ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग दस (10)
भाग 10
अंशुमन
"वह कैसी है? क्या वह ठीक है?" मैंने पूछा जब शाश्वत ने मुझे फोन करके बताया कि उसने अपनी माँ से बात की है।
"मुझे नहीं पता। मैंने बहुत गलती कर दी, पापा।" .... "क्या हुआ?" मैंने घबरा कर पूछा।
"मैंने माँ से अपनी आदत की तरह चिढ़ते हुए पूछना शुरू किया कि वह क्या बकवास कर रही है। माँ ने मुझसे कहा कि अगर मैं अनादर करूंगा तो वह मुझसे बात नहीं करेगी।"
"शाश्वत?"
"मैं बेवकूफ़ जैसा महसूस कर रहा हूँ। वह इतनी दुखी और प्यार भरी लग रही थी कि ‘मैं हमेशा तुमसे प्यार करूँगी’ और इससे मैं भभक गया।"
मैं अपने दफ़्तर में अपनी कुर्सी पर पीछे झुक गया और अपनी आँखें बंद कर लीं। "यह तुम्हें परेशान क्यों करता है कि तुम्हारी माँ तुमसे प्यार करे?"
"बात बस इतनी है कि वह हमेशा इतनी ज्यादा उदार रहती है कि वह इसे संतुलित करना कठिन बना देती है, आप समझ रहे हैं न?"
मैंने एक पल के लिए इसके बारे में सोचा और अचानक अपनी आँखें खोलीं। "नहीं बेटा, मैं नहीं समझ रहा। तुम्हारी माँ का तुम्हें प्यार करना? आखिर तुम इतना नाराज़ क्यों हो?"
"मैं... बस... मैं नहीं जानता।"
"क्या तुम उसके साथ ऐसे इसलिए हो गए कि मुझे उसके साथ बुरा व्यवहार करते देखा है?" मुझे यह प्रश्न पूछना अच्छा नहीं लगा, लेकिन मैं जानता था कि यह पूछना ही होगा।
"आप माँ के साथ बुरा व्यवहार नहीं करते, पापा। आप उन के साथ बहुत धैर्यवान हैं; आप उन के साथ बहुत अच्छे हैं।"
"वास्तव में? मैं ‘धैर्यवान’ हूँ? तुम्हें क्या लगता है कि उसने क्या गलतियाँ की हैं जो मुझे ‘धैर्यवान’ होना पड़ा हो? .... वैसे शाश्वत, सभी लोगों में से, केवल तुम ही ऐसा कह रहे हो। बाकी सभी लोग मुझे बधाई दे रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि मैं जान-बूझ कर तुम्हारी माँ के साथ घर के कोने मेँ पड़ी हुई किसी गंदगी जैसा व्यवहार करता रहा हूँ, क्योंकि मैं चाहता था कि इसके कारण वह मुझे छोड़ कर चली जाए।"
"मुझे तो ऐसा नहीं लगता।"
"और सब को लगता है कि मैं काव्या के साथ खिलवाड़ कर रहा हूँ।" मैंने यह बात इसलिए कही क्योंकि मैं निराश था।
.... फोन पर लम्बा विराम था।
"शाश्वत?"
