ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग आठ (08)
भाग 8
अंशुमन
मैं काम से जल्दी निकलकर रक्षित के घर चला गया। हम भाई भी थे और दोस्त भी, और अगर कोई मेरी कमज़ोरियों को पहचान सकता था, तो वह वही था। "अरे, क्या हुआ?" रक्षित ने घबरा कर पूछा। मैं जानता था कि मेरा दर्द मेरे चेहरे पर लिखा हुआ था।
"देविका आसपास है?" मैं उसकी पत्नी से, जो बहुत क्रूर थी, अच्छे दिन पर भी, मिलना नहीं चाहता था। "नहीं। वह बाहर है। महिलाओं की पार्टी।"
"बहुत बढ़िया। मुझे एक अच्छी ड्रिंक चाहिए।"
हम उसके ‘बार’ वाले कमरे मेँ गए, उसके घर में यही एक जगह थी जहां देविका रक्षित को फुटबॉल देखने के लिए अकेला छोड़ देती थी और वह शराब पीकर मदहोश हो जाता था।
मैं बैठ गया। रक्षित ने मुझे दो फिंगर स्कॉच दी तो मैंने उसका शुक्रिया अदा किया। वह मेरे सामने बैठ गया। "तुम्हारे दिमाग में क्या गड़बड़ चल रही है, भाई?"
"प्रियंका मुझे छोड़कर चली गई है रक्षित।" शब्द फुसफुसाहट के रूप में निकले।
"कब?" ..... "कुछ सप्ताह पहले।"
रक्षित ने सिर हिलाया, जैसे उसे आश्चर्य न हुआ हो। "बधाई हो?"
"क्या???? यह क्या बकवास है, रक्षित?"
उसने मेरी ओर उलझन में देखा। "मुझे... हम सब को, ऐसा लग रहा था कि तुम यही तो चाहते थे। क्या ऐसा नहीं है?" क्या उसकी आवाज मेँ आरोप घुला था?
"क्या?" मुझे ऐसा महसूस हुआ कि मैं एक ऐसा जीवन जी रहा था जिसके बारे में मुझे कुछ भी पता नहीं था, कम से कम, जिसे दूसरे लोग मुझसे बहुत अलग तरीके से देखते थे।
"मतलब? तुम्हारे प्री-नेपुटल समझौते के अनुसार यदि तुम तलाक मांगों तो उसे हिस्सा देना होगा, लेकिन यदि वह खुद चली जाए तो वह कुछ भी लेकर नहीं जाएगी। इसीलिए तुम उसे अपमानित करते, उपेक्षा करते, जिससे वह खुद तंग आकर तुम्हें छोड़ जाए – नहीं?"
"मैं तलाक नहीं चाहता। मैं अपनी पत्नी से प्यार करता हूँ।"
रक्षित ने अपनी दोनों भौंहें उठाईं। "अच्छा जी! चलो-चलो, मुझे मूर्ख मत बनाओ। अगर तुम अपनी पत्नी से प्यार करते होते, तो तुमने अपनी सेक्रेटरी से प्रेम-संबंध क्यों बनाए होते?"
मैंने थोड़ी व्हिस्की पी और अपना गिलास नीचे रख दिया। मेरी ज़िंदगी एक झंझट बन गई थी। बस यही था। "तुमने ऐसा क्यों सोचा कि मैं काव्या के साथ हूँ?"
