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शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

multiply fast mentally vedic maths

Well - most of us want our kids to multiply fast WITHOUT calculators, specially kids in 7th to 10 standards, where they need to multiply big numbers but no calculators; let them try these. today i am discussing 2 digit by 2 digit. next post will be 3 by 3 digit.
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2 digit x 2 digit

       37                                  *   *    
    x 45                                  *   *
   -----
---------------------------------------------------
step 1: first place line vertical, keep carry a little down to remember to add it to next step answer;

       37                                  *     *
                                                 |
    x 45                                  *     *     (7x5 = 35 )
   -----                                                 (write 5 in place and 3 little below for carry to next step) 
       35

step 2: 
crosswise; add previous place carry; 
keep new carry a little down to remember to add it to next step answer;
       37                                  *      *                     3 7
                                               X
    x 45                                  *      *                     4 5        
   -----                                                           (3x5=15)+(7x4=28)+(previous carry 3)= 46 
      465                                                           (write 6 in place and 4 little below for carry to next step)
   
 step 3: second place line vertical, add previous place carry; 

       37                                  *   *
                                          |
    x 45                                  *   *               (4x3=12) + (4 from previous carry)= 16        
   -----
   1665

well - check with your calculator - is that the right answer ?

you can do these for practice --- 
   98
x 43
-----

74 x 56 ;              38x84 ;......

for doing 2 digit x 1 digit they can append a zero to tens place, or do as they already do it....


tomorrow - 3 digit multiplication

गुरुवार, 2 जनवरी 2014

yogi patanjali non-violence osho

पतंजलि सूत्र :

जब योगी पूर्णतः योग में डूब जाता है तब उसके पास की सम्पूर्ण सृष्टि अहिंसक हो जाती है :

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योगी भर ही तो योगी है -
आस पास की सृष्टि तो नहीं ?
फिर यह सूत्र क्या कह रहा है ?
यदि ऐसा है तो क्यों ,
जीज़स को सलीब और ,
सुकरात को जहर मिला ?
वे लोग जो इन योगियों के समीप थे ,
क्यों अहिंसक न हुए ?
क्या जीज़स या सोक्रेट्स ,
सनातन सत्य प्राप्त -
सच्चे योगी नहीं थे ?

क्यों लोगों ने महावीर और ,
बुद्ध पर लगाए लांछन ?
क्या उन्होंने आत्मबोध को नहीं पा लिया था ?

क्यों हुए कृष्ण और राम जैसे ,
ब्रह्मज्ञान युक्त योगियों के  ,
आस पास इतने भयंकर युद्ध ?
क्या यह सूत्र झूठा है ?

न - पतंजलि सिद्ध योगी हैं ,
उनका सूत्र झूठा कैसे हो सकता है ?
फिर ?

हाँ - सुना है यह भी हमने ,
कि जब मीरा को आया था,
विष का प्याला ,
तो विष ने अपना स्वभाव बदल ,
खुद को अमृत कर लिया था ,
और सांप ने स्वयं को बदल दिया
पुष्प माला में ।

सुना है मैंने कि ,
देवव्रत ने बुद्ध पर ,
बड़ा शिलाखंड गिरवाया था ,
लेकिन ठहर गया था शिलाखंड ,
बुद्ध को छूने से पहले ,
अपने स्वभाव के विपरीत ।

जब बुद्ध पर पागल हाथी लपकाया गया ,
तो वह शांत भाव से हुआ ,
चरणों की शरण।

सुना है बहुत कुछ जो ,
हुआ इन सिद्ध योगियों के निकट ,
जो सृष्टि के स्वाभाविक ,
नियमों के विरुद्ध हुआ ,
लेकिन ,
इन्हे चमत्कार मान लिया गया।

