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सोमवार, 26 जनवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग बारह (12)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग बारह (12)


भाग 12

अंशुमन




"काव्या" मैंने दहाड़ते हुए कहा।

देर हो चुकी थी, लेकिन हम अभी भी कार्यालय में थे और एक टेंडर का काम पूरा कर रहे थे, जिसकी समय सीमा समाप्त हो चुकी थी। उसने अपना सिर अंदर डाला। "लगभग पूरा हो गया है, और मैं इसे दस मिनट में अनुमोदन के लिए आपको ईमेल कर सकती हूँ।"

"आज मेरी पत्नी ने फोन किया था?"

"आपका मतलब पूर्व पत्नी से है?" वह मुस्कराते हुए अंदर आई।

मैं सच में इस औरत से नफरत करने लगा था। "मेरी एक ही पत्नी है, जो पूर्व नहीं वर्तमान पत्नी है, और रहेगी। मेरी पत्नी ने आज फोन किया?" "हाँ।" उसने अपनी आँखें घुमाईं।

“क्या उसने मेसेज छोड़ा था?" काव्या ने कंधे उचका दिए, "वह हमेशा मेसेज छोड़ती हैं।"

"क्या मेसेज था?" मैंने दांत पीसते हुए पूछा। "हमेशा जैसा। अंशुमन से कहो कि मुझे वापस कॉल करे।"

"तो तुमने मुझे क्यों नहीं बताया?"

वह हंस पड़ी "जब मैंने काम शुरू किया, अंशुमन, जब भी मैंने मेसेज बताया तो आप बड़बड़ा कर कहते थे कि काश वह इतनी बार फोन न करती। तो मैंने बताना बंद कर दिया।"

"लेकिन उस दिन मैंने तुम्हें बताया था न, कि वह चली गई है। तुम्हें पता था कि यह महत्वपूर्ण था," मैंने आरोप लगाया।

"यह तो और भी बड़ा कारण है, न बताने का।"

मुझे एहसास हुआ कि यह काव्या की गलती नहीं थी। यह मेरी गलती थी। मैंने अपने जीवन में हर किसी को अपनी पत्नी का तिरस्कार करने की पूरी छूट दे दी थी। "अगली बार जब वह फ़ोन करे, तो मुझे तुरंत बता देना। दरअसल, मैं अपने फ़ोन का रूट बदल दूँगा, ताकि अब से मैं खुद ही फ़ोन ले सकूँ।"

"अंशुमन, मैं आपकी सहायक हूँ; यह मेरा काम है .... " उसने विरोध किया।

“हाँ, यह तुम्हारा काम ही था काव्या, लेकिन तुमने इस फोन रूट का अपने स्वार्थ के लिए फायदा उठाया। मुझे मूर्ख मत समझो!! अब तुम्हें मेरे निजी सेल फ़ोन कॉल का जवाब नहीं देना पड़ेगा।" मैंने अपना फ़ोन उठाकर कॉल फ़ॉरवर्डिंग हटा दी, जो हमारे काम के लंबे घंटों के लिए सेट की गई थी। मेरे बच्चे कॉल करने से ज़्यादा मैसेज करते थे, मैं कभी नहीं चूका। लेकिन, मैंने प्रियंका के संदेशों को अनदेखा कर दिया क्योंकि मैं एक बुरा पति था।

"अंशुमन?" काव्या को जैसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था।

"काव्या, मैं ठीक नहीं हूँ। मैं अपनी पत्नी को वापस घर लाने की कोशिश कर रहा हूँ, इसलिए जब तुम उसका फोन और संदेश मुझसे छुपाती हो, तो इससे कोई मदद नहीं मिलती।"

काव्या ने आह भरी, "वह तो कई सप्ताह पहले ही चली गई हैं, अंशुमन ।"

मेरा जबड़ा कस गया। "वह टेंडर भेज दीजिए; टीम के सभी सदस्यों को कॉपी करना न भूलें ताकि वे सभी अपना इनपुट दे सकें। धन्यवाद।” वाह पलट कर जाने लगी। “और याद रखना काव्या, आगे से मेरे और मेरी पत्नी के बीच मेँ आने की कोशिश की, तो मुझे एचआर से इस व्यवहार की शिकायत करनी होगी।" सुन कर उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