"नीलिमा और मैं भी ऐसा सोच रहे थे। यह हमसे संबंधित बात नहीं है, पापा, और-"
"क्या मतलब है तुम्हारा? कैसे बच्चे हो तुम? तुम्हें यह स्वीकार्य लगा कि तुम्हारी माँ के साथ मैं धोखा करूँ? तुम्हारे मन मेँ अपनी माँ के लिए बस इतनी ही फिक्र है कि तुम्हारे पिता का बाहर अफेयर हो और यह ‘तुमसे संबंधित बात नहीं’ हो? इस बात पर तो बच्चे अपनी माँ के समर्थन में अपने पिता को छोड़ देते हैं!!" मैंने चिल्लाकर कहा।
"मुझे नहीं मालूम। ठीक है? मुझे नहीं मालूम, पापा।" वह भी व्याकुल लग रहा था।
"नहीं बेटे, मैंने प्रियंका को कभी धोखा नहीं दिया। मैं ऐसा नहीं चाहता था। मैं अब भी नहीं चाहता। मैंने हमेशा उससे प्यार किया। मुझे लगता है कि मैं एक अलग दुनिया में हूँ जहाँ मुझे लगता है कि मेरी शादी अच्छी है, वैसी नहीं जैसी मेरे आस-पास के लोग सोचते हैं। और, सबसे बुरी बात यह है, कि मुझे नहीं पता कि प्रियंका क्या सोचती है।"
"पता तो है ही, पापा," शाश्वत ने थके हुए स्वर में कहा। "माँ चली गई न?"
यह बात मेरे मन एक वज्रपात की तरह लगी। "हाँ, वह चली गई"
"मैं माँ का नंबर भेज दूँगा।"
"थैंक्स"
"पापा, मुझे नहीं पता कि मैं उनसे माफी कैसे मांगूं।"
"तुम और मैं दोनों ही नहीं जानते, बेटा।"
"पापा?" शाश्वत की आवाज़ एक छोटे लड़के जैसी थी। "हाँ?"
"क्या मैं बहुत ही बुरा बेटा हूँ?"
लानत है! "मेरे लिए नहीं, लेकिन, हाँ, तुम अपनी माँ के साथ बुरा व्यवहार करते रहे हो, और मैं भी यह नोटिस करने में विफल रहा। लेकिन बाकी सभी ने देखा, जिसमें ‘हमेशा नशे में रहने वाला यशस्वी’ भी शामिल था।" इस पर शाश्वत हंस पड़ा, जैसी मुझे उम्मीद थी।
"मुझे लगता है कि मुझे किसी मनोचिकित्सक से बात करनी चाहिए। मुझे ऐसा लगता है। मेरा एक दोस्त किसी समस्या से गुज़रा था, और वह एक मनोचिकित्सक के पास गया था। उसने कहा कि इससे मदद मिली। जानते हैं पापा, जब मैंने माँ से बात की तो वह नाराज़ नहीं थी। वह थकी हुई थी, लेकिन नाराज नहीं। लेकिन मेरे बकवास करने के बाद उन्होंने कहा कि अब वह मेरा अनादर बर्दाश्त नहीं करेगी। इसके बाद ही मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मैं माँ के साथ हमेशा ऐसा करता रहता हूँ। वे कभी कुछ नहीं कहती थीं तो मुझे बलवान महसूस होता था। इस बार वे चुप नहीं रहीं तो मुझे पहली बार समझ आया कि प्यार करने वाले से ऐसा सुनना कैसा लगता है। माँ ने कहा कि वह मुझसे प्यार तो करती है लेकिन अब वे मेरा अनादर बर्दाश्त नहीं करेगी। मुझे अपने आप पर बहुत शर्म आ रही है।"
मैंने उसकी आवाज़ में आँसू सुने। मेरे बेटे ने मेरी नकल भर की थी।
"शाश्वत, इसकी शुरुआत मुझसे हुई। मैंने तुम्हारी माँ की अनदेखी की और अनजाने मेँ तुम्हें ऐसा करना सिखाया। गलती मेरी है। तुम किसी मनोवैज्ञानिक से बात करो, और मैं...मैं माँ से बात करूँगा। मैं सब ठीक कर दूँगा।" मुझे नहीं पता था कि यह कैसे करना है, लेकिन मैं पिता था, है न? चाहे चीजें कितनी भी खराब क्यों न हों, उन्हें ठीक करना मेरा काम था।
"सच?" उसकी आवाज मेँ आशा थी।
"मेरे पास कोई विकल्प नहीं है, बेटा। मैं तुम्हारी माँ के बिना नहीं रह सकता। पिछले दो सप्ताह नरक जैसे रहे हैं। मैं अपनी प्रियंका के बिना साँस नहीं ले सकता।" यह एक कड़वी सच्चाई थी। मैं उसके बिना मर जाऊँगा। शाश्वत से बात खत्म करने के बाद, मैं अपने ऑफिस की खिड़की के पास गया और बैंगलोर शहर का नजारा देखा, मेरा पेट खोखला सा हो रहा था। मैं किस तरह का आदमी था?