सुना मैंने यह भी है कि ,
एक व्यक्ति ने ,
लाखों लोगों के सामने ,
एक प्रयोग किया था ,
एक सांड के दिमाग में ,
बिठाया एक इलेक्ट्रोड ,
उसे बटन दबा कर क्रोधित किया गया ,
और वह लपका व्यक्ति को मारने ,
फिर कुछ फीट की दूरी पर ,
दूसरा बटन ,
और क्रोधित सांड एकदम शांत हुआ ,
आशंकायें मुस्कुराईं और ,
व्यक्ति को कुछ न हुआ।

तो क्या योगी के आस पास ,
निर्मित होता है कोई तेजमण्डल?
जो ऐसा ही कुछ प्रभाव करता है ,
आस पास की निर्जीव सजीव सृष्टि पर ?

जो पत्थर हैं और हैं पशु ,
उनके मस्तिष्क ,
स्वाभाविक हैं।
तो उनपर असर करता है ,
सतयोगी का प्रभा मंडल ,
वे आईने हो जाते हैं और ,
उनमे दिखती है योगी की ,
शांत छवि।
वे सम्पूर्ण अहिंसक हो जाते हैं।
उनका स्वभाव स्व न रह कर  ,
योगी स्वभाव का प्रतिरूप हो उठता है ,
योगी उन्हें नहीं बदलता ,
उनके आईने साफ़ होने से ,
वे स्वयं योगी का,
प्रतिबिम्बन करने लगते हैं।

लेकिन मानव ?
अनेकों आइनों पर धूल पड़ी है।

जो शांत और खुले मनुष्य हैं ,
वे ऐसे योगी के समीप ,
शांत हो जाते हैं ,
सम्बोधि भी प्राप्त कर लेते हैं।

लेकिन जिनके आईने धूलि धूसरित हैं ,
वे बिम्ब नहीं बनाते ,
वे स्वयं ही धूल में लिपटे ,
चुनाव करते हैं ,
हो वह हिन्दू आस्थाओं की धूल ,
या मुस्लिम ईमान की ,
धारणाओं में लिपटे मानव ,
प्रकाश को स्वयं तक आने ही नहीं देते।

यीशु का प्रेम सन्देश ,
तोते की तरह रट लेने वाले ,
नहीं मान सकते ,
युद्ध को उकसाते कृष्ण को ,
योगी।

और ,
धर्म के नाम पर
निरीह जीवों और जनों की ,
हत्या करना सीखे लोग ,
नहीं मान सकते महावीर के ,
अहिंसा के सन्देश को।
तो वे महावीर को,
योगी मान ही नहीं सकते।

अपने मानक योगी के ,
अपने विश्वासों के विरुद्ध हुई बातो के ,
तर्कसंगत औचित्य ढूंढ लेते हैं।
और दूसरे विश्वासों के योगियों के ,
वे नरक भेज देते हैं ,
अपने मानस मंडल में।

वे कृष्ण को मानें तो ,
रासलीला के अनेक तर्कसंगत कारण ,
गिना देते हैं क्योंकि ,
उनके आईने की धूल कहती है ,
कि योगी नहीं कर सकता रासलीला।
क्योंकि उनकी धूल के अनुसार तो ,
शारीरिक प्रेम सिर्फ पाप है।
फिर वे अपने मन में ही ,
अपने ईश्वर को - ढाल लेते हैं ,
और
उसके आस्था के विरुद्ध दीखते कर्मों के ,
कारण आरोपित करते हैं।

योगी यदि पूर्ण रूपेण ,
यॊगस्थित हो ,
तो अहिंसक हो जाती है उसके ,
उपवास करने वाली सम्पूर्ण सृष्टि।

कृष्ण की गोपिकाएं नाचने लगती हैं ,
सिंह और छौने संग आ जाते हैं।
अग्नियाँ शीतल हो जाती हैं ,
सीता के गुजरने के लिए।

राम के वनमार्ग के ,
कठोर कंटक कोमल पुष्प हो उठते है
तैरने लगते हैं सागर पर पत्थर।

