ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग सोलह (16)
भाग 16
अंशुमन
घबराहट से मेरी नसें टूट रही थीं। मैं जैसे बिना किसी राह के अंधेरे मेँ भाग रहा था, मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या कर रहा हूँ। प्रियंका से जुदाई के एक महीने के बाद और उस फोन कॉल के दो हफ़्ते बाद मुझे देखने पर प्रियंका की प्रतिक्रिया क्या होगी, यह कोई भी अनुमान लगा सकता था। मैंने उसे फिर से कॉल नहीं किया था; मैं फिर वही गलती करने का जोखिम नहीं उठाना चाहता था।
मुझे मदद की ज़रूरत थी। मैं मनोचिकित्सक डॉक्टर राहुल वर्मा के सामने बैठा था। मैं शाश्वत के साथ अपनी पत्नी को बताए बिना ही दीपावली के लिए लक्षद्वीप जा रहा था, और जाने के दो दिन पहले मैंने उनसे मिलने के लिए अपॉइंटमेंट ले लिया था। वे एक सख्त दिखने वाले व्यक्ति थे। निगाहें ऐसी, कि लगता था कि वे आपकी आत्मा की परतों को उधेड़ देंगी, लेकिन उनकी आवाज़ अप्रत्याशित रूप से कोमल थी। डॉ. वर्मा ने कहा, "अंशुमन, आपने फॉर्म में लिखा है कि आपने पहले कभी थेरेपी नहीं ली है।"
"हाँ बस डॉ. मिश्रा के साथ तीस मिनट का परिचय सत्र, उन्होंने आपका रेफ़रल दिया।" मैं सोफे पर बैठा खुद को बेवकूफ़ महसूस कर रहा था। क्या मुझे डॉक्टर के क्लिनिक मेँ ऐसे लेटकर अपनी भावनाओं के बारे में बात करनी चाहिए? बकवास! हम उच्च समाज के मजबूत पुरुष थे; हम इस सब मेँ शांत रहने में विश्वास करते थे। ‘मजबूत पुरुष थेरपी नहीं लेते’ मेरे मन मेँ मेरी माँ की लानतें गूंज रही थी।
डॉ. वर्मा मुस्कराए। "आपने जो फॉर्म भरा है, उसमें आपने लिखा है कि आपकी पत्नी आपको छोड़कर चली गई है, और इसीलिए आप थेरेपी ले रहे हैं।"
"हाँ... और मेरे लिए... मेरी अपनी मानसिक शांति और तरक्की के लिए भी," मैंने कहा। "उसके जाने से मेरे पास खुद के बारे में जितने जवाब हैं, उससे कहीं ज़्यादा सवाल हैं।"
हमने कुछ देर बात की और मैंने उन्हें बताया कि प्रियंका और मेरे साथ क्या हो रहा है, और सिर्फ़ मेरे साथ भी। वह हर शब्द पर ध्यान देते रहे। कैसे दुनिया के लिए प्रियंका पीड़ित पत्नी थी, और मैं एक मूर्ख पति था जो नहीं जानता था कि उसके पास सब कितना अच्छा था।
फिर हम डॉ. मिश्रा द्वारा दिए गए होम वर्क पर पहुंचे, जिसके बारे में मैंने डॉ. वर्मा को बताया। "ठीक है, तो चलिए इस बारे में बात करते हैं कि आपने अतिथि कक्ष में सोना क्यों शुरू कर दिया," उन्होंने शान्त स्वर मेँ कहा, उनका स्वर सपाट लेकिन सहानुभूति पूर्ण था।
मैंने सिर हिलाया, और मेरे मुंह से परिचित बहाना निकल गया। "मैं देर से घर आता था या स्टडी में देर तक काम करता था। वह तब तक सो रही होती थी, और मैं गेस्ट रूम में सो जाता था, इसलिए कि मैं उसे परेशान नहीं करूँ।" लेकिन क्या मैं यह नहीं जानता था कि अलग सोने से मैं उसे और परेशान कर रहा हूँ? डॉ. वर्मा थोड़ा आगे झुके, उनकी उंगलियाँ आपस में उलझी हुई थीं। “क्या आपने पहले से ही ऐसा ही इंतजाम रखा है?”
मैंने अपना सिर हिलाया। कमरा अचानक से तंग लगने लगा, हवा घनी हो गई। "नहीं। बस पिछले कुछ महीनों से...शायद एक साल या उसके आसपास, मुझे लगता है।"
"क्या कोई विशेष घटना घटी जब यह शुरू हुआ?"
