फ़ॉलोअर

शनिवार, 5 जुलाई 2014

श्रीमद भागवतम ६ कपिल, देवहूति

पिछला भाग 
पहला भाग

श्री शौनक जी ने कहा - अजन्मे ईश्वर ने अपनी योगशक्ति को अधीन कर माता देवहूति के पुत्र रूप में जन्म लिया।  उनकी सुखदायी कथा कहिये। सूत जी बोले - 'व्यासदेव के मित्र श्री मैत्रेय, तब विदुर जी से कहने लगे' :

"पिता के वन गमन के पश्चात कपिलदेव , माता देवहूति के संग बिंदु सरोवर के किनारे रहने लगे।  एक समय माता देवहूति ब्रह्मा के वचन को याद करते हुए  (कि पुत्र नारायण होगा और सत्य का पथ दिखायेगा) अत्यंत विनम्रता से कपिल जी से बोलीं :
"हे प्रभो - मैं माया के जाल में असत में डूबी हुई हूँ। अनेक जन्मों के बाद आपकी असीम कृपा से अब आप मिले हैं।  इस अज्ञानरूपी अंधकार से निकलने का प्रकाश प्रज्वलित कीजिये। हे प्रभो आपकी माया के आवरण के कारण ही मुझे "मैं" "मेरा" का भरम होता है - आप मुझे प्रकृति और पुरुष के बारे में समझाइये।  आप मायाजाल से बने संसार वृक्ष को काटने के लिए मेरी कुल्हाड़ी हैं।"

माता की इन बातों को सुन कर कपिल देव (श्री नारायण) प्रसन्न मन से बोलने लगे:
हे माते , योगी आत्म परायण हो कर मोहबंधन को काट देता है।  वह सुख और दुःख से मोह को प्राप्त नहीं होता (यह वही सांख्य ज्ञान है जो गीता में श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, कई जगह तो शब्द भी वही होते हैं ) । आपको वही योग ज्ञान बता रहा हूँ , जो ज्ञान मैंने इससे पहले उन संतों योगियों को दिया था जो सत जानने को तत्पर थे।  

जीवात्मा अपने बंधन एवं मुक्ति के लिए स्वयं उत्तरदायी होता है।  तीनों गुणों (सतो रजो तमो-गुण ) में उसकी आसक्ति ही उसे बंधन में बांधती है और इनसे परे होना परमात्मा के पास ले जाता है। काम क्रोध लोभ और मोह - "मैं" से जन्म लेते हैं।  मैं (अहम) से मुक्ति ही इन सब से मुक्त करती है।  जब मन आत्म ज्ञान युक्त हो जाए , तब संसार से स्वयं ही संन्यास हो जाता है।  परमात्मा से एकत्व सर्वश्रेष्ठ योग है।   

संसार से मोह बंधन करता है। और वही मोह जब परमात्मा से हो जाए तो बंधन मुक्त कर देता है।  तब व्यक्ति सहिष्णु , दयायुक्त और सब जीवों के प्रति अनुकूल हो जाता है  , और किसी के प्रति उसका शत्रुभाव नहीं रह जाता।  वह उस मार्ग पर स्वतः चलने लगता है जो शास्त्र बताते हैं। (यहां ध्यान दें - वह शास्त्र पढ़ कर मार्ग पर अपनी शिक्षा के पूर्वग्रह के बंधन से चलेगा यह नहीं कहा जा रहा - कहा यह जा रहा है कि आत्मज्ञानी स्वतः ही जिस मार्ग पर चलेगा, वही मार्ग शास्त्र अनात्मज्ञानी के लिए  भी दिखाते हैं) .…  


भक्ति मार्ग बड़ा आसान है और इसका यात्री सब जीवों के प्रति दयावान और अनुकूल प्रकृति का हो जाता है। जो मुझ तक आना चाहें वे अपने मोह और बंधन को काटने के सीधे प्रयास को कठिन पाते हैं।  वे अपने मोह के पात्र की जगह मुझे बदल दें - इससे विषय वस्तुओं में उनका मोह स्वतः ही छूट जाएगा और वे निः संग हो जाएंगे।  अब वे ज्ञानी साधुओं के सत्संग में रहें और उनके साथ रह कर सदा प्रभु की लीलाओं का वर्णन सुनने से स्वयं ही उनकी आसक्ति प्रभु की तरफ लक्षित हो जायेगी। भक्त मना सज्जनों से लगातार मेरी लीला गाथाएं सुनने से स्वतः ही भक्ति मन में उपजेगी - और जो मन बंधन को ले जाता था वह स्वयं ही मुक्ति की ओर अग्रसर होगा। जो व्यक्ति तीनों गुणों से पर होकर मुझ पर ही एकाग्र होते हैं वे जीवन में ही मुक्ति के योग्य हैं।  

