।"

"आपके सारे दोस्त जैसी पत्नी चाहते हैं, वैसी आपको मिल गई। अरे, आपका भाई तक उसे छीन लेना चाहेगा। लेकिन आपकी बेवकूफ़ प्यार मेँ पागल बीवी की नज़र सिर्फ़ आप पर थी। वह आपको पूजती थी। और आप उसे अनदेखा करते थे जब तक कि ‘आप’ उससे कुछ नहीं चाहते थे।" ईशानी अपनी बाँहें क्रॉस करके बैठी गुस्से से चिल्ला रही थी।

"मुझे नहीं पता था, ईशानी।" ऐसा लगा जैसे वह मेरा सिर कलम करने वाली थी, तो मैंने अपने हाथ ऊपर उठा दिए। "मुझे पता तक नहीं था कि मैं ऐसा कर रहा हूँ। ठीक है? मुझे लगा कि हम ठीक हैं। मैं व्यस्त रहता था और, हाँ, मैं कुछ चीजें मिस कर गया और...."

मैं और क्या कह सकता था? मैंने गलती कर दी थी। इसमें कोई दो राय नहीं है।

"आप उसका जन्मदिन भूल गए, अंशुमन। लगातार तीन साल। अपनी एनिवर्सरी भी। और भी कितने प्रोग्राम कैन्सल कर दिये। ऐसा कौन करता है?" एक घटिया पति? "आप उसका जन्म-दिन भूल गए और फिर उसे डाँट कर परेशान किया क्योंकि वह फार्म हाउस मेँ मनाना चाहती थी और देविका को फार्म हाउस चाहिए था या कुछ और। क्या आपको देविका की जगह प्रियंका का पक्ष नहीं लेना चाहिए था? आप तो उसके पति थे! आपने अपने परिवार, अपने बच्चों और खुद अपने आप को हमेशा प्रियंका से आगे रखा है। कभी-कभी दूसरों को अपनी पत्नी से आगे रखना ठीक है; ऐसा होता है। लेकिन हर बार?"

ईशानी और प्रियंका दोस्त थे - असली दोस्त, अमीर समाज में हवाई चुंबन वाली बकवास नहीं। जब विवेक और ईशानी का तलाक हो गया, तो मैंने विवेक के साथ अपने रिश्ते को जारी रखा। मैंने प्रियंका से कहा कि अगर विवेक अपनी नई पत्नी के साथ हमारे घर पर पार्टियों में होगा तो वह ईशानी को आमंत्रित नहीं कर सकती।

"लेकिन, वह मेरी दोस्त है अंशुमन," प्रियंका ने विरोध किया था।

"विवेक और मैं साथ मिलकर काम करते हैं। तुम जानती हो कि यह कैसा है।"

"तो फिर चलो विवेक को इस बार न बुलाएं? शायद हम ईशानी को यहाँ बुला सकें—"

"मैं तुमसे सलाह नहीं कर रहा, प्रियंका, मैं बता रहा हूँ।"

"लेकिन अंशुमन, ईशानी तो—"

"मेरी समस्या नहीं है। ईशानी से अपने समय पर मिलो," मैंने बात खत्म की। "मुझे काम है। मैं आज रात तुमसे मिलूंगा।"

तो, यह कहते हुए, मैंने उसे रसोई में छोड़ दिया, मन मेँ गुस्सा करते हुए कि वह ऐसी बातों में मेरा समय बर्बाद कर रही है कि पार्टी में किसे आमंत्रित करें। ही भगवान, क्या इतना भी नहीं जानती कि हमारी कंपनी के लिए विवेक ज़रूरी था? उसके संपर्क और उसके प्रभाव ने हमें सौदे हासिल करने में मदद की। लेकिन, वह अपनी दोस्त का पक्ष लेना चाहती थी। व्यापार में कोई पक्ष नहीं होता। लानत है, मुझे किसी ऐसी लड़की से शादी करनी चाहिए जो इस सब को समझती हो – हमारे व्यावसायिक समाज से आई पत्नी ऐसा करती।

