ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग अठारह (18)
भाग 18
अंशुमन
प्रियंका सफ़ेद कपड़ों मेँ बहुत खूबसूरत लग रही थी। उसके बाल उसके कंधों पर खुले हुए थे, और मैं खुद को उन बालों में लपेटना चाहता था और उन्हें फिर से छूने का अधिकार चाहता था, कि मैं उसके रसीले मुँह को चूम कर उसे यह कहते हुए सुन पाऊँ कि ‘मेरे प्यारे अंशुमन, मैं तुमसे प्यार करती हूँ’। क्या मैं अपनी गलतियों को सुधार पाऊँगा? "हाय, प्रियंका।" मैं उस जगह पर गया, जहां मुझे लगा कि वह चेक-इन डेस्क है, जहां एक सुंदर कंप्यूटर स्क्रीन और सर्दियों के फूलों का एक बड़ा फूलदान था।
वह पूरी तरह स्तब्ध होकर देखती रही। "क्या… कैसे…?"
मैंने मुस्कराते हुए कहा, "मेरे और शाश्वत के लिए एक बुकिंग है।"
मैंने उसकी आँखों में आँसू देखे जैसे उसके अंदर आशा की किरण जागी हो "शाश्वत?"
"हाँ, वह गाड़ी से सामान उतार रहा है।"
"क्या? क्या वह यहाँ है? मेरा बच्चा यहाँ है?"
लानत है! वह कितनी अनिश्चित लग रही थी, वह अपने बच्चों से कितना प्यार करती थी, और मेरे कारण बच्चों ने उसके साथ कैसा व्यवहार किया था। "बेशक, वह है। हम तुम्हें हमारे बिना छुट्टियां बिताने नहीं दे सकते, बेब।" उसने आँसू पोंछे और फिर चौंककर बोली, "तो इसका मतलब? क्या.... क्या तुम दोनों ही श्रेया के दोस्त हो?"
मैं मुस्कराया। "हाँ। उसने कहा कि वह सुनिश्चित करेगी कि तुम हमारे लिए दो कमरे अलग रख लो।" मैंने क्रेडिट कार्ड निकाला, और वह उसे घूरने लगी। "मैं तुम्हारा पैसा नहीं ले सकती," उसने फुसफुसाते हुए कहा। "तुम... श्रेया ने कहा है कि तुम उसके दोस्त हो, पैसा नहीं लेना है।" और हम तुम्हारे पति और बेटा भी तो हैं प्रियंका, भूल गईं? मैंने अपना कार्ड वापस पर्स में रख कर जेब में डाल लिया। मैं उससे इस बात पर लड़ने वाला नहीं था। अगर वह मेरे पास, हमारे पास, वापस आ जाए, तो मैं उससे कभी किसी बात पर नहीं लड़ने वाला।
तभी शाश्वत अंदर आया और प्रियंका के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
"मेरा बच्चा।" वह उसकी तरफ दौड़ने लगी। पहले तो उसके कदम तेज दौड़े से थे और फिर अनिश्चित हो कर धीरे हो गए, जैसे कि उसे यकीन न हो कि शाश्वत कैसी प्रतिक्रिया देगा। शाश्वत ने भी मेरी तरह ही इस झिझक को महसूस किया और मुझे उसका दर्द महसूस हुआ। उसने अपनी बाहें खोलीं और प्रियंका ने दौड़ कर खुद को उनमें लपेट लिया। उसने उसे जोर से गले लगा लिया, पंजों के बल ऊंची खड़ी हुई और उसके चेहरे को पकड़ कर कई चुम्बन दिए। "मेरा बच्चा, मेरा बेटा ... ओह मेरा बच्चा यहाँ है। ओह, शाश्वत। ओह धन्यवाद। भगवान का शुक्र है। मुझे तुम्हारी बहुत याद आती थी बेटे। आने के लिए ..... ओ मेरे बेटे, शुभ दीपावली, प्रिय।" शाश्वत माँ से आलिंगन कर खड़ा था। उसने अपनी ठुड्डी उसके कंधे पर टिका दी, और आंखों में आंसू लिए मेरी ओर देखने लगा।