रक्षित ने हंसते हुए कहा, "अंशुमन, मैं ही नहीं सब जानते हैं। तुम हमेशा उसके साथ रहते हो। लोग तुम्हें रेस्तराँ में देखते हैं। तुम उसके साथ यात्रा करते हो। पार्टियों में भी तुम काव्या के साथ होते हो और प्रियंका एक कोने में बैठी रहती है और हर कोई उसे ‘पहली पत्नी’ के रूप में देखता है, जिसे जल्द ही बदल दिया जाएगा। हमारी बहन दिव्या और मेरी पत्नी कई बार उसका मजाक बनाती हैं कि वह एक रोड़ा है और जैसे ही वह रास्ते से हटेगी तुम अपनी सेक्रेटरी से शादी कर लोगे। मैंने कई बार उन्हें उससे कहते सुना है और वह चुप चाप आँसू पी लेती। तुम यह अनदेखा करते थे, उसकी हर पार्टी मेँ उपेक्षा करते थे। हम सब को तो यही लगता है कि तुम उसे चले जाने के लिए मजबूर करने के लिए ऐसा कर रहे हो।"
मैंने उन पार्टियों को याद करने की कोशिश की। क्या मैं वाकई प्रियंका के साथ इतना बुरा बर्ताव करता था? अगर सभी ने देखा, तो उसे भी तो ऐसा महसूस हुआ होगा। इससे मेरी प्यारी पत्नी को कितना दुख पहुंचा होगा? प्रियंका, जिसने कभी किसी के बारे में बुरा नहीं कहा, यहाँ तक कि मेरी माँ के बारे में भी नहीं, जिसने उसे हर मौके पर अपमानित किया। मुझे माँ से उसकी रक्षा न करने के लिए दोषी महसूस होता था, यही वजह थी कि मैं आखिरकार अपने अलग घर मेँ जाने के लिए सहमत हो गया। लेकिन सच में मैं अपनी माँ के साथ कोई तमाशा नहीं चाहता था। मुझे उम्मीद थी कि प्रियंका उससे निपटेगी, और उसने चुपचाप यही किया। हमारी शादी के पहले दो वर्षों के बाद, प्रियंका बिल्कुल वैसी पत्नी बन गई थी जिसकी मुझे ज़रूरत थी। वह घर चलाती थी, जब भी मुझे उसकी ज़रूरत होती थी, हमेशा मौजूद रहती थी, जब भी मैं चाहता था, मेरे साथ समागम करती थी, और मेरे परिवार को संभालती थी ताकि वे उसके बारे में मुझसे शिकायत न करें। धिक्कार है! मैं एक स्वार्थी व्यक्ति था। हमारा वैवाहिक जीवन सिर्फ इस बात पर निर्भर करता था कि उसने मेरे लिए क्या किया। आखिरी बार मैंने उसके लिए कब कुछ किया था?
"तो क्या सभी लोग यह मान रहे हैं कि मैं अपनी असिस्टेंट के साथ संबंध बना रहा हूं और अपनी पत्नी को तलाक देने के लिए तैयार हूं?"
रक्षित ने आह भरी। "मुझे समझ नहीं आ रहा क्या कहूँ अंशुमन। यह तो हम सब को वर्षों से स्पष्ट रहा है कि तुम्हें अपनी पत्नी में कोई दिलचस्पी नहीं है। पारिवारिक रात्रिभोज में, हमेशा एक तरफ तुम और जुड़वाँ बच्चे होते हैं, जबकि दूसरी तरफ प्रियंका चुपचाप बैठी रहती है। मुझे उस पर तरस आता था और मैं उससे बात करने की कोशिश करता था, लेकिन देविका ईर्ष्या से भर जाती थी, इसलिए मैंने बात करना बंद कर दिया।"
"देविका प्रियंका से ईर्ष्या क्यों करती है?" यह सब बहुत उलझन भरा था। रक्षित ने उपहास किया और फिर अविश्वास में अपना सिर हिलाया। "तुम्हें पता है कि तुम्हारी पत्नी बहुत खूबसूरत है, है न?"
"हाँ।" प्रियंका एक क्लासिक सुंदरता की मिसाल थी। कभी-कभी, मैं उसके चेहरे से नज़र नहीं हटा पाता था। "और जहां देविका रोजाना डाइट पर रहती है, प्रियंका सहज रूप से छरहरी और सुंदर है। वह प्यारी, मधु-भाषी है और उससे बात करना आसान है। काश मेरी भी ऐसी पत्नी होती..." उसने आह भरी। "तुम्हें तो पता ही है कि देविका कैसी है। बस इसलिए देविका को प्रियंका से ईर्ष्या है" मुझे पता था। देविका एक खास तरह की गड़बड़ थी। मेरा भाई कह रहा था कि मेरी एक अद्भुत पत्नी है, जिसे मैं इस हद तक नजरअंदाज करता रहा हूं कि मेरे मित्रों और परिवार सहित सभी लोग सोचते हैं कि मैं उससे छुटकारा पाना चाहता हूं इसलिए जान-बूझ कर तंग कर रहा हूँ। मैंने व्हिस्की पी ली और अपने लिए कुछ और डाला।
"बच्चे उससे बुरा व्यवहार करते हैं, और तुम इसे कभी नहीं रोकते। खास तौर पर शाश्वत। इस गणेश चतुर्थी के पर्व पर, मुझे उससे बकवास बंद करने के लिए कहना पड़ा, लेकिन शाश्वत ने अनदेखा कर दिया।" यह कैसे हुआ कि मेरा भाई मेरी पत्नी का योद्धा बन गया? वही जिसने उसके मुँह पर उसे लालच मेँ मुझे फँसाने वाली कह कर अपमानित किया था?
"शाश्वत ने क्या कहा था?"
"बस कुछ बकवास था कि वह कुछ नहीं समझ पाएगी क्योंकि वह अनपढ़ है और उसके पास कॉलेज की डिग्री नहीं थी। यह अपमानजनक था, और प्रियंका की आँखों मेँ आँसू आ गए थे।
"मैं कहाँ था?" हां, अंशुमन, इस पूरे समय तुम थे कहां?