"तुम सबसे अच्छे आदमी हो जिन्हें मैं जानती हूँ, मेरे प्यारे अंशुमन ।"
"तुम मुझे हमेशा ऐसा क्यों कहती हो? मेरे प्यारे अंशुमन?" मैंने उसके होंठों को चूमा
"क्योंकि तुम हो, मेरे प्रिय ... मैं... तुम्हें यह पसंद नहीं है क्या?"
"ऐसा नहीं है। बात बस इतनी है...तुम मुझे सालों से इसी नाम से बुलाती आ रही हो।"
"शुरुआत से ही।"
"क्या तुम मुझसे प्यार करती हो?" मैंने उसे घुमाया। वह मुझे चूमकर मुस्कराई।
"मैं तुमसे प्यार करती हूँ, मेरे प्यारे अंशुमन।"
मेरा दिल इतना भर गया कि मुझे लगा कि यह उसके लिए प्यार से फट जाएगा।
अब, मुझे एहसास हुआ कि मैंने उसे यह बात नहीं कही। मैंने उसे यह नहीं कहा कि मैं भी उससे प्यार करता हूँ। आखिरी बार कब मैंने उससे कहा था कि मैं उससे प्यार करता हूँ? मुझे याद तक नहीं आ रहा। क्या मैंने ऐसा कहना बंद कर दिया था? पहले तो मैं कहता था। मैं हमेशा अपने बच्चों से कहता था, लेकिन मुझे नहीं लगता कि पिछले कई सालों मेँ मैंने प्रियंका से कहा था। ऐसा क्यों? मैं अभी भी उससे प्यार करता था। यह बात इस बात से स्पष्ट हो गई कि मैं अभी मुश्किल से ही कुछ कर पा रहा था। मुझे उसकी ज़रूरत थी। मैं यह जानता था। मैंने उससे पूछा, बल्कि आदेश दिया, कि वह कहे कि वह मुझसे प्यार करती है। और मैंने उसे यह शब्द नहीं दिए। न ही अपने व्यवहार से उसे यह दिखाया कि मुझे उसकी फिक्र है – फिर वह यह कैसे नहीं सोचती कि मैं उसे नहीं चाहता?
मेरे अंदर गुस्सा उमड़ आया। मैंने अपनी मुट्ठी दीवार पर दे मारी, जिससे विभाजन की दीवार पर एक हल्का गड्ढा बन गया और मेरी अंगुलियों पर चोट लग गई। काव्या ने मेरे दरवाज़े पर दस्तक दी और मेरे जवाब का इंतज़ार किए बिना ही दरवाज़ा खोल दिया। मैंने पलटकर उसकी तरफ़ देखा और पाया कि उसकी नज़र सीधे दीवार की दरार पर गई थी। "हाँ?" आज मेरे पास उसके लिए वाकई समय नहीं था, न ही धैर्य। यह तथ्य कि उसे लगा कि मैं उसमें दिलचस्पी रखता हूँ, मुझे गुस्सा दिला रहा था। वह मेरा दाहिना हाथ थी। एक करीबी सहकर्मी। मैं अब से केवल पुरुष असिस्टेन्ट को ही काम पर रखने वाला था ताकि लोग चुप हो जाएँ। या शायद अगली अफवाह यह हो कि मैं समलैंगिक हूँ!
