ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग छः (06)
भाग 6
अंशुमन
मुझे ऐसा लग रहा था जैसे घर मेँ कोई मर गया हो। बच्चों और मुझे पूरे एक हफ़्ते से प्रियंका की कोई खबर नहीं मिली थी। दीपावली कुछ ही दूर थी, और मेरे दिल में बिल्कुल भी खुशी नहीं थी। घर में कोई आत्मा नहीं थी, सिर्फ़ मैं, आधी ज़िंदा आत्मा, भटकती, इधर-उधर भागती हुई। मैं हर दिन काम से लौटता था, इस उम्मीद में कि आज वह वापस आएगी। शाश्वत ने फोन पर मुझसे बेरुखी से कहा, "पापा, माँ को अपने मध्य जीवन संकट/ नर्वस ब्रेकडाउन से निपटने दीजिए, और फिर वह घर आ जाएंगी"
"बदतमीजी बंद करो, शाश्वत। मैं गंभीर हूँ। तुम लगातार माँ का अनादर कर रहे हो।"
"क्या????"
नीलिमा ने ग्रुप कॉल पर कहा, "पापा सही कह रहे हैं, शाश्वत, माँ इस तरह के बर्ताव की हकदार नहीं है। हम सब ने उसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया है। यशस्वी ने कहा कि उसे बिल्कुल आश्चर्य नहीं हुआ कि माँ हम सब को छोड़ कर चली गयीं।”
शाश्वत "हूँ? वह सिर्फ एक बार माँ से मिला है।"
"हाँ, और उसके लिए एक मुलाकात ही यह देखने के लिए काफी थी कि हम माँ के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते। उसने कहा कि उसने माँ से बात की और उन्हें काफी दिलचस्प पाया। वह आश्चर्यचकित था कि हम लोगों ने माँ के साथ कोई बातचीत नहीं की...सिवाय इसके कि....कि .."
"सिवाय किस बात के नीलिमा? बोलो न?" शाश्वत ने पूछा।
"मुझे बहुत शर्म आ रही है, पापा। यशस्वी को याद है कि आप फ्रैंक लॉयड राइट के बारे में बात कर रहे थे, और माँ ने कहा कि वह उनके घरों में से एक में गई थी, और वह घर उनकी पसंद के हिसाब से बहुत ही कठोर था। तब शाश्वत ने कहा कि वह उनकी शैली को नहीं समझ पाई क्योंकि वह अनपढ़ जैसी हैं, क्योंकि वे कॉलेज नहीं गई थी।"
शाश्वत ने बचाव करते हुए कहा, "मैंने ऐसा कभी नहीं कहा था।"
"यशस्वी को इस बात का हर शब्द याद है, शाश्वत। तुमने कहा था, ‘मुझे नहीं लगता कि आप उसकी प्रतिभा की सराहना कर सकती हो, माँ, क्योंकि आपने मेरी तरह इसका अध्ययन नहीं किया। मेरा मतलब है, आप तो कभी कॉलेज भी नहीं गई हो!’ और फिर तुम व्यंग्य से हँसे और विषय बदल गया। यशस्वी ने मुझे बताया कि माँ सदमे में दिख रही थी कि उन के अपने बच्चे उनके पति और यशस्वी के साथ खड़े होकर उनका मखौल उड़ा रहे हैं। उनकी आँखों मेँ एक पल को आँसू आए थे और उन्होंने पलकें झपक कर आँसू रोके और खुद को नियंत्रित कर लिया था। फिर रसोई से कुछ लाने के लिए उठ गईं। जब वह वापस आई, तो वह अपने आप में मुस्करा रही थी, लेकिन उन्होंने उस शाम के बाकी समय कोई बात नहीं की। यशस्वी को लगता है कि तुम एक बेवकूफ हो, शाश्वत, और पापा और मैं तुम्हें इस तरह के व्यवहार मेँ प्रोत्साहित करते हैं, क्योंकि वे गरीब घर से आईं, जल्दी बच्चे हो जाने के कारण पढ़ नहीं पायीं, और हम पढ़े-लिखे, अमीर, बड़े लोग हैं।