“वहीं तो थे - यह सब तुम्हारे सामने ही होता था, अंशुमन। तुम मुझे यह नहीं कह सकते कि तुमने ध्यान नहीं दिया।" जब उसने मेरी आँखों में दर्द देखा, तो वह हैरान रह गया। "तुम सच में मुझसे कह रहे हो कि तुमने नहीं देखा कि कैसे तुम्हारे बच्चे हर बार जब वह बोलने की कोशिश करती थी, तो उसे अपमानित कर के चुप करा देते थे? मेरा मतलब है, नीलिमा तो सिर्फ उसे अनदेखा करती थी, जो बेहतर था, क्योंकि शाश्वत बहुत क्रूर हो जाता है।"
"तुमने कभी कुछ कहा क्यों नहीं?" मैंने घबराकर पूछा।
"जब यह सब तुम्हारे सामने हो रहा था, तो मैं कुछ क्यों कहूँगा?" उसने जवाब दिया। "क्या बकवास है, अंशुमन? मुझे तो यही लगता था कि तुम उससे छुटकारा पाने की कोशिश कर रहे हो। जान बूझ कर यह सब कर रहे हो जिससे वह तुम्हें छोड़ जाए और तुम्हें उसे कुछ देना न पड़े। मुझे तुम्हारे तरीके पसंद नहीं आए, लेकिन मेरी अपनी वैवाहिक समस्याएँ हैं, एक पत्नी के साथ जो हर पाँच मिनट में खाने दौड़ती है, इसलिए तुम अपनी शादी की गड़बड़ी का दोष मुझ पर मत लगाओ।"
मुझे एहसास हुआ कि इसके लिए मैं किसी को दोषी नहीं ठहरा सकता। मैंने अपनी पत्नी को हल्के में लिया और मेरे बच्चे भी मेरे व्यवहार का अनुकरण करने लगे। "पहले ऐसा नहीं था।" रक्षित ने आगे कहा, "ठीक है, तुम हमेशा काम करते रहते थे लेकिन पहले उसके साथ नरमी से पेश आते थे। मुझे लगता है कि जब बच्चे छोटे थे तो वह खुश रहती थी। वह एक बहुत अच्छी माँ है। देविका के साथ मेरे झगड़ों को देखते हुए, मुझे ईर्ष्या होती थी कि तुम कितने खुश-किस्मत थे। अरे, मेरे बच्चे भी प्रियंका के साथ घूमना पसंद करते थे, यही वजह थी कि देविका जलन के मारे उन्हें ऐसा करने नहीं देती थी। लेकिन फिर जुड़वाँ बच्चे किशोर हो गए, और वे बदल गए। वे तुम्हारे साथ अलग हैं। वे तुम्हारा सम्मान करते हैं।"
"वे प्रियंका का भी सम्मान करते हैं," मैंने कहने की कोशिश की।
"नहीं, अंशुमन, वे उसका लगातार अपमान करते हैं। और मेरे ऊपर गुस्सा मत करो; लेकिन वे यह अपमान इसलिए करते हैं क्योंकि तुम खुद उसका हर समय अपमान करते हो। वे यह क्रूरता तुमसे ही सीखे हैं।"
"मैं उसका सम्मान करता हूँ," मैंने झल्लाकर कहा। लेकिन मैं भी अपने दिमाग में अतीत की बातें सुन सकता था। "भगवान के लिए, प्रियंका, मैं काम कर रहा हूँ। क्या तुम खुद अपना काम नहीं संभाल सकती हो?” यह तब, जब उसे मेरी मां के आगे मेरी मदद चाहिए थी।
"क्या तुम सच में डिनर तैयार न कर पाने की बात कह रही हो, प्रियंका? मैंने तुम्हें एक सप्ताह पहले ही बता दिया था कि हमारे यहाँ लोग आ रहे हैं। तुम कैसे भूल सकती हो? तुम बिल्कुल बेकार पत्नी हो" यह तब की बात है जब मैंने उस पर उसकी गलती के बिना ही क्रोध किया और इसके लिए माफी नहीं मांगी, जबकि मुझे पता था कि मैं झूठ बोल रहा हूँ, मैंने उसे हफ्ते पहले नहीं बताया था। मैंने उसे दस लोगों के लिए डिनर तैयार करने के लिए तीन घंटे का समय दिया था, क्योंकि मेरी सेक्रेटरी उसे इस बारे में फोन करना भूल गई थी। लेकिन मैंने प्रियंका पर ही दोष लगाया था।
फिर एक और डिनर के दिन "यह महत्वपूर्ण है, इसलिए कृपया इन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करने का प्रयास करना।" मैं यही कह रहा था कि मुझे शर्मिंदा मत करना। लेकिन उसने तो कभी मुझे शर्मिंदा नहीं किया। तो मैं उसके साथ इतना बुरा व्यवहार क्यों करता रहा था? ऐसे करना मेरी आदत बन गई थी, बिना सोचे कि इससे उसे कैसा लगता होगा। लेकिन जब मैं उसके साथ था, तो उसने जीवन को सुरक्षित और प्रेमपूर्ण बना दिया; उसने मेरी दुनिया को प्रेम और गर्मजोशी का आश्रय बना दिया।