मैं झिझका, जब मैं आखिरकार बोला तो मेरी आवाज़ सिर्फ़ फुसफुसाहट सी थी। "मैं इस बारे में बहुत सोच रहा था, और मुझे यकीन नहीं है। या शायद मैं निश्चित हूँ। कुछ तो हुआ था, ऐसा कुछ जो तब समझ में नहीं आया लेकिन अब समझ में आ रहा है।" वर्मा ने सिर हिलाया और मेरे आगे बोलने की प्रतीक्षा करने लगे।
मैं फिर से देर से घर आया था ... प्रियंका सो रही थी, लेकिन उसने उस छोटी सी मेज पर एक नोट छोड़ा था जहाँ मैं अपनी चाबियाँ रखता था। मेरे प्यारे अंशुमन, अगर आपने खाना नहीं खाया है तो आपके लिए फ्रिज में प्लेट में खाना रखा हुआ है। आपको बस इसे माइक्रोवेव में एक मिनट के लिए रखना है। साथ में पेकन पाई भी है। -प्रियंका
अपराध बोध ने मुझे अंदर से कुतर दिया। वह इतनी प्यार भरी क्यों थी? मैंने देर रात काम करने के बाद काव्या और कुछ अन्य सहकर्मियों के साथ मार्सेल रेस्तरां मेँ खाना खा लिया था। वास्तव में हमने एक बोतल वाइन के साथ एक बढ़िया डिनर किया था। मैं अपनी कार को काम पर छोड़कर टैक्सी से वहाँ गया था और फिर घर आया था। जब भी मेरी शाम की योजनाएँ बदलती थीं, मैंने प्रियंका को बताने की कभी ज़हमत नहीं उठाई, भले ही वह हर सुबह मुझे शाम के डिनर के बारे में पूछती थी। यदि पहले से डिनर का कोई प्रोग्राम होता तब मैं उसे पहले ही बता देता था, लेकिन अगर दिन में कोई योजना बनती तब नहीं। आज भी कुछ अलग नहीं था, मेरी डिनर योजनाएँ बन गईं, और प्रियंका घर पर घर के बने खाने की प्लेट लेकर अपने पति का इंतज़ार कर रही थी, जो नहीं आया था।
वह मुझसे प्यार करती थी और मेरा ख्याल रखती थी। प्रियंका ने मेरे लिए जो कुछ भी चाहिए था, वह किया। मेरे सूट ड्राई-क्लीन किए गए। मेरी शर्ट इस्त्री की गई। मेरे जूते पॉलिश किए गए। अगर मैं लोगों को रात के खाने के लिए घर पर आमंत्रित करता, तो वह बढ़िया खाना बनाती और उसे बढ़िया वाइन के साथ परोसती। प्रियंका की मेजबानी के हुनर से हर कोई प्रभावित था। अगर मुझे बात करने की ज़रूरत होती, तो वह वहाँ होती। मुझे जो भी चाहिए या जो भी चाहिए, प्रियंका ने दिया।
मैं थका हुआ बेडरूम में गया, उम्मीद कर रहा था कि प्रियंका सो गई होगी ताकि मुझे अपने विचारहीन व्यवहार का सामना न करना पड़े। लेकिन वह नाइट शर्ट और शॉर्ट्स में जाग रही थी, पढ़ रही थी। उसकी नीली झीनी नाइटवियर मेँ उसकी रेशमी त्वचा चमक रही थी। मेरी पत्नी बहुत खूबसूरत थी। उसने अपना आईपैड एक तरफ रख दिया और मेरी तरफ देखकर मुस्कराई। "तुम थके लग रही हो, बेब। क्या तुमने खाना खाया?"
