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गुरुवार, 29 जनवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग तेरह (13)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग तेरह (13)


 

भाग 13

प्रियंका




मैंने डॉ. मिश्रा के साथ अपनी सेशन की बातचीत पूरी की और सीधे रसोई में आ गई। मौसम अच्छा था, सनशाइन होम्स रिज़ॉर्ट में अच्छी ऑक्यूपेंसी थी। यह अच्छी बात थी क्योंकि हमें आय की आवश्यकता थी। पिछले कुछ महीने थोड़े निराशाजनक रहे थे, क्योंकि श्रेया काम नहीं कर पा रही थी, और उसे कैलेंडर के कुछ हिस्सों को ब्लॉक करना पड़ा था।

"इतनी अच्छी खुशबू किस चीज की है?" रंजीत ने रसोई में आते हुए अपने हाथ रगड़े।

"मैंने अभी-अभी बेसन के लड्डू बनाए हैं। थोड़ा ठंडा होने दो, फिर खा सकते हैं," मैंने कहा।

वह नाश्ते की टेबल पर बैठा था। रंजीत बीस साल का था, मेरे बच्चों की उम्र के आसपास, और मैं उसके साथ उन जैसा ही व्यवहार करती थी। वह कॉलेज में मैकेनिक बनने की पढ़ाई कर रहा था, और साथ ही छोटे-मोटे काम करके पैसे कमा रहा था। उसका काम सम्हाल लेना हमारे रिज़ॉर्ट के लिए एक वरदान था। मैंने उसके सामने नाश्ते के साथ गरमागरम लड्डू रख दिये, और उसने खुशी-खुशी खाना शुरू कर दिया। "प्रियंका आंटी, आप एक बेहतरीन कुक हैं। श्रेया आंटी को यह मत बताना, लेकिन आपके पकाने और उनके पकाने मेँ दिन और रात का अंतर है। आपके बच्चे आपके खाना पकाने को जरूर मिस करते होंगे। मुझे ज़रूर याद आएगा जब मैं कॉलेज जाने पर यहाँ उतना नहीं आ पाऊँगा।"

"सेमेस्टर के लिए तैयार?" एक कप चाय के साथ उसके सामने बैठते हुए मैंने पूछा।

उसने सिर हिलाया, "हाँ।"

"तुम्हारे घर की स्थिति क्या है, रंजीत?" ..... "कुछ नहीं," उसने टालते हुए कहा।

लीला ने बताया था कि उसे रंजीत को अपने साथ रहने के लिए बुलाना पड़ सकता है क्योंकि उसके मकान मालिक ने अपना किराया बढ़ा दिया है और वह इसे वहन नहीं कर सकता। लीला का कमरा छोटा था और उसके साथ पहले से ही एक बेटी थी। रंजीत को फर्श पर सोना पड़ता; लेकिन ऐसे रहना उसके लिए ठीक नहीं था, क्योंकि उसे पढ़ाई भी करनी थी।

"क्या तुम्हें अपने कमरे से बाहर निकाला जा रहा है?"

"मैं ठीक रहूँगा मिस प्रियंका।"

"तुम्हें कितने पैसे की जरूरत है बेटे?" मैंने पूछा।

"प्रियंका आंटी, मैं आपके पैसे नहीं लूंगा।" रंजीत चुपचाप खाना खाता रहा। मैं अपने बेडरूम में गई और सौ रुपये के दस नोट ले आई। मैंने उन्हें उसकी प्लेट के पास रख दिया।

"आंटी?" वह चौंककर बोला। उसे मुझसे ज़्यादा पैसों की ज़रूरत थी। मेरे पास अभी कोई खर्च नहीं था। मेरा खाना और रहने का खर्च रिज़ॉर्ट अकाउंट से आता था।

"इसे ले लो।"

"नहीं-नहीं, मैं आपकी उदारता के लिए आभारी हूँ, लेकिन .... "

"तुम श्रेया के अपने बेटे की तरह हो, इसलिए तुम इसे चुपचाप ले लोगे। अगर श्रेया को पता चल गया, तो वह परेशान हो जाएगी। वह मर रही है, और क्या तुम चाहते हो कि वह अब तुम्हारे लिए भी चिंता करे?" जाहिर तौर पर मुझे पता था कि जब बात मनवानी हो तो भावनात्मक ब्लैकमेल कैसे करना है, मैंने अपने मन मेँ अपनी तारीफ की, खुद को प्रभावित करने के लिए। मुझे अपने बच्चों के साथ ऐसा करना चाहिए था, और शायद वे मेरे साथ बेहतर व्यवहार करते। लेकिन फिर यह भी है कि मैं अपने लाभ के लिए कभी किसी को हेरफेर नहीं करूंगी। मैं एकदम बेवकूफ हूँ! पैसे लेते समय रंजीत की आंखों में आंसू थे। "मैं आपको पैसे लौटा दूंगा, आंटी"

"पहले सब ठीक कर लो, फिर बाद मेँ कभी लौटा सकते हो। श्रेया को कील ठोकना और दीवार पर पट्टी बांधना वगैरह आता था; मुझे इनमें से कुछ भी नहीं आता। इसलिए, मुझे एक सहायक की ज़रूरत है, और वह तुम बनोगे।"

“आपके लिए मैं कुछ भी करूंगा ।"