मोज़ेस के संग जाते ,
ईजिप्शियनों से बच भागते ,
इज़राइलियों के लिए ,
सागर राह देता है ,
और उनके जाते ही ,
फिर पूर्ववत हो उठता है।

कृष्ण के स्पर्श से ,
कुब्जा सीधी हो उठती है ,
गुरुनानक जिधर पैर करें ,
उसी ओर ,
दीनवालों को काबा दीखता है।

लेकिन धूलभरे मानव आईने ,
अपने विश्वासों की धूल लिए ,
योगी के प्रकाश की ऊर्जा को ,
प्रतिबिंबित नहीं करते।
वे उसे ,
क्रोधाग्नि की ऊर्जा में ,
रूपांतरित कर लेते हैं ,
और करते हैं योगी पर हमले।

योग सूत्र सच ही है ,
किन्तु परन्तु  लेकिन ....

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ओशो रजनीश के वचनो से











रविवार, 10 नवंबर 2013

self aware robots and machines 1


आज एक मजेदार कहानी शेयर कर रही हूँ रोबोटिक जनरेशन्स के बारे में।  असल में यह पोस्ट बहुत दिनों से मेरे मन में थी।  फेसबुक पर एक दिन आशीष श्रीवास्तव जी ने यह पूछा था की क्या मशीनें "सेल्फ अवेयर" हो सकते हैं।  तब से यह पोस्ट मेरे मन में थी।

एक बड़ी मजेदार कहानी है - लेकिन यह कहानी नहीं सच है :) रोबोट्स को सोचने समझने लायक बनाने के लिए बढे क़दमों में से तीन कदम आपके साथ आज शेयर करती हूँ :)

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मिस्टर एक्स नामक रोबोट जी को लोगों से बातचीत करना और सोचना सिखाया गया । उन्हें हर सोच के बाद कार्य करने से पहले "दो रूल" सिखाये गए  (ये दोनों रूल हर रोबोट कि रीड ओनली मेमोरी में होते हैं - जिन्हे हटाया या बदला नहीं जा सकता - आपको याद होगा की रोबोट पिक्चर में रजनीकांत के रोबोट कि मेमोरी चिप ही बदल दी गयी थी )

१. किसी इंसान को नुक्सान न पहुंचाओ (चाहे ऐसा हुक्म भी दिया जाए) ;
    यदि हो रहा हो तो मनुष्य को हो रहे नुक्सान को रोको
    (- यदि यह दुसरे इंस्ट्रक्शन के विरुद्ध न हो रहा हो तो ही )
२. अपने आप को नुक्सान न पहुंचाओ और अपने आप को हो रहे नुक्सान को रोको
    (- जब तक यह रूल एक के विरुद्ध न हो रहा हो।  )
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तो अब आगे कि कहानी।
मिस्टर एक्स को बताया गया कि जिस कमरे में उनकी बैटरी (रोबोट का जीवन बैटरी से ही है , बैटरी ख़त्म तो जीवन ख़त्म) रखी है उस कमरे में एक बम है।  रोबोट के सोचने की प्रक्रिया (ब्रेन) ने analysis किया तो पाया कि यदि बैटरी को बचाया न जाए तो मेरी ज़िन्दगी ख़त्म।  तो उसने निष्कर्ष निकाला कि कमरे से बम को बाहर निकालना आवश्यक है।  तो एक्स कमरे में गया, वहाँ उसने बम को वहाँ रखी एक ट्रॉली पर रखा और ट्रॉली को बाहर खींच लाया और दूर हट गया।

क्या समस्या सुलझा पाया रोबोट ?