जब वह बिस्तर से उठने वाली थी, मैंने उसकी ओर हाथ हिलाया। "मैंने खाना खा लिया। हम कुछ लोग मार्सेल रेस्तरां गए थे।" जैसे ही रेस्तरां का नाम निकला, मैं उसके चेहरे पर पल भर का तनाव देख सकता था, जो एक पल भर मेँ गायब हो गया, तथा उसकी जगह उसकी मुस्कान ने ले ली। इस बारे में ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं थी कि वह उस क्षण क्यों आहत दिखी। क्या पिछले शुक्रवार को ही प्रियंका ने मार्सेल में आरक्षण करवा कर मुझसे नहीं कहा था? हाँ, यह पिछले शुक्रवार की बात है। सिर्फ़ चार दिन पहले, मैंने उसे साफ़-साफ़ कह दिया था कि मेरे पास डिनर या कुछ और करने का समय नहीं है। मैं एक लंबे हफ़्ते के बाद थक गया था और बस सोना चाहता था। उसने मुस्कराते हुए मुझे बताया था कि वह इसलिए जाना चाहती थी क्योंकि शेफ ने उसे आमंत्रित किया था। वह उससे तब मिली थी जब वह एक आश्रय गृह में स्वयं सेवा करती थी, और उनकी दोस्ती हो गई थी।
मैं इतना लापरवाह कैसे हो सकता था? लेकिन मैं था।
"हम जल्द ही साथ मेँ चलेंगे," मैंने अपना गला साफ़ किया। "आह...मुझे नहाना है।" मैं बाथरूम में भाग गया। जब मैं बिस्तर पर आया, तो वह मेरी तरफ मुँह करके लेटी थी। उसकी आँखें बंद थीं, लेकिन मुझे पता था कि वह जाग रही है। मैं उसके बगल में बैठ गया और तुरंत उसे देख उत्तेजित होने लगा। बुरी तरह! हमेशा की तरह मैं उसके लिए भूखा था। मैं पीठ के बल लेट गया और एक हाथ आगे बढ़ाया। उसने तुरंत अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया, उसके छोटे, नाजुक हाथ मेरी छाती पर थे। मैंने उससे विनती की, "बेब, मैं .... "
उसने अपनी बाहें फैलाईं और पैर फैलाए, "हाँ, मेरे प्यारे अंशुमन।" मेरे पास उसके लिए धैर्य नहीं था, जो मैं लगभग हमेशा करता था। इस बार नहीं। मेरा दिन लंबा और तनावपूर्ण था, और वह मेरा इनाम थी - मेरी कमबख्त मुक्ति। "मैं रुक नहीं सकता बेबी।" उसने मेरी पीठ पर हाथ फेरा और मेरा स्वागत किया। बस इतना ही आमंत्रण था जिसकी मुझे जरूरत थी। मैंने अपनी आवश्यकता पूरी कर ली। मैं जानता था कि उसके लिए यह नहीं हुआ था। मैंने फुसफुसाते हुए कहा, ‘सॉरी।‘ अपराध बोध पर अपराध बोध की परतें चढ़ती गईं। वह मुस्कराई और मेरे मुंह को चूमा। "मुझे तुम्हारा मेरे अंदर होना, तुम्हें अपने इतने करीब महसूस करना बहुत अच्छा लगता है।"
"लेकिन मैं हमेशा तुम्हें भी सुख देता हूँ।"
उसकी आँखें घूम गईं और मैंने पलकें झपकाईं, "प्रियंका?"
"हाँ .... हाँ देते हो न .... तुम्हें पता है," उसने कहा, लेकिन मैं जानता था कि वह झूठ था। मैंने उसे चूमा। मैं उसके लिए सब कुछ ठीक कर दूँगा; मैंने खुद से वादा किया, जब इतना थका हुआ नहीं रहूँगा। वैसा करूँगा, जैसा कि मैं पहले करता था।"
“तो, आपकी पत्नी को संभोग सुख नहीं मिला, और आप दोषी महसूस कर रहे थे," डॉ. वर्मा ने अनुमान लगाया। मैंने होंठ चाटे। "और उसके कहने के तरीके से मुझे एहसास हुआ कि यह पहली बार नहीं था जब मैंने उसका ख्याल नहीं रखा था। मुझे एक गधे जैसा लगा।"
"क्या आपने उससे इस बारे में बात की?"
मैं आत्म-ग्लानि में हंसा। "चलो, डॉक्टर, मैं एक मजबूत पुरुष हूँ, हम ऐसी बातों के बारे में बात नहीं करते।" डॉक्टर ने गंभीरता से सिर हिलाया। "नहीं डॉक्टर। मैंने उससे इस बारे में बात नहीं की," मैंने उदास होकर कहा। "मुझे लगा जैसे उसने मुझे अभी-अभी बताया हो कि मैं एक घटिया प्रेमी था, और शायद इसीलिए... मैंने अतिथि कक्ष में सोना शुरू किया।"
"क्या उन्होंने सचमुच ऐसा कहा था?"