"अच्छा। तो अब तुम सनशाइन होम्स रिज़ॉर्ट के आधिकारिक सहायक हो गए हो, और यह रिटेनर था, वापस देने के लिए कुछ भी नहीं है।" उसने अपना चम्मच नीचे रखा और मेरे पास आया। उसने झुककर मेरे पैर छूए। "आप एक परी हैं आंटी।”

मैंने उसका हाथ पकड़ा और उसके सिर पर थपथपाया। काश मेरे बच्चे भी ऐसा सोचते।

"सब ठीक हो जाएगा, रंजीत। आमतौर पर चीजें हो जाती हैं।"

वह मेरी ओर देखकर मुस्कराया, "अब मुझे जलाने की लकड़ी अंदर ले आना चाहिए।"

मैंने उसे जाते हुए देखा और एक बार फिर से यह निश्चितता महसूस की कि यह मेरा नया घर है। यहाँ, ऐसे लोग थे जिन्होंने मुझे देखा था और मेरी सराहना की थी। जिन्होंने मेरे खाने की तारीफ़ की, जिन्होंने मुझे हल्के में नहीं लिया। अदृश्य न होना अच्छा लग रहा था। यहाँ मेरे पास मेहमान थे जो मुझसे बात करते थे। मेरे पास श्रेया थी, और भले ही वह मर रही थी, उसने मेरा हाथ थामा और अपने साथ मुझे हंसाया था। लीला थी, जिसकी छोटी लड़की मीनू से मैं बहुत प्यार करने लगी थी, और रंजीत, जो बहुत अच्छा लड़का था, जिसका यहाँ अपनी चचेरी बहन लीला के अलावा कोई नहीं था।

बैंगलोर में, अभी मैं घर पर अकेली होती, अंशुमन का इंतज़ार कर रही होती। यहाँ, मैं आठ लोगों के लिए खाने की मेज़ सजाने में व्यस्त थी। यहाँ लोग मेरे खाने का आनंद लेते थे, जो ठंडा नहीं हो जाता था क्योंकि कोई खाना भूल गया था या देर से आया था। मैं उनकी बातचीत सुनती थी और यह सुनिश्चित करती थी कि उनके वाइन ग्लास भरे हुए हों और उनके पास वह सब कुछ हो जिसकी उन्हें ज़रूरत है। वे मुझे अपनी चर्चाओं में शामिल करते थे और मुझे यह महसूस नहीं करवाते थे कि मैं उनसे कम हूँ।

रात के खाने के बाद, मैं श्रेया के पास गई और सुनिश्चित किया कि वह कुछ खा ले। हम उसके बिस्तर पर बैठे रहे और तब तक खराब टीवी देखते रहे जब तक वह सो नहीं गई। जब वह चली जाएगी तो मेरी दुनिया की रोशनी फीकी पड़ जाएगी। वैसे तो बैंगलोर छोड़ने के बाद से ही जीवन की रोशनी फीकी पड़ ही गई थी। मुझे बस एक नया जीवन बनाना था जो उज्ज्वल हो, और मैं बनाऊँगी। अंशुमन के साथ मेरी बातचीत के बाद मेरा निर्णय और सुदृढ़ हुआ कि मेरा घर छोड़ने का फैसला सही है। वह मुझे इसलिए वापस चाहता था कि ‘लोग क्या कहेंगे’, इसलिए नहीं कि वह मुझे चाहता था, या कि मुझसे प्यार करता था।

उसने मुझे यह बताने की भी ज़रूरत महसूस नहीं की कि वह काव्या के साथ मुझे धोखा नहीं दे रहा है; वह बस उम्मीद करता था कि मैं इस पर यकीन करूँ। क्यों? वह कोई आदर्श पति तो था नहीं, और हर कोई सोचता था कि वह काव्या के साथ सो रहा है। और, फिर भी उसने मुझे विश्वास दिलाने की कोई कोशिश नहीं थी. न माफी मांगी थी। बल्कि गुस्सा ही किया, जैसे सब कुछ पहले की ही तरह हो। नहीं, मैंने उसे छोड़ कर बिल्कुल ठीक किया। पहले मुझे लग रहा था कि बिना बातचीत किए चले जाना कहीं मेरा स्वार्थ तो नहीं है? सच तो यह था कि मुझे लगा कि मैं उससे बात कर ही नहीं सकती थी, क्योंकि मुझे डर था कि यह कितना अप्रिय होगा। और यह सच साबित हुआ। मैं इस अप्रियता से तंग आ चुकी थी!

मैं बस शांति से रहना चाहती थी और अवसाद मेँ नहीं रहना चाहती थी। जीवन के पतझड़ के कुछ काले दिन थे जब मैं डॉ. मिश्रा को लगभग नियमित रूप से ईमेल लिख रही थी। डॉ. मिश्रा ने मुझसे कहा था कि मुझे अभी सिर्फ़ खुद को देखना चाहिए। इसलिए, अगर मुझे घर से बाहर निकलना सबसे सुरक्षित लगता है, तो मुझे ऐसा करना चाहिए। अगर मैं ‘अपने लिए’ चाहती हूँ तो मुझे अंशुमन से बात करनी चाहिए, न कि इसलिए कि वह चाहता है। उन्होंने मुझसे कहा कि कभी-कभी स्वार्थी होना बुरी बात नहीं होती - वास्तव में आत्मरक्षा के लिए यह अच्छा है कि हम खुद को पूरी तरह दूसरों को न दें जिस तरह मैंने किया था।

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