खुशकिस्मत, उसे माफ़ी मांगने की भी ज़रूरत नहीं पड़ी थी, और वह उसे गले लगा रही थी। अगर मैंने उसे अपनी बाँहों में खींचने की कोशिश की, तो पूरी संभावना थी कि मैं अपनी बाहें ही खो दूँगा। लेकिन मैं उन्हें साथ देखकर खुश था और मुझे पूरी उम्मीद थी कि वे अपने बीच की दरार को पाट सकेंगे; और जब नीलिमा और यशस्वी यहां आएंगे तो हम सब मिल जुलकर प्रियंका को दिखा सकेंगे कि वह हमारे लिए कितनी महत्वपूर्ण है। प्रियंका दूर हट गई और शाश्वत के कंधे थाम कर उसे निहारती रही कुछ देर। फिर मेरी ओर देखने लगी। उसने जोर से थूक निगला। "दीपावली की शुभकामनाएं, बेब।" मैं उसकी ओर बढ़ा और वह एक कदम पीछे हट गई, जिससे मेरे दिल में एक तीर सा चुभ गया।
"अंशुमन," उसने सांस ली। सिर्फ अंशुमन। उसने ‘मेरे प्रिय अंशुमन’ नहीं कहा था। मुझे बहुत अच्छा लगता था जब वह मुझे ‘मेरे प्रिय’ कहती थी। यहाँ तक कि जब उसने मेरे लिए एक नोट छोड़ा, तो उसमें भी उसने मुझे अपना प्रिय अंशुमन कहा। और मैंने उसे खो दिया। मैं इसे सही करना चाहता था, लेकिन मुझे यह भी नहीं पता था कि कहाँ से शुरू करूँ। मुझे नहीं पता था कि मैं जो कुछ भी कहना चाहता था, उसे कैसे कहूँ। उसे कैसे यह विश्वास दिलाऊँ कि मैं फिर कभी ऐसी मूर्खता नहीं करूंगा क्योंकि चार हफ़्तों में पहली बार मैं पूरी साँस ले पा रहा था। मेरी प्रियंका मेरे सामने थी। वह भले ही मुझसे नाराज हो, लेकिन वह यहाँ थी, मेरे सामने। मैं उसकी अनूठी खुशबू सूंघ सकता था, और इससे मुझे सुकून मिला।
प्रियंका हमें एक गलियारे से ले गई, जिसमें समुद्री दृश्यों की फ़्रेमयुक्त पेंटिंग्स समुद्र को सीधे घर में लाती हुई लग रही थीं। हम प्रियंका के पीछे-पीछे लकड़ी की सीढ़ियों से होते हुए रिसॉर्ट की ऊपरी मंजिल पर पहुँच गए। इस मंजिल पर हवा ठंडी थी, समुद्र की हल्की, नमकीन गंध से भरी हुई। वह अंत में एक दरवाज़े के सामने रुकी। मुझे इस तरह के सुसज्जित जगह की उम्मीद नहीं थी। मैंने हर जगह अपनी पत्नी के सलीकेदार स्पर्श को देखा। मुझे पूरा यकीन था कि उसने ही इसे सजाया था। भव्य, शांत कला, जिस तरह सब कुछ तारतम्य लिए एक साथ था, छुट्टियों की सजावट, यह सामंजस्य प्रियंका के स्पर्श की लिखावट थी।
उसने हमारे घर में भी ऐसा ही किया था। उसके बिना, वह घर जो कभी मुझे बहुत पसंद था, ठंडा, वीरान खंडहर लगने लगा था। वह अब घर ही नहीं लगता था, मुझसे उसके बिना वहाँ सांस भी नहीं ली जा रही थी। यहाँ उसे अपने पास पाकर एहसास हुआ कि हमारे घर का एहसास सिर्फ़ उसकी सौम्य सजावट के कारण नहीं, बल्कि प्रियंका की उपस्थिति ही थी जिसने हमारे घर में गर्मजोशी लाई, और यहाँ सनशाइन होम्स रिज़ॉर्ट में भी। उसने एक दरवाज़ा खोला जहाँ बोर्ड पर लिखा था, ‘सैंडी कोव रूम’। "शाश्वत, बेबी, यह तुम्हारा कमरा है।"