"ईशानी अस्थाना आपसे मिलने आई हैं। "
मेरा दिल धड़कना बंद हो गया, फिर वह फिर से धड़कने लगा। मैंने ईशानी से संपर्क करने का सोचा था, ताकि पता चल सके कि श्रेया का रिसॉर्ट कहां है, लेकिन उसके यहाँ होने से मुझे उम्मीद हुई कि आखिरकार ब्रह्मांड मुझे एक सकारात्मक संकेत भेज रहा है।
"अंदर भेजो। धन्यवाद।" उसने सिर हिलाया और बाहर निकल गई।
मुझे उम्मीद थी कि काव्या नौकरी छोड़ देगी क्योंकि अगर मैंने उसे नौकरी से निकाल दिया तो मेरे लिए एचआर समस्या खड़ी हो जाएगी क्योंकि आधी दुनिया को लगता था कि मैं उसके साथ संबंध बना रहा हूँ। मेरे पास उसे नौकरी से निकालने का कोई कारण भी नहीं था क्योंकि उसने अपना काम अच्छे से किया था। लेकिन मैं उसके साथ कैसे पेश आऊँ, इस बारे में भी ज़्यादा सावधान रहूँगा।
ईशानी अंदर आई और मेरी फटी हुई उँगलियों और दीवार को देखकर बोली - "क्या आप मरम्मत करवा रहे हैं?"
मैं उसके पास आया और उसे गले लगा लिया। "मैं आपको फ़ोन करने वाला था।"
वह भौंचक्की हुई और बोली, "सच मेँ?"
मैंने उसे कुर्सी पर बैठने को कहा और अपनी मेज के पीछे बैठ गया।
"हाँ... यह शर्मनाक है, लेकिन.... क्या आपको पता है कि प्रियंका की दोस्त श्रेया कहाँ रहती है?" मैंने उससे पूछा, मुझे पूरी तरह से असफल महसूस हो रहा था।
"आपको नहीं पता कि आपकी पत्नी की सबसे अच्छी दोस्त कहाँ रहती है?" उसका स्वर तीखा था। मैंने आह भरी। "मुझे पता है कि यह एक द्वीप है, और उसके पास एक रिसॉर्ट भी है, लेकिन बस इतना ही।"
ईशानी ने सिर हिलाया और अपना बैग टेबल पर रख दिया। उसने कुछ दस्तावेज निकाले। "साफ समझ में आता है कि वह तलाक क्यों चाहती है।" मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे दिल में चाकू घोंप दिया हो क्योंकि मैं साँस नहीं ले पा रहा था। मुझे अब जाकर एहसास हुआ कि ईशानी यहाँ क्यों थी। वह एक पारिवारिक वकील थी। मुझे पता होना चाहिए था।
"नहीं," मैंने विलाप किया। "नहीं। नहीं। नहीं। बिलकुल नहीं। यह नहीं हो सकता" मैं अपने आँसुओं को रोक नहीं सका। यह कहना कि ईशानी चौंक गई थी, कमतर विवरण होगा। अगर मैं अपने दफ़्तर में चिम्पांजी के साथ नाच रहा होता तो उसे कम झटका लगता।
"अंशुमन?"
मैंने आँसू पोंछे और सिर हिलाया। "नहीं। कृपया। नहीं। वह ऐसा नहीं कर सकती।"
ईशानी ने अपने होंठ चाटे और आह भरी। "क्या बकवास है, अंशुमन? अगर आप नहीं चाहते थे कि वह आपको तलाक दे, तो आप उसके साथ ऐसा बर्ताव क्यों कर रहे थे कि ..... "
"कृपया मेरी असिस्टेंट के साथ सेक्स के बारे में मत कहिए क्योंकि मैंने ऐसा नहीं सोचा। मैं कभी नहीं करूंगा। मैं अपनी पत्नी से प्यार करता हूं। मुझे कोई दूसरी नहीं चाहिए। मैं क्यों करूंगा? क्या आपने प्रियंका को देखा है? कोई भी पुरुष दूसरी महिला के साथ सेक्स क्यों करना चाहेगा, जब वह उसके घर पर हो?" मैं चीख रहा था। कैसी बकवास थी मेरी ज़िंदगी? मैं सोचता रहा कि सब ठीक है और मैं खुश हूँ, ज़िंदगी इस हालत पर कब पहुँच गई?