ऐसी परिस्थितियों में मैंने कितनी बार सोचा कि वह मेरे लिए गलत पत्नी है? कई बार ऐसा हुआ। मैं हर किसी से झूठ बोल सकता था, लेकिन खुद से नहीं। सच तो यह था कि मुझे प्रियंका से नाराजगी थी क्योंकि उसने मुझे अपने ‘प्यार के जाल में फंसाया’ था। अब यह वाक्य सोच कर मुझे इसमें अपनी माँ की बातों की बू आती थी, लेकिन जाने कब मैं बिल्कुल अपनी माँ जैसा ही हो गया था? पहले कुछ सालों में मुझे नाराजगी रही थी, कि उसके कारण मैं अपने परिवार के विरुद्ध गया, वनिता से शादी न कर के उससे की। बच्चे होने के बाद मैं उनसे प्यार करने लगा, तो यह सब सोचना खत्म हो गया। लेकिन बिना उसकी गलती के उससे नाराज होने की आदत बनी रही। हर बात पर उसपर आरोप लगा देना, हर गलती, हर असफलता का ब्लेम उस पर डाल देना एक आदत बन गई थी। मैं कभी यह सोचने नहीं रुकता कि उसे कैसा लगता होगा। जैसे मैंने उस पर शादी कर के उसपर एहसान किया था और यह मूल्य उसे चुकाना ही था। जाने अनजाने में, या जानबूझकर भी मैंने उसे बार-बार चोट पहुंचाई। अपनी हर हताशा का गुस्सा उस पर उतारना एक आदत हो गई थी, और वह कुछ बोलती भी तो नहीं थी, तो मेरे हौसले अगली बार के लिए और बढ़ जाते थे।

"आप क्या कह रही हैं ईशानी?" मैंने अपने कंधों पर दुनिया का भार महसूस करते हुए पूछा।

उसने कागज़ मेरी ओर बढ़ाए। "कि आप इन पर दस्तखत कर दें। वह पैसा भी नहीं मांग रही। वह मर्सिडीज़ वापस करने की पेशकश कर रही है, बस अनुरोध है कि आप कार यहाँ लाने का इंतज़ाम करो, अगर नहीं तो वह इसे जल्द से जल्द वापस पहुंचवाएगी”

मेरा दिल धड़क उठा। मैंने तलाक के कागजात देखे और जल्दी से उन्हें सरसरी तौर पर पढ़ा। वह कुछ भी नहीं मांग रही थी। कुछ भी नहीं। उसने घर के खाते से लिए पाँच हज़ार रुपये को वापस करने के लिए एक मासिक किश्तों की योजना भी बना रखी थी। राव-सिन्हा देश के सबसे धनी परिवारों में से एक थे, और मेरी पत्नी ने पाँच हज़ार रुपये वापस करने के लिए मासिक भुगतान वाली एक साल की योजना बनाई थी। यह हमारी शादी पर अंतिम टिप्पणी थी - प्रियंका को नहीं लगता था कि उसके पास कोई अधिकार है। लिखा था कि उसे प्री-नेपुटल याद है और वह कुछ नहीं लेगी। यह मेरी माँ का किया धरा था। जब हम एक दूसरे से मिलने लगे, तो उस डाइनर वेटर यूनिफोर्म में भी, वह बहुत खूबसूरत थी, बहुत ही प्यारी। उन दिनों मेरी एक गर्लफ्रेंड भी थी, जिसे पाने के लिए मेरी मां मुझ पर दबाव डाल रही थी। मेरी माँ के मुताबिक, राजनेता नारायण शंकर की बेटी वनिता नारायण शंकर, मेरे जैसे ‘राव-सिन्हा’ की ‘परफेक्ट पत्नी’ बनेगी। वनिता सुसंस्कृत और सुंदर थी और जॉर्जिया विश्वविद्यालय में पढ़ रही थी। वह प्रियंका जितनी अच्छी नहीं थी, लेकिन ज्यादातर लड़कियां उस जैसी नहीं होतीं।

"मुझे अपनी पत्नी वापस चाहिए।"

"आप उसके लायक नहीं हो," ईशानी ने रूखी टिप्पणी की।

"हाँ, ठीक है, उसने विवाह के वचन लिए हैं, समझौता साइन किया है और वह उन्हें पूरा करेगी।" मैंने रूखे स्वर मेँ उत्तर दिया। मैं तलाक के कागजात हस्ताक्षर नहीं करने वाला था। अगर वह सोचती थी कि मैं ऐसा करूँगा तो वह पागल थी। उफ्फ़ - मेरा अहंकार।

"आपने भी तो वचन लिए थे, लेकिन आपने सब वचन तोड़ दिए। उन्हें पूरा नहीं किया।"

"मैंने कहा न, कि मेरा कोई अफेयर है," मैंने झल्लाकर कहा।

"सिर्फ अफेयर की बात नहीं। आप ने शादी मेँ प्यार और देखभाल करने का वादा किया था, अंशुमन।" ईशानी उठ गई। कहा। "आप ने ऐसा नहीं किया। कागज़ात पर हस्ताक्षर करके उन्हें मुझे वापस भेज दो। और बताओ कि आप कार को कैसे मँगवाओगे। मैंने उससे कहा था कि इसे रख लो, लेकिन वह उस प्री-नेपुटल समझौते की बात करती रहती है।"

मैंने अपना सिर हिलाया, "वह कमबख्त प्री-नेपुटल समझौता।"

ईशानी ने कहा, "आप अपनी मां को इतनी अपमानजनक बात पर उससे जबरदस्ती हस्ताक्षर करवाने से रोक सकते थे। फिर आप भी जीवन भर उसका हर पार्टी मेँ हर किसी के सामने मजाक उड़ते हुए उस समझौते की बार-बार याद दिलाते रहे – नहीं क्या?"