:(
नहीं
:
:
:

क्योंकि जिस ट्रॉली पर वह उस बम को लाड कर बाहर खींच लाया वह ट्रॉली वह थी जिस पर बैटरी रखी थी।  बेचारा मिस्टर एक्स :(
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अगले जनरेशन के रोबोट की कहानी अब
मिस्टर वाय नामक रोबोट को अपनी की हुई गतिविधियों का कमरे के सामान पर होने वाले असर को भी analyse करना सिखाया गया और फिर उसे भी वही समस्या दी गयी।

इन्होने भी यही निर्णय निकाला कि बैटरी कमरे से निकाली जानी चाहिए।  फिर उसने analyse किया कि इस से कमरे पर क्या असर होगा।  तो उसने पाया की  इससे कमरे की दीवारों , फर्श खिड़कियों आदि पर कुछ भी फर्क नहीं पड़ेगा।  हाँ कमरे की स्पेस कुछ बढ़ अवश्य जायेगी और कार्पेट एरिया का खुलापन ट्रॉली जितना बढ़ जाएगा।  इससे न रूल एक न रूल दो टूटेगा।

तो मिस्टर वाय ने भी बम को ट्रॉली पर रखा और कमरे से बाहर ले आये :( अंजाम वही हुआ जो एक्स का हुआ था।

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अब जेड नामक रोबोट को यह सब सिखाया गया कि जो पहले वाले दोनों को सिखाया गया था।  इसके अलावा एक और रूल दिया गया
"ignore inconsequential details about the room "

और फिर जेड जी को भी यही समस्या दी गयी।
कुछ समय गुज़र जाने के बाद बम फूटने का समय पास आने लगा और जेड ने कुछ किया ही नहीं।  वैज्ञानिक रचयिता चिंतित होने लगे  . उन्होंने रोबोट जेड को query भेजी कि क्या हुआ - तुम्हारी बैटरी के कमरे में बम है - तुम्हे यह पता है - तुम कुछ करते क्यों नहीं ??????

उत्तर आया :

:
:
:
कर रहा हूँ न - मैं कमरे के बारे में हज़ारों inconsequential details को इग्नोर करने में बिज़ी हूँ - जिनमे यह भी एक डिटेल है की एक कमरे में एक बम रखा है - क्योंकि इससे रूल एक दो या तीन किसी के अंतर्गत कोई परेशानी नहीं .......

………

:) :) :)
फिर मिलेंगे :)

बुधवार, 11 सितंबर 2013

दूर संचार भाग २

पिछली पोस्ट में हम ने टेलीफोन पर बात की।  इस बार हम अपने घर पर रखे टीवी पर पिक्चर कैसे बनती है और चलती फिरती दिखती है इस पर एक नज़र डालते हैं।

बिलकुल पुराने टीवी पर चलते हैं। जब एशियन गेम्स के समय मैं छोटी सी थी तब हमारे शहर में नया नया टीवी आया था।  हमारे घर में तो खैर बहुत बाद में आया लेकिन टीवी तो आ गया थे - जान गए थे कि एक डब्बा होता है जिसमे फ़िल्मी गाने सुनाई नहीं बल्कि दिखाई देते हैं - फिल्मे भी दिखती हैं चलती फिरती।  बड़ी चकित होती थी मैं , और सोचती थी ये लोग कैसे इतने सारे डब्बों में एक साथ एक जैसे स्टेप्स पर नाचते गाते बोलते दिखते हैं ? आइये देखें यह कैसे होता है।

यह कंप्यूटर मॉनिटर भी एक स्क्रीन है, जिसपर आप ये अक्षर पढ़ रहे हैं।  नीचे यह इमेज देखिये।


यहाँ दो टीवी दिख रहे हैं।  पहले में रंगीन पट्टियाँ  हैं और दुसरे में एक काला सफ़ेद मुस्कुराता चेहरा।  आपने शायद कभी यह सोचा हो कि टीवी पर यह बनते कैसे हैं ? इसी पर आज की यह पोस्ट होगी : * पहले ब्लेक एंड वाइट पर चित्र कैसे बनता है  . 