देवहूति ने प्रश्न किया : सच्ची भक्ति कैसे होगी ? सत्य का स्वरुप क्या होगा ? मुझ अल्पबुद्धि को ठीक से समझाइये।  तब कपिलदेव ने माँ को सत्य का ज्ञान दिया।  

जैसे जठराग्नि भोजन को पचा देती है उसी तरह स्थितप्रज्ञ मुझ में स्थिर मना हो कर मायाजाल को काट देते हैं। जिनकी बुद्धि स्थिर हो जाती है वे माया से नहीं भटकते और जन्म मृत्यु के चक्र से निकल जाते हैं।  मेरी इच्छा से पवन चलता है,  इंद्र वर्षा कराते हैं , अग्नि प्रज्ज्वलित हैं और जन्म मरण का चक्र काल चक्र चलता है। मुझमे स्थिर बुद्धि वाले ज्ञानी इन सब भयों से मुक्त हो जाते हैं।  

हमारे भीतरका आत्मा ही पुरुष है,  प्रकृति आत्मन का आवरण है। पुरुष अनादि अनंत है, निर्गुण है। प्रकृति की दो प्रमुख शक्तियां हैं - आवरण शक्ति और विक्षेप शक्ति।  प्रकृति के तीनों गुण  (सतो तमो रजो) जब संतुलन में हों तो वह निर्गुण लगती है।  निर्गुण पुरुष समय भी है।  जब समय चलायमान हो तो वह प्रकृति के तीनों गुणों के संतुलन को उत्तेजित करता है और गुणों में असंतुलन आ जाता है।  पहले राजस प्रकट होता है, फिर सतो और तमो। जब गन कर्म में आएं तब आवरण और विक्षेप शक्तियां भी पृथक प्रकट होती हैं और आवरण के कारण जीवात्मा अपने स्वरूप को भूल जाता है। पुरुष की इस स्थिति को अविद्या कहते हैं। इस अविद्या की स्थिति में विक्षेप शक्ति माया का प्राविर्भाव करती है।  जीवात्मा इन में उलझ कर स्वयं को भुला देता है और संसार में उलझता है।  जो आत्मा / परमात्मा / पुरुष इस से प्रभावित नहीं हुआ, वही ईश्वर/ मूलपुरुष/ ब्राह्मण / भगवान है। 

सब योग इसी ब्राह्मण तक जाने के अलग अलग मार्ग हैं। जो यह सत जान ले वह ब्राह्मण है। ब्राह्मण की खोज ब्राह्मण की अनुभूति पर ही समाप्त होती है, ब्राह्मण की प्राप्ति पर नहीं।  जो ब्राह्मण को पा ले वह ब्राह्मण को "ढूंढ" नहीं लेता बल्कि स्वयं ब्राह्मण हो जाता है। जीवात्मा जान लेता है कि वह परमात्मा / ईश्वर / ब्राह्मण है भक्ति योग भी यहीं पहुंचाता है और सांख्य योग भी।  भक्ति योग में प्रेम की वह अवस्था प्राप्त होती है जहां भक्त भगवान हो जाए और उसकी अपनी कोई पहचान न रहे, सांख्य योग ज्ञान की वह अवस्था है जहां योगी आवरण और विक्षेप शक्तियों से पृथक होकर अपने को पुरुष रूप में जान ले।  

मूलपुरुष अनादि अनंत है , सर्व व्यापी है और सारे ब्रह्माण्ड उसी में निवास करते हैं। अपनी ही इच्छा से उस सर्व कारणों के कारण ने संसार के निर्माण का निर्णय लिया और प्रकृति ने पुरुष की इच्छा मात्र से सृष्टि की। संसार तीन गुणों पर आधारित है  और जीवात्माएं इन्ही तीन गुणों के प्रभाव से कर्म करती हैं। कर्म में संग होने से बंधन होता है और कर्म निष्काम और निर्मोह से होने से मुक्ति।  जब व्यक्ति अपने को कर्म का कर्ता मानता है तो वह उस कर्म के फल से जुड़ जाता है, और बंधन में बंध जाता है ।   

१. पंचतत्व - आकाश, वायु , अग्नि जल और पृथ्वी 
२. इनके गुण - शब्द , स्पर्श , रंग , स्वाद , गंध 
३. पांच ज्ञानेन्द्रियाँ है - इन पांच गुणों के लिए - कान आदि,
४. पांच कर्मेन्द्रियाँ - मुंह,हाथ, पैर, जननेंद्रियां, एवं मल त्याग के अंग 
५. इन बीस के साथ - चार सूक्ष्म स्वभाव हैं -मन , बुद्धि , अहंकार और चैतन्य 

