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गुरुवार, 29 जनवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग चौदह (14)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग चौदह (14)


भाग 14

अंशुमन




"मैं आपसे प्रियंका जी के बारे में बात नहीं कर सकती।" वह एक लंबी एंग्लो-इंडियन महिला थीं, जिनका चेहरा कोमल और व्यवहार शांत था। वह दृढ़ और सरल स्पष्ट भी थीं।

"मैं जानता हूँ, लेकिन उम्मीद है कि आप मेरी मदद कर सकती हैं। मैं खो गया हूँ।"

डॉ मिश्रा ने सिर हिलाया "ठीक है, आप किस बारे में बात करना चाहते हैं?"

"मेरी पत्नी ने मुझे छोड़ दिया है" मैंने शुरू किया, और फिर सब कुछ बता दिया, शब्द बह निकले। मैंने बताया कि कैसे मेरे आस-पास के सभी लोग मेरी शादी को बर्बाद मानते थे, सोचते थे कि मेरा अपनी असिस्टेंट से अफेयर है, और मैं यह समझता रहा था कि मेरी शादी कितनी अच्छी चल रही थी। प्रियंका के साथ मेरी आखिरी कॉल के दौरान, मैंने कैसे बेवकूफी की थी, मैं एक बेवकूफ़ था; मैं यह समझने के लिए संघर्ष कर रहा था कि मैंने अपनी पत्नी को कैसे-कैसे अनदेखा किया, जो वह इस तरह सोच रही थी। मैंने कबूल किया, "मुझे यह भी समझ में नहीं आ रहा है कि जाने से पहले उसने मुझसे बात क्यों नहीं की।"

“आपको क्या लगता है, उन्होंने बात क्यों नहीं की होगी?"

मैंने इस बारे में सोचा और होंठ सिकोड़ लिए "पिछले दो सालों से मैं ज़्यादा मौजूद नहीं रहा। नहीं, दरअसल, पिछले कई सालों से। शायद...उसे लगा कि वह बात नहीं कर सकती?"

"क्या उन्होंने पहले भी आपसे किसी विषय पर बात करने की कोशिश की है?"

"मुझे ऐसा लगता है ..... मेरा मतलब है, हाँ, उसने कई बार प्रयास किए हैं।"

"वह प्रयास कैसा रहा? क्या बातचीत हुई?"

मुझे पता था कि वह क्या कहना चाह रही थीं। "मैंने उसके मुद्दों को एक बाधा की तरह लिया, अनदेखा किया। कुछ ऐसा कि उसे खुद ही अपने मुद्दे हल करने चाहिए।

डॉ. मिश्रा ने मेरी ओर देखा, "यह जानकर आपको अब कैसा महसूस हो रहा है?"

"शर्मिंदा।" .....

"बस शर्मिंदा? और कुछ नहीं?"

"मुझे डर है कि मैं उसे वापस नहीं पा सकता। कि मैंने उसे हमेशा के लिए खो दिया है; कि मैं उसे खोने के ही लायक हूँ।" डॉ. मिश्रा ने कुछ नोट्स बनाए और फिर मेरी तरफ देखा। "आप कहते हैं कि आप तलाक नहीं चाहते। मुझे बताइए कि ऐसा क्यों है।"

"मैं उससे प्यार करता हूं।"

"इस ‘प्यार करता हूं’ से आपका क्या मतलब है?"

मैंने पलक झपकाई। "बस इतना ही कि मैं...उससे प्यार करता हूँ।"

“आपके लिए इस ‘प्यार करने’ का क्या मतलब है?"

मैंने इसके बारे में सोचा, और मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई, भले ही मैं कितनी भी मुश्किलों में क्यों न फंसा हुआ हूँ। "वह मुझे सुरक्षित महसूस कराती है। जब मैं उसके साथ बिस्तर पर लेटता हूँ तो मुझे शांति महसूस होती है, और वह मेरे साथ होती है। मेरा दिन सबसे खराब हो सकता है, लेकिन जब मैं उसके साथ लेटा होता हूँ, तो यह सब दूर हो जाता है।"

"वह आपका ‘सेफ स्पेस या सुरक्षित स्थान या शरणस्थली या आश्रय’ हैं?"