"नहीं, नहीं" मैंने चिल्लाकर कहा। "नहीं। उसने नहीं कहा। प्रियंका... वह बहुत प्यारी है। यह सब मेरी गलती थी। मुझे अपराध बोध हो रहा था, और मैं जानता था कि अगर मैं उसके साथ बिस्तर पर गया, तो मैं फिर यही करूंगा। मैं उसके साथ अपने आप को रोक नहीं सकता। मेरे दोस्त शिकायत करते हैं कि उनकी पत्नियाँ उन्हें उत्तेजित नहीं करती हैं, और वे किसी अजनबी के साथ यह करना चाहते हैं। मैं उनकी बात बिल्कुल नहीं समझ पाता। मैं प्रियंका को देखता हूँ, और उत्तेजित हो जाता हूँ।" डॉ. वर्मा पीछे झुक गए मानो वे मेरे कुछ और कहने का इंतजार कर रहे हों और दुर्भाग्य से और भी कुछ हुआ। यह गड़बड़ मैंने खुद ही की। "मुझे संदेह था कि वह खुश नहीं थी, और शायद इसीलिए वह संतृप्त नहीं हुई। मैं हमारे बीच बढ़ती दूरी को महसूस कर सकता था। अलग-अलग सोना इसका सामना करने से ज़्यादा आसान लग रहा था।"
"प्रियंका जी के जाने के बाद से आप कहाँ सो रहे हैं?"
मुझे लगा कि मेरी आँखों में आँसू आ गए हैं। "बिस्तर के उसकी वाली तरफ़।"
“क्यों?” डॉ. वर्मा ने पूछा, उनका स्वर सहानुभूति पूर्ण किन्तु साथ ही जांच पूर्ण था।
"क्योंकि मैं वहां उसकी गंध महसूस कर सकता हूं, और मैं कम अकेला और अधिक सुरक्षित महसूस करता हूं।" मैंने हाउस कीपर से कहा था कि चादरें न बदलें। मैं अपनी प्रियंका को यथासंभव लंबे समय तक अपने पास रखना चाहता था।
"अंशुमन, यह तो बिल्कुल स्पष्ट है कि आप अपनी पत्नी से प्यार करते हैं।"
"बहुत ज़्यादा," मैंने भर्राई हुई आवाज़ में कहा। "बहुत-बहुत, बहुत ही ज़्यादा।"
"आपको क्या लगता है कि इस प्यार के बावजूद आप उनके साथ ऐसा व्यवहार क्यों करते आ रहे हैं, जिसके बारे में आपके आस-पास के सभी लोग सोचते हैं कि यह उन्हें दूर भगाने के लिए किया गया था?" पिछले कुछ सप्ताहों से मैं इस विषय में बहुत सोच रहा था, जब से मेरी पत्नी चली गयी थी। पहले तो मुझे लगा कि वह नाटकीय हो रही है। फिर मैंने खुद को यकीन दिलाया कि वह किसी भी दिन वापस आ जाएगी। लेकिन, आखिरकार, मैं खुद के साथ ईमानदार हो गया कि मैं एक पति और एक आदमी के रूप में कौन था।
"जब हमारी शादी हुई तो मुझे डर था कि वह मेरे लिए एक गलत पत्नी है। मुझे उम्मीद थी कि एक दिन मोह भंग हो जाएगा और मैं उसे तलाक दे दूंगा।" यह याद करके मुझे हमेशा खुद से नफरत होती थी। "मैं उसे तलाक नहीं देना चाहता था, डॉक्टर। मैं उससे प्यार करता था, तब भी। लेकिन…... " .....
"लेकिन?"