उसे सबके सामने अपमानित करने के बाद रात मेँ मैं अपनी प्यास बुझाने पहुँच गया था "आज रात मुझे ज़रूरत है, बेब," उसकी भावनाओं को पूरी तरह नजरअंदाज करके मैंने बेरुखी से कहा। मेरे लिए सिर्फ अपनी जरूरत महत्वपूर्ण थी "मेरे प्रिय अंशुमन, मैं तुमसे प्यार करती हूँ।" उसने हमेशा की तरह मुस्करा कर मेरे लिए अपनी बाहें खोल दी थीं, कोई शिकवा शिकायत नहीं थी। तब मुझे गर्व होता था कि मेरी पत्नी इतनी समर्पित थी, मेरे दोस्त मुझे कहते थे कि वे मुझसे ईर्ष्यालु थे। अब मुझे समझ आ रहा था कि वे प्रियंका को दया से देखते थे। वे सोचते थे कि घर पर मेरी बेचारी पत्नी मुस्कराती हुई मेरी परवाह करती थी जबकि उसका पति जाहिर तौर पर अपनी सहायक के साथ संबंध बना रहा था। यह सच नहीं था। मेरा अपनी सेक्रेटरी से संबंध नहीं था। लेकिन सब तो ऐसा ही सोचते थे। मैंने बाद मेँ उससे कहा, "प्रियंका, तुम मुझे मना कर सकती हो।"
"मुझे पता है। लेकिन मैं ऐसा नहीं करना चाहती। हम जो कुछ भी करते हैं, प्रिये, वह अद्भुत है क्योंकि हम इसे एक साथ करते हैं। यह हमारी अपनी दुनिया है।" क्या उसे लगता होगा कि अगर वह मेरी बात नहीं मानेगी तो मैं नाराज़ हो जाऊँगा? नहीं, ऐसा नहीं था। उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि यही वह समय था जब मैं उसके लिए पूरी तरह से अकेला होता था। मैं अभी भी अपनी सांसें थाम रहा था। उसने आगे कहा था "यही समय है जब हम सिर्फ़ ‘हम दोनों’ होते हैं, जो अनमोल है।"
मैंने मज़ाक में कहा, "प्रियंका, यहाँ हमेशा सिर्फ़ हम ही रहते हैं। बच्चे पढ़ने चले गए हैं।"
"खैर, तुम काम में व्यस्त रहते हो, इसलिए यह अच्छी बात है।"
"काम की बात हुई है तो, मैं अगले सप्ताह के अंत तक न्यूयॉर्क जा रहा हूँ - हमारा वहां एक बड़ा प्रोजेक्ट है।"
"आह... अम्म ... क्या मैं साथ आ जाऊँ?"
मैंने उसे एक तरफ़ बिठाया और बैठ गया। "यह कोई छुट्टी नहीं है, प्रियंका। मैं काम पर जा रहा हूँ, और हम शायद बिज़नेस डिनर करेंगे।"
"ठीक है।" उसके चेहरे पर निराशा थी, उसकी आंखें उदास थी लेकिन मुझे खुश रखने के लिए मुस्कराई। "चलो प्रियंका, ऐसा मुंह मत बनाओ। तुम काम के बीच में आओगी। मैं काम पर हूँ। तुम वहाँ भी अकेली होगी, तो न्यूयॉर्क के होटल में रहने के बजाय यहीं अकेली रहो।"
"मैं समझती हूँ प्रिय अंशुमन। यह सिर्फ़ एक विचार था। चिंता मत करो।" वह बिस्तर से उठी और बाथरूम में चली गई। मैंने शॉवर शुरू होते सुना। मेरा एक हिस्सा अंदर जाकर उसके साथ दूसरा दौर शुरू करना चाहता था। मैं उससे कभी भी तृप्त नहीं होता था। लेकिन मैं नहीं गया। मैं उसके चेहरे पर उस हार के भाव के बारे में दोषी महसूस नहीं करना चाहता था जब मैंने उसे बताया कि वह मेरे रास्ते में आएगी। लेकिन अहंकार – मैं उसके सामने अपनी गलती स्वीकार नहीं कर सकता था। उफ्फ़! मेरे जैसे ‘समझदार आदमी’ ने उसकी प्यार माँगने की विनती कैसे नहीं सुनी? मैं कैसे नहीं देख पाया कि वह कह रही थी कि मैं उस पर ध्यान दूँ? वह अपने पति से मिलने के लिए कह रही थी। "वह कहाँ गयी है?" रक्षित ने पूछा।