यह चौबीस "सगुण ब्रह्म" के प्राकट्य हैं।  निर्गुण ब्रह्म पदार्थ से नहीं समझा जा सकता। ये चौबीस प्रकार के तत्व त्रि-गुण (सतो , रजो तमो) , काल के चक्र से बिंधे कर्म चक्र में घूमते हैं। पुरुष ने जब इन गुणों वाली प्रकृति में प्रवेश किया तो संतुलन बिगड़ गया और हिरण्यमय प्रकट हुई। सतोगुण वासुदेव नाम से प्रकट हुए, संकर्षण शेषनाग हुए।  विराट पुरुष का प्रादुर्भाव हुआ , फिर अंडाकार ब्रह्माण्ड हुआ।  यह "विशेष" कहलाया।  

जीवात्माओं ने शरीर धारण किये।  जैसे थाली में पानी भर कर चन्द्रमा को  देखते हुए, पानी हिलने से चन्द्र हिलते दीखते हैं किन्तु असल में स्थिर  होते हैं, उसी तरह शरीर में वास करने वाला जीवात्मा उस शरीर के बदलाव से परिवर्तित नहीं होता। अहंकार जनित "मैं करता हूँ - यह मेरा कर्म और यह मेरा फल है" की भावना से जीवात्मा भटक जाता है। जब व्यक्ति ज्ञान और भक्ति के मार्गों पर चलता है , तब बंधन छूट जाते हैं।  

देवहूति जी ने पूछा - हे ब्राह्मण - जैसे पृथ्वी के बिना गंध और जल के बिना रस नहीं हो सकते - वैसे ही माया से अलग जीव कैसे होगा ? 

कपिल जी ने कहा - हे देवी - जीवात्मा संसार पर निर्भर नहीं होता ।  जब वह माया बंधन को तोड़ देता है तब वह जान लेता है कि वह हमेशा संसार से पृथक था।  मुझे तत्वरूप में जानने वाला फिर से भव कूप में नहीं पड़ता। हे मनुकुमारी , अपने कर्म को धर्म रूप में करने वाला कर्म से नहीं बंधता , क्योंकि उसका कर्म फल की कामना से नहीं होता। 

परम्परागत कर्मकांडी धर्म का प्रदर्शन, और धर्म, पृथक पृथक होते हैं।  जब जीवात्मा स्थितप्रज्ञ हो, तब मौन, योग, ब्रह्मचर्य, शौच , और आत्मसंयम स्वतः ही बाह्य रूप से प्रकट होते हैं । लेकिन पाखंडी बाहरी रूप से यह सब गुण प्रकट करते हुए भी भीतर से संसार में लिप्त बना रहता है।  

सच्चा योगी प्राणायाम का अभ्यास करता हुआ अपने मन को केंद्रित करता है।  उसका मन प्रभु में स्थित हो जाता है और वह उनके दर्शन कर लेता है।  उस दिव्य रूप के अलौकिक सौंदर्य के दर्शन के पश्चात फिर संसार में ऐसा कुछ नहीं बचता जो योगी को दोबारा आसक्त कर सके।  सुन्दर से सुन्दर वस्तु भी उस दिव्य सौंदर्य के आगे फीकी हो जाती है।  जैसे व्यक्ति अपने आप को अपने पुत्र, जमीन, धन से पृथक समझ पाटा है, वैसे ही दिव्य साक्षात्कार के उपरान्त व्यक्ति खुद को संसार से पृथक देख पाता है।  अपने सत्य स्वरुप को जानने वाला समदृष्टा हो जाता है क्योंकि वह गाय, संत , कुत्ते , वृक्ष , और चांडाल , सब में एक ही परम को देखता है।

माता देवहूति जी को योग ज्ञान देकर उनकी आज्ञा लेकर कपिल जी पूर्वोत्तर को चले गए।  उनकी दीक्षा पर चलते हुए माता ने तपस किया।  उनकी अविद्या लुप्त हुई और वे ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त हुईं। उनके भीतर का पुरुष आवरण और विक्षेप के प्रभाव से निकल कर मूलरूप ब्राह्मण हुआ। जिस स्थान पर उन्होंने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया वह सिद्धपाद नामक तीर्थ स्थल हुआ।  उधर कपिल जी पूर्वोत्तर को गए जहां सिद्ध, चरण और गन्धर्वों ने उनकी आराधना के।  वरुणदेव  उन्हें अर्घ्य दिया और अपने भीतर तपस का स्थान दिया, जहां कपिल जी ने तपस किया।   

जारी ……। 

बुधवार, 2 जुलाई 2014

श्रीमद भागवतम ५ : कर्दम, देवहूति, ऋषि दंपत्ति

पिछला भाग 

पहला भाग 

मनु और शतरूपा जी ने ब्रह्मा जी के आदेश से संतति बढाने के लिए पांच संतानों को जन्म दिया। ये थे - प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक पुत्र और आकूति , देवहुति , एवं प्रसूति नामक कन्याएं।
मनु और शतरूपा की एक पुत्री थीं देवहूति। अब मैं देवहूति और ऋषि कर्दम और उनकी संतति की कथा कहूँगी।