मैंने आह भरी, "लेकिन, प्रियंका गलत समाज से है, और मैं राव-सिन्हा खानदान का हूँ।" उन्होंने सिर हिलाया, लेकिन कुछ न कहा, वे जानते थे कि मुझे अभी बहुत कुछ कहना है। "मेरी माँ उससे घृणा करती थी। पहले दो साल तो मुश्किल भरे थे, लेकिन फिर प्रियंका ने," मैं मुश्किल से शब्द निकाल पाया, "उनके अनुरूप होकर चुप रहना शुरू कर दिया।" मैंने अपनी प्यारी, मासूम, प्यारी पत्नी को अपनी माँ के क्रूर हाथों में छोड़ दिया था, जिनसे मैं भी डरता था, क्योंकि मैं कायर था। उस सारी दबंग आदमी वाली बातों और बकवास के बावजूद, मैं एक असफल व्यक्ति था जिसने अपनी पत्नी को अपनी माँ के नीचे रहने दिया। मेरी माँ, जो किसी से प्यार करने या देखभाल करने का अर्थ भी नहीं जानती थी।
"मुझे बताओ कि इस समय तुम्हारे साथ क्या हो रहा है?" डॉ. वर्मा ने पूछा।
मैंने उन की ओर देखा, मेरे गाल आँसुओं से भीगे हुए थे। "मुझे खुद से नफरत है।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैंने अपनी पत्नी को उसके हाल पर छोड़ दिया था। क्योंकि मैंने उसे मजबूर किया कि वह मेरे लिए जिए, मेरी ज़रूरतें पूरी करे, लेकिन उससे कभी नहीं पूछा, एक बार भी नहीं पूछा, कि उसे क्या चाहिए।" जब भी हम बहस करते, मैं उस पर झल्लाता, "मैंने तुमसे शादी की है, है न? तुम और क्या चाहती हो?" जैसे मैंने उसे अपनी पत्नी बनाकर उस पर सबसे बड़ा एहसान किया हो।
"क्यों, अंशुमन? आप एक सभ्य आदमी हैं। आप अपने बच्चों से प्यार करते हैं, उनकी देखभाल करते हैं। आपका उनके साथ एक सच्चा और प्रामाणिक रिश्ता है। आपका अपने भाई के साथ भी अच्छा रिश्ता है। प्रियंका जी में ऐसा क्या था जो आपको —"
"मुझे दोषी महसूस हो रहा है," मैंने अचानक कहा। "ठीक है? और मैं दोषी हूँ। मुझे पता था कि उसके साथ क्या हो रहा था, लेकिन तब मुझे लगता था कि वह इसी के लायक थी। उसने उस समाज से आकर भी मुझ जैसे शहजादे को प्यार मेँ फंसा कर मुझसे से शादी कर ली; उसकी उसे कीमत चुकानी ही थी।" अब मैं इस बात से शर्मिंदा था, लेकिन एक समय था जब मैं, अपनी माँ की बातों से प्रभावित था और सच मेँ ऐसा ही सोचता था।
"क्या आप ने कोई कीमत चुकाई?"
मैंने सिर हिलाया। "मैं तो जैसे सोने की खान में गिर गया था। मुझे सबसे अच्छी पत्नी मिली जो एक आदमी चाह सकता है। मेरे बच्चों को एक बहुत प्यार करने वाली माँ मिली जिसने उन्हें बेहतर करने के लिए प्रेरित किया लेकिन कभी भी उन्हें चोट नहीं पहुँचाई, उनका अपमान नहीं किया, जैसा कि मेरे माता-पिता ने किया था। जैसा मेरे आस पास कई पत्नियाँ करती हैं। वह मेरे लिए हमेशा मौजूद थी। सिर्फ़ बिस्तर पर ही नहीं बल्कि हर जगह। वह मेरी सबसे अच्छी दोस्त है, डॉक्टर, लेकिन मैं उसका दोस्त नहीं रहा हूँ।" डॉ. वर्मा ने टिश्यू का डिब्बा मेरी ओर बढ़ाया और इस स्थिति का निचोड़ सोच कर मुझे हंसी आ गई। एक मनोचिकित्सक के दफ़्तर में रोना! लेकिन मुझे शर्मिंदगी महसूस नहीं हुई। नहीं, मुझे लगा... मुझे हल्का पन महसूस हुआ। "मैंने उसे खुद को सम्हालने के लिए छोड़ दिया क्योंकि मैं नहीं जानता था कि उसे कैसे खुश किया जाए, और मैं सीखना भी नहीं चाहता था। उसे टालना, हमारी समस्याओं को टालना, यह स्वीकार करने से कहीं अधिक आसान था कि मैंने एक पति के रूप में उसे निराश किया है" मैंने स्वीकार किया, शब्दों का वजन मेरे पेट में पत्थरों की तरह था।
डॉ. वर्मा ने फिर से ऊपर देखने से पहले अपने नोट्स में कुछ लिखा। "जब चीजें वास्तविक हो जाती हैं, तो बच निकलना ही आपकी आदत रही है। आपने अपने माता-पिता के साथ ऐसा किया, आप प्रियंका जी के साथ भी ऐसा कर रहे हैं, और मुझे यकीन है कि आप अपने जीवन में हर रिश्ते के इर्द-गिर्द इसी तरह बचते बचाते जीते हैं। लेकिन समस्या यह है कि यदि युद्ध मेँ आप पर्याप्त गोलियों से बच निकलते हैं, और आप खुद को युद्ध क्षेत्र में अकेला पाएंगे। अगर आप प्रियंका जी के साथ चीजों को बचाने का कोई मौका चाहते हैं, तो आपको स्क्रिप्ट को पलटना होगा। स्थिति का सामना करना होगा। अपनी सारी बातें कहनी होंगी, और फिर चुप होकर उनकी बात भी सुननी होगी - वास्तव में सुननी होगी, कि ‘वह’ क्या कह रही हैं। भागना नहीं, छिपना नहीं। सामना करना होगा। अगर आप प्रियंका जी के साथ चीजों को सच मेँ बचाने का कोई मौका चाहते हैं, तो।”
"मैं उसे फिर से कैसे पाऊँ?" मेरी आवाज़ में हताशा थी। "मैं उसे वापस कैसे जीतूँ?"
