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शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग सात (07)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग सात (07)



भाग 7

प्रियंका



"श्रेया कैसी है?" ईशानी ने फोन पर पूछा, जब मैं मेहमानों के सो जाने के बाद सुबह के लिए आटा गूंथ रही थी। यह शांत समय था - जब मैं अगले दिन की तैयारी करते हुए सोच सकती थी। मुझे बैंगलोर छोड़े दस दिन हो गये थे, मेरा दिल टूट गया था। मुझे अंशुमन की याद आती थी। मैं कई बार फ़ोन करने के लिए ललचाती थी, लेकिन खुद को रोक लेती थी। जब मैं घर पर थी, तब भी तो वह फ़ोन नहीं उठाता था, जबकि वह मेरा नंबर पहचानता था, तो अब क्या संभावना थी कि वह फ़ोन उठाएगा, खासकर अपरिचित नंबर से?

"वह धीरे-धीरे खोती जा रही है ईशानी। मैं कल उसके साथ डॉक्टर के पास गई थी, और उसके पास अब ज्यादा समय नहीं बचा है।"

"हे भगवान, प्रियंका, मुझे बहुत खेद है। मैं कल्पना भी नहीं कर सकती कि यह तुम्हारे लिए कितना कठिन है।" ..... "वह बहुत छोटी है। हम दोनों कमोबेश दोनों एक ही उम्र की तो हैं.... उसे ऐसी हालत मेँ देखकर मेरा दिल टूट जाता है।"

"दिल टूटने की बात करें तो, मेरे पास तलाक के सारे कागज़ात तैयार हैं।" मैंने अस्थिर साँस छोड़ी और एक पल के लिए आटा गूंथना बंद कर दिया।

मैंने ईशानी से तलाक की प्रक्रिया संभालने और अंशुमन को कागजात सौंपने को कहा था। मुझे डर था कि मैं कहीं खुद ही कागज उसे दूँ, और फिर वह उन्हें देखकर भी अनदेखा कर दे या अरुचि से हाँ मेँ सिर हिलाए, और फिर अपने कंप्यूटर स्क्रीन पर जो कुछ भी था, उसे देखने लगे। मेरा रहा-सहा दिल भी टूट जाएगा। उस दर्दनाक पल से बचने के लिए, मैंने कायरतापूर्ण तरीका अपनाया और ईशानी से कागजी प्रक्रिया संभालने को कहा था। "ठीक है। कागज मुझे भेज दो, तो मैं हस्ताक्षर करके उन्हें वापस भेज दूँगी।"

"प्रियंका, क्या तुम सच में कुछ पैसे नहीं लेना चाहती हो? हनी, तुमने इतने सालों तक उसके घर और उसके बच्चों का ख्याल रखा था।"

"हमारा घर और हमारे बच्चे ईशानी। मुझे उससे एक पैसा भी नहीं चाहिए।"

"मैं प्री-नेपुटल समझौते को चुनौती दे सकती हूँ। तुम दोनों बीस साल से साथ हो।"

"मैं नहीं चाहती, ईशानी।"

"मुझे इस बात से नफरत है कि तुम्हें तलाक से गुजरना पड़ रहा है। लेकिन मैं समझती हूँ। मेरा मतलब है, यह बात पूरे शहर में है इसलिए...."

"शहर में? क्या बात? क्या हो रहा है?" मैंने पूछा, मेरा दिल धड़क रहा था।

"चलो प्रियंका, तुम्हें पता है।" उस ने अपना गला साफ किया। मुझे जाकर कुछ ही दिन हुए थे, क्या अंशुमन इतनी जल्दी ही आगे बढ़ चुका था? खैर, इससे मुझे समझना चाहिए कि मैं उसकी प्राथमिकताओं की सूची में कहाँ हूँ। "भगवान जाने कब से उसका अपनी सहायिका के साथ प्रेम-संबंध चल रहा है। हर किसी को पता है।"

