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शनिवार, 31 जनवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग पंद्रह (15)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग पंद्रह (15)


भाग 15

प्रियंका

 

"श्रेया, तुम ने दीपावली के सप्ताह के लिए दो कमरे बुक किए हैं, कोई नाम या क्रेडिट कार्ड नहीं है," मैंने श्रेया को पुकारा जब वह धीरे-धीरे लाउंज में आई जहाँ मैं जा रही थी। वह अपने लैपटॉप पर बुकिंग कर रही थी। "मुझे पता है। वे मेरे दोस्त हैं। कोई पेमेंट नहीं होगी इसलिए क्रेडिट कार्ड की जरूरत नहीं है।"

मैंने भौंहें चढ़ाईं, "अच्छा? मुझे नहीं पता था कि मेरे अलावा भी तुम्हारे और दोस्त हैं।"

"ए लड़की, मेरे पास दोस्त भी हैं और प्रेमी भी हैं," उसने शरारती अंदाज में कहा। "बस उस बुकिंग को वैसा ही छोड़ दो और उस की चिंता मत करो।" मैंने श्रेया के दोस्तों के लिए कमरे दर्ज किए और साप्ताहिक मीनू देखना शुरू किया, तथा जो किराने का सामान मुझे खरीदना था उसे एक नोट पर लिख लिया।

"नीलिमा और यशस्वी कब पहुंचेंगे?" श्रेया ने पूछा।

मैं मुस्कराई, अपनी बच्ची को जल्द ही देखने की खुशी में झूम रही थी। "शुक्रवार को। यकीन नहीं हो रहा कि नीलिमा सनशाइन होम्स में होगी। मैं विश्वास ही नहीं कर सकती।"

श्रेया ने मेरे हाथ पर हाथ रखा। "प्रियंका, तुम एक बहुत अच्छी माँ हो। तुम्हारे बच्चों ने भले ही बुरा व्यवहार किया हो, लेकिन मुझे लगता है कि एक बार जब उन्हें एहसास होगा कि उन्होंने तुम्हें कितना दुख पहुँचाया है, तो वे दोनों तुम्हारे पास लौट आएंगे।"

"तुम्हें लगता है?" मैं यह उम्मीद भी नहीं कर रही थी कि शाश्वत बदलेगा। उस दिन के बाद उसने फ़ोन नहीं किया। काश मैंने उस पर इतना कठोर व्यवहार न किया होता। मैं उसे मैसेज करके माफ़ी मांगना चाहती थी, लेकिन डॉ. मिश्रा ने मुझे अपनी सीमाएँ बनाए रखने की सलाह दी थी। बच्चे मेरे साथ वैसा ही व्यवहार करेंगे जैसा मैं उन्हें करने देती हूँ। मुझे कठोर शब्दों से खुद को बचाने के लिए सुरक्षा कवच लगाने की ज़रूरत थी। इससे मैं बुरी माँ नहीं बनी, बल्कि एक अच्छी माँ बनी। अपने बच्चों को लोगों का, ख़ासकर अपने माता-पिता का, सम्मान करना सिखाना एक अच्छा सबक था जिसे उन्हें अवश्य सीखना चाहिए।

इन सबके बावजूद, मुझे शाश्वत की याद आती थी। मुझे नीलिमा की याद आती थी। मुझे अंशुमन की याद आती थी - सबसे ज़्यादा उसकी ही। मुझे बिस्तर पर उसकी बाँहों में लिपटे रहने की याद आती थी। मुझे उसके साथ प्यार करना याद आता था। मुझे वह याद आता था जब वह मुझसे बात करता था। मुझे उसकी खुशबू याद आती थी।

श्रेया सोफ़े पर बैठ गई। अपने कमरे से लाउंज तक का छोटा सा रास्ता उसे थका देता था। "मुझे पक्का पता है कि तुम्हारे बच्चे तुम्हारे पास वापस आएंगे, प्यारी लड़की। मुझे लगता है कि मौत के इतने करीब होने से मैं भविष्य वक्ता हो रही हूँ।" उसने हँस कर कहा। उसका चेहरा पीला और मुरझाया हुआ था। यह सिर्फ़ दो-तीन महीनों या शायद इससे भी कम समय की बात थी; डॉक्टर ने मुझे एक दिन पहले ही चेतावनी दी थी जब हम उसकी नियमित जाँच के लिए गए थे। डॉक्टर ने एक बार फिर मुझे श्रेया को अस्पताल ले जाने के बारे में सोचने को कहा, और मैंने एक बार फिर कहा कि श्रेया अपने घर में ही मरना चाहती है। मैं नर्स का खर्च नहीं उठा सकती थी, और हमें उसकी ज़रूरत भी नहीं थी। मैं ही उसकी नर्स थी। मैं ही उसकी माँ थी, बेटी भी और बहन भी। हम दोनों एक दूसरे की सब कुछ थीं। मैं उसे नहलाती, साफ़ करती, जो भी ज़रूरी होता वो करती। मैं उसके लिए मौजूद थी।