"अब, अंशुमन, स्पष्ट है कि आप एक लक्ष्य-उन्मुख व्यक्ति हैं, और आप अपनी मंजिल तक पहुँचना चाहते हैं और अपनी पत्नी को वापस जीतना चाहते हैं" उन्होंने एक छोटी सी मुस्कान के साथ कहा। "लेकिन आपको अपनी मानसिकता बदलनी होगी। आप प्रियंका जी को खुश नहीं कर सकते। केवल वह खुद को खुश कर सकती हैं - आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि आप की तरफ से उसे कोई दर्द न हो, ताकि वह अपनी खुशी तक पहुँच सके। इसका कोई त्वरित समाधान नहीं है।"
"मुझे इस बात का डर था," दुखी होकर मैंने मज़ाक करने का प्रयास किया।
"अंशुमन, ऐसा नहीं है कि आपकी शादी के सभी बीस साल बुरे रहे हों। अच्छे समय भी होंगे?
मैंने अपना सिर हिलाया और फिर कंधे उचका दिए। "मेरे लिए तो अच्छे थे। प्रियंका के लिए? मुझे नहीं पता।"
"मैं जो देख सकता हूँ, और यह सच है कि यह हमारा पहला सेशन है, आपके बीच अच्छे और बुरे दोनों ही दौर रहे हैं। मुझे लगता है कि बुरे से ज़्यादा अच्छे दौर तब तक रहे जब तक कि आपके बच्चे चले नहीं गए। आप दोनों खाली घोंसले वाले पंछी हो गए और अपने रिश्ते को बनाए रखने के लिए ज़रूरी प्रयास नहीं किया। आपके बच्चों ने सहज रूप से आप दोनों के बीच दरार को देखा और आपका पक्ष ले लिया।" मैंने अपने हाथ में इस्तेमाल किए गए टिशू को कुचल दिया। जिस चीज को टूटने में सालों लग गए थे, उसे कुछ दिनों में ठीक नहीं किया जा सकता था। मुझे यह पता था। लेकिन रिश्ता ठीक करने के हम दोनों मेँ यह करने की इच्छा होनी चाहिए। और मुझे डर था कि उसमें वह इच्छा नहीं बची है। मुझे नहीं पता था कि अगर वह रिश्ता वापस नहीं जोड़ना चाहती, तो मैं क्या करता।
डॉ. वर्मा ने आगे कहा, "यदि आप अपनी पत्नी को वापस लाना चाहते हैं तो इसकी शुरुआत उनकी ज़रूरतों, इच्छाओं और चाहतों को समझने से होगी। आपको उन्हें विश्वास दिलाना होगा, और करके भी दिखाना होगा कि आप प्रतिबद्ध हैं। सच तो यह है कि आप अपनी पत्नी को खुश नहीं कर सकते और न ही वह आपको खुश कर सकती हैं। खुशी हमारे भीतर से आती है। आपको जिस चीज़ पर ध्यान केंद्रित करने की ज़रूरत है, वह है बिना क्रोधित हुए एक-दूसरे की बात सुनना, सीखना, एक-दूसरे की ज़रूरतों को सही मायने में सुनना और समझना, और उन्हें पूरा करने के लिए मिलकर काम करना।"
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