"यशस्वी नशे में था। मैं उसकी बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं दे सकता," शाश्वत बुदबुदाया।
मुझे यह बात याद थी, लेकिन यह एक खुली बात थी कि कैसे प्रियंका को हाईस्कूल की पढ़ाई से आगे की शिक्षा नहीं मिल पाई, क्योंकि वह गर्भवती हो गई थी। उसे एक साथ दो बच्चे पालने थे। हमारे अमीर समाज की महिलाएं बच्चों को संभालने के लिए अक्सर आया रख लेती थीं, घरवालों से मदद की आवश्यकता ही नहीं होती, लेकिन प्रियंका ने आया नहीं रखी थी। अपने बच्चों को बड़े प्यार से अपने हाथों ही संभाला था। मेरे परिवार मेँ मेरे सहित किसी ने उसे सहारा नहीं दिया कि वह आगे पढ़ पाती। यह कोई रहस्य नहीं था। लेकिन यह कोई जायज कारण नहीं था कि वह जो भी महसूस करती हो उसे अमान्य कर दिया जाए।
"शाश्वत, जहां बात तुम्हारी माँ की आती है, तो तुम और मैं गलत तो हैं ही" मैंने धीरे से कहा। "मैंने ही तुम्हारे लिए एक बुरा उदाहरण पेश किया है। मेरी देखा देखी तुम दोनों उसका अनादर करने लगे। मुझे पता भी नहीं चला मैंने कब उसे अपने ही घर मेँ एक तिरस्कार की वस्तु बना दिया। मैं शर्मिंदा हूँ, और तुम्हें भी अपने बर्ताव पर सोचना चाहिए।"
शाश्वत ने कराहते हुए कहा, "मुझे इस तरह की आत्म-प्रहार से नफरत है। वह खुद चली गईं। यह उन की अपनी जिम्मेदारी है। मैं फोन रख रहा हूँ।"
उसने फ़ोन काट दिया, लेकिन नीलिमा लाइन पर बनी रही। "मैंने माँ को हमेशा अनदेखा किया," उसने धीरे से कहा। "हमेशा.. सिर्फ इसलिए कि वह आपकी तरह नहीं। वह .... वह घरेलू हैं, घर पर ही रहती हैं। वह राज्यपाल या मेयर से बात नहीं करती। वह सिर्फ खाना बनाती है और... और ..." नीलिमा अब रो रही थी, "मैं एक घटिया बेटी रही हूँ, पापा।"
"नहीं, हनी। ओह, स्वीटहार्ट।" मुझे नहीं पता था कि उसे कैसे सांत्वना दूँ।
"यशस्वी ने बताया कि हम तीनों ने एक इन-ग्रुप बनाया था और वह आउट-ग्रुप में थी।"
"क्या?"
"वह मनोविज्ञान की पढ़ाई कर रहा है," नीलिमा ने बताया। "और वह सही कह रहा है। मैं अपने दिमाग पर जोर डाल रही थी; हम तीनों बातें करते, और वह चुप रहती थीं। अगर वह कुछ कहने की कोशिश करती, जैसे उस दिन, तो हम अनसुना कर देते, या चुप करा देते जैसे उस दिन शाश्वत ने किया। यह सिर्फ़ उस दिन, या उस बात, या शाश्वत की बात नहीं है। यह आपकी भी बात है और मेरी भी।"
"जानता हूँ बेटी।"
"हम माँ के लायक नहीं हैं। माँ ने एक दिन ने मुझे बताया कि श्रेया आंटी की मौत के डर से वह कितनी दुखी है, और मैंने झिड़क कर कहा कि मेरी क्लास चल रही है और मेरे पास ये बेकार बातें करने का समय नहीं है।" मेरा दिल टूट गया कि मेरी बच्ची रो रही थी, लेकिन इससे भी ज्यादा दुख इस बात से हुआ कि मैंने अपनी पत्नी को उसके जीवन से निपटने के लिए अकेला छोड़ दिया: एक मरती हुई दोस्त, एक मतलबी सास, एक मुश्किल ननद, बच्चे जो उसका सम्मान नहीं करते, सब कुछ ही.... मैंने नीलिमा को सांत्वना देने की कोशिश की, लेकिन हम दोनों जानते थे कि हमने गलत किया है। यह बात बिल्कुल स्पष्ट थी।