मैंने अपने बालों में हाथ फेरा। "यह सबसे ज़्यादा गड़बड़ वाली बात है रक्षित; मुझे बिल्कुल नहीं पता। उसने सब कुछ छोड़ दिया। उसका फ़ोन, और उसके सारे क्रेडिट कार्ड, सारे गहने। कपड़े भी सिर्फ पुराने कामचलाऊ जींस-टॉप ले गई है, कोई डिजाइनर कपड़े या हैन्ड्बैग नहीं। हर चीज़ यहीं छोड़ गई है। मुझे एक नोट छोड़ा, कि वह पाँच हज़ार रुपये ले रही है, लेकिन वह उस बकवास प्री-नेपुटल समझौते की वजह से उसे भी वापस कर देगी।" मैंने अपना चेहरा अपने हाथों में छिपा लिया और मेरे अंदर आँसू उमड़ कर बाहर निकलने लगे।
"भाड़ में जाओ," रक्षित बुदबुदाया। "बेचारी प्रियंका।"
मैंने ऊपर देखा, मुझे एहसास हुआ कि मेरे चेहरे पर आँसू बह रहे थे। "तुमने तो उसे लालची औरत कहा था। उसके सामने ही।"
"मैं तब एक मूर्ख बच्चा था। मेरा विश्वास करो, मैं ऐसी औरतों से मिला हूँ। प्रियंका खुद सोना थी। उसने हमारी राक्षसी माँ को संभाला। वह तब भी शालीन रहती थी जब देविका या दिव्या क्रूर होती थीं। जानते हो, उसने कभी भी तुम्हारे बारे में शिकायत नहीं की, तब भी नहीं जब मैंने उससे कई बार पूछा कि चीजें कैसी चल रही हैं? वह बस इतना कहती थी कि तुम अपने परिवार के लिए कड़ी मेहनत करते हो, और उसे तुम पर बहुत गर्व है।"
"मुझे बहुत अच्छा लगता था कि वह मेरी ओर ऐसे देखती थी जैसे मैं कोई सुपरहीरो हूँ।"
रक्षित इस बात पर कड़वाहट से हंस पड़ा। मैं उससे सहमत था। सुपरहीरो! मैं तो अपनी शादी की बीसवीं सालगिरह भी भूल गया। "तुम्हें क्या लगता है वह कहां गई होगी?"
"मैं अनुमान लगा रहा हूं - श्रेया।"
रक्षित ने सिर हिलाया, "क्या यह उसकी दोस्त है जिसे कैंसर है?"
"हाँ।" ..... "मैंने उसे पिछले साल कंपनी की नए साल की पार्टी में रोते हुए देखा था।"
मैंने रक्षित की ओर देखा, "क्या?"
उसने सिर हिलाया। "हाँ, वह अकेली ही आग के पास बैठी हुई थी। मुझे उसके लिए बुरा लगा। उसने बहुत बढ़िया खाना पकाया था, पूरी पार्टी का आयोजन किया था, लेकिन वह अकेली थी जिसे इसका कोई मज़ा नहीं आ रहा था। कोई उससे बात नहीं कर रहा था, तुम काव्या के साथ हंस बोल रहे थे। वह बहुत उदास थी।" मुझे याद आया कि मैंने काम से कुछ लोगों को आमंत्रित किया था। काव्या वहाँ आई थी। मैंने बहुत अच्छा समय बिताया - अपने बच्चों, अपने सहकर्मियों, अपने भाई, अपने दोस्तों के साथ समय बिताया। जब हमने नया साल मनाया तो मैंने बच्चों को चूमा। लेकिन मुझे याद नहीं कि अगले दिन क्या हुआ।
क्या मैंने अपनी पत्नी को नव वर्ष की शुभकामनाएँ दी थीं? रक्षित कहता रहा "वह परेशान थी। अगली सुबह उसे अपनी दोस्त के पास जाना था जो कीमोथेरेपी करवा रही थी। वह दो दिन पहले जाना चाहती थी लेकिन तुमने उसे कहा कि तुम्हारी ‘नेटवर्किंग’ पार्टी महत्वपूर्ण है और उसका रहना जरूरी है।" मैं सुबह करीब चार बजे बिस्तर पर कर सो गया था। जब तक मैं उठा, प्रियंका जा चुकी थी। उसने हमेशा की तरह मेरे लिए खाना छोड़ा था, जो वास्तव में कोई मायने नहीं रखता था क्योंकि मैंने काव्या और काम से जुड़े अन्य लोगों के साथ खूब खाया था। "मैंने उससे कहा कि वह एक अच्छी दोस्त है। मेरा मतलब है, वह श्रेया के सभी कीमो उपचारों में गई थी, सिवाय एक दो के, जब मुझे लगता है कि तुम्हारा कोई काम रहा था। यह होती है देखभाल!" बोलते हुए रक्षित सिर हिला रहा था, उसकी आँखों में मेरी पत्नी के लिए विस्मय और सम्मान था। हाँ, प्रियंका ठीक ऐसी थी, देखभाल करने वाली, ध्यान रखने वाली, प्यार करने वाली। मुझे याद है कि उसे वह कीमोथेरेपी छोड़ देनी पड़ी क्योंकि मुझे कार्यक्रम में उसके साथ की ज़रूरत थी। क्या मैंने अपना समय उसके साथ बिताया, या मैंने वही किया जो रक्षित ने कहा था; काव्या और अन्य लोगों के साथ रहा, अपनी ‘पहली’ पत्नी को एक कोने में बैठा कर?