"सैंडी कोव?" वह बुदबुदाया। वह हंस पड़ी। "हाँ, मैंने सभी कमरों का नाम तब रखा था जब श्रेया ने पहली बार इसे रिज़ॉर्ट बनाया था। हम इसे सैंडी कोव कहते हैं क्योंकि यहाँ से आपको रेतीले समुद्र तट और टीलों का नज़ारा दिखता है।" शाश्वत ने कमरे की ओर देखा और प्रशंसा मेँ सिर हिलाया। "धन्यवाद, माँ।" उसने माँ के गाल को चूमा, और मैंने उसके कंधे की पीछे फिर से उसकी आँखों में पछतावे की हताशा देखी।
"तुम लोग नहाकर आराम क्यों नहीं कर लेते? खाना एक घंटे में है, और... उसके बाद, शायद हम बात कर सकें?" प्रियंका ने प्यार से सुझाव दिया। वह ऐसी ही थी, प्यार करने वाली और देखभाल करने वाली। वह शाश्वत पर झपट नहीं रही थी, उसे यह नहीं कह रही थी कि उसका व्यवहार बहुत बुरा रहा है और उसे सुधरना चाहिए। ऐसा नहीं कि यह गलत होता। उसे उसके पिछले व्यवहार के लिए यह करने का पूरा अधिकार था। लेकिन प्रियंका ऐसी नहीं थी। वह एक कोमल आत्मा थी, जिसने बिना माफी मांगे ही शाश्वत को माफ कर दिया था। शाश्वत के अपने कमरे में चले जाने के बाद वह मुझे हॉल के दूसरे छोर पर स्थित कमरे में ले गई। मेरे दरवाजे पर लिखा था, ‘सनराइज हेवन’। "यह आपका कमरा है," प्रियंका ने कहा, उसकी आवाज़ में हल्की गर्मजोशी थी जब उसने दरवाज़ा खोला। "यह एक कोने वाला कमरा है। यहाँ समुद्र पर आपको सूर्योदय दिखेगा।"
"इसलिए इसका नाम सनराइज हेवन रखा गया?" ..... "हाँ।"
अंदर कदम रखते ही, मैं कमरे के शांत, स्वागत करते माहौल से मंत्रमुग्ध हो गया। इसे समुद्र तट की तरह नर्म रेतीले रंगों में रंगा गया था। बड़ा बिस्तर कुरकुरे सफेद लिनेन और एक मोटे, गहरे नीले कम्फ़र्टर से बना था, जो थके हुए यात्री को आराम करने के लिए आमंत्रित करता था। दोनों तरफ, मेल खाते हुए नाइट स्टैंड में साधारण सिरेमिक लैंप रखे हुए थे जो एक नर्म रोशनी देते थे। बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ ध्यान खींच रही थीं क्योंकि उनसे संध्या के समय महासागर का अद्भुत दृश्य दिखाई दे रहा था, जिसका विशाल जल क्षितिज में अंतहीन रूप से फैला हुआ था। तट से टकराती लहरों की आवाज़ मेरे कानों तक पहुँच रही थी, एक प्राकृतिक लोरी जो आरामदायक रातों का वादा कर रही थी। एक कोने में एक आरामदायक कुर्सी रखी हुई थी, जिसके साथ एक छोटी लकड़ी का बुकशेल्फ़ था, जिसमें समुद्री इतिहास से लेकर क्लासिक फिक्शन तक की कई किताबें रखी थीं। यह एक अच्छी कहानी में खो जाने या बस बैठकर समुद्र को देखने के लिए एकदम सही जगह लग रही थी। दीवारों पर समुद्र की थीम पर आधारित कलाकृतियाँ थीं, जिनमें समुद्र के ऊपर डूबते हुए सूर्य का एक आकर्षक चित्र भी था, जिसके रंग चमकीले और सजीव थे।
"यह बहुत ही खूबसूरत है।" मैंने विस्मय से चारों ओर देखा। "मुझे ऐसा लग रहा है...."