प्रियंका से कोई संपर्क न होने से मैं बहुत परेशान था। मुझे लगा कि शायद वह अपनी दोस्त श्रेया से मिलने गई होगी, लेकिन मुझे यह भी नहीं पता था कि श्रेया कहाँ रहती है। किसी द्वीप पर या कुछ और। बच्चों को भी नहीं पता था। यह हमारी उपेक्षा का एक और प्रमाण था। उसकी सबसे करीबी दोस्त मर रही थी, और प्रियंका पिछले सालों में अक्सर उससे मिलने जाती थी। उसने कई बार मुझसे कहा था कि मैं साथ चलूँ, लेकिन न सिर्फ मैं नहीं गया बल्कि एक दो बार उसे भी नहीं जाने दिया था। शायद ईर्ष्या थी, कि मेरे अलावा भी उसका कोई और है? फिर भी, मुझे यह तक नहीं पता था कि श्रेया कहाँ रहती है।
मैं अब तक प्रियंका को शांत होने के लिए कुछ समय दे रहा था। जैसे ही उसे एहसास होगा कि वह नाटकीय हो रही है, वह फोन करेगी और हम इस मामले को सुलझा लेंगे। मुझे इस बात का पूरा यकीन था। वह अपने परिवार से प्यार करती थी। वह हमारे प्रति समर्पित थी। इस बारे में मेरे मन में कभी कोई संदेह नहीं था। लेकिन वह चली गई और गायब ही हो गई। मैं प्रियंका से बहुत नाराज़ था। मैं खुद से भी नाराज़ था। मैं दुखी था, मैं दर्द में था। मैं एक ही समय में जुदाई के सभी चरणों से गुज़र रहा था। मैंने अपने मेसेज देखे कि शायद उसने कुछ भेजा हो? सबसे ताजा मेसेज शादी की सालगिरह के दिन का था। “उम्मीद है कि तुम आज जल्दी घर आ जाओगे। मैं शैंपेन की बोतल खोलकर रात के खाने के लिए तुम्हारी पसंदीदा चीज़ें बना रही हूँ। मैं तुमसे प्यार करती हूँ।
मैंने उस मेसेज को आज तक देखा भी नहीं था। मैंने पुराने मेसेजेस को स्क्रॉल करना शुरू किया। उसने मुझे हमारी सालगिरह वाले दिन से पहले महीनों तक कोई मेसेज नहीं भेजा था, आखिरी संदेश अप्रैल में आया था, ‘अंशुमन, तुम घर कब आओगे?’ अधिकतर इसी प्रकार के प्रश्न थे, जिनका मेरी तरफ से कोई उत्तर नहीं था। मैंने पढे तक नहीं थे। एक था जिसका उत्तर था - क्या तुम छह बजे तक घर आ जाओगे? दिव्या और शुभम डिनर के लिए आ रहे हैं। मेरा उत्तर - हाँ । मेरी बहन के मेहमान होने पर तो मैंने उत्तर दिया था! ‘आज मेरा जन्म दिन है। क्या तुम आठ बजे तक घर आ सकते हो? मैं उम्मीद कर रही थी कि हम साथ में खाना खा सकें’ - कोई जवाब नहीं। फिर ‘मैंने मलाई कोफ्ता बनाया है। मैं तुम्हारे लिए रख देती हूँ’ कोई जवाब नहीं। शायद देर से घर आने के बाद मैंने कोफ्ता खा लिया होगा।
‘आज हमारे बच्चों का जन्मदिन है। क्या हम उन्हें घर एक साथ बुला सकते हैं?’ मेरा जवाब था, ‘उनसे मेरी पहले ही बात हो चुकी है, वे नहीं आ रहे’ क्या उसे उन्हें शुभकामनाएँ देने का भी मौका मिला? क्या उन्होंने उसका कॉल उठाया होगा?