"मैं उससे प्यार करता हूँ, रक्षित।"
"लगता तो नहीं है अंशुमन। किसी को भी नहीं लगता। क्या सच मेँ?"
"हाँ," मैंने ईमानदारी से कहा। "प्रियंका मेरी ज़िंदगी को बेहतर बनाती है। पिछले कुछ महीने हमारे अंतर्राष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स में बहुत व्यस्त रहे हैं, लेकिन जब मैं घर आता हूँ और उसके साथ बिस्तर पर जाता हूँ, तो ऐसा लगता है जैसे मेरी पूरी दुनिया सही है।" तो फिर तुम अक्सर अतिथि कक्ष में क्यों सोते हो, बेवकूफ? मुझे लग रहा था कि मेरे इर्द-गिर्द दुनिया ढह रही है, और अब मुझे पता चल रहा था कि यह सब मेरे ही हाथों से होता रहा है। "मैं उसे कभी धोखा नहीं दूंगा। मैं ऐसा नहीं करना चाहता। बच्चों के बाद भी, सभी कहते हैं कि सेक्स खत्म हो गया, लेकिन हमारे साथ ऐसा नहीं हुआ।" लेकिन हाल ही में हमारा साथ नहीं हुआ, पिछले कई महीनों से नहीं। मैं देर रात तक काम कर के अतिथि कक्ष में सोने लगा था।
"अंशुमन, बिस्तर मेँ अपनी शारीरिक जरूरत पूरी करने के लिए पत्नी को उपयोग कर लेना प्यार नहीं होता मेरे भाई। किसी को नहीं लगता कि तुम्हें उससे प्यार है। मुझे संदेह है कि प्रियंका को भी कभी ऐसा लगता होगा। तुम भाग्यशाली हो।"
"हाँ, मैं भाग्यशाली था।" मैंने आह भरी। "ओह! क्या मैं उसके साथ इतना बड़ा गधा था?"
"पता नहीं जब तुम दोनों अकेले होते थे, तब कैसा था, लेकिन जब मैं आसपास था, हाँ। फिर एक बार तुम नशे में थे, और हम सब शादी के रिश्ते के बारे में बात कर रहे थे।"
मुझे वह रात याद आ गई। हमारे साथ कुछ लोग आए थे। हमारे दोस्त ईशानी और विवेक भी वहाँ थे। एक साल बाद उनका तलाक हो गया। मेरी बहन दिव्या और शुभम भी थे। लेकिन उस रात हम सब इस बारे में बात कर रहे थे कि हम सब कैसे एक साथ आए। "मैं प्रियंका से तब मिला था जब वह यूनिवर्सिटी के पास एक रेस्टोरेंट में काम करती थी," मैंने कहा। "वह बहुत खूबसूरत थी और बेशक, मैं प्यार मेँ पड़ गया। मूर्खता की उम्र थी। हम उन दिनों कैसे बेवकूफ होते थे?" देविका और रक्षित सोफे पर साथ बैठे थे जबकि ईशानी और विवेक कॉफी टेबल के दूसरी तरफ के सोफ़े पर। प्रियंका मेरे पास में एक आराम-कुर्सी पर बैठी थी ताकि वह रसोई में अंदर-बाहर जा सके और सभी का ख्याल रख सके। उसने खाना पकाया था, क्योंकि वह बहुत बढ़िया खाना बनाती थी, जिस पर मुझे हमेशा बहुत गर्व होता था। यहाँ तक कि माँ या देविका भी उसके खाने के बारे में कुछ नहीं कह सकती थीं। हम खाना खा कर अंत में वाइन और कॉफी पी रहे थे। "हमने बच्चों की वजह से शादी आगे भी बनाए रखी। लेकिन कौन जानता है कि अगर वे न होते तो क्या होता।"
प्रियंका ने मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे मैंने उसे थप्पड़ मार दिया हो, और मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं और चिढ़ गया। "मेरा ऐसा मतलब नहीं था, अपने चेहरे से वह दुख भरी नज़र हटाओ, लानत है यार। और यह सालों पहले की बात है; हम इसे भूल सकते हैं, है न?"