"हाँ," मैंने सहमति जताई।

"तो, जब वह समस्याएं या चिंताएं आपके सामने लाती हैं, तो क्या होता है?"

"मैं..." मैंने आह भरी जब मुझे एहसास हुआ कि वह क्या कह रही थी और मैं क्या कर रहा था। "मुझे यह पसंद नहीं आता है क्योंकि यह मेरी शांत सुरक्षित जगह छीन लेता है। यह संघर्ष को बढ़ाता है जो मैं नहीं चाहता। मैं चाहता हूँ कि प्रियंका के साथ सब कुछ शांतिपूर्ण रहे। मेरे चारों ओर संघर्ष है, और बिस्तर पर, मैं चाहता हूँ कि मेरी पत्नी मेरी बाँहों में हो, कहे कि वह मुझसे प्यार करती है, न कि मुझे यह बताए कि उसका जीवन कठिन है।"

"आप ‘बिस्तर’ कहते रहते हैं। जब मैं घर आता हूँ और उसके साथ ‘लेटता’ हूँ। जब मैं ‘बिस्तर पर’ होता हूँ। क्या आप ‘सेक्स’ के बारे में बात कर रहे हैं?"

मैंने अपने चेहरे के एक तरफ हाथ रगड़ा। "हाँ, आंशिक रूप से। हमारा सेक्स जीवन हमेशा शानदार रहा है। बीस साल हो गए हैं, और हम अभी भी कई बार सेक्स करते हैं। नहीं, हम पहले करते थे। पिछले कुछ महीनों में यह कम हो गया है, असल में, बिलकुल नहीं।"

"क्यों? ऐसा क्या हुआ था?"

"मैंने अक्सर अतिथि कक्ष में सोना शुरू कर दिया। मैं देर रात तक स्टडी में काम करता और गेस्ट रूम मेँ सो जाता, ताकि वह जाग न जाए।"

"आप तो हमेशा से ही बहुत काम करते रहे हैं। तो अब ही अलग कमरे मेँ क्यों सोने लगे?"

मैंने कंधे उचका दिए. "मैं उसे परेशान नहीं करना चाहता था।"

"आप ने अभी कहा कि हर कोई सोचता है कि आप अपनी असिस्टेंट के साथ सो रहे हैं। क्या आपके मन में आपकी असिस्टेंट के लिए कोई भावनाएँ हैं?"

"नहीं," मैंने जोरदार विरोध किया। "बिलकुल नहीं। आप समझ नहीं रही हैं। मैं प्रियंका के अलावा किसी और के साथ सेक्स नहीं करूँगा। मैं करना ही नहीं चाहता। मैं उसका हूँ और वह मेरी है। और वही मेरे लिए सब कुछ है।"

डॉ. मिश्रा ने कुछ और नोट्स लिये। "आप कहते हैं कि हर कोई देख सकता है कि आप अपनी पत्नी की उपेक्षा कर रहे हैं। क्या आप यह देख पा रहे थे?"

"नहीं, मुझे तो लगता था सब ठीक है, बल्कि बढ़िया है। लेकिन अब देख पा रहा हूँ।"

"मुझे इसके बारे में बताइए।”

मैंने अपने बालों में हाथ फेरा। एक के बाद एक सवालों के जवाबों के बारे में सोचना बहुत मुश्किल काम था। मेरे पास सभी जवाब नहीं थे, और जो जवाब मेरे पास थे, उनसे मुझे पता चला कि मैं अपनी पत्नी के साथ कितना बुरा व्यवहार कर रहा था। यहाँ डॉ. मिश्रा के साथ कुछ मिनटों के अंतराल में मैंने जो कुछ समझा था, असलियत को उजागर कर रहा था।