एक और यह ‘देविका बच्चों के अस्पताल चैरिटी बॉल के बारे में पूछना चाहती थी। क्या मैं भी आपके साथ शामिल होऊंगी?’ मैंने जवाब दिया: हाँ ।
‘देविका अगले सप्ताहांत के लिए फार्म हाउस की मेरी बुकिंग से परेशान है। वह चाहती है कि मैं बुकिंग रद्द कर दूं’ मुझे याद आया कि इस मेसेज के बाद मैंने उसे फोन किया था, उसके मेसेज के लिए नहीं बल्कि इसलिए कि देविका ने फोन कर के प्रियंका के बारे मेँ बहुत कड़वी बातें की थीं। और उसके अनुरोध के लिए मेरा उत्तर ‘नहीं’ था "प्रियंका, तुम्हें पहले से देविका और रक्षित से पूछना चाहिए था। उनकी योजनाएँ थीं," मैंने उसे फ़ोन पर झिड़क दिया था।
"लेकिन अंशुमन, मैंने देविका से पहले ही पूछा हुआ है।"
"खैर, प्रोग्राम रद्द कर दो। मुझे नहीं लगता कि मैं इसमें शामिल हो पाऊंगा, और बच्चों ने भी कहा है कि वे इसमें शामिल नहीं हो सकते।"
"लेकिन, अंशुमन हमने जन्मदिन मनाने का प्लान....."
"प्रियंका, मेरी अभी एक मीटिंग है। बस इसे संभालो, ठीक है न?" मैंने खीज कर कहा था।
मैंने संदेश की तारीख देखी और आह भरी। लानत है! मैं एक बेवकूफ़ इंसान था। उसने अपने जन्मदिन के लिए घर बुक किया था, कि परिवार इसे एक साथ मना सके, और हम सब? क्या मुझे उसका जन्मदिन याद रहा था? क्या मैंने उसे कोई उपहार दिया था? मैं अपनी शादी के साथ क्या करता आया था?
काव्या ने मेरे खुले ऑफिस के दरवाजे पर दस्तक दी और मैंने उसे अंदर आने का इशारा किया। वह मेरी कार्यकारी सहायक थी और अब तक की सबसे अच्छी सहायक थी। वह उम्र के बीसवें दशक के अंत में थी और अपने काम में बिल्कुल परफ़ेक्ट थी। "अंशुमन, हमें कुछ चीजों के लिए आरएसवीपी करना है।" वह मुस्करा कर बैठ गई। वह गोरी, सुडौल और सुंदर थी, साथ ही सक्षम भी थी। रक्षित ने मुझे चिढ़ाते हुए कहा था कि मैं उस से अफेयर चला रहा हूँ। लेकिन मैं धोखेबाज़ नहीं था, और मैं ऐसा करना भी नहीं चाहता था। प्रियंका और मेरे बीच एक बेहतरीन सेक्स लाइफ़ थी। हमने कब सेक्स करना बंद कर दिया था? आख़िरी बार कब किया था? क्या यह उस रात के बाद था जब मेरा मतलब जल्दी पूरा हो गया था और उसे संतुष्ट नहीं कर पाया था क्योंकि मैं बहुत थक गया था? हाँ, मुझे पूरा यकीन था कि ऐसा ही था। वही आखिरी रात थी, फिर मैं गेस्ट रूम मेँ सोने लगा था। शर्म ने मेरे अंदर फिर से जगह बना ली। हर बार जब मैं सोचता कि मैंने प्रियंका के साथ लगातार कैसा व्यवहार किया, तो मेरा खुद के प्रति सम्मान कम होता जाता।
काव्या ने पूछा, "क्या प्रियंका जी अगले सप्ताहांत मेयर बारबेक्यू में शामिल होंगी?" मैंने अपना सिर न मेँ हिलाया। मुझे नहीं पता था। "नहीं? क्यों नहीं? क्या उनकी भी कोई व्यस्तता है?" उसके चेहरे पर व्यंग्य की मुस्कान थी जैसे प्रियंका को ऐसे समारोहों से मना करने का कोई अधिकार ही नहीं था। "इसका क्या मतलब हुआ?"