ईशानी ने अपना सिर हिलाया। "मुझे नहीं पता आप क्या कर रहे हैं अंशुमन, लेकिन भगवान की कसम, अगर आप मेरे साथ बकवास कर रहे हैं तो ..... "
"ईशानी, मैं प्रियंका से प्यार करता हूँ। मैं उससे बहुत प्यार करता हूँ। मुझे नहीं पता कि मेरी ज़िंदगी में क्या हो गया?" मैंने अपना सिर नीचे कर लिया।
"अंशुमन, ..... हे भगवान! यदि यह सच है तो .. लेकिन....। अंशुमन मैं बहुत नाराज हूँ।"
मैंने अपना सिर उठाया और ईशानी को उदास भाव से देखा। "नाराज हो? कल्पना करो कि मैं अपने आप पर कैसा क्रोध महसूस कर रहा हूँ।"
"आपके सारे दोस्त जैसी पत्नी चाहते हैं, वैसी आपको मिल गई। अरे, आपका भाई तक उसे छीन लेना चाहेगा। लेकिन आपकी बेवकूफ़ प्यार मेँ पागल बीवी की नज़र सिर्फ़ आप पर थी। वह आपको पूजती थी। और आप उसे अनदेखा करते थे जब तक कि ‘आप’ उससे कुछ नहीं चाहते थे।" ईशानी अपनी बाँहें क्रॉस करके बैठी गुस्से से चिल्ला रही थी।
"मुझे नहीं पता था, ईशानी।" ऐसा लगा जैसे वह मेरा सिर कलम करने वाली थी, तो मैंने अपने हाथ ऊपर उठा दिए। "मुझे पता तक नहीं था कि मैं ऐसा कर रहा हूँ। ठीक है? मुझे लगा कि हम ठीक हैं। मैं व्यस्त रहता था और, हाँ, मैं कुछ चीजें मिस कर गया और...."
मैं और क्या कह सकता था? मैंने गलती कर दी थी। इसमें कोई दो राय नहीं है।
"आप उसका जन्मदिन भूल गए, अंशुमन। लगातार तीन साल। अपनी एनिवर्सरी भी। और भी कितने प्रोग्राम कैन्सल कर दिये। ऐसा कौन करता है?" एक घटिया पति? "आप उसका जन्म-दिन भूल गए और फिर उसे डाँट कर परेशान किया क्योंकि वह फार्म हाउस मेँ मनाना चाहती थी और देविका को फार्म हाउस चाहिए था या कुछ और। क्या आपको देविका की जगह प्रियंका का पक्ष नहीं लेना चाहिए था? आप तो उसके पति थे! आपने अपने परिवार, अपने बच्चों और खुद अपने आप को हमेशा प्रियंका से आगे रखा है। कभी-कभी दूसरों को अपनी पत्नी से आगे रखना ठीक है; ऐसा होता है। लेकिन हर बार?"