प्रियंका मेरा ‘आश्रय’ थी, इसलिए मेरे मन की दुनिया मेँ उसके पास अपनी कोई समस्या या मुद्दा होने की अनुमति नहीं थी। उसे एक गुड़िया जैसी मानना चाहता रहा था जो मेरी देखभाल करने और मुझे बेहतर महसूस कराने के लिए मौजूद रहे। और जब वह हो जाता, तो मैं अपने रास्ते पर चला जाता, और वह? खैर, हकीकत यह सामने आ रही थी कि वह तो मेरा ‘आश्रय’ बन गई थी, लेकिन मैं कभी उसकी शरणस्थली नहीं बन सका था, न कभी मुझे उसके लिए बनने की इच्छा हुई थे। वह एक सहारा थी जिस पर झुक कर मैं आराम पाता था। बदले मेँ मैंने उसे यह बताने का मौका नहीं दिया कि उसके साथ क्या हो रहा था। मैं उससे किसी भी चीज़ के बारे में बात कर सकता था, और वह सुनती भी थी। लेकिन वह नहीं बोल सकती थी। जब डॉ. मिश्रा और मेरी बातचीत खत्म हुई, मैं थक कर निढाल हो चुका था। और यह सिर्फ़ आधे घंटे का सत्र था?

डॉ. मिश्रा ने कहा, "जाने से पहले मैं चाहती हूँ कि आप दो बातों के बारे में सोचें, इसे होम वर्क की तरह सोचें। सबसे पहले, मैं चाहती हूँ कि आप जानें और समझें कि आपने अपनी पत्नी से अलग सोना क्यों शुरू किया, जबकि आपका रिश्ता वैवाहिक बिस्तर के बारे में बहुत कुछ रहा है। दूसरा, मैं चाहती हूँ कि आप कल्पना करें कि अगर आपकी पत्नी ने आपसे अपने अवसाद के बारे में बात की होती तो उसके साथ बातचीत कैसी होती। एक ऐसी बातचीत जिसे आपने गंभीरता से लिया होता, या वैसा ही होता जैसे कि जिस तरह से आपने उसे फोन पर फटकार लगाई जब उसने अपने विवाह मेँ खुश न होने का ज़िक्र किया।"

मैं सोफे से उठ खड़ा हुआ, मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं गन्ने का रस निकालने वाली मशीन से गुज़रा हूँ। "धन्यवाद, डॉ. मिश्रा।"

"अंशुमन जी, मेरी पेशेवर राय में, आपको अभी भी इस संकट के समय मेँ थेरेपी जारी रखनी चाहिए। आपको सप्ताह में कम से कम दो बार किसी से मिलना चाहिए। मैं आपको रेफ़रल दे देती हूँ। मुझे लगता है कि आप किसी पुरुष के साथ बेहतर कर सकते हैं।"

मैंने हैरानी से उन्हें देखा, "ऐसा क्यों?"

"मैंने आपसे बहुत देर तक तो बात नहीं की है, और हो सकता है कि मैं गलत भी होऊं। लेकिन, मेरा मानना है कि आप महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों का अधिक सम्मान करते हैं।"

"नहीं," मैंने तुरंत कहा। "मैं उन बेवकूफ लोगों में से नहीं हूँ।"

वह मुस्कराई। "हम सभी में पूर्वाग्रह होते हैं। मेरे मन में गोरे पुरुषों के प्रति थोड़ा पूर्वाग्रह है, लेकिन इससे यह तथ्य नहीं बदलता कि मेरे पति गोरे हैं। मैं आपको कुछ संदर्भों के साथ एक ईमेल भेजूंगी।"

"लेकिन आप मुझे सेशन के लिए नहीं लेंगी?"