मैं सोफे पर उसके बगल में बैठी थी और घड़ी पर नज़र रखे हुए थी। मैंने ओवन में कुछ रखा हुआ था और आठ मेहमानों को एक घंटे में खाना परोसा जाना था: दो जोड़े और एक किशोर परिवार। मैंने पूछा, "तुम्हें कुछ दर्द निवारक दवाएँ चाहिए?" उसने अपना सिर हिलाया।

"वे दर्द तो दूर करते हैं, लेकिन मुझे नींद भी आने लगती है। मेरे पास बहुत कम समय बचा है, मैं कुछ समय तक जागना चाहती हूँ।" मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लिया और हम लाउंज की बड़ी खिड़कियों से सामने के बगीचे और उसके आगे समुद्र को देखने लगे। "क्या तुमने अंशुमन से कुछ सुना?" श्रेया ने आगे पूछा।

"उस कॉल के बाद से नहीं जब उसने मुझ पर चिल्लाया था।"

"मुझे पता है कि तुम उससे प्यार करती हो, लड़की।" उसने अपने हाथ से मेरा हाथ थपथपाया। "लेकिन मुझे नहीं लगता कि तुम मानती हो कि वह तुमसे प्यार करता है ।"

"नहीं करता।" अब यह निश्चित हो गया था। वह तलाक के कागज़ात पर हस्ताक्षर करने जा रहा था, जैसा कि उसने कहा था। ईशानी ने कहा था, जल्द ही कुछ मिलेगा। कुछ महीने लगेंगे। लेकिन मैं पहले ही घर से निकल चुकी थी और अंशुमन से कुछ नहीं चाहती थी, इसलिए सब सरल होने वाला था। तो, इस तरह मेरी बीस साल की शादी बिना किसी परेशानी के खत्म हो गई। यही तो तलाक लेने वाला हर व्यक्ति चाहता था, है न? यह अच्छी बात थी, है न? अंशुमन से झगड़ा मुझे बर्बाद कर देता। मुझे पता था कि टूटी शादी से उबरने में मुझे बहुत समय लगेगा। और, श्रेया जाएगी तब मैं सचमुच अकेली हो जाऊँगी, तब मुझे फिर से खुद को संभालना होगा। यह आसान नहीं होने वाला था।

श्रेया ने मुझे आश्चर्यचकित करते हुए पूछा, "अंशुमन को तुम्हें अपने प्यार का यकीन दिलाने के लिए क्या करना होगा?" मेरे मनोचिकित्सक ने भी मुझसे यही प्रश्न पूछा था, और मेरे पास इसका कोई स्पष्ट उत्तर नहीं था।

"मुझे नहीं पता," मैंने स्वीकार किया। "लेकिन सवाल निरर्थक है, श्रेया। वह मुझसे प्यार नहीं करता, और वह मुझे मनाने के लिए एक उंगली भी नहीं हिलाएगा। उसके अनुसार, मुझे बस अपने घर चले जाना चाहिए और इतना ‘नाटक करना’ बंद कर देना चाहिए।"

श्रेया ने रूखे स्वर में कहा, "मैडम, आप ‘रियल हाउस वाइव्स’ सीरियल की कड़वी पत्नियों में से एक लगती हैं।"

"हाँ तो? मैं उनमें से एक हूँ," मैंने हँस कर कहा। "मैं उन अमीरों के बीच ही रहती थी।"

श्रेया हँसी और फिर संभल गई। "शुरू में, मुझे लगा कि अमीरी से तुम बदल जाओगी। उन जैसी ही बन जाओगी। लेकिन तुम कभी नहीं बदलीं। तुम हमेशा तुम ही रही हो।"