ईशानी और प्रियंका दोस्त थे - असली दोस्त, अमीर समाज में हवाई चुंबन वाली बकवास नहीं। जब विवेक और ईशानी का तलाक हो गया, तो मैंने विवेक के साथ अपने रिश्ते को जारी रखा। मैंने प्रियंका से कहा कि अगर विवेक अपनी नई पत्नी के साथ हमारे घर पर पार्टियों में होगा तो वह ईशानी को आमंत्रित नहीं कर सकती।
"लेकिन, वह मेरी दोस्त है अंशुमन," प्रियंका ने विरोध किया था।
"विवेक और मैं साथ मिलकर काम करते हैं। तुम जानती हो कि यह कैसा है।"
"तो फिर चलो विवेक को इस बार न बुलाएं? शायद हम ईशानी को यहाँ बुला सकें—"
"मैं तुमसे सलाह नहीं कर रहा, प्रियंका, मैं बता रहा हूँ।"
"लेकिन अंशुमन, ईशानी तो—"
"मेरी समस्या नहीं है। ईशानी से अपने समय पर मिलो," मैंने बात खत्म की। "मुझे काम है। मैं आज रात तुमसे मिलूंगा।"
तो, यह कहते हुए, मैंने उसे रसोई में छोड़ दिया, मन मेँ गुस्सा करते हुए कि वह ऐसी बातों में मेरा समय बर्बाद कर रही है कि पार्टी में किसे आमंत्रित करें। ही भगवान, क्या इतना भी नहीं जानती कि हमारी कंपनी के लिए विवेक ज़रूरी था? उसके संपर्क और उसके प्रभाव ने हमें सौदे हासिल करने में मदद की। लेकिन, वह अपनी दोस्त का पक्ष लेना चाहती थी। व्यापार में कोई पक्ष नहीं होता। लानत है, मुझे किसी ऐसी लड़की से शादी करनी चाहिए जो इस सब को समझती हो – हमारे व्यावसायिक समाज से आई पत्नी ऐसा करती।
ऐसी परिस्थितियों में मैंने कितनी बार सोचा कि वह मेरे लिए गलत पत्नी है? कई बार ऐसा हुआ। मैं हर किसी से झूठ बोल सकता था, लेकिन खुद से नहीं। सच तो यह था कि मुझे प्रियंका से नाराजगी थी क्योंकि उसने मुझे अपने ‘प्यार के जाल में फंसाया’ था। अब यह वाक्य सोच कर मुझे इसमें अपनी माँ की बातों की बू आती थी, लेकिन जाने कब मैं बिल्कुल अपनी माँ जैसा ही हो गया था? पहले कुछ सालों में मुझे नाराजगी रही थी, कि उसके कारण मैं अपने परिवार के विरुद्ध गया, वनिता से शादी न कर के उससे की। बच्चे होने के बाद मैं उनसे प्यार करने लगा, तो यह सब सोचना खत्म हो गया। लेकिन बिना उसकी गलती के उससे नाराज होने की आदत बनी रही। हर बात पर उसपर आरोप लगा देना, हर गलती, हर असफलता का ब्लेम उस पर डाल देना एक आदत बन गई थी। मैं कभी यह सोचने नहीं रुकता कि उसे कैसा लगता होगा। जैसे मैंने उस पर शादी कर के उसपर एहसान किया था और यह मूल्य उसे चुकाना ही था। जाने अनजाने में, या जानबूझकर भी मैंने उसे बार-बार चोट पहुंचाई। अपनी हर हताशा का गुस्सा उस पर उतारना एक आदत हो गई थी, और वह कुछ बोलती भी तो नहीं थी, तो मेरे हौसले अगली बार के लिए और बढ़ जाते थे।
"आप क्या कह रही हैं ईशानी?" मैंने अपने कंधों पर दुनिया का भार महसूस करते हुए पूछा।