"अगर आप यही चाहते हैं, तो बिल्कुल ले सकती हूँ। मैं बहुत से विवाहित जोड़ों को साथ में भी और अलग-अलग भी परामर्श देती हूँ। लेकिन मुझे लगता है कि आप किसी पुरुष के साथ बेहतर महसूस करेंगे। आप यदि मेरे साथ बने रहना चाहते हैं तो अवश्य मुझसे फिर से मिल सकते हैं। अपॉइंटमेंट लेने के लिए बस मेरी वेबसाइट पर पोर्टल का उपयोग करें। फिर भी मैं कुछ और नाम आपको भेज दूँगी।"

मैं दरवाजे पर पहुंच कर रुक गया, और पीछे मुड़ कर कहा, "मेरी पत्नी की मानसिक सेहत बचाने के लिए धन्यवाद।"

"आपका दिन अच्छा रहे, अंशुमन जी।" मैं जानता था कि वह यह स्वीकार नहीं कर सकतीं कि प्रियंका उनकी मरीज़ थी। लेकिन मैं बताना चाहता था कि उन्होंने उसके लिए जो किया उसके लिए मैं उसका आभारी हूँ। और जो उन्होंने मेरे लिए किया था उसके लिए भी। जाने से पहले मैंने उनके सहायक से बात की, जिसने प्रियंका का बही खाता देखा और भुगतान की व्यवस्था की; जाहिर है, इस मेँ कोई समस्या नहीं थी। मैंने पूरा भुगतान कर दिया।

घर लौटते समय मैंने अपने आर्किटेक्चर विभाग के प्रमुख प्रभाकर को फ़ोन किया। प्रभाकर चार साल पहले ही हमारे साथ जुड़े थे और उन्होंने कई बार खुद को एक बेहतरीन आर्किटेक्ट और लीडर के तौर पर साबित किया था। "कैसा चल रहा है, बॉस?" प्रभाकर ने पूछा।

"कल इस बारे में विस्तृत बात करूंगा, लेकिन मुझे छुट्टी लेनी है।" ...चुप्पी थी... "प्रभाकर?"

"क्या आपके साथ सब कुछ ठीक है? आपका स्वास्थ्य ठीक है?"

"हाँ, कोई चिंता की बात नहीं है।"

मैं उसकी उलझन सुन सकता था। "आप छुट्टी लेने वाले हैं? आप तो सप्ताहांत की भी छुट्टी नहीं लेते, अंशुमन। क्या हो रहा है?" बता देना बेहतर होगा।

"प्रियंका ने मुझे छोड़ दिया है। मुझे अपना परिवार बचाना है।"

"मुझे खेद है, अंशुमन। प्रियंका जी बहुत अच्छी इंसान हैं। आपको कितना समय चाहिए?"

मैंने इसके बारे में सोचा और कहा, "जितना समय लगे। कम से कम छह महीने।" अगर प्रभाकर को आश्चर्य हुआ, तो उसे नहीं पता था कि मैं खुद इस बात पर कैसा महसूस कर रहा हूँ। मैंने राव-सिन्हा-आर्किटेक्ट्स-एण्ड-बिल्डर्स कंपनी को मेरे पिता कि बनाई एक स्थानीय कंपनी से एक अंतरराष्ट्रीय दिग्गज में बदल दिया था। मैंने इसे खून-पसीने की कीमत दे कर किया था। और अब समझ आया कि अपनी शादी की कीमत भी दे दी थी। "क्या आप इस बारे में निश्चित हैं? आप दूर से काम कर सकते हैं या --"

"नहीं, मुझे छुट्टी ही चाहिए। मुझे यकीन है।"

"यह कब करना चाहते हैं? उसने पूछा

"कल हमारी बैठक मेँ हम परिवर्तन योजना पर बात करेंगे। बाद मेँ मैं वहाँ से भी किसी सलाह के लिए उपलब्ध रहूँगा। बस एक फ़ोन कॉल और ईमेल की दूरी पर। लेकिन मुझे अपनी पत्नी को घर लाना है, प्रभाकर! ... आप कार्यकारी सीईओ और अध्यक्ष होंगे।"

"मैं आपको निराश नहीं करूँगा," उसने धीरे से कहा, लेकिन मुझे पता था कि वह हैरान था कि मैं यह जिम्मेदारी उसे सौंप रहा हूँ जिसके लिए मैंने इतनी मेहनत की थी। लेकिन कभी-कभी ‘जीवन’ पैसा कमाने से ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है; वास्तव में, यह हमेशा से ही था। मुझे अब जाकर इसका एहसास हुआ, जब प्रियंका ने मुझे छोड़ दिया।

"प्रभाकर, तुमने मुझे कभी निराश नहीं किया है, मुझे विश्वास है कि कभी नहीं करोगे।"

"विश्वास-मत के लिए धन्यवाद अंशुमन। तो प्रियंका जी अभी कहां है?"