जब मैंने प्रियंका को फ़ोन किया तो मैं एक तो पहले से ही गुस्से में था, और फिर मैंने आदतन उस पर अपना गुस्सा निकाला। किसी को मुझे यह बताने की ज़रूरत नहीं थी कि मेरी पत्नी के साथ तीन हफ़्तों में मेरी पहली बातचीत अच्छी नहीं रही। बल्कि हो सकता है कि मैंने उसे मुझे छोड़ने के अपने फ़ैसले के बारे में बेहतर महसूस करने में मदद की हो। और आज पहली बार उसने मुझे पलट कर जवाब दिया था, आईना दिखाया था। ठीक वैसे ही जैसे उसने शाश्वत का अपमान बर्दाश्त नहीं किया, मेरा भी नहीं किया। मेरे मन मेँ उसके लिए सम्मान और अपने लिए धिक्कार का भाव और गहरा हो गया।

मुझे मदद की ज़रूरत थी। शाश्वत की ही तरह मुझे भी एक मनोचिकित्सक से मिलना होगा। मुझे जरूरत थी - प्रियंका की। वह घर क्यों नहीं आ सकती? मुझे उसकी जरूरत थी..... मैंने शर्म से अपना सिर झुका लिया। मैं उस पर चिल्लाया। माफी मांगने के बजाय, यह कहने के बजाय कि, मैं तुमसे प्यार करता हूँ, घर आओ, मैंने उससे डाँट कर कहा कि वह पाँच हजार रख ले! असहाय महसूस करते हुए मैंने रक्षित को फोन किया। "मैंने उससे बात की।"

"फिर?"

"मुझे लगता है कि मैंने खुद को और भी ज़्यादा बर्बाद कर लिया है।" .....

"अच्छा!," उसने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा। "अब तुमने क्या किया है?" मैंने उसे सब बताया। "वाह! आप बहुत आगे बढ़ गए हैं, और जाहिर है, आपकी पत्नी घर नहीं आ रही है।"

"मुझे नहीं पता कि मैं क्या करूँ, रक्षित।" मैंने अपने जीवन में कभी इतना असहाय, इतना बेकाबू महसूस नहीं किया था।

"अंशुमन, क्या सच मेँ तुम अपनी पत्नी को वापस चाहते हो?"

"हाँ।"

"तो फिर हिम्मत करो और उससे मिलो। उसे बताओ कि तुम कैसा महसूस कर रहे हो। और ऐसा कुछ भी करने से पहले, अच्छे से समझ लो कि गलत तुमने किया है, उसने नहीं। अगर - सिर्फ अगर - अगर वह तुम्हें माफ़ कर देती है, तो ठीक है, तुम्हारी किस्मत। लेकिन नहीं, तो फिर अपने पैसे के गुरूर की बकवास अलग रख कर सुनिश्चित करना कि वह आर्थिक रूप से सहज हो और उसे शांति से जीवन जीने के लिए छोड़ देना।"

पता नहीं यह कब हुआ, लेकिन मेरा छोटा भाई मुझसे ज्यादा समझदार हो गया था।

"मैं उसके बिना साँस नहीं ले सकता," मैंने अपनी छाती को रगड़ते हुए कहा। प्रियंका के बिना रहना बहुत दुखदायी है। बहुत दुखदायी!”

"यदि वह माफ नहीं करे तो तुम्हें जीना सीखना होगा क्योंकि अब निर्णय उसे लेना है।"

"तुम प्रियंका के इतने बड़े प्रशंसक कब से बन गए?" मैंने नाराजगी जताते हुए कहा ।

"सालों पहले। हर बार जब हम साथ होते थे, और मैं देखता था कि कैसे वह तुम सब का ख्याल रखती थी। देविका नहीं रखती थी अंशुमन, तुम तो जानते ही हो। देविका से विवाह के कुछ समय बाद ही मुझे समझ आ गया था कि तुम कितने किस्मत वाले हो।

इसके बाद मैंने नीलिमा को फोन किया। उसने मुझे बताया कि यशस्वी मेरा या शाश्वत का चेहरा भी नहीं देखना चाहता था और वे दोनों दीपावली मनाने के लिए लक्षद्वीप जा रहे थे।

"यह तो अच्छी बात है" मैंने उससे कहा। ..... "क्या वास्तव में?"