"जैसे क्या?" उसने धीरे से पूछा, लगभग शरमाते हुए जब मैंने अपने शब्द रोक लिए।
"जैसे मैं घर आ गया हूँ प्रियंका। जैसे यहाँ खिड़कियों के बाहर फैली विशाल सुंदरता के सामने दुनिया की सारी चिंताएँ अर्थहीन हो गई हैं" मैंने अपना सूटकेस नीचे रखा और महसूस किया कि मेरे कंधों से वजन उतर गया है। मैं अपनी पत्नी के साथ था और घर पर था। प्रियंका ही मेरा घर थी। वह जहां हो वहीं मेरा घर था। मैं यह पहले क्यों नहीं समझ पाया?
"मुझे बहुत खुशी है कि तुम्हें पसंद आया," उसने फुसफुसाते हुए कहा।
मैं अपनी पत्नी के खूबसूरत चेहरे को आँख भर देखता रहा। "बेब, .... मैं.... मैं .... "
"मैं बात करने के लिए तैयार नहीं हूँ, अंशुमन" उसने शांत तरीके से कहा। "प्लीज।"
मेरा गला रुंध गया। मैंने सिर्फ सिर हिलाया। "तुम समय लो, बेब। मैं कहीं नहीं जा रहा।"
उसकी भौंहें उठ गईं, और वह हैरान दिख रही थी "क्या मतलब?"
"मैंने... आ ...श्रेया ने तुम्हें नहीं बताया? मैंने छह महीने के लिए कमरा बुक किया है," मैंने कहा, जानते हुए कि मामला बिगड़ सकता है। मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या उम्मीद करूँ। जो प्रियंका पिछले बीस सालों से मेरे साथ रही थी, उससे मैं उम्मीद नहीं करता था कि वह हमें छोड़ जाएगी। मैं हमेशा से जानता था कि वह मजबूत है; मैं बस इस मजबूती को भूल गया था क्योंकि वह मजबूती उसके प्रेम के आँचल मेँ छिपी रही इतने वर्षों।
"छह महीने?" उसकी आवाज़ में आश्चर्य साफ़ था। "लेकिन... तुम्हारे काम का क्या?"
मैंने कंधे उचकाए। "प्रभाकर ने कार्यवाहक सीईओ का पदभार संभाल लिया है।"
"क्या?" वह मेरी ओर देखती रही। "क्यों?" और फिर मैंने देखा कि उसकी आँखों में घबराहट और चिंता के बादल छा गए "क्या तुम ठीक हो? ..... क्या तुम्हारी तबीयत ठीक है?"
"बेबी, मैं ठीक हूँ। दिल टूट गया है, लेकिन बाकी सब ठीक है," मैंने जल्दी से कहा, क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि वह घबरा जाए। चूंकि उसकी सहेली बीमार थी, इसलिए मैं समझ गया कि उसका दिमाग कहाँ गया होगा "मैं सिर्फ तुम्हारे साथ रहना चाहता हूँ।"
उसने मेरी ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा, "मैं समझ नहीं पा रही।"
"जब तक तुम यहां हो, मैं लक्षद्वीप पर ही रहूंगा।"
"क्या? लेकिन क्यों?" मैं चुपचाप खड़ा रहा। बात दोहराने के बजाय मैं उसे देखता रहा। उसने मेरी बात ठीक सुनी थी, भले ही बात पसंद न आई हो "तुम- तुम ऐसा नहीं कर सकते"
"क्यों?"