अगले भाग में फिर कलर टीवी और फिर यह कि ये चित्र चलते फिरते कैसे दिखते हैं।  

हिंदी की कई टर्म्स मुझे नहीं आती हैं,  हिंदी की गलतियाँ माफ़ हों।  :) पहले आपको CRT  के बारे में बताती हूँ।  इंट्रेस्टिंग है - मुझे लगता है आप बोर नहीं होंगे।  :)

पुरानी टेक्नोलोजी के टीवी CRT पर चलते थे, और तब के कम्प्यूटर स्क्रीन भी।  ऐसा ही कुछ अभी भी अस्पताल के मोनिटर्स या हमारे ओफ़िसेज़ के पुराने कम्प्यूटर्स में दीखता है।  आपने ज़रूर ध्यान दिया होगा कि उन टीवी स्क्रीन्स के पीछे एक काफी गहरा डब्बा होता था।  जो टीवी चलते हुए गर्म भी काफी हो जाता था।  यह डब्बा CRT है - cathode ray terminal .

इस डब्बे के भीतर बहुत ज्यादा वोल्टेज का (+) और (-) टर्मिनल है (जैसा आप रिमोट कंट्रोल्स में प्रयुक्त होने वाले पेंसिल सेल में देखते हैं ) . इनमे से (+) को अनोड और (-) को कथोड कहते हैं /

टीवी के भीतर का (+) हमारे टीवी का आगे का जो कांच का स्क्रीन है (जिस पर हम पिक्चर्स देख पाते हैं ) वहां कनेक्टेड है और (-) सबसे पीछे की ओर।  यह ठीक किसी टोर्च के पीछे की और लगी इलेक्ट्रिक प्लेट और आगे लगी नन्ही बल्ब की तरह है।  जब हम टोर्च का बटन दबाते हैं तो पीछे से आगे का सर्किट पूर्ण होता है जिससे बिजली दौड़ने लगती है और बल्ब चमकता है।  लेकिन टोर्च से समरूपता यहीं ख़त्म हो जाती है।  इसके आगे टोर्च जैसा कुछ नहीं होता।

पहली बात तो यह कि टोर्च के भीतर बिजली तारों में दौड़ती है लेकिन टीवी की ट्यूब में पूरा vaccuum है।  जैसा कि हम जानते ही हैं - करंट तब ही दौड़ सकता है जब उसे तार या कोई और मेटल आदि कंडक्टर मिले।  लेकिन vaccuum या रिक्तता में बिजली नहीं दौड़ सकती।  फिर ? :)

फिर यह कि  टीवी के कथोड को हीटर से गर्म करते हैं जिससे इलेक्ट्रोन गर्मी के मारे बेचारे निकल भागते हैं।  इसे thermal emmission  कहते हैं।  ये जो इलेक्ट्रोन  र्म कथोड से बाहर आये वे स्कुल से घर की छुट्टी पर निकले बच्चों की तरह फ्री हैं - ये वहीँ इकट्ठे रहेंगे यदि इन्हें कोई न बुलाये।

आपको याद होगा कि मैंने पहले ही कहा था कि टीवी का कांच का स्क्रीन (+) से जुड़ा  हुआ है। और कथोड  (जिससे इलेक्ट्रोन निकले हैं) वह (-) से जुड़ा हुआ है।  तो ये स्कूल से छूटे बच्चों जैसे इलेक्त्रोन जैसे बच्चे स्कूल से दूर घर की और खिंचाव महसूस करते हैं वैसे ही ये इलेक्ट्रोन भी खुद निगेटिव हैं तो ये (-) कथोड से दूर (+) अनोड , यानी कि टीवी स्क्रीन की और दौड़ने लगते हैं।


यह इस चित्र में देखिये :

यह जो पूरा बंद ट्यूब दिख रहा है यह कांच का ट्यूब समझ लीजिये जिसके भीतर की हवा खींच कर vaccuum बना दिया गया है।  सबसे पीछे जो भीतर लाल रंग का अरेंजमेंट है वहां हीटर और काथोड हैं।  हीटर से गर्म हो कर जो इलेक्ट्रोन बाहर आये हैं वे नीले रंग में दिख रहे हैं।  ये इलेक्ट्रोन  किरणों की तरह सीधी रेखा में स्क्रीन (अनोड ) की तरह जाएँ इसके लिए उन्हें फोकस करना है - जिसके लिए एक्सिलरेटिंग और फ़ोकसिंग अनोड मदद करते हैं।