"है एक खूबसूरत जगह। तो ठीक है। मैं सभी परियोजनाओं और उनकी स्थिति की एक सूची बनाऊँगा, और मेरे जाने के पहले हम उन पर विचार कर सकते हैं। मैं कर्मचारियों को विवरण देने के लिए के लिए एक प्रस्तुति भी तैयार करूँगा। अभी यह गोपनीय रखना। मैं नहीं चाहता कि जब तक हम इस पर चर्चा पूरी नहीं कर लेते और इस नेतृत्व परिवर्तन को अंतिम रूप नहीं दे देते, तब तक किसी को भी इसके बारे में पता चले।"

"बिल्कुल।"

"प्रभाकर," मैंने गहरी साँस ली और आगे कहा, "क्या तुम्हें भी ऐसा लगता रहा है कि मेरा काव्या के साथ कुछ चल रहा है?" ..... फिर से एक लंबी चुप्पी ......

"हर कोई ऐसा क्यों सोच रहा है? क्या मैं ऐसी छवि रखता हूँ?" मैंने पूछा। प्रभाकर ने ठंडी आह भरी। "नहीं। मैं आपको जानता हूँ, इसलिए मैंने कभी इस पर यकीन नहीं किया। लेकिन काव्या खुद आपके बारे में हर किसी से इस तरह बात करती है। ऐसा नहीं है कि आप ... आप लोग कुछ कर रहे हो, लेकिन आप हफ्ते मेँ 3-4 बार उसके साथ डिनर करते हैं अक्सर देर तक काम करते रहते हैं। वह कई बार बातचीत मेँ इस बात का संकेत देती रही है कि आप दोनों एक साथ हो। और, मुझे आपके कॉल करने से पहले ही प्रियंका जी के चले जाने के बारे में पता था, क्योंकि ..... "

"क्योंकि काव्या ने सब को बता दिया था?" मैंने उसकी बात पूरी की।

"हाँ, और यह कि आप दोनों जल्द ही अपने रिश्ते को आधिकारिक बना दोगे।"

"ठीक है। काव्या अब तुम्हारी समस्या है क्योंकि तुम अब कार्यकारी अध्यक्ष और सीईओ बनने जा रहे हो। किसी कार्यकारी सहायक का अपने बॉस के बारे मेँ ऐसी खबरें फैलाना पॉलिसी के विरुद्ध है। मुझे यकीन है कि नए सीईओ के रूप मेँ तुम इस समस्या से निबट लोगे।"

प्रभाकर ने हंसते हुए कहा। "बॉस, मुझे काव्या से कोई परेशानी नहीं होगी। लेकिन मेरे पास पहले से ही एक एग्जीक्यूटिव असिस्टेन्ट है, और मैं उसके काम को बहुत पसंद करता हूं। हम काव्या के लिए कुछ और काम ढूंढ लेंगे। मुझे एचआर के साथ इस मामले को संभालने दो। इसकी चिंता मत करो। आप अपनी पत्नी को मनाने पर ध्यान केंद्रित रखो।"

"प्रभाकर, जब तुमने मुझे और प्रियंका को साथ देखा तो हमारी शादी के बारे में क्या सोचा?"

"यही कि आप बहुत भाग्यशाली थे कि आपकी पत्नी आप से इतना प्यार करती थीं।"

"और प्रियंका के बारे में कैसा लगता था?"