"यह... आह... यह रिज़ॉर्ट मेहमानों के लिए है।"
"प्रियंका, मैं कमरे का किराया देने को तैयार हूं।"
"मैंने पहले ही तुमसे कहा था, मुझे तुम्हारा पैसा नहीं चाहिए," उसने कहा, और मैंने उसके अंदर वही आग देखी, जिसे मैंने फोन पर सुना था और जब उसने बताया था कि वह हमारी शादी से कितनी नाखुश थी।
"मैं जानता हूं, मेरा विश्वास करो" मैंने दुखी होकर कहा। उसे एक पैसा भी नहीं चाहिए था। प्रियंका के बारे में माँ की सभी बातों के बावजूद, मेरी पत्नी ईमानदारी से मुझसे मेरे लिए प्यार करती थी, मेरे परिवार के नाम के लिए नहीं। मुझे यह पता था, लेकिन मैंने अपनी माँ के सामने कभी यह बात नहीं कही - मुझे कहना चाहिए था। शादी के शुरुआती दिनों में मैं माँ को नाराज़ करने से डरता था। लेकिन उसके बाद, मुझे कोई परवाह नहीं रही थी। "अंशुमन तुम यहाँ इतने दिन नहीं रुक सकते।" वह दरवाज़े की ओर चली गई। "मैं... अच्छा, चलो बाद में बात करते हैं। लेकिन तुम यहाँ नहीं रह सकते।"
"प्रियंका, अगर तुम मुझे इस रिज़ॉर्ट से बाहर निकाल दोगी तो मुझे द्वीप पर कोई और जगह ढूंढनी पड़ेगी। लेकिन मैं वहीं रहूँगा जहाँ तुम हो।" इस पर उसने मुझ पर व्यंग्य किया। व्यंग्य! वह कभी-कभार ही रूखी होती थी, इसलिए यह चौंकाने वाला था। "देखते हैं, अंशुमन। मुझे यकीन है कि जब भी काव्या किसी संकट के बारे में फोन करेगी, तो तुम उलटे पैरों भाग जाओगे।" जिस तरह से उसने काव्या का नाम लिया, मैं परेशान हो गया। "प्रियंका, मैंने तुम्हें कभी धोखा नहीं दिया, न शारीरिक रूप से, न भावनात्मक रूप से। कभी नहीं।"
उसका जबड़ा कस गया। "हाँ, तो तुम ऐसा करते क्यों, अंशुमन? क्या मैं हमेशा ‘अच्छी पत्नी’ नहीं थी जिसे कभी बहाने का ‘सिरदर्द’ नहीं हुआ और जो हमेशा तुम्हारे साथ ‘वैसे ही सेक्स’ करती रही जैसा-जैसा तुम अपनी तृप्ति के लिए चाहते थे?" हैं? प्रियंका इस तरह बात नहीं करती थी। यह क्या था? "तुम्हें आश्चर्य हो रहा है? मैंने तुम्हें एक बार रक्षित से ऐसा कहते हुए सुना था। तुमने हमारे पति पत्नी के अंतरंग पलों को अपने भाई के सामने एक सस्ता मजाक बना दिया, जैसे कि मैं कोई.... " मैं हांफने लगा। वह कह नहीं पा रही थी, लेकिन अर्थ यही था कि मैंने उसके बारे मेँ एक बाजारी औरत की तरह अपने भाई से बात की थी, अब शर्मिंदा होने से क्या होगा, मैंने ही तो यह किया था।
"मैं....मैं .... " मैं खुद का बचाव भी नहीं कर सका क्योंकि ऐसा लग रहा था कि मैंने कुछ गिलास पी लिए होंगे और यह बका होगा। क्या मैंने प्रियंका को कभी ऐसे देखा था? मेरा दिल धड़क उठा। नहीं। मैंने अठारह साल की लड़की से शादी की, और उसे कभी किशोरी होने का मौका ही नहीं मिला। वह हाई स्कूल और सरकारी कॉलेज मेँ भी पैसों की जरूरत के लिए कोई न कोई काम करती रही। उसे कभी बच्ची होने का समय ही नहीं मिला; यह मैं जानता था। और मैंने उसे किशोरी होने का मौका भी नहीं दिया, क्योंकि मैंने ‘प्यार करता हूँ’ कह कर विवाह कर लिया, और फिर अपनी शेरनी जैसी माँ की मांद में फेंक दिया।