"बेशक। क्या कोई और कॉफी या वाइन लेना चाहेगा?"
"क्यों न मैं आपकी मदद करूँ?" रक्षित प्रियंका के साथ रसोई में चला गया।
मैंने अगले दिन प्रियंका से माफ़ी मांगी और कहा कि मैंने बहुत ज़्यादा शराब पी ली थी। उसने मेरी माफ़ी स्वीकार की और नाश्ता बनाया, और बस इतना ही। अब, जब मैंने उस बातचीत के बारे में सोचा, तो मुझे उल्टी आने लगी। मैंने उसे कितना अपमानित किया। कोई आश्चर्य नहीं कि सभी ने मान लिया कि मैं उससे छुटकारा पाना चाहता हूँ; सच ही मेँ, शायद उसे भी यही लगता होगा। रक्षित ने आगे कहा "मैंने अंदर जाकर पूछा कि क्या वह ठीक हैं, मुझे आश्चर्य हुआ था कि तुमने सबके सामने ऐसा कहा। उस पल मेँ, किसी दूसरे पुरुष के पूछने पर, कोई भी दूसरी महिला अपने पति के खिलाफ बोल पड़ती। लेकिन प्रियंका ने मुझे कॉफी को लिविंग रूम में वापस ले जाने में मदद करने के लिए कहा और मुझे उसका हालचाल पूछने के लिए धन्यवाद दिया। कोई शिकायत नहीं की।"
"मैंने उसके लिए उससे माफ़ी मांगी थी"
"हुँह! और माफी मेँ क्या कहा था तुमने?"
"यह ‘लेकिन मैं नशे में था’ वाली माफी थी, जो बिल्कुल भी ईमानदार नहीं थी।"
"क्या जुड़वाँ बच्चों के कारण तुम्हें उससे शादी बनाए रखने की मजबूरी पर कोई क्रोध है?"
मैंने ‘न’ मेँ अपना सिर हिलाया. "मुझे उसके साथ जीवन पर बहुत खुशी है।"
"तो फिर अंशुमन, तुम अपनी पत्नी के साथ कूड़े जैसा व्यवहार क्यों करते रहे हो?" मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था। मुझे लगता था कि मैं खुश हूँ। मुझे लगता था कि हम ठीक-ठाक हैं। नहीं, यह सच नहीं है। मुझे पता था कि वह खुश नहीं थी। मैं सोचता रहा, कि जैसे ही काम मेँ चीजें आसान हो जाएंगी, मैं उसके पास पहुँच जाऊँगा। वह कहीं नहीं जाने वाली, लेकिन मेरे ग्राहक शायद जा सकते थे।
तभी देविका आई, एक बहुत ही टाइट ड्रेस में जो मैं उसकी उम्र की किसी महिला को पहने हुए नहीं देखना चाहता था। मेरा मतलब है, मुझे इस बात से कोई मतलब नहीं था कि कोई महिला क्या पहनती है; यह उसकी अपनी पसंद थी, लेकिन देविका, प्रियंका के बारे में झुग्गी के बारे में की गई सभी बकवास टिप्पणियों के बावजूद, बहुत अभद्र कपड़े पहनती थी। जब प्रियंका झुग्गी में रहती थी, तब भी ऐसी नहीं दिखती थी। वह हमेशा, सस्ते कपड़ों में भी, सुंदर सौम्य और आकर्षक दिखती थी। क्या मैंने उसे कभी यह बताया था? देविका ने नीले रंग का सीक्विन वाला गाउन पहना था जो उसके शरीर को और उभार रहा था। उसने हाल ही में महंगा टमी टक करवाया था जो कारगर रहा, क्योंकि उसका पेट सपाट था। प्रियंका ने बिना सर्जरी के कसरत की और अपना ख्याल रखा। क्या प्रियंका को लगा कि उसे ऐसा करने की ज़रूरत है क्योंकि मैं उसे नहीं चाहता? अब मेरे मन में बहुत सारे सवाल थे। "अंशुमन, तुम्हें देखकर बहुत अच्छा लगा। कैसा चल रहा है?" उसने मुझे हवा में चूमा और फिर अपने पति के पास बैठ गई। "प्रियंका उसे छोड़कर चली गई," रक्षित ने उससे कहा।