"बस इतना है कि वे... घर पर ही तो रहती हैं, और ज़्यादा कुछ नहीं करती हैं।"
"क्या?"
काव्या ने बस कंधे उचका दिए। "मैं...खैर, चलो आगे बढ़ते हैं-"
"नहीं। अपनी बात समझाओ।"
"आपने मुझसे एक बार कहा था कि जब तक कोई मर न जाए तब तक उसके कॉल आपको न लगाऊँ, क्योंकि ‘उसके पास करने के लिए कुछ नहीं है और फालतू कॉल करती रहती है, और वह समझ नहीं पा रही कि हम काम से घिरे होते हैं’, ठीक यही आपके शब्द थे” क्या? क्या मैंने ऐसा कहा था? मैं एक मूर्ख था। "मैंने यह कब कहा?"
"आपके लिए काम करना शुरू करने के कुछ महीने बाद, उन्होंने फोन किया था, और मैंने आपको कॉल कनेक्ट किया था; तब आपने मुझे कहा था कि ऐसा दोबारा न करूँ” अजीब बात यह थी कि मुझे याद भी नहीं था, लेकिन ऐसा लग रहा था कि संभव है कि जिस तरह मैं उस के साथ था, यह संभव था कि मैं ऐसा कहूंगा और करूंगा।
"तो, वह कितनी बार फोन करती रही है? "
काव्या ने कंधे उचका दिए। "कभी कभार। पहले ज्यादा करती थीं। फिर जब मैंने कनेक्ट करना बंद कर दिया तो धीरे-धीरे छोड़ दिया। एक हफ़्ते पहले एक बार फ़ोन किया था।"
हमारी शादी की सालगिरह के दिन किया होगा, उसने मुझे फ़ोन करके और मैसेज करके संपर्क करने की कोशिश की थी - मेरी प्रियंका जो मेरे आने और उससे मिलने का इंतज़ार कर रही थी। "उसने उस दिन फोन पर क्या कहा?"
काव्या ने अपने होंठ चाटे, मैंने इंतजार किया। उसने आँखें घुमाईं। "बस इतना ही कि शादी की सालगिरह थी या कुछ और। मैंने सिर्फ़ इतना बताया कि आप मीटिंग में हो।"
"और तुमने मुझे क्यों नहीं बताया?"
"मैं क्यों बताती?" काव्या ने विरोध किया। "आपने कभी अपनी पत्नी में दिलचस्पी नहीं दिखाई अंशुमन। आज ये सारे सवाल क्यों?"
"लेकिन उसने तो सालगिरह कहा था न? और तुम्हारा क्या मतलब है यह कहने से कि मुझे अपनी पत्नी में कभी कोई दिलचस्पी नहीं रही? वह मेरी पत्नी है, काव्या।"
काव्या परेशान दिख रही थी। "बस यही कि, आप हर समय काम करते रहते हैं। आपके कैलेंडर में साथ बाहर जाने की कोई योजना नहीं होती है, सिवाय किसी सामाजिक कार्यक्रम के। हफ़्ते में तीन बार मेरे साथ दफ़्तर या किसी रेस्तराँ में खाना खाते हैं। मुझे पता है कि आप उन के बिना बच्चों से मिलने जाते हैं, क्योंकि मैं ही फ्लाइट बुक करती हूँ।" फिर से शर्मिंदगी महसूस हुई। मैं अपनी पत्नी की इतनी उपेक्षा कर रहा था कि मेरी सहायक को भी लगा कि मैं उसकी परवाह नहीं करता। उसने चुप होकर कहा, "आज क्या हुआ है?”
"प्रियंका मुझे छोड़ गई, काव्या।"
उसने मुस्कराकर मुझे चौंका दिया। "अच्छा। हाँ, यह तो अच्छी ही बात है, है न?"
"क्या?" मैंने गुस्से में फुसफुसाया।
"आप यही तो चाहते ही थे कि वे चली जाएं, है ना?"
"क्या??? ऐसा क्यों सोचा तुमने?" मैं चौंककर गुस्से से उठ खड़ा हुआ "क्यों?"