"हाँ। मैं नहीं चाहता कि तुम्हारी माँ छुट्टियों में अकेली रहे। क्या तुम मुझे श्रेया के रिसॉर्ट का विवरण भेज सकते हो?" जानकारी मिलने के बाद, मैंने लक्षद्वीप और सनशाइन होम्स रिज़ॉर्ट के बारे में जानकारी ली। वेबसाइट पर मौजूद तस्वीरों में एक शानदार नज़ारा था, जो प्रियंका की सारी सिफ़ारिशों को पुष्ट करता था। उसने कई बार मुझे चलने के लिए मनाने की कोशिश की थी। श्रेया उसकी सबसे अच्छी दोस्त थी, वही उसका परिवार थी, और मैं उसे नहीं जानता था। मैं प्रियंका के जीवन के लोगों को नहीं जानता था, क्योंकि मैंने परवाह नहीं की थी। मैंने उसकी जरूरतों को हमेशा अनदेखा किया था। मुझे नहीं पता कि यह कब शुरू हुआ, लेकिन जितना प्रियंका एक बेहतर श्रीमती राव-सिन्हा बनने के लिए काम करती थी, जाहिर है, उतना ही अधिक मैं एक बड़ा बेवकूफ बनने के लिए बढ़ता था।

उस रात, जब मैं बिस्तर पर लेटा था, मैंने प्रियंका का पुराना फोन निकाला। उसमें पास कोड नहीं था। जब मैं उसे रखने को कहता, तो वह हंस पड़ती कि उसके पास छिपाने के लिए कुछ भी नहीं है, और यह सिर्फ़ एक परेशानी होगी। मुझे यह देखकर राहत मिली कि उसने अपना फोन डिलीट नहीं किया था, और मैंने सोचा कि काश मैंने पहले ही यह देख लिया होता।

संदेशों को देखा – मेरे और बच्चों की ओर से अनुत्तरित बहुत सारे मेसेज थे। मैंने तस्वीरें देखीं- पूरे परिवार की तस्वीरें, उसकी एक भी नहीं। एक सेल्फी भी नहीं। प्रियंका किसी सोशल मीडिया पर नहीं थीं और उस ने सिर्फ़ यादों को संजोने के लिए तस्वीरें लीं थीं। मैंने कई ऐप्स खोले और बंद किए। मैं फिर से उसके जीमेल ऐप में गया और उसके फ़ोल्डर्स को स्कैन करना शुरू किया। उनमें से एक का नाम सिर्फ़ “मेरा निजी” था। मैंने उसे खोला।

मेरी नजर पहली विषय पंक्ति पर पड़ी: पुनः अदृश्य महसूस कर रही हूँ।

दूसरी “आज फिर यही हुआ”

तीसरी “आज पार्टी मेँ सब महिलायें कह रही थीं कि मैं ‘पहली पत्नी’ हूं और अंशुमन ‘होने वाली दूसरी पत्नी’ के साथ समय गुजार रहे हैं”

आखिरी मेल हमारी सालगिरह के अगले दिन की थी। मुझे अपने आंसू पोंछने पड़े ताकि मैं स्क्रीन देख सकूं।

विषय: अपॉइंटमेंट रद्द करना

डॉ. मिश्रा,

कल हमारी 20वीं सालगिरह थी। यह भी अंशुमन की ओर से एक शब्द भी कहे बिना चली गई। कोई स्वीकृति नहीं, कोई पहचान नहीं। लगता है जैसे हम एक ही घर में अजनबी हैं। मैं सोचती रहती हूँ कि क्या उसने मुझे कभी सच मेँ प्यार किया भी होगा? मैं खुद को बहुत अलग-थलग महसूस कर रहा हूँ - अंशुमन से, अपने बच्चों से, उस जीवन से जिसे बनाने के लिए मैंने इतनी मेहनत की है। इसका कोई मतलब नहीं है। मैंने जाने का फैसला किया है। मैं श्रेया के साथ रहूँगी जैसा कि मैंने योजना बनाई थी। मैं कुछ पैसे ले रही हूँ, लेकिन आप तो प्री-नेपुटल समझौता के बारे में जानती ही हैं, इसलिए बस इतना ही ले रही हूँ कि कुछ दिन अपना गुजारा कर सकूँ। इसलिए अब फीस के लिए मेरे पास पैसे नहीं हैं। जैसे ही मैं फीस वहन कर पाऊँ, मैं आपके साथ टेलीथेरेपी की व्यवस्था करूँगी। लेकिन अभी मेरे पास आपकी फीस के लायक पैसे नहीं हैं। मुझे बहुत अफसोस है।