कर्दम ब्रह्मा के पुत्र थे।  वे परम ज्ञानी थे और माया से परे थे , किन्तु पिता ब्रह्मा की आज्ञानुसार संतति बढ़ाने को प्रतिबद्ध थे।  उन्होंने बहुत तप किया और नारायण प्रकट हुए।  तब उन्होंने वर मांगने को कहा।

कर्दम जी बोले - आपके दर्शन होने के बाद तो मांगने को कुछ  बचा ही नहीं है।  फिर भी पिता ब्रह्मा की आज्ञा से मुझे संतति का प्रजनन करना आवश्यक है।  सो हे प्रभु, मैं आपको ही अपने पुत्र के रूप में चाहता हूँ , और संतति प्राप्त करने के लिए एक शीलवती धर्मपत्नी की भी आवश्यकता है।  कर्दम की प्रेमभक्ति से प्रसन्न नारायण की आँखों से अश्रु गिरे और  दिव्या जलाशय - हुए बिन्दुसार। नारायण ने कहा - आपकी पत्नी होंगी मनु और शतरूपा जी की सुपुत्री - देवहुति।  मैं आप दोनों के पुत्र रूप में आऊंगा।

उधर मनु जी को प्रेरणा हुई कि देवहूती जी को कर्दम जी की संगिनी होना है।  वे अपनी धर्मपत्नी शतरूपा और देवहूती के संग कर्दम जी के आश्रम आये और कहा प्रणाम और स्वागत आदि के उपरांत कहा , कि मेरी पुत्री आपकी स्त्री होना चाहती है।  कर्दम जी ने कहा कि मैं विवाह करने को तो तैयार हूँ, किन्तु गृहस्थाश्रम के बाद मैं संन्यासाश्रम में भी जाऊँगा , जब आपकी पुत्री संतानों की माता बन जाएंगी।  देवहूति और मनु और शतरूपा की सहमति से कर्दम जी और देवहूति जी का शुभविवाह हुआ और माता पिता अपनी पुत्री को पति के संग छोड़ कर वापस चले गए। लौट कर जहां वराह जी के शरीर से कुछ बाल गिरे थे वहां उन दोनों ने यज्ञ कराया।

इधर नवविवाहित कर्दम जी फिर से अपने ध्यान आदि में लग गए और देवहूति उनकी सेवा करती रहीं। कई प्रहर बीते , दिन, महीने , वर्षों बीत गए और देवहूति सेवा में लगी रहीं।  उनका नवयौवन समय के साथ समाप्त हो गया, किन्तु वे तनिक भी दुखी हुए बिना पति की सेवा करती रहीं।

कई वर्षों बाद कर्दम जी की समाधि खुली तो उन्होंने देखा कि उनकी सुन्दर नवयौवना पत्नी वृद्धा सी हो चली थीं।  वे  स्वयं   भी अब युवा न थे।  तब उन्होंने अपनी प्रिय  पत्नी से कहा - आप ने पूर्ण रूप निस्वार्थ हो कर स्त्री - धर्म निभाया है।  मेरी तपस्या के साथ आपने भी अनेक व्रत-उपवास किये - जिनसे आप असमय ही कुम्हला गयीं।  अब मैं पति धर्म  निभाऊंगा। कहिये आप मुझसे क्या चाहती हैं।

 देवहूति बहुत संकोच में थीं।  मन से तो वे वही युवती थीं जो  पति  अपने माता पिता के संग यहां आयीं थीं , किन्तु उनका शरीर वृद्धा का हो चुका था। उनके रेशमी वस्त्र अब न थे, और वे पुराने वस्त्र पहनी थीं।  गहनों को भी वे कबसे त्याग चुकी थीं। उनका शरीर अनेक व्रतों से कमज़ोर हो गया था और उनके सुन्दर नेत्र अपनी चमक खो चुके थे।  वे लजाते हुए अपने  कि मैं आपकी पत्नी हूँ, क्यों आप मुझसे कहलवाना चाहते हैं कि मैं क्या चाहती हूँ ?

उनकी कामना को  समझते हुए ,  तब कर्दम जी  योगशक्ति से एक ऐसा विमान बनाया जो पूरा नगर सा था - जिसमे सभी सांसारिक सुविधायें थीं। तत्पश्चात उन्होंने सप्रेम देवहूति जी से बिन्दुसार में स्नान कर आने। झिझकती हुई देवहूति जलाशय में उतरीं तो अत्यधिक चकित हो गयीं।  बिन्दुसार नारायण जी के अश्रुओं से बने थे , उनके चमत्कारी जल के प्रभाव से देवहूति वृद्धा से पुनः युवा हो उठीं। वहां अनेक सुन्दर स्त्रियां उनके सामने ही प्रकट हो कर उन्हें सजाने - संवारने लगीं।  उनके सुंदर केश संवार कर उनका श्रृंगार किया।  रेशमी वस्त्र और गहने पहनाए।