"यह सच नहीं है," मैंने धीरे से कहा। "मैंने खुद को खो दिया, श्रेया। अदृश्य हो गई। शादी के बारे में कोई भी यह नहीं बताता कि आपको खुद को पूरी तरह से इसके लिए समर्पित करना होगा। हम निस्वार्थ भाव से यह करते हैं। हमारे बच्चे, पति, वे ही हमारी ज़िंदगी बन जाते हैं। लेकिन ‘हम’ उनकी ज़िंदगी नहीं बन पाते। कोई ‘धन्यवाद’ भी नहीं कहता। ऐसा लगता है कि मुझसे माँ और पत्नी बनने के लिए खुद अपनी पहचान को खो देने की उम्मीद की गई थी। मैं अब खुद भी नहीं जानती कि ‘प्रियंका सिंह’ कौन है। यह सच है कि उन्होंने मुझे नहीं देखा, लेकिन गड़बड़ तो है यह है श्रेया, कि मैंने भी खुद को नहीं देखा।"

श्रेया झुकी और मैंने उसके माथे को चूमा, उसके पतले, कमज़ोर शरीर को अपने पास समेटा। उसकी खुशबू पुदीने जैसी थी। "मैं नहीं चाहती कि जब मैं चली जाऊं तो तुम यहां... इस दुनिया में अकेली रहो।" उसने अपने मुंह से मौत का बदबूदार स्वाद (उसके शब्द) दूर करने के लिए पुदीने की पत्तियों को चबाना शुरू कर दिया था। "तुम ने ही कहा था कि ‘अकेले रहना ठीक है, बस अकेलापन नहीं।’ मैं यहाँ अकेलेपन मेँ नहीं रहूंगी प्रिय श्रेया।"

"मुझे बुरा लग रहा है कि तुम दुखी हो, प्रियंका। मुझे इस बात से नफरत है।" उसने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया। "लेकिन मैं तुम्हें एक बात बताऊँगी जो मुझे पक्का पता है कि सच है। तुम्हारा परिवार तुमसे प्यार करता है। हो सकता है कि उन्होंने हाल ही अपनी हरकतों और बातों में इसे दिखाया न हो, लेकिन वे करते हैं।" यह अच्छी कल्पना थी। लेकिन मुझे नहीं लगता था कि यह सच है। मैं रोमांचित थी कि नीलिमा आ रही थी, लेकिन यह सिर्फ उसके अपराध बोध के कारण था। मैं यह जानती थी और मुझे इसकी परवाह नहीं थी। मैं किसी भी कारण से अपने बच्चे को अपने साथ चाहती थी। शाश्वत ने तो मुझसे संपर्क करने की भी जहमत नहीं उठाई थी। और फिर अंशुमन का फोन पर व्यवहार भी तो एक संकेत था।

"जब वे छोटे थे, बच्चे भी और अंशुमन भी, तब उन्हें मेरी ज़रूरत थी, ताकि वह काम कर सकें, और मैं घर की देखभाल करूँ।" मैंने एक अच्छी माँ और पत्नी बनने के लिए बहुत मेहनत की थी। और इस सबके बाद, मैं यहाँ, अड़तीस साल की उम्र मेँ अकेली थी। "अब, उनका अपना जीवन है। मैं यह समझती हूँ। मैं बस यही चाहती हूँ कि वे मुझे चाहते, भले ही उन्हें मेरी ज़रूरत न हो, फिर भी वे मुझे मेरे लिए चाहते, प्यार करते, सम्मान करते।" मैंने डॉ. मिश्रा से इस बारे में अक्सर बात की थी, कि कैसे मैं अक्सर एक पत्नी, माँ और वेश्या की तरह महसूस करती हूँ, जिसकी अपनी कोई निजता नहीं है। वहाँ कोई प्रियंका नहीं थी, बस उसके अलग-अलग अवतार थे जो परिवार की सेवा करते थे।

श्रेया की सांसें धीमी हो गई, और मैं समझ गई कि वह सो गई है। मैंने उसके सिर को कुशन पर इस तरह से एडजस्ट किया कि वह आराम कर सके। वह बड़े सोफे पर छोटी सी लग रही थी। मैंने उसके ऊपर एक कंबल डाला और उसे सोने के लिए छोड़ दिया, जबकि मैंने अपने ओवन की जाँच की और एक नए अवतार में आ गई। एक रिज़ॉर्ट की मालकिन- प्रियंका सिंह, जो खाना बनाना, साफ-सफाई करना और एक बेहतरीन परिचारिका बनना जानती थी - लेकिन इस बार, इस सब की सराहना होती थी। इस बार मैं यह सब अपने लिए कर रही थी, और यह एक आज़ादी जैसा था।


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