"कुछ साल पहले की बात है," उसने आगे कहा। "रक्षित की बर्थडे पार्टी थी उनके घर पर। मैं आना नहीं चाहती थी, लेकिन तुमने कहा कि मुझे आना ही होगा। 'लोग कहेंगे कि तुम कहाँ हो, प्रियंका। मैं उस बकवास से निपटना नहीं चाहता’ उसने आखिरी हिस्सा मेरे ही लहजे मेँ नकल सी करते हुए कहा। "प्रियंका, मुझे बहुत खेद है," मैंने कहा, उस पार्टी की यादें वापस आ गईं। मैंने खुद को रक्षित से उनके बगीचे में बात करते हुए देखा। मुझे ठीक-ठीक बातचीत याद नहीं आ रही थी, बस इतना पता था कि यह उम्र बढ़ने के बारे में थी। यह लगभग चार साल पहले की बात है। "क्या तुम्हें याद भी है कि तुमने क्या कहा था?" उसने मुझे चुनौती दी। मैंने अपना सिर हिलाया। "मुझे नहीं पता। बिल्कुल नहीं। क्या तुम मुझे बताओगी?" उसकी आँखों में आँसू भर आए। उसने अपना सिर हिलाया। "खाना साढ़े छह बजे तैयार हो जाएगा। केसर के चावल पर राजमा, भुनी हुई सब्जियाँ मुख्य कोर्स है, बाकी सामान्य।“
"धन्यवाद, प्रियंका।" वह बहुत ही बढ़िया और दिलचस्प खाना बनाती थी। बच्चे बढ़िया खाना खाकर बड़े हुए थे। उनके जाने के बाद भी वह खाना बनाती रही, लेकिन मैं रात के खाने के लिए घर कम ही आता था। अगर बच्चे होते तो मैं हमेशा घर पर रहता - लेकिन अगर वे नहीं होते तो... कई मायनों में, मैंने अपनी पत्नी को बिना कुछ कहे ही बता दिया था कि वह महत्वपूर्ण नहीं है, बच्चे महत्वपूर्ण हैं। मैं एक बेवकूफ़ था।
उसके जाने के बाद, उसकी खुशबू कमरे में बनी रही, और मैंने उसे सांसों में महसूस किया। मैं आसमान में अंधेरा छाने के साथ ही टूटती लहरों को देखता रहा, सोचता रहा कि मैं उसे कैसे वापस जीत सकता हूँ, जबकि मुझे लग रहा था कि मैं उसे जानता ही नहीं। सिर्फ़ चार हफ़्तों में, वह ज़्यादा मुखर और तर्क शील हो गई थी। इसने मुझे उलझन में डाल दिया, क्योंकि यह वह प्रियंका नहीं थी जिसके साथ मैं बीस सालों से रह रहा था। अगर वह पहले भी मेरे सामने इस तरह खड़ी होती, इतनी जोरदार होती, तो क्या मैं बेहतर व्यवहार करता? ऐसा नहीं है कि उसे ऐसा करने की ज़रूरत होनी चाहिए थी, मुझे अपनी पत्नी के साथ बिना इसके ही ठीक से पेश आना चाहिए था, चाहे कुछ भी हो। यह मेरी ज़िम्मेदारी थी।
लेकिन मैं अभी भी सोचता था कि अगर हम कभी इस बारे में बात कर पाते कि हम वास्तव में कैसा महसूस करते हैं, तो चीज़ें कैसी होतीं? यह सब मैं उस रिज़ॉर्ट से नज़ारे की मन ही मन प्रशंसा सोचते हुए सोच रहा था, जहाँ मैं सालों से जाने से इनकार करता रहा था।