मैं जोर से हंस पड़ी, "नहीं ईशानी, मुझे ऐसा नहीं लगता।"

"तुम अंशुमन से प्यार करती हो प्रियंका, लेकिन प्यार मेँ हम इतने अंधे नहीं हो सकते।"

"मैं अंधी नहीं हूँ, मुझ पर विश्वास करो ईशानी। मैं अंशुमन को अंदर और बाहर से जानती हूँ। हो सकता है कि वह अब मुझसे प्यार नहीं करता, या शायद उसने कभी सच में किया ही नहीं, लेकिन धोखा देकर अपनी शादी की कसमें तोड़ रहा हो? वह ऐसा नहीं है।"

"मैं एक घरेलू वकील ऑफिस चलाती हूँ प्रियंका! मुझे नहीं पता कि मेरे पास आने वाली कितनी महिलाएं जीवन भर सोचती हैं कि उनके पति उन्हें धोखा नहीं देंगे और—"

"अंशुमन मुझे किसी दूसरी महिला के साथ धोखा नहीं देंगे, ईशानी। यह उससे भी बदतर स्थिति है। उन्होंने मुझसे कभी प्यार ही नहीं किया। और यह सच्चाई पिछले कुछ सालों में और भी स्पष्ट होती जा रही है। शायद उन्हें लगता है कि मुझ से शादी कर के मुझ पर कोई एहसान किया है, क्योंकि मैं एक गरीबी मेँ पली हुई लड़की थी और वे खानदानी अमीर लोग थे। उन्होंने उनकी माँ के हर दुर्व्यवहार पर हर बार मुझ पर एहसान दिखाया कि ‘मैंने तुमसे शादी की न? और क्या चाहती हो?’ और हर बार याद दिलाया कि प्री-नेपुटल समझौते के अनुसार यदि मैंने उन्हें छोड़ा तो मुझे कुछ नहीं मिलेगा। वे यही सोचते और कहते रहे कि मैं पैसे के लिए उनसे बंधी रही, जबकि मैं अपने प्यार के कारण उनके साथ थी।"

"हम्म - क्या कागज मैं उसे किसी के हाथ से पहुंचाऊं या कोरियर से भेज दूँ?"

"वही करो जो तुम आम तौर पर करती हो। ईमानदारी से कहूँ तो, अंशुमन को कोई परवाह नहीं होगी।” उसे तो पता लगने में भी कुछ दिन लग गए होंगे कि मैं चली गई हूँ। ईशानी ने आह भरी, "और तुम्हें उससे कुछ भी नहीं चाहिए?"

"नहीं। बस इतना करना कि मर्सिडीज और पाँच हज़ार रुपये के बारे में एक नोट जोड़ देना। मैंने उसे जो पत्र छोड़ा था, उसमें मैंने कार का ज़िक्र नहीं किया था। अगर वह चाहे तो कार उसे तुरंत वापस मिल सकती है। पैसे.... खैर, पैसे लौटाने के लिए मुझे कुछ समय चाहिए, इसलिए शायद हम मेरे लिए पैसे वापस करने की कोई महीने की किश्तों की योजना बना सकें। और हाँ, यह भी कहना कि मैं प्री-नेपुटल समझौते के कारण नहीं बल्कि प्यार के कारण इतने सालों उसके साथ थी।"

"प्रियंका, वह अमीर आदमी पांच हजार रुपये तो खर्च कर ही सकता है," ईशानी ने खीज कर कहा। "मैं खुद ये तलाक के कागजात अंशुमन राव-सिन्हा को सौंपने जा रही हूँ और जब मैं ऐसा करूँगी, तो मैं उसे कुछ अक्ल की बात भी बता दूँगी।"

"तुम जो करना चाहो करो, ईशानी, लेकिन तुम अपना समय ही बर्बाद करोगी।"

हमने लक्षद्वीप में मेरे जीवन के बारे में थोड़ी और बातें कीं। जब तक मैंने कॉल खत्म की, मैं डबल-रोटी के आटे को रसोई के सबसे गर्म हिस्से में खमीर उठने के लिए छोड़ने को तैयार थी। मैंने एक आवाज़ सुनी और रसोई के दरवाजे पर खड़ी श्रेया की ओर देखा, "क्या तुम तलाक लेने के बारे में निश्चित हो?" ..