"प्रियंका ने खुद समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। अगर उसे कोई समस्या थी, तो उसे बता देना चाहिए था। अब उसे शर्तों को निभाना होगा।" मैंने बेरुखी से वही कहा, यह जो मैं सालों से कहता और सोचता रहा था। दुर्भाग्य से, ऐसा करना अब आदत बन गई थी। बोलते ही मैं समझ गया कि मैंने गलती की है, लेकिन आदत से यह निकल गया था। लेकिन मैं भूल गया कि मेरे सामने मुझे प्यार करने वाली प्रियंका नहीं बैठी, जो माफ कर के चुप हो जाएगी। प्रियंका के क्रूर पति से नफरत करने वाली इशानी बैठी है। ईशानी ने मेज़ पर अपनी मुट्ठी पटकी और मुझे घूर कर देखा।

"गिरे हुए बिगड़े अमीर इंसान!!! तब वह अठारह साल की बच्ची थी, एक कमीने अमीर शहजादे से सच्चे प्यार मेँ पड़ी हुई थी। उसे आपकी और आपके परिवार की क्रूरता का अंदाजा भी नहीं था। वह तो यह समझ बैठी थी कि यह शहजादा उसे प्यार करता है, उसे नहीं पता था कि शहजादे के मुखौटे के पीछे राक्षस छुपा है। उसे जो भी कागज दिया गया, उसने उस पर हस्ताक्षर कर दिए क्योंकि उसे पैसों की परवाह नहीं थी, वह सिर्फ अपने प्यार को पाना चाहती थी। जो आप अमीर राक्षसों ने कभी नहीं समझा। ये कागज़ात प्रियंका की तरफ से बता रहे हैं कि उसे अभी भी आपके पैसों की परवाह नहीं है। आपने उसे बीस साल तक घर और कपड़े दिए; लेकिन उसके बदले मेँ आपको एक मुफ़्त नौकरानी, बच्चों की माँ, बच्चों की आया, रसोइया, घर की नौकरानी और सबसे बढ़कर अपनी हवस मिटाने के लिए एक वेश्या मिली। इसलिए बकवास मत करो। आप एक गिरे हुए इंसान हैं, जिसने एक गरीब भोली लड़की को अपने प्रेम जाल मेँ फँसाया, फिर जीवन भर प्यार करने की सजा देते रहे। आप एक राक्षस, एक कुत्ते से भी गिरे हुए हो, जो कह रहे हो कि उसने समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं तो उसे पूरा करे?? हाँ तो वह पूरा कर रही है। वह उस समझौते की शर्त के अनुसार आपके क्रूर परिवार के और अपने क्रूर पति के गंदे पैसे को नहीं छू रही, जो आपने उसके अरमानों के खून से बढ़ाया है।" सुन कर मेरा दिल रुक गया। अब तक मैं खुद को महान महसूस कर रहा था कि देखो मैं अपनी गलती मान रहा हूँ। मेरे आस पास के लोगों ने जो थोड़ा-बहुत कहा भी था, उसमें उनकी असल संवेदना मेरे साथ थी, वे मेरे अपने थे, प्रियंका के नहीं। लेकिन ईशानी की आवाज की हिकारत ने मुझे आईना दिखाया।

"मेरी पत्नी को वेश्या मत कहो।"

“हंह – अब यह नाटक तो करो मत। प्रियंका को भी ऐसा ही लगता है कि तुमने उसे ऐसे इस्तेमाल किया। ये उसके अपने शब्द हैं। मेरी नजर मेँ तुम एक गिरे हुए क्रूर राक्षस हो"

मुझे लगा जैसे मेरे अंदर कुछ ठंडा और अप्रिय बिखर रहा है। "वह मेरी पत्नी है। मैंने उसे कभी ऐसा महसूस नहीं कराया कि वह ..... "

"हाँ तुमने कराया। तुमने भी, और बाकी सभी ने भी तुम्हारे सामने बार-बार किया। तुम्हारी माँ, बहन, भाई, देविका और यहाँ तक कि तुम्हारे बच्चे भी। तुम सब उसके साथ ऐसा व्यवहार करते हो जैसे कि वह इंसान ही नहीं हो। लेकिन वह तुम लोगों के जैसी नहीं है। कागजों पर हस्ताक्षर करो, नहीं तो मैं भगवान की कसम खाती हूँ, मैं कोर्ट मेँ तुम्हारी क्रूरता के सारे सबूत देकर तुम्हें, तुम्हारे परिवार के बड़े नाम सम्मान को तबाह कर दूँगी।"

वह पैर पटकती हुई मेरे कार्यालय से बाहर चली गई, और मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मैं उससे भी बड़ा बेवकूफ हूं, जितना कि मैं समझ रहा था।