"अरे यार, अंशुमन," वह झेंप गया।

"मुझे बताओ।"

"बहुत बुरा लगता था, आप पर बहुत गुस्सा आता था। यह बहुत दुखद था क्योंकि वह हमेशा अकेली दिखती थीं, खासकर काम की पार्टियों में, जहाँ मैं उन्हें ज़्यादातर देखता था। वह लोगों से बात करती थीं और आपको घुलते-मिलते देखती थी। यह स्पष्ट था कि वह सिर्फ़ आपके साथ रहना चाहती थीं। मैंने कभी भी हनी ट्रैप की अफ़वाहों पर विश्वास नहीं किया। और वह बहुत खूबसूरत हैं।" हनी ट्रैप की अफ़वाहें? हाँ, तो पूरा शहर जानता था कि हमने कम उम्र में ही शादी कर ली थी। जब गरीब घर से आई प्रियंका सिंह अमीर परिवार की श्रीमती अंशुमन राव-सिन्हा बनीं तो यह एक घोटाला होना ही था। मुझे अभी भी याद है कि जब मैं उसे अपने माता-पिता के घर ले गया और वहाँ छोड़ दिया तो वह कितनी खोई हुई दिख रही थी - अठारह साल की, डरी सहमी हुई।

मेरी मां ने प्रियंका से कहा था, "तुम सोने की खान में गिर गई हो, लड़की, लेकिन ध्यान रखना, प्रियंका सिंह, अगर तुमने राव-सिन्हा परिवार के नाम के साथ खिलवाड़ किया, तो मैं तुम्हें वापस झोंपड़ पट्टी में भेज दूंगी।" प्रियंका ने मेरी तरफ असहाय भाव से देखा, उम्मीद थी कि मैं कुछ कहूंगा, उसके बचाव में कुछ करूंगा, लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। क्योंकि गलती करने के बाद प्रियंका को वापस मनाने के लिए मेरे पास अपने तरीके थे, लेकिन मेरी मां के साथ मेरे पास कोई तरीके नहीं थे। इसलिए मैंने कुछ ऐसा कहा जो मुझे खुद भी स्पष्ट नहीं था, जैसे, "माँ, उसे यहाँ थोड़ा सेटल होने दो" या कुछ ऐसा ही बकवास। मुझे उसके हमारे समाज के हिसाब से गलत पत्नी होने का बहुत डर था। प्रियंका ने मुझे दो प्यारे बच्चे दिए। शाश्वत और नीलिमा ने मुझे एक बेहतर इंसान बनाया और मेरे जीवन को उन तरीकों से समृद्ध किया, जिनकी मैं एक इक्कीस वर्षीय डरे हुए युवा के रूप में कभी कल्पना भी नहीं कर पाया था। लेकिन प्रियंका तो उससे भी छोटी थी, और नए घर के माहौल मेँ थी। मेरे पास तो कई लोगों का सहारा था, मेरे माता-पिता, दोस्त, भाई। उसके पास तो कोई नहीं था। सिर्फ़ उसकी दोस्त श्रेया, जिसके बारे में मेरी माँ ने कहा था कि वह उसे सार्वजनिक रूप से नहीं मिल सकती या अपनी शादी में भी नहीं बुला सकती।

मां ने प्रियंका से कहा कि श्रेया हमारे समाज के सामने आने के लायक नहीं है। और अगर वह शादी में आती तो उसके और प्रियंका की पृष्ठभूमि के बारे में बहुत सारे सवाल पूछे जाते। प्रियंका ने मुझसे मेरी माँ को मनाने के लिए बहुत अनुनय की थी। वह दुनिया में अपने परिवार के एकमात्र सदस्य श्रेया के बिना शादी नहीं करना चाहती थी। मैंने कुछ नहीं किया, उसे खुद ही माँ से बात करने के लिए कहा। आखिरकार श्रेया शादी में नहीं आई। श्रेया कभी-कभार ही मिलने आती थी, और भले ही मैं उससे मिल चुका था, लेकिन मैं उसे नहीं जानता था। वह बैंगलोर आने पर होटल में रुकती, हमारे घर पर नहीं। आमतौर पर, प्रियंका पहले पुणे और फिर लक्षद्वीप में अकेले ही उससे मिलने जाती थी। प्रियंका के पास दुनिया में एक ही व्यक्ति था जो उसका अपना था, और मेरा परिवार और मैं चाहते थे कि वह उस बंधन को तोड़ दे। यह प्रियंका की दृढ़ता को दर्शाता है कि उसने हममें से किसी की मदद के बिना भी अपनी दोस्ती को जीवित रखा। "अंशुमन, मुझे लगता है कि आप अपनी शादी बचा लेंगे" प्रभाकर ने भरोसा दिलाया। "बस अपनी पत्नी के पास जाकर यह दिखाना होगा, कि आप उनसे प्यार करते हैं। और याद दिलाना होगा कि वह भी आपसे प्यार करती हैं।"