"नहीं, लेकिन वापस नहीं जा सकती श्रेया।" मैंने कहा "मैं वहाँ धीरे-धीरे खत्म हो रही थी। और... और...." मेरे आंसुओं ने मेरा गला घोंट दिया।

"ओह, रोना बंद करो," श्रेया ने अपने चिर परिचित शुष्क हास्य के साथ कहा। "रोना इस धरती पर मेरे आखिरी दिनों को उदास कर देगा, और मैं ऐसा नहीं चाहती।" मैंने उसे नाश्ते के कोने में कुर्सी पर आराम से बैठने में मदद की और उसके चारों ओर एक कंबल लपेट दिया। वह थक कर तकिये पर झुक गई। अपने बेडरूम से रसोई तक चलने में ही वह थक गई थी। डॉक्टर ने मुझे एक साल या कुछ महीने बताए थे, लेकिन संभवतः? डॉक्टर ने अस्पताल का सुझाव दिया था, और मैंने मना कर दिया था। श्रेया भी ऐसा नहीं चाहती थी। मैं यहाँ थी, और मैं उसकी देखभाल कर सकती थी। मैं उसे नहलाती, सहारा देती, उसे बाथरूम ले जाती और यदि वह उल्टी करती थी तो उसे सम्हालती। वह सब करती जो उसे चाहिए होता था। वह अब बहुत सोती थी, बहुत कम खाती थी, थोड़ी चाय पीती थी क्योंकि पानी का स्वाद उसे बुरा लगता था। अपनी प्यारी दोस्त को इस तरह मरते हुए देखना दर्दनाक था। "पुदीने की चाय चाहिए?" उसने सिर हिलाया, उसकी साँसें उथली थीं। मैंने केतली चालू की और एक बर्तन में चाय, पुदीने की पत्तियाँ और थोड़ा शहद डाला। उसका गला दुखता था और शहद दर्द को कुछ हद तक कम करने में मदद करता था।

"अंशुमन बुरा आदमी नहीं है," श्रेया ने अचानक कहा।

"नहीं, वह बुरा आदमी नहीं है।"

"वह एक स्वार्थी कमीना इंसान है, लेकिन तुमने भी तो उसे अपने साथ ऐसा व्यवहार करने की अनुमति दी। गलती तुम्हारी भी है, तुमने कभी विरोध नहीं किया"

"मुझे पता है श्रेया, कि मेरी भी गलती है" मैंने चाय के प्याले को मेज पर रख दिया।

श्रेया ने अपने दिवंगत पति के बीमे के पैसे का इस्तेमाल उस घर को रिसॉर्ट में बदलने के लिए किया, घर जो पति ने उसके लिए छोड़ा था। वह जगह, जो कभी उसके पति की दादी की थी, एक अविश्वसनीय संपत्ति थी। पहले यह बस एक उपेक्षित कूड़ा-घर था जिसे कोई नहीं चाहता था, लेकिन श्रेया ने इसकी क्षमता देखी और इसे बहाल करने में खुद को झोंक दिया। जैसे भी मैं मदद कर सकती थी, मैंने मदद की। जब वह दो साल पहले बीमार पड़ी, तो मेरा उस से मिलने जाना और भी ज़्यादा बढ़ गया। मैं उसकी कीमोथेरेपी के दौरान उसके साथ रहना चाहती थी और यह सुनिश्चित करना चाहती थी कि रिज़ॉर्ट का संचालन सुचारू रूप से चलता रहे - आखिरकार यह उसकी आजीविका थी। और अब मेरी भी तो!