यह इलेक्ट्रोंन किरणें बहुत हाई वोल्टेज से खिंचती हुई अनोद (स्क्रीन) की तरफ दौड़ रही हैं।

इसके आगे लगी हैं हॉरिजॉन्टल डिफ्लेक्टिंग प्लेट्स ।  इन हॉरिजॉन्टल डिफ्लेक्टिंग प्लेट्स मे वोल्टेज क्रमशः कम से अधिक होता रहता है जिससे ये इलेक्ट्रोन  किरणें कभी उलटे हाथ को और कभी सीधे हाथ को खिंचाव महसूस करती हैं - लगातार इस खिंचाव के प्रभाव से दिशा बदलती हैं।  ये बहुत तेज़ हैं और दायीं बायीं और घूम तो जाती हैं लेकिन आगे बढती जाती है। इस कारण ये उलटे हाथ से सीधे हाथ की तरफ बहुत तेजी से स्क्रीन को कवर करती हैं।  इससे कुछ कम गति से वेर्टिकल डिफ्लेक्टिंग प्लेट्स लगातार किरणों को ऊपर से नीचे की तरफ दौडाती रहती हैं ।  तो किरणें स्क्रीन पर एक जगह न पड़ कर, लगातार, उलटे हाथ से सीधे की तरफ और साथ ही ऊपर से नीचे की तरफ बढती रहती हैं।  कुछ ऐसे :

इस तरह से बड़ी तेज़ी से पूरी स्क्रीन किरणों द्वारा स्केन होती है - जिसे रास्टर सकेन कहते हैं। 

स्क्रीन के कांच की भीतरी तरफ एक फोटो सेंसिटिव मटेरियल पुते हुए है , जो तेज़ गति से आते इलेक्ट्रोन की ऊर्जा सोख कर चमकता है।  जिस बिंदु पर उस वक्त किरण पड़ रही है सिर्फ वही बिंदु चमकता है, लेकिन यह इतनी तेज़ी से रिपीट होता रहता है लगातार, कि हमारी आँखें भ्रम में पड़ जाती हैं, कि पूरी स्क्रीन लगातार चमक रही है।  यदि आपने कभी किसीके फोटो तेज़ स्पीड शटर वाले केमरा से टीवी के आगे खींचे हों , तो आप देखेंगे कि उसमे स्क्रीन का कुछ ही भाग रोशन है - क्योंकि जितनी देर केमरा का शटर खुला था , उतनी देर में सिर्फ उतने ही भाग को किरणों ने स्कैन किया।  इसे ऐसे समझिये कि जैसे छत पर घूमता पंखा हमें ऐसे आभास देता है कि पूरे सर्कल में पंखा लगातार मौजूद है , असल में तो पंखे के ब्लेड्स एक समय में एक ही जगह हैं - किन्तु तेज़ी से घूम रहे होने से आँखों को निरंतरता का भ्रम होता है।  कभी रात को अँधेरे में लाइट बंद कर के टीवी की रौशनी में पंखे का घूमना देखिये - कुछ अलग स्पीड दिखेगी।  

अब यह होने से तो पूरी स्क्रीन बराबर चमकनी चाहिए न ? फिर ? चित्र कैसे बनेगा ?