हाँ, मुझे पता था कि वह मुझसे प्यार करती है, हमेशा से पता था। इसी कारण मैंने ऐसा व्यवहार किया, है न? इसीलिए मैंने उसे हल्के में लिया, यह सोचकर कि यह मुझे छोड़ कर कहाँ जाएगी? शुरुआती सालों में जब हम झगड़ते थे, तो क्या मैंने उसके स्वाभिमान के मुंह पर एक थप्पड़ की तरह बार-बार वह मूर्खता पूर्ण विवाह-पूर्व समझौता नहीं फेंका था? "प्रियंका सिंह, अगर तुम्हें यह पसंद नहीं है तो चली जाओ। बस याद रखो, अगर तुम मुझे छोड़कर चली जाओगी तो तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा, हमारे बच्चे भी नहीं।" मैं जब भी उससे नाराज होता था तो उसे प्रियंका सिंह कहकर बुलाता था ताकि उसे याद दिला सकूँ कि वह किस गंदगी से आई है। मैंने सालों से ऐसा नहीं किया था। क्यों? मैं बिना ज़्यादा दिमाग लगाए समझ गया कि यह इसलिए था क्योंकि अब वह मुझसे बहस ही नहीं करती थी। अगर मैं कुछ कहता तो वह या तो धीरे से मेरा मन बदलने की कोशिश करती या फिर बस मान जाती। हम कभी झगड़ते नहीं थे, कभी नहीं। इस बात पर दोस्त मुझसे ईर्ष्या करते थे।

"मेरी पत्नी बहुत गुस्से में है। मैं उसके लगातार परेशान करने से थक गया हूँ," विनय शॉ ने कहा था, जब हम में से कुछ लोग ड्रिंक के लिए मिले और उसने टेबल पर रुपये फेंके। "मुझे जाना होगा, नहीं तो वह मेरी जान ले लेगी।"

मैंने अपनी घड़ी देखी, "इतनी जल्दी?"

उस ने कहा, "हम सभी का विवाह संत प्रियंका से नहीं हुआ है अंशुमन।"

मैंने असमंजस में दूसरों की ओर देखा, "यह क्या है?"

गंगाधर मूर्ति ने हंसते हुए कहा, "तुम्हारी पत्नी बहुत अच्छी है। मेरा मतलब है, क्या तुम लोग कभी लड़ते भी हो?"

"अच्छी या डोर मैट?" तेजस नरसिम्हा, जो थोड़ा नशे में था, ने तीखे स्वर मेँ कहा।

मैंने विरोध करते हुए कहा, "प्रियंका डोर मैट नहीं है," हालांकि ऐसा कहने वाला वह पहला व्यक्ति नहीं था। दिव्या, देविका और रक्षित ने अक्सर ऐसा कहा था। "डोर मैट गलत शब्द है, सॉरी" तेजस ने धीरे से कहा। "लेकिन यार, मैं चाहता हूँ कि मेरी पत्नी हर दिन, हर पल मुझे परेशान न करे। जैसे प्रियंका जी तुम्हारा ख्याल करती हैं वह भी करे। इतना ही।"

"ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रियंका हमारे समुदाय से नहीं आती है," मैंने समझाया।