साभार,

प्रियंका

फिर मैंने डॉ. मार्लीन मिश्रा का उत्तर पढ़ा।

प्रिय प्रियंका,

मैं सभी भावी नियुक्तियों को टेलीथेरेपी में बदल रही हूँ। भुगतान के बारे में चिंता न करें। हम भविष्य में इस पर काम कर सकते हैं। हम अपनी साप्ताहिक सेशन की नियुक्तियाँ जारी रखेंगे। अगर समय बदलने की ज़रूरत है तो मुझे बताएँ। आपको खुद पर गर्व होना चाहिए कि आप वह व्यक्ति हो जो होना चाहिए। दवाइयाँ जारी रखना। बुधवार को बात करते हैं। जब ज़रूरत हो तो मुझे फ़ोन या मैसेज करो। आप कभी भी मुझसे संपर्क कर सकती हैं।

स-सम्मान,

डॉ. मार्लीन मिश्रा

दवाएं? स्पष्ट था कि मनोचिकित्सक अपने मरीज़ के बारे में इतनी चिंतित थी कि बिना पैसे लिए उसे देखती रहेगी। मैं इतना अमीर था और प्रियंका के पास इलाज के पैसे नहीं थे जिसके कारण वह अपॉइंटमेंट कैन्सल कर रही थी। धिक्कार है! मैंने उसे यह नहीं कहा कि मेरे पैसे तुम्हारे हैं, मैंने उसे चिल्ला कर भीख की तरह कार और पाँच हजार रुपए रखने को कहा था। मैंने डॉ. मार्लीन मिश्रा को ढूँढा। उनका क्लिनिक पास ही था। मैंने ऑनलाइन अपॉइंटमेंट लिया और शुक्र है कि अगले दिन तीस मिनट के परिचय सत्र के लिए उनके पास समय था। मुझे पता था कि वह मुझे प्रियंका के साथ अपनी बातचीत के बारे में कुछ नहीं बताएंगी, लेकिन उन्होंने मेरी पत्नी का ख्याल रखा और शायद वह मुझे एक बेहतर इंसान बनने में मदद कर सकती हों। मुझे प्रियंका की थेरेपी के लिए भुगतान करने का मौका भी मिल जाएगा।

अगले दिन, मैंने काव्या को यह बताने के लिया फोन किया कि मैं आज छुट्टी ले रहा हूँ। मैं काम के बारे में सोचना नहीं चाहता था और न ही काव्या की लालसा भरी निगाहें सहना चाहता था। मुझे कि उसे अपने जीवन से बाहर निकालना था। शायद ट्रांसफर? उस मेँ आत्म संतुष्टि दिखती थी जैसे कि वह मेरा इंतज़ार कर रही थी कि मैं उसे बताऊँ कि अब मेरी पत्नी चली गई है, और वह और मैं साथ रह सकते हैं। हे भगवान्!

फिर बच्चों को फोन किया। जब बच्चे वे वीडियो कॉल पर आए, तो शाश्वत रोआँसा था। "मैं किसी से बात कर रहा था। और उन्होंने कहा कि मैं माँ के साथ बुरा व्यवहार कर रहा था क्योंकि मैं अपनी असुरक्षाओं से जूझ रहा था। यह बहाना नहीं और स्पष्टीकरण भी नहीं है। कभी-कभी बच्चे ऐसा करते हैं, अपनी भावनाओं को माता-पिता पर निकाल देते हैं।"

"यशस्वी सोचता है कि हम सब उनके साथ ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि वह हमें ऐसा करने देती हैं, और .... मैं यह नहीं कह रही कि यह माँ की गलती है, क्योंकि माँ को अपने ही परिवार को उनका सम्मान करना नहीं सिखाना पड़ना चाहिए। मुझे विश्वास नहीं होता कि हम सब ने माँ को इतना दुखी किया और हमें एहसास तक नहीं हुआ। वे हमें छोड़ नहीं जातीं तो हम ऐसे ही बने रहते – हैं न?" नीलिमा ने नाक सिकोड़ते हुए कहा।

"और मैं उन्हें छोटा महसूस कराता रहा, कराता ही रहता," शाश्वत ने रोते हुए कहा। "मैं यह गलती कैसे पूरी कर सकता हूँ, पापा? कैसे?"

"गलती मेरी है – शुरुआत मुझसे हुई, तुम दोनों ने मेरी देखा-देखी किया।" मैंने थके हुए स्वर में कहा और उन्हें प्रियंका के साथ अपने फोन कॉल के बारे में बताया। "ओह, पापा, आपने तो बहुत गड़बड़ कर दी," नीलिमा ने सहमति जताते हुए कहा "अब हम क्या करेंगे?" मैं एक योजना बना रहा था, लेकिन उसे अंतिम रूप देने के लिए मुझे कुछ दिन चाहिए थे। "हम यह साबित करेंगे कि हम उस से प्यार करते हैं और उसका ख्याल रखते हैं।"

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