"क्योंकि आपने मुझसे कहा था कि आप उनसे दफ़्तर में बात नहीं करना चाहते। आप मुश्किल से कभी ही अपनी पत्नी से मिलते हैं। अपनी सालगिरह और उनके जन्मदिन को भी याद नहीं करते। और आप मेरे साथ बहुत समय बिताते हैं, तब भी जब वे आसपास हों।" मैं काव्या को घूरता रहा। क्या उसने अभी वही कहा था जो मैंने सुना था? "मुझे पता है कि आप एक अच्छे इंसान हैं और अपनी पत्नी को धोखा नहीं देंगे, लेकिन मुझे ही नहीं बल्कि सभी को पता है कि... यहाँ तक कि जब हम किसी पार्टी में होते हैं, तो आप मेरे साथ होते हैं, उनके साथ नहीं। लोग बातें करते हैं, कि हम दोनों, कि आप और मैं ... हम साथ हैं...। आप जानते हैं कि सब लोग आपको और मुझे एक जोड़े के रूप मेँ देखते हैं। और यह भी कि आप उन्हें इसलिए उपेक्षित करते रहते हैं कि वह चली जाएं और हमारा रास्ता साफ हो जाए।"
"क्या कहा? लोग क्या कहते हैं? कि तुम्हारा और मेरा अफेयर चल रहा है????"
"हाँ। मेरा मतलब, हम दोनों जानते हैं कि अफेयर नहीं हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि हमारे बीच कुछ तो है ही। मैं इसे महसूस करती हूँ। मुझे पता है कि आप भी महसूस करते हैं।"
यह सब क्या था? मेरा दिमाग रुक गया ... " काव्या, तुम सिर्फ मेरी कार्यकारी सहायक हो। मेरा दाहिना हाथ। तुम मेरी रखैल, प्रेमिका या कुछ और नहीं हो, मैंने तुम्हें कभी ऐसा आभास नहीं दिया, कम से कम जानबूझकर तो नहीं।" क्या बकवास है! वह मेरे पास आई और मेरे कंधे पर हाथ रखा। मैं झेंप गया और दूर चला गया। मैं काम पर हमेशा महिलाओं के साथ सावधान रहता था। मैं ऐसा आदमी नहीं था जो किसी महिला की पीठ या कंधे पर हाथ रखता हो - ऐसा कुछ भी नहीं। मैंने यह सुनिश्चित किया कि मैं ऐसा कोई व्यवहार न करूँ जिसका गलत अर्थ निकाला जा सके। जब मैंने पिता जी के बाद पदभार संभाला, तो मैंने खुद से वादा किया था कि मैं महिलाओं के साथ व्यवहार करने के तरीके के बारे में बहुत सावधान रहूँगा। "क्या आप यह कह रहे हैं कि आप मेरे लिए कुछ भी महसूस नहीं करते?" काव्या ने पूछा, और उसके आत्मविश्वास ने मुझे और नाराज़ कर दिया।
"मैं तुम्हारे लिए वैसा ही महसूस करता हूँ जैसा मैं किसी भी कर्मचारी के लिए करता हूँ। मुझे किसी और तरह से तुममें कोई दिलचस्पी नहीं है। मैं अपनी पत्नी से प्यार करता हूँ। मैंने हमेशा अपनी पत्नी से प्यार किया है।"
वह उपहास से हंसी "यह बात कोई नहीं मानेगा अंशुमन। कोई नहीं सोचता कि आप अपनी अनपढ़ गंवार पत्नी से प्यार करते हो। यहाँ तक कि आपके बच्चे भी नहीं। जिस तरह से आप उनके साथ, और उनके बारे में भी, रूखी और अपमानजनक बात करते हो, कोई ऐसा सोच भी नहीं सकता।" हैं!! ऐसा लगा जैसे मैं अपनी ज़िंदगी के बारे में नहीं जानता। पत्नी छोड़कर चली गई, जिससे मैं बे-इंतहा प्यार करता था, जिसके साथ मैं सोचता था कि मेरी शादी बहुत अच्छी चल रही है; और असिस्टेंट सोचती है कि मैं उसे चाहता हूँ!