देविका ने दोनों भौंहें उठाईं और खुशी से ताली बजाई। "अच्छा, अरे, तब तो हमें शैंपेन खोलनी चाहिए।" मैंने उसकी तरफ देखा। खैर, उसे ऐसा क्यों नहीं लगेगा कि यह जश्न मनाने का क्षण है, क्योंकि मेरा भाई भी, जो मुझे बेहतर जानता था, ऐसा ही सोचता था? "क्या हुआ?" देविका ने हम दोनों की उदासी देख कर चकित आवाज मेँ पूछा।
"मैं नहीं चाहता था कि वह मुझे छोड़ कर चली जाए, देविका," मैंने कहा।
"सच में? क्योंकि हम सब को तो ऐसा लग रहा था कि तुमने जान बूझ कर ऐसा माहौल बनाया। और माँ जी ने कई बार सभी को बताया कि तुम्हारा प्री-नेपुटल समझौता कैसे सेट किया गया था। उन्होंने मुझे बताया था कि प्रियंका ने इसे बिना पढे हस्ताक्षर कर दिए थे। ‘मूर्ख लड़की’, उन्होंने कहा था। मैंने तो भाई, अपने वकीलों से अपने समझौते को बारीकी से जांचने को कहा” देविका अपने पति की ओर मुड़ी। "प्रिय, एक ग्लास वाइन प्लीज।" रक्षित उसके लिए कुछ पीने के लिए लेने चला गया। वह षड्यंत्रकारी ढंग से आगे झुकी। "अंशुमन, कृपया अपनी असिस्टेंट से शादी मत करना। मेरा मतलब है, तुम जो भी कर रहे हो, ठीक है, लेकिन उसे राव-सिन्हा मत बनाओ। प्रियंका जैसी गंदगी की पैदाइश से छुटकारा पाने में तुम्हें बहुत समय लग गया और अब एक और मध्यम वर्ग से आई लड़की को परिवार मेँ ---"
"देविका, मैं अपनी पत्नी से प्यार करता हूँ," मैंने बीच में कहा। " मैं उससे बहुत प्यार करता हूँ। मेरा काव्या के साथ कोई संबंध नहीं है। मैं अपनी पत्नी से प्यार करता हूँ। मैं उसे वापस लाना चाहता हूँ।"
देविका भी रक्षित की ही तरह उलझन में दिखी! "कोई भी विश्वास नहीं कर सकता, कोई नहीं सोचता कि तुम अपनी पत्नी से प्यार करते हो, अंशुमन" उसने उपहास करते हुए कहा।
"हाँ, मुझे एहसास होने लगा है, कि मैं प्रियंका के लिए एक बहुत बुरा आदमी रहा हूँ।"
"खैर, कम से कम वह तुमसे कुछ नहीं ले सकती, यह राहत की बात है।"
"किसके लिए राहत?" ..... "हम सभी जो परिवार की परवाह करते हैं।"
"तुम चाहती हो कि मेरी पत्नी के पास पैसे न हों? बीस साल की शादी के बाद वह कंगाल हो जाए?" मैं उठ खड़ा हुआ, मेरे अंदर उलटी आने का भाव उमड़ रहा था। "क्यों? वह एक अद्भुत पत्नी और माँ है। तुम सब उसे इतना नापसंद क्यों करते हो?"
"ईमानदारी से कहूँ तो अंशुमन, सवाल तो यह है कि ‘तुम’ उसे क्यों नापसंद करते हो? हम सब तो इसलिए ऐसा करते हैं कि तुमने हमें ऐसा करने के लिए हमेशा प्रोत्साहित किया है।" देविका ने पलटकर कहा।
"मैं उसे नापसंद नहीं करता, थोड़ा सा भी नहीं। मैं उससे बहुत प्यार करता हूँ।"
"जिस तरह से तुम उसके साथ व्यवहार करते हो, जिस तरह से तुम्हारे बच्चे तुम्हारे सामने उसके साथ व्यवहार करते हैं? किसी को भी ऐसा नहीं लगता। रक्षित और मेरे बीच कुछ मुद्दे हो सकते हैं, लेकिन अगर हमारे बेटे कभी मुझसे उस तरह बात करें जैसे शाश्वत प्रियंका से करता है, तो वह अपना आपा खो देगा।"
रक्षित रेड वाइन का गिलास लेकर वापस आया और देविका के सामने रख दिया, और अपनी पत्नी के पास बैठते हुए बोला "मैं सोच रहा था कि यह कौन जानता होगा कि प्रियंका कहाँ है? ईशानी। वे दोनों दोस्त थीं।” “हाँ, ठीक कहा तुमने” मैंने उठते हुए कहा। “मैं ईशानी से बात करूँगा।"
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