"ठीक है। या शायद यह तुम्हारी प्री-नेपुटल समझौते की वजह से है," तेजस बुदबुदाया। मुझे यह बात पसंद नहीं थी कि हर कोई इस बारे में जानता था, लेकिन दिव्या और देविका ने यह बात खूब फैलाई थी। वह हर किसी के सामने प्रियंका को अपमानित करने के लिए इसका प्रचार करती थी। मुझे इस बारे में बात करना पसंद नहीं था। "या शायद इसलिए कि मैं अपनी पत्नी को खुश रखता हूँ," मैंने झल्लाकर कहा। गंगाधर ने नाक भौंह सिकोड़ी। "क्या कहना चाहते हो?" मैंने खीज कर पूछा था।

"अंशुमन, तुम और अपनी पत्नी को खुश रखना? तुम तो खुश हो, लेकिन प्रियंका जी के बारे में नहीं पता। उन की खुशी का ध्यान रखो। तुम नहीं जानते तुम कितने खुशकिस्मत हो।"

"क्या बकवास है। मैं अपनी पत्नी और अपनी शादी को जानता हूं," मैंने गुस्से से कहा और विषय बदल दिया। हे भगवान! जब भी मैं पुरानी यादें ताज़ा करता, मुझे और भी बुरा लगता, क्योंकि मैं प्रियंका और उसकी भावनाओं के प्रति अपनी बेरुखी और अंध उपेक्षा का सामना करता। क्या मैंने उसे कभी भी खुश रखने का प्रयास किया था? जो सब देख पाते थे वह मुझे क्यों नहीं दिखता था?

मुझे कुछ साल पहले की एक रात याद आई, जब बच्चों के पढ़ने चले जाने के बाद एक बार हमने प्यार किया था। मैं अभी भी जोर से सांसें ले रहा था, सुख का स्वाद अभी भी मेरे मुंह में था। उसने सुस्ती से अंगड़ाई लेकर पूछा था, "अंशुमन, क्या मैं तुम्हें खुश करती हूँ?"

"तुम्हारे साथ यह करना मुझे बहुत खुश करता है, बेब।"

"और इसके अलावा, मेरे बाकी हिस्से के बारे में क्या?" उसने पूछा।

क्यों मुझे अक्ल नहीं आई कि जब उसने यह सवाल पूछा था तो वह मन से क्या महसूस कर रही होगी? मैंने क्यों नहीं देखा कि वह कह रही है कि मैं उसे एक इंसान की तरह, एक साथी की तरह देखूँ? इसके बजाय, मैंने उसके शरीर के हर हिस्से को छुआ और कहा कि क्यों और कैसे उसकी कमर, त्वचा, उसके बदन का हर हिस्सा मुझे गर्म और कामुक बना देता है।

वह शर्म से मुस्कराई। "मेरा मतलब था, मेरे शरीर के अलावा।"

"तुम्हारी मुस्कान मुझे खुश करती है। तुम्हारा खाना बनाना मुझे खुश करता है। जिस तरह से तुम्हारा शरीर मेरे शरीर के साथ काँपता है, उससे मुझे खुशी मिलती है।" मैंने उसे चूमा और हमेशा की तरह, मैं उससे तृप्त नहीं हो पाया। जल्द ही, हम फिर प्यार करने लगे। ऐसा कितनी बार हुआ था? उसने मुझसे खुद से मिलने के लिए कहा था, और मैंने सिर्फ उसका शरीर देखा था, बस यह कि उसने मेरे लिए क्या किया था। लेकिन जिस बात ने मुझे सबसे ज़्यादा परेशान किया, वह था वह सवाल जो मैंने कभी उससे पूछने के बारे में नहीं सोचा था: प्रियंका, क्या मैं तुम्हें खुश करता हूँ? अब समय आ गया था कि मैं न केवल पूछूं, बल्कि यह भी गारंटी दूं कि उसका जवाब ‘हाँ’ हो। मैंने अपना फोन उठाया और उस व्यक्ति को कॉल किया जिसे मैं जानता था कि वही मेरी मदद कर सकता है। मुझे बस उम्मीद थी कि वह मुझे उसके दोस्त के साथ किए गए व्यवहार के लिए माफ कर देगी - ताकि मैं अपनी पत्नी को वापस पा सकूं।

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