"तुमने बच्चों को मेसेज कर लिया?" श्रेया ने पूछा।

मैंने अपना सिर ना मेँ हिलाया। "मुझे डर लग रहा है। शनिवार को करूँगी। लेकिन चिंता की ज़रूरत नहीं है - वैसे भी जब मैं फ़ोन करती हूँ तो वे शायद ही कभी फ़ोन उठाते हैं।"

"प्रियंका, तुम अपने परिवार से बहुत प्यार करती हो।"

मैंने श्रेया के हाथ को थपथपाया। जब हम छोटे थे, तो लोग हमें ब्लैक एंड व्हाइट कहकर बुलाते थे। हम अविभाज्य थे, जैसे आप तभी हो सकते हैं जब आपका घर संकट में हो, और आप एक दूसरे की जीवन रेखा हों। हमने अपने लिए अच्छा किया। हम झोंपड़ पट्टी से बाहर निकल आए। अब हमको देखो! "मैं अपने परिवार से प्यार करती हूँ, लेकिन मुझे भी तो प्यार की ज़रूरत है," मैंने कहा। "मैं उन लोगों की देखभाल करते-करते थक गई हूँ जो मेरा कभी साथ नहीं देते।" ... "इसमें मैं भी शामिल हूँ क्या?" श्रेया ने कर्कश स्वर में कहा।

मैं हँस पड़ी "तुम मेरी हो, श्रेया। हमारा साथ हमेशा का है, प्यारी सखी।" उसने एक कमजोर हंसी निकाली जो खाँसी में बदल गई। उसने अपना गला शांत करने के लिए थोड़ी चाय पी। "तुम्हें उन्हें बताना तो होगा न, कि तुम कहाँ हो।"

“वे जानते हैं कि मैं तुम्हारे साथ हूँ। वे जानते हैं तुम ही मेरी दोस्त हो। और उन्होंने मेरी एकमात्र मित्र से मिलने की कभी जहमत नहीं उठाई। मैंने उनसे लक्षद्वीप का ज़िक्र किया, लेकिन पता नहीं वे मेरी बात सुन भी रहे थे या नहीं।" मैं कड़वाहट से भरी थी। अपने परिवार के लिए मैं कुछ नहीं थी - सिर्फ माँ और पत्नी; जो “मौजूद” थी एक कुर्सी टेबल की तरह। उनकी सुविधा के लिए। मेरा अपना कोई अस्तित्व नहीं था उन सब के लिए।

"प्रियंका, अकेले रहना कोई बुरी बात नहीं है। मैं अकेली थी, लेकिन मेरे पास तुम थी। अरे, मेरे चले जाने के बाद तुम्हारे पास वह भी नहीं रहेगा। देखो, अकेले रहना ठीक है; एकाकी हो जाना ठीक नहीं है। इसलिए, जब अंशुमन तुम्हारे पास आए, क्योंकि वह आएगा, तो तुम सुनिश्चित करो कि उसे पता हो कि वह तुम्हें वापस क्यों चाहता है।"

मेरे मुँह से सिसकी निकल पड़ी। "मुझे नहीं लगता कि वह मुझे वापस चाहता है, श्रेया। मुझे नहीं लगता कि वह मुझे पहले भी सच्चे मन से चाहता था। उसने हमेशा मुझे एहसास दिलाया कि उसने मुझसे शादी कर के मुझ पर एहसान किया है। और एक समझौते पर हस्ताक्षर के कारण मैं उसके साथ रहने पर मजबूर हूँ।"

मैंने अपना सिर उसके कंधे पर टिका दिया और उसने मुझे अपने पास खींच लिया। हम साथ में वैसे ही बैठे रहे, जैसे बचपन में झोंपड़ पट्टी मेँ बैठते थे। तब बाहरी दुनिया हमारी दुश्मन थी। और अब?

अब, हमारे शत्रु हमारे अंदर बस गए थे - उसका कैंसर और मेरा टूटा हुआ दिल।

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