फिर से CRT  का चित्र देखिये।  कथोड  के आगे एक ग्रिड है।  इस ग्रिड में तस्वीर के अनुसार वोल्टेज कम ज्यादा करने से इलेक्ट्रोन बीम की गति कम ज्यादा होती है।  जितनी कम गति उतनी कम ऊर्जा - उतनी कम चमक स्क्रीन पर - इसके लिये ग्रिड को थोडा निगेटिव वोल्टेज देंगे जिससे इलेक्ट्रोन बीम की गति कम हो। इससे उलट - यदि ज्यादा चमक चाहिए तो गति बढाने के लिए ग्रिड को अधिक पोजिटिव वोल्टेज दिया जाएगा।  

रास्टर स्केन की गति के अनुसार हमें यह पहले से पता है कि समय के किस बिंदु पर बीम स्क्रीन के किस स्थान पर गिरेगी।  उस बिंदु पर सफ़ेद रंग देखना हो, तो अधिकतम पोजिटिव वोल्टेज , पूरा काला बिंदु देखना हो तो पूरा निगेटिव वोल्टेज , और बीच का कोई ग्रे शेड देखना हो तो उस हिसाब का वोल्टेज ग्रिड को देते हैं।

जैसे ऊपर की टीवी पिक्चर में पहली दो तिरछी रेखाओं में ग्रे रंग है, …… तीसरी रेखा में पहला तिहाई भाग ग्रे फिर काला बिंदु। ……. फिर ७-८ ग्रे बिंदु  ……. फिर से एक काला बिंदु और। …… फिर एक तिहाई भाग फिर से ग्रे है।

हमारे भारत में स्क्रीन पर ६२५ हॉरिजॉन्टल रेखाएं हैं, और हॉरिजॉन्टल वर्टिकल अनुपात ४:३ का है।  HDTV में यह अनुपात १६:९ का होता है।  अमेरिका में पहले रेखाएं ५२५ होती थीं, भारत जापान आदि में ६२५। अर्थात भारत में एक रास्टर स्क्रीन में (६२५) x (६२५ x  ३ / ४ ) अलग अलग बिंदु हैं -जिनमे से हर एक बिंदु को काला सफ़ेद या ग्रे देखा जा सकता है, उस समय ग्रिड को अलग अलग वोल्टेज दे कर।

आपके इलेक्ट्रोनिक केमरा में इससे ठीक उलटी प्रक्रिया होती है।  रास्टर स्कैन तो वही होता है - लेकिन पड़ती हुई रौशनी के अनुसार स्क्रीन पर लगा फोटो सेंसिटिव पदार्थ अलग अलग वोल्टेज पैदा करता है - जो बाद में टीवी की ग्रिड को उसी क्रम में दिए जाते हैं।

अब बहुत हुआ - आगे रंग और चलती फिरती तस्वीरों की तकनीक अगली पोस्ट में।  अभी बताऊंगी तो आप बोर हो जायेंगे।

फिर मिलते हैं :)

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

दूर संचार भाग १

इस श्रंखला की भी बड़े दिनों से प्लानिंग चल रही है। अन्य श्रंखलाओं की तरह यह भी अधूरी न रह जाय इस आशा से शुरुआत कर रही हूँ।

:)
:(
 :)

हम सब सॅटॅलाइट कम्युनिकेशन शब्द से परिचित हैं । हम टीवी देखते हैं - जी टीवी , स्टार प्लस आदि सेटेलाईट चेनल कहलाते हैं। इन पर केबल ओपरेटर को एक निश्चित दिशा में एंटीना रखने पर सिग्नल मिलने की बात होती है। फिर आजकल डायरेक्ट टू होम टीवी हैं  । जासे टाटा स्काई  , डिश टीवी आदि। जिनके लिए हम अपने घर एक नन्ही डिश लगवाते हैं एक निश्चित दिशा में। ये डिश कैसे काम करती है? रेडिओ , टीवी , फोन आदि को अपनी अपनी तरह के सिग्नल कैसे मिलते हैं? टीवी में फोटो और लोग कैसे चलते फिरते दीखते हैं?