"मैं अपनी पत्नी के बारे में कैसे बात करता हूँ??" मैं वास्तव में जानना चाहता था।
"जैसे कि वह बिल्कुल महत्वपूर्ण नहीं है।" काव्या पीछे हट गई। "अगर आप कह रहे हैं कि आप उससे प्यार करते थे, तो भगवान का शुक्र है कि आप मुझसे प्यार नहीं करते। ऐसा जहरीला क्रूर प्यार कोई स्त्री नहीं चाहेगी जिसमें उसका हर जगह मजाक उड़ाया जाए या हर किसी के सामने हर समय अपमान किया जाए। भगवान का शुक्र है कि हमने अपने रिश्ते को पेशेवर बनाए रखा है।"
"मैंने तुम्हें कभी ऐसा कोई संकेत नहीं दिया कि ..... "
"नहीं, आपने ऐसा नहीं किया है," उसने बीच में टोकते हुए कहा। "मैंने खुद ही यह मान लिया। यह मेरी गलती है। लेकिन मैं और क्या सोच सकती थी? आप प्रियंका जी के प्रति बहुत ही उदासीन लगते रहे हैं। आपने मुझे कहा कि उनके फोन आपको न कनेक्ट करूँ उनके संदेश आपको न सुनाऊँ। यह स्पष्ट है कि आपके और आपके बच्चों में उनके लिए कोई सम्मान नहीं है, खासकर शाश्वत। और आपने अपने बच्चों को बढ़ावा दिया कि वे दोनों आपकी पत्नी का सारे-आम अपमान करते रहें।"
"तुम्हें यह सब कैसे और कहां से लग रहा है?"
"मैं तीन साल से यहाँ काम कर रही हूँ, अंशुमन। आपके बच्चे यहाँ आते हैं। उस दिन शाश्वत यहाँ था और माँ का फ़ोन आया, और उसने उसे वॉयस मेल पर जाने दिया और कहा, ‘माँ बहुत उबाऊ है’ आपने उसे नहीं टोका। और आपका भी तो हमेशा यही रवैया रहा? मैं और क्या अर्थ निकालती? सिर्फ मैं ही नहीं, सब लोग यही सोचते हैं।” मैं हमेशा देखता था कि बच्चे प्रियंका का सम्मान नहीं करते, लेकिन क्यों? और फिर, मुझे एहसास हुआ। वे सम्मान इसलिए नहीं करते क्योंकि मैं सम्मान नहीं करता। उन्होंने मुझसे सीखा है। मेरा दिल धड़कने लगा, और मुझे एहसास हुआ कि ‘प्रिय जॉनी’ वाला पत्र प्रियंका से पाना कोई आश्चर्य नहीं था। मेरी प्यार करने वाली प्यारी पत्नी, जो खुद विनम्र थी, उसके साथ मैंने कूड़े जैसा व्यवहार किया था। वह कभी चीखती चिल्लाती नहीं थी। उसने कभी अपनी आवाज़ ऊँची नहीं की। उसने मुझसे लड़ाई नहीं की। उसने हमें संयत और शांत किया। वह हमारी संरक्षक देवदूत जैसी थी, और हम सभी ने उसके साथ एक डोर मैट की तरह व्यवहार किया।
"बात यह है कि आप भी हमेशा उनके बारे में इसी तरह बेपरवाही से ही बात करते हैं। हो सकता है कि आज आप 'ना' कहें, लेकिन व्यवहार से कमोबेश यह बात स्पष्ट हो जाती है, इसलिए मैंने मान लिया..." उसने घबरा कर चारों ओर देखा "देखिए, मैं अपने कार्यालय वापस जा रही हूँ, इससे पहले कि मैं कुछ ऐसा कह दूँ जिसका मुझे पछतावा हो।"
मैं इतना सदमे में था कि कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं था, इसलिए मैं चुपचाप खड़ा रहा, मुझे लगा कि मेरी दुनिया पहले से कहीं ज़्यादा बिखर गई है। आखिर मेरी ज़िंदगी यह कैसे बन गई?
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