स्नान और श्रृंगार के पश्चात पुनर्यौवना हुई देवहूति सकुचाते हुए पति के निकट पहुंची तो चकित रह गयीं , क्योंकि उन्ही की तरह कर्दम मुनि भी वृध्द से फिर वही युवक बन गए थे जिनसे वर्षों पहले उनका विवाह हुआ था। अब कर्दम जी ने अपनी शर्माती लजाती हुई धर्मपत्नी का हाथ थामा और विमान में प्रवेश किया।  विमान कई वर्षों तक अंतरिक्ष में विचरण करता रहा और संसार से बेखबर दंपत्ति गृहस्थाश्रम आनंद लेते रहे।  इस बीच देवहूति नौ कन्याओं की माता भी हो गयीं।

नौ कन्याओं के पिता होने के बाद कर्दम जी ने कहा - हे प्रिय संगिनी - मैंने विवाह के समय ही कहा था कि संतानोत्पत्ति के पश्चात संन्यास ले लूँगा - अब वह समय आ गया लगता है। तुम नौ कन्याओं की माता हो चुकी हो।  तब देवहूति जी बोलीं - ये कन्याएं तो ब्याह कर के अपने अपने पति के घर चली जाएंगी।  आप तो ब्रह्मज्ञानी हैं किन्तु मैं तो साधारण स्त्री हूँ।  मैं किसके सहारे जियुंगी ? यदि एक पुत्र होता तो मेरे सहारे को कोई रहता।  तब कर्दम जी ने कहा कि हे देवी - अपने आप को साधारण न कहो। नारायण स्वयं ही तुम्हारे पुत्र होंगे - इसके लिए हम दोनों को व्रतादि करने होंगे।  तब दोनों ने कई वर्षों व्रतोपवास आदि किये और नारायण देवहूति के गर्भ में आये।

गर्भस्थित नारायण की स्तुति करने ब्रह्मा जी नौ परम ब्राह्मण ऋषियों को लेकर आये। उन्होंने बताया कि आपके पुत्र रूप में नारायण आएंगे और संसार को सांख्य योग की शिक्षा देंगे, और कपिल मुनि नाम से प्रसिद्ध होंगे। इसके पश्चात उन्होंने कर्दम और देवहूति जी से उनकी कन्याओं के विवाह इन नौ परम ब्राह्मणों से करने का प्रस्ताव किया जिसे दोनों ने सहर्ष स्वीकारा।  तब उन नौ कन्याओं के इन नौ ब्राह्मणों से विवाह संपन्न हुए।

मारीचि जी का विवाह कला जी से हुआ ,
अनुसूया माता का अत्रि जी से,
श्रद्धा जी का अंगिरा जी से,
पुलत्स्य जी का हविर्भू जी से ,
गति जी का पुलह जी से विवाह हुआ

क्रिया जी का कृतु जी से ,
ख्याति जी और भृगु जी का विवाह हुआ ,
अरुंधति जी का विवाह वशिष्ठ जी से हुआ,
शान्ति जी का अथर्व जी से विवाह हुआ।

नौ कन्याएं अपने पतियों के संग उनके आश्रम को चली गयीं और वृद्ध माता पिता अपने आश्रम में रहते हुए अपने नारायण - अवतार सुपुत्र के जन्म की प्रतीक्षा में रहने लगे।

जारी 

सोमवार, 30 जून 2014

श्रीमद भागवतम 4: ब्रह्मा सृष्टि ब्रह्मा के पुत्र पुत्रियाँ


पिछला भाग 
पहला भाग 
[
कथा स्ट्रिक्टली समय क्रम में नहीं होगी 
]

श्री महाविष्णु शेष शैया पर लेटे  थे और उनकी नाभि से विशाल डंठल वाला कमल खिला - जिस पर ब्रह्मा प्रकट हुए।  ब्रह्मा ने अपने आस पास देखना चाहा , तो उनके चार दिशाओं में चार चेहरे हुए। उन्होंने अपने आठ नेत्रों से सब ओर देखा।  सब तरफ शून्य ही दिखता था।  तब उन्होंने अपने आप को जानने के लिए कमल के डंठल के भीतर प्रवेश किया लेकिन कितना ही गहरा उतरने पर भी कुछ न मिला।  वे वापस कमल पर लौट आये।  उन्हें अपने भीतर शब्द सुनाई दिया "तपस तपस तपस"। तब उन्होंने सौ वर्षों तक तप किया।  तत्पश्चात उनके अंतर्मन में विष्णु जी की छवि  उभरी, सृष्टि का ज्ञान , और वेद प्राप्त हुए, और सृष्टि रचने की प्रेरणा हुई।

पहले स्थूल जगत कि रचना हुई।  काल परमात्मा की सूक्ष्म शक्तियों और और स्थूल सृष्टि को प्रथक करते है।  सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण से सृष्टि चलती है। नौ स्तर पर सृष्टियाँ हैं - महत तत्व , अहंकार , इन्द्रियां , ज्ञान और कर्म ऊर्जा , मन , विभ्रांति करने वाली माया , अचल जगत (ग्रह नक्षत्र सितारे पृथ्वियां जल थल पेड़ पौधे …… ) , चल जीवन के निचले रूप (कीड़े, पशु पक्षी …… ).