इस श्रंखला में मैं इस पूरे सिस्टम पर बात करुँगी।

दूरसंचार की शुरुआत से शुरू करती हूँ फिर धीरे धीरे आगे बढूँगी।सिर्फ तरीके भर पर। मेथेमेटिकल डिटेल्स नही। ( मैं चिट्ठियों आदि नहीं बल्कि सिर्फ दूरसंचार / टीवी आदि इलेक्ट्रोनिक कम्युनिकेशन की बात कर रही हूँ।)

सबसे पहले तो हम मनुष्य सिर्फ अपने समीप मौजूद व्यक्तियों से ही बात कर पाते थे। फिर  dots and dashes का उपयोग कर दूर सन्देश भेजे जाने लगे। फिर तारों के द्वारा जुड़े दो टेली फोंस पर बात होनी शुरू हुई।

फोन मशीन के काम करने के बारे में अभी एक संक्षिप्त परिचय । मोटे तौर पर सिर्फ इतना है कि टेलीफोन में चार अलग भाग हैं।

1. - माइक। जैसे माइक पर गायक गीत गाते हैं और नेता भाषण देते हैं :) ।माइक के भीतर मैगनेट का इंतज़ाम रहता है जिसके कारण यह हमारी कही बात को बिजली की लहरों में परिवर्तित करता है। हमारी आवाज़ से हुए कम्पन के कारण वोल्टेज के बदलाव होते हैं , जिन्हें तकनीकी भाषा में ऑडियो सिग्नल कहते हैं।

2. - स्पीकर। जी हाँ वही जो नेता के कहे शब्दों को पूरे मैदान में सुनाने के लिए जगह जगह लगे होते हैं। या गायक के गीत को आपके कानों तक पहुंचाते हैं। दुबारा वही ध्वनि जनरेट कर कर। जो म्युज़िक सिस्टम या टीवी के शब्द को कमरे में फिर से बनाते हैं। इन स्पीकरों में परदे और चुम्बक होते हैं। चुम्बक और बिजली की लहरों का आपस में ऐसा असर होता है की स्पीकर में लगा पर्दा कम्पन करता है और ध्वनि तरंगों को जन्म देता है।  मूल तौर पर माइक और स्पीकर एक ही सिद्धांत पर काम करते हैं। एक ध्वनि तरंगों को विद्युत् तरंगो में बदलता है तो दूसरा विद्युत् तरंगों को ध्वनि तरंगो में। लेकिन सिद्धांत दोनों का एक ही है - विद्युत् और चुम्बक के आपसी सम्बन्ध और एक ताना हुआ स्क्रीन।

3. - तीसरा हिस्सा है वह भाग जो ऊपर बताई माइक की विद्युत् लहरों को टेलीफोन एक्सचेंज तक और टेलीफोन एक्सचेंज से अति हुई विद्युत् लहरों को स्पीकर तक आने का विद्युत् रास्ता बनाता है। ये बेसिकली तार और स्विच हैं।

4. आखरी हिस्सा हमारी आपस में की जा रही बातचीत से सम्बन्धित नही । यह सिग्नलिंग के लिए है। फोन उठाने पर आने वाली डायल टोन, किसी को फोन करने पर सुनाई देने वाली रिंगिंग या बिजी टोन, कोई हमें फोन करे तब बजने वाली घंटी, ये सब सिग्नलिंग के हिस्से हैं

ये सब तो था हमारे प्यारे घर में लगे टेलीफोन जी के नन्हे से डब्बे जी के भीतर। यह डब्बा हमारे घर के अन्य सामान की ही तरह हमारा है, यह खुद अपने आप में कम्युनिकेशन नेटवर्क का हिस्सा नहीं । आगे ये विद्युत् तरंगे कैसे एक से दूसरी जगह पहुँचती हैं, वह कम्युनिकेशन का हिस्सा है।

यह कैसे होता है यह अगले भाग में। सॅटॅलाइट तक पहुँचते पता नहीं कितने भाग हो चुके होंगे।

चलिए फिर मिलते हैं एक ब्रेक के बाद

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