उसने कागज़ मेरी ओर बढ़ाए। "कि आप इन पर दस्तखत कर दें। वह पैसा भी नहीं मांग रही। वह मर्सिडीज़ वापस करने की पेशकश कर रही है, बस अनुरोध है कि आप कार यहाँ लाने का इंतज़ाम करो, अगर नहीं तो वह इसे जल्द से जल्द वापस पहुंचवाएगी”
मेरा दिल धड़क उठा। मैंने तलाक के कागजात देखे और जल्दी से उन्हें सरसरी तौर पर पढ़ा। वह कुछ भी नहीं मांग रही थी। कुछ भी नहीं। उसने घर के खाते से लिए पाँच हज़ार रुपये को वापस करने के लिए एक मासिक किश्तों की योजना भी बना रखी थी। राव-सिन्हा देश के सबसे धनी परिवारों में से एक थे, और मेरी पत्नी ने पाँच हज़ार रुपये वापस करने के लिए मासिक भुगतान वाली एक साल की योजना बनाई थी। यह हमारी शादी पर अंतिम टिप्पणी थी - प्रियंका को नहीं लगता था कि उसके पास कोई अधिकार है। लिखा था कि उसे प्री-नेपुटल याद है और वह कुछ नहीं लेगी। यह मेरी माँ का किया धरा था। जब हम एक दूसरे से मिलने लगे, तो उस डाइनर वेटर यूनिफोर्म में भी, वह बहुत खूबसूरत थी, बहुत ही प्यारी। उन दिनों मेरी एक गर्लफ्रेंड भी थी, जिसे पाने के लिए मेरी मां मुझ पर दबाव डाल रही थी। मेरी माँ के मुताबिक, राजनेता नारायण शंकर की बेटी वनिता नारायण शंकर, मेरे जैसे ‘राव-सिन्हा’ की ‘परफेक्ट पत्नी’ बनेगी। वनिता सुसंस्कृत और सुंदर थी और जॉर्जिया विश्वविद्यालय में पढ़ रही थी। वह प्रियंका जितनी अच्छी नहीं थी, लेकिन ज्यादातर लड़कियां उस जैसी नहीं होतीं।
"मुझे अपनी पत्नी वापस चाहिए।"
"आप उसके लायक नहीं हो," ईशानी ने रूखी टिप्पणी की।
"हाँ, ठीक है, उसने विवाह के वचन लिए हैं, समझौता साइन किया है और वह उन्हें पूरा करेगी।" मैंने रूखे स्वर मेँ उत्तर दिया। मैं तलाक के कागजात हस्ताक्षर नहीं करने वाला था। अगर वह सोचती थी कि मैं ऐसा करूँगा तो वह पागल थी। उफ्फ़ - मेरा अहंकार।
"आपने भी तो वचन लिए थे, लेकिन आपने सब वचन तोड़ दिए। उन्हें पूरा नहीं किया।"
"मैंने कहा न, कि मेरा कोई अफेयर है," मैंने झल्लाकर कहा।
"सिर्फ अफेयर की बात नहीं। आप ने शादी मेँ प्यार और देखभाल करने का वादा किया था, अंशुमन।" ईशानी उठ गई। कहा। "आप ने ऐसा नहीं किया। कागज़ात पर हस्ताक्षर करके उन्हें मुझे वापस भेज दो। और बताओ कि आप कार को कैसे मँगवाओगे। मैंने उससे कहा था कि इसे रख लो, लेकिन वह उस प्री-नेपुटल समझौते की बात करती रहती है।"
मैंने अपना सिर हिलाया, "वह कमबख्त प्री-नेपुटल समझौता।"
ईशानी ने कहा, "आप अपनी मां को इतनी अपमानजनक बात पर उससे जबरदस्ती हस्ताक्षर करवाने से रोक सकते थे। फिर आप भी जीवन भर उसका हर पार्टी मेँ हर किसी के सामने मजाक उड़ते हुए उस समझौते की बार-बार याद दिलाते रहे – नहीं क्या?"