इसके बाद मानव, फिर देव, पितर, असुर / दानव, गन्धर्व और अप्सराएँ , यक्ष और राक्षस , सिद्ध चरण और विद्याधर , भूत प्रेत पिशाच ; महामानव आदि हुए।  [तत्व और समय के माप कोई जानना चाहे तो यहाँ (लिंक क्लिक करें) उपलब्ध हैं।  ]

स्थूल जगत रचने के पश्चात ब्रह्मा ने अपनी शक्ति से चार "कुमारों" (सनक , सनन्दन , सनातन, सनत कुमार) को प्रकट किया - किन्तु कुमारों ने संतति बढाने से मना कर दिया यह कहते हुए कि हम बालक ही रहेंगे - क्योंकि हमें "बड़ों" के अवगुण नहीं चाहिए। इस पर ब्रह्मा जी को क्रोध तो आया किन्तु उन्होंने अपने क्रोध को तुरंत सम्हाल लिया।  तब उनका क्रोध उनके मस्तक से एक रोते हुए लालिमा युक्त नीलवर्ण बालक के रूप में प्रकट हुआ - जो "रूद्र" हुए।  रूद्र के अन्य नाम हैं - मन्यु , मनु ,  महिनाशा , महान, शिव , ऋतध्वज , उग्ररेता , भव , काल , धृतवृता।  रूद्र की पत्नी  रुद्राणी होंगी - धी , धृति , रसाला , उमा , नियुत, सर्पि , इला , अम्बिका , इरावती , स्वधा दीक्षा।  क्रोध से उत्पन्न हुए रूद्र और रुद्राणी की अगणित संतानें हुईं जो उन जैसी ही क्रोधित नेत्रों को लिए सृष्टि को समाप्त करने उद्धत हुईं।  ब्रह्मा ने रूद्र से कहा - हे पुत्र - ऐसी संतति तो सृष्टि का नाश कर देगी।  हे प्रिय पुत्र - तुम तपस में लीन होओ।  तब रूद्र तपस में लीन हुए।

तत्पश्चात ब्रह्मा जी ने दस मानस पुत्र उतपन्न किये :-

मारीचि
अत्रि
अंगीरा
पुलह
पुलत्स्य
कृतु
वशिष्ठ
दक्ष
भृगु
नारद

नारद पूर्व सृष्टि के पूर्वजन्म के आशीर्वचन से अपना सत्य स्वरुप नहीं भूले थे - तो उन्होंने श्री नारायण जी कि भक्ति में ही जीवन जीने का निर्णय लिया।

ब्रह्मा जी के चार चेहरों से चार वेद प्रगट हुए। आयुर्विद्या , शास्त्र ज्ञान , संगीत , वास्तुशिल्प विद्या सब वेदों से प्रकट हुए।  क्रोध , काम , लोभ आदि  भी ब्रह्मा से प्रकट हुए। आयुर्विद्या , शास्त्र ज्ञान , संगीत , वास्तुशिल्प विद्या सब वेदों से प्रकट हुए। वेदों के बाद ब्रह्मा ने अपने चारों चेहरों से पुराण अभिव्यक्त किये। ब्रह्मा के ह्रदय से काम प्रकट हुए , उनकी छाया से कर्दम ऋषि।

उनके शरीर से एक पुरुष और एक स्त्री आकृति प्रकटे , जिनके नाम हुए - मनु और शतरूपा।संतति के रहने के लिए धरनी आवश्यक थीं - जो पिछली प्रलय से रसातल में ही थीं।  पृथ्वी को रसातल से निकाल्ने के लिए श्री विष्णु वराह रूप में प्रकट और रसातल से पृथ्वी को बाहर लाये ( इसी प्रक्रिया में उन्होंने हिरण्याक्ष का वध भी किया था - जो कथा आगे आएगी ) । मनु और शतरूपा जी ने ब्रह्मा जी के आदेश से संतति बढाने के लिए पांच संतानों को जन्म दिया। ये थे - प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक पुत्र और आकूति , देवहुति , एवं प्रसूति नामक कन्याएं।

 ब्रह्मा की पुत्री हुईं "वाक" जिनके प्रति ब्रह्मा ही आकर्षित हो गए। किन्तु पुत्री उनकी ओर ऐसे कोई भाव न रखती थीं।  तब मारीचि और अन्य पुत्रों ने विनम्रता से अपने पिता से कहा कि  इससे पूर्व किसी ब्रह्मा ने यह नहीं किया।  आप सृष्टा हैं - आप अपनी ही पुत्री से कामभाव रखेंेगे तो सृष्टि किस दिशा में अग्रसर होगी ? अपने प्रजापति पुत्रों की बात से ब्रह्मा लज्जित हुए और तुरंत अपनी देह त्याग दी।  यह त्यागी हुई देह सब दिशाओं में भयंकर अंधकार रूप हुई।

आकूति का विवाह रूचि नामक प्रजापति  से हुआ , देवहूति का कर्दम ऋषि से और प्रसूति का दक्ष प्रजापति से हुआ।  इनसे संतति आगे बढ़ी।

सोमवार, 16 जून 2014

बस यूँ ही

कल क्वचिदन्यतोSपि पर यह कविता पढ़ी।  इस पर टिप्पणी यह लिखी - और सोचती हूँ यहां भी सहेज ही लूँ  :)

:)
जब इतना बड़का संसार 
तत्वों के कॉम्बिनेशन से 
एक्सिदेंटली बन सकता है, 
जीवन संवर बिगड़ सकता है, 
पीढियाँ बीत सकती हैं, 
नदियाँ रीत सकती हैं, 
आकाशगंगाएं उभर सकती हैं
धरतियां सँवर सकती हैं

बारिशों की छुवन से
बहारों के आगमन से
फूलों की कम्पन से
सूरज की तपन से 
भीगती धरा की सतहों पर
अन्न उग जाता मिटटी के कण से

तब क्यों नहीं यह हो 
जो आपकी कविता कह रही
संभावनाओं से सृजा संसार
संभावनाओं से मिले साथी
संभावनाओं की गलियों में
क्यों न खो सकते कहीं ?

:)

सोमवार, 2 जून 2014

श्रीमद भागवतम सुखसागर 3: परीक्षित, कलियुग, श्राप

भाग २ 
भाग १ 

परीक्षित ने कई वर्षों तक धर्मपूर्वक राज्य किया।  उनका विवाह उत्तरकुमार जी की पुत्री इरावती जी से हुआ और उनका जनमेजय नामक पुत्र हुआ।  वे एक बार सरस्वती नदी के किनारे जा रहे थे जब उन्होंने देखा कि एक बहुत कमज़ोर गाय और एक बैल बात कर रहे थे। बैल की तीन टाँगे टूटी हुई थीं और वह लंगड़ा कर चलता था।

बैल गाय से कह रहा था :
"हे माता पृथ्वी, आप इतनी दुखी और कमज़ोर लगती हैं।  आप इसीलिए उदास हैं न कि श्रीकृष्ण आपको छोड़ कर अपने धाम चले गए और धर्म क्षीण हो चला है ?"

गौमाता ने कहा:
"जी हाँ, धर्म देव।  जब कृष्ण यहां थे तब उन्होंने अापका उत्थान किया एवं अन्याय और अधर्म का नाश किया।  अब कलि प्रभाव से धर्म का ह्रास हो रहा है।  धर्म के चार पैर हैं - तपस, शौच, दया और सत्य। आपके तीन चरण कलि प्रभाव से बिगड़ गए हैं और अब कलियुग में सत्य ही बचा है।  मैं बहुत दुखी हूँ कि अब मुझ पर ऐसे लोग रहेंगे जो कहेंगे कि कोई ईश्वर है ही नहीं और यह चराचर जगत सिर्फ पदार्थों के प्रभाव से बना है और चल रहा है।  सिर्फ संयोग और सम्भोग से जीवन बनता और बहता है। ईश्वर है ही नहीं। "

इतने में वहां से एक भयावह दिखने वाला पुरुष आया और वह बैल के चौथे पैर (सत्य) को तोड़ने का प्रयास करने लगा। यह देख कर परीक्षित दौड़े  आए और उस पुरुष को मारने दौड़े।

उस कलि ने अपना भेष त्याग दिया और परीक्षित के चरणों में गिर पड़ा।  परीक्षित बोले - मैं अर्जुन पुत्र अभिमन्यु का पुत्र हूँ।  शरणागत की ह्त्या नहीं कर सकता।  तुम कौन हो ? उसने बताया कि वह कलियुग है तो परीक्षित कुपित हो कर बोले कि मेरे राज्य में प्रविष्ट होने का तुम्हारा साहस कैसे हुआ।  निकल जाओ यहां से।

कलि ने कहा - हे राजन , सारी पृथ्वी पर आप ही का तो राज्य है।  मैं कहाँ जाऊंगा ? मुझे भी प्रभु ने बनाया है ,  और समयानुसार ही मैं आया हूँ।  अब मैं कहाँ जाऊंगा ? आप राजा हैं तो मुझे रहने का स्थान देना भी आप का ही धर्म है। क्योंकि मैं प्रभु द्वारा रचित हूँ और आपकी प्रजा भी हूँ।