"प्रियंका ने खुद समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। अगर उसे कोई समस्या थी, तो उसे बता देना चाहिए था। अब उसे शर्तों को निभाना होगा।" मैंने बेरुखी से वही कहा, यह जो मैं सालों से कहता और सोचता रहा था। दुर्भाग्य से, ऐसा करना अब आदत बन गई थी। बोलते ही मैं समझ गया कि मैंने गलती की है, लेकिन आदत से यह निकल गया था। लेकिन मैं भूल गया कि मेरे सामने मुझे प्यार करने वाली प्रियंका नहीं बैठी, जो माफ कर के चुप हो जाएगी। प्रियंका के क्रूर पति से नफरत करने वाली इशानी बैठी है। ईशानी ने मेज़ पर अपनी मुट्ठी पटकी और मुझे घूर कर देखा।
"गिरे हुए बिगड़े अमीर इंसान!!! तब वह अठारह साल की बच्ची थी, एक कमीने अमीर शहजादे से सच्चे प्यार मेँ पड़ी हुई थी। उसे आपकी और आपके परिवार की क्रूरता का अंदाजा भी नहीं था। वह तो यह समझ बैठी थी कि यह शहजादा उसे प्यार करता है, उसे नहीं पता था कि शहजादे के मुखौटे के पीछे राक्षस छुपा है। उसे जो भी कागज दिया गया, उसने उस पर हस्ताक्षर कर दिए क्योंकि उसे पैसों की परवाह नहीं थी, वह सिर्फ अपने प्यार को पाना चाहती थी। जो आप अमीर राक्षसों ने कभी नहीं समझा। ये कागज़ात प्रियंका की तरफ से बता रहे हैं कि उसे अभी भी आपके पैसों की परवाह नहीं है। आपने उसे बीस साल तक घर और कपड़े दिए; लेकिन उसके बदले मेँ आपको एक मुफ़्त नौकरानी, बच्चों की माँ, बच्चों की आया, रसोइया, घर की नौकरानी और सबसे बढ़कर अपनी हवस मिटाने के लिए एक वेश्या मिली। इसलिए बकवास मत करो। आप एक गिरे हुए इंसान हैं, जिसने एक गरीब भोली लड़की को अपने प्रेम जाल मेँ फँसाया, फिर जीवन भर प्यार करने की सजा देते रहे। आप एक राक्षस, एक कुत्ते से भी गिरे हुए हो, जो कह रहे हो कि उसने समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं तो उसे पूरा करे?? हाँ तो वह पूरा कर रही है। वह उस समझौते की शर्त के अनुसार आपके क्रूर परिवार के और अपने क्रूर पति के गंदे पैसे को नहीं छू रही, जो आपने उसके अरमानों के खून से बढ़ाया है।" सुन कर मेरा दिल रुक गया। अब तक मैं खुद को महान महसूस कर रहा था कि देखो मैं अपनी गलती मान रहा हूँ। मेरे आस पास के लोगों ने जो थोड़ा-बहुत कहा भी था, उसमें उनकी असल संवेदना मेरे साथ थी, वे मेरे अपने थे, प्रियंका के नहीं। लेकिन ईशानी की आवाज की हिकारत ने मुझे आईना दिखाया।
"मेरी पत्नी को वेश्या मत कहो।"
“हंह – अब यह नाटक तो करो मत। प्रियंका को भी ऐसा ही लगता है कि तुमने उसे ऐसे इस्तेमाल किया। ये उसके अपने शब्द हैं। मेरी नजर मेँ तुम एक गिरे हुए क्रूर राक्षस हो"
मुझे लगा जैसे मेरे अंदर कुछ ठंडा और अप्रिय बिखर रहा है। "वह मेरी पत्नी है। मैंने उसे कभी ऐसा महसूस नहीं कराया कि वह ..... "
"हाँ तुमने कराया। तुमने भी, और बाकी सभी ने भी तुम्हारे सामने बार-बार किया। तुम्हारी माँ, बहन, भाई, देविका और यहाँ तक कि तुम्हारे बच्चे भी। तुम सब उसके साथ ऐसा व्यवहार करते हो जैसे कि वह इंसान ही नहीं हो। लेकिन वह तुम लोगों के जैसी नहीं है। कागजों पर हस्ताक्षर करो, नहीं तो मैं भगवान की कसम खाती हूँ, मैं कोर्ट मेँ तुम्हारी क्रूरता के सारे सबूत देकर तुम्हें, तुम्हारे परिवार के बड़े नाम सम्मान को तबाह कर दूँगी।"
वह पैर पटकती हुई मेरे कार्यालय से बाहर चली गई, और मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मैं उससे भी बड़ा बेवकूफ हूं, जितना कि मैं समझ रहा था।
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