तब परीक्षित ने सोच समझ कर कहा - ठीक है।  शरणागत प्रजाजन का मैं वध नहीं करूंगा। तुम वहां रह सकते हो जहां ईश्वर का नाम भुलाया जा चुका हो, जहां जुआ, शराब, कामवासना , और ह्त्या की कामना हो। कलि ने कहा - मुझे एक ऐसा स्थान बताएं जहाँ ये सब साथ हों। मैं वहीं चला जाऊँगा।  तब परीक्षित ने कहा - स्वर्ण में यह सब है - तुम स्वर्ण में रह सकते हो।  तत्क्षण कलियुग ने स्वर्ण में अपना घर बना लिया।

परीक्षित का मुकुट भी स्वर्ण का ही था और कलियुग के प्रवेश पर उनका सर कलि प्रभाव से प्रभावित हुआ।
………………

एक बार परीक्षित आखेट पर थे और बहुत थके और क्लांत हो कर वे महर्षि शमिका के आश्रम पहुंचे। उन्होंने आदरपूर्वक ऋषि को प्रणाम किया और जल माँगा।  किन्तु ऋषि समाधिस्थ थे और उन्होंने राजा को कोई उत्तर न दिया।  बार बार पूछने पर भी उत्तर न आने से कलि प्रभावित थके हुए और प्यासे राजा को लगा कि ऋषि जानबूझ कर उनका अपमान कर  क्रोध में आकर उन्होंने वहां पड़े हुए मृत सर्प को ऋषि के गले में डाल दिया और लौट गए।  जब वे महल पहुंचे और मुकुट उतार तो कलि प्रभाव हटा और वे बहुत लज्जित हुए कि मैंने कितना गलत पाप कर्म कर दिया।  वे क्षमा मांगने जाने का सोचने लगे।

उधर ऋषि पुत्र श्रृंगी के मित्र आकर उसे छेड़ने लगे कि तुम्हारे पिता मृत शरीर उठाये हैं।  वह दौड़ा भागा आश्रम पहुंचा और यह दृश्य देख अत्यंत दुखी हुआ।  तत्क्षण उसने कमंडल का जल लेकर श्राप दिया कि जिसने मेरे पिता के साथ यह किया वह ठीक सात दिन में सांप के ही काटने से मर जाएगा।  फिर बालक बहुत रोने लगा।

पुत्र के रोने से ऋषिवर की समाधी टूटी और सब जानकर उन्होंने औने पुत्र को कहा कि तुम कैसे ब्राह्मण हो ? परीक्षित तो धर्मरक्षक राजा है  - प्यास की अधीरता से यदि उनका क्षत्रिय क्रोध उठ आया और उन्होंने यह कर भी दिया तो तुम्हे तो ब्राह्मण के गुणों - क्षमा और शान्ति - का त्याग नहीं करना चाहिए था ? लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता - क्योंकि सच्चे ब्राह्मण का श्राप झूठा नहीं हो सकता।

तभी ऋषि ने महल अपने शिष्यों को भेजा जिन्होंने परीक्षित को बताया कि आज से सात दिन बाद आपकी सांप काटने से मृत्यु हो जायेगी।  यह सुन परीक्षित बिलकुल दुखी नहीं हुए और बोले - मुझसे भयंकर पाप हुआ था , उसका दंड यहीं देकर ऋषिपुत्र ने मुझे मृत्यपरांत पाप का धारण किये रहने से बचा लिया है।

तुरंत परीक्षित ने अपने पुत्र का राज्याभिषेक कराया और सर्वस्व त्याग कर गंगातट पर चल पड़े।  वहां अनेक महान ऋषिगण पहुंचे और मोक्ष के तरीके पर उन्हें सलाह देने के आग्रह पर उन्हें बताने को उद्धत हुए। किसी ने योग, किसी ने तपस, किसी ने दान और किसी ने यज्ञ की सलाह दी।  तभी वहां व्यास पुत्र शुकदेव आये और सभी ने उनसे ही राह सुझाने को कहा। 

शुकदेव जी ने कहा - योग और यज्ञ के लिए एक सप्ताह का समय कम है।  दान आप नहीं कर सकते क्योंकि आप सर्वस्व पहले ही त्याग आये - तो आपके पास दान करने को कुछ नहीं है।  तपस भी एक सप्ताह में नहीं हो सकता।

भागवद कथा के श्रवण से आप शुद्ध हो जाएंगे और ईश्वर धाम को जाएंगे। एक सप्ताह का समय तो बहुत अधिक है - एक मुहूर्त भी भागवत कथा का श्रवण मन और भक्ति से हो तो काफी है किसी के भी लिए।

इसके पश्चात कथा प्रारम्भ हुई।

जारी ……