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सोमवार, 12 जनवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग आठ (08)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग आठ (08)



भाग 8

अंशुमन



मैं काम से जल्दी निकलकर रक्षित के घर चला गया। हम भाई भी थे और दोस्त भी, और अगर कोई मेरी कमज़ोरियों को पहचान सकता था, तो वह वही था। "अरे, क्या हुआ?" रक्षित ने घबरा कर पूछा। मैं जानता था कि मेरा दर्द मेरे चेहरे पर लिखा हुआ था।

"देविका आसपास है?" मैं उसकी पत्नी से, जो बहुत क्रूर थी, अच्छे दिन पर भी, मिलना नहीं चाहता था। "नहीं। वह बाहर है। महिलाओं की पार्टी।"

"बहुत बढ़िया। मुझे एक अच्छी ड्रिंक चाहिए।"

हम उसके ‘बार’ वाले कमरे मेँ गए, उसके घर में यही एक जगह थी जहां देविका रक्षित को फुटबॉल देखने के लिए अकेला छोड़ देती थी और वह शराब पीकर मदहोश हो जाता था।

मैं बैठ गया। रक्षित ने मुझे दो फिंगर स्कॉच दी तो मैंने उसका शुक्रिया अदा किया। वह मेरे सामने बैठ गया। "तुम्हारे दिमाग में क्या गड़बड़ चल रही है, भाई?"

"प्रियंका मुझे छोड़कर चली गई है रक्षित।" शब्द फुसफुसाहट के रूप में निकले।

"कब?" ..... "कुछ सप्ताह पहले।"

रक्षित ने सिर हिलाया, जैसे उसे आश्चर्य न हुआ हो। "बधाई हो?"

"क्या???? यह क्या बकवास है, रक्षित?"

उसने मेरी ओर उलझन में देखा। "मुझे... हम सब को, ऐसा लग रहा था कि तुम यही तो चाहते थे। क्या ऐसा नहीं है?" क्या उसकी आवाज मेँ आरोप घुला था?

"क्या?" मुझे ऐसा महसूस हुआ कि मैं एक ऐसा जीवन जी रहा था जिसके बारे में मुझे कुछ भी पता नहीं था, कम से कम, जिसे दूसरे लोग मुझसे बहुत अलग तरीके से देखते थे।

"मतलब? तुम्हारे प्री-नेपुटल समझौते के अनुसार यदि तुम तलाक मांगों तो उसे हिस्सा देना होगा, लेकिन यदि वह खुद चली जाए तो वह कुछ भी लेकर नहीं जाएगी। इसीलिए तुम उसे अपमानित करते, उपेक्षा करते, जिससे वह खुद तंग आकर तुम्हें छोड़ जाए – नहीं?"

"मैं तलाक नहीं चाहता। मैं अपनी पत्नी से प्यार करता हूँ।"

रक्षित ने अपनी दोनों भौंहें उठाईं। "अच्छा जी! चलो-चलो, मुझे मूर्ख मत बनाओ। अगर तुम अपनी पत्नी से प्यार करते होते, तो तुमने अपनी सेक्रेटरी से प्रेम-संबंध क्यों बनाए होते?"

मैंने थोड़ी व्हिस्की पी और अपना गिलास नीचे रख दिया। मेरी ज़िंदगी एक झंझट बन गई थी। बस यही था। "तुमने ऐसा क्यों सोचा कि मैं काव्या के साथ हूँ?"

रक्षित ने हंसते हुए कहा, "अंशुमन, मैं ही नहीं सब जानते हैं। तुम हमेशा उसके साथ रहते हो। लोग तुम्हें रेस्तराँ में देखते हैं। तुम उसके साथ यात्रा करते हो। पार्टियों में भी तुम काव्या के साथ होते हो और प्रियंका एक कोने में बैठी रहती है और हर कोई उसे ‘पहली पत्नी’ के रूप में देखता है, जिसे जल्द ही बदल दिया जाएगा। हमारी बहन दिव्या और मेरी पत्नी कई बार उसका मजाक बनाती हैं कि वह एक रोड़ा है और जैसे ही वह रास्ते से हटेगी तुम अपनी सेक्रेटरी से शादी कर लोगे। मैंने कई बार उन्हें उससे कहते सुना है और वह चुप चाप आँसू पी लेती। तुम यह अनदेखा करते थे, उसकी हर पार्टी मेँ उपेक्षा करते थे। हम सब को तो यही लगता है कि तुम उसे चले जाने के लिए मजबूर करने के लिए ऐसा कर रहे हो।"

मैंने उन पार्टियों को याद करने की कोशिश की। क्या मैं वाकई प्रियंका के साथ इतना बुरा बर्ताव करता था? अगर सभी ने देखा, तो उसे भी तो ऐसा महसूस हुआ होगा। इससे मेरी प्यारी पत्नी को कितना दुख पहुंचा होगा? प्रियंका, जिसने कभी किसी के बारे में बुरा नहीं कहा, यहाँ तक कि मेरी माँ के बारे में भी नहीं, जिसने उसे हर मौके पर अपमानित किया। मुझे माँ से उसकी रक्षा न करने के लिए दोषी महसूस होता था, यही वजह थी कि मैं आखिरकार अपने अलग घर मेँ जाने के लिए सहमत हो गया। लेकिन सच में मैं अपनी माँ के साथ कोई तमाशा नहीं चाहता था। मुझे उम्मीद थी कि प्रियंका उससे निपटेगी, और उसने चुपचाप यही किया। हमारी शादी के पहले दो वर्षों के बाद, प्रियंका बिल्कुल वैसी पत्नी बन गई थी जिसकी मुझे ज़रूरत थी। वह घर चलाती थी, जब भी मुझे उसकी ज़रूरत होती थी, हमेशा मौजूद रहती थी, जब भी मैं चाहता था, मेरे साथ समागम करती थी, और मेरे परिवार को संभालती थी ताकि वे उसके बारे में मुझसे शिकायत न करें। धिक्कार है! मैं एक स्वार्थी व्यक्ति था। हमारा वैवाहिक जीवन सिर्फ इस बात पर निर्भर करता था कि उसने मेरे लिए क्या किया। आखिरी बार मैंने उसके लिए कब कुछ किया था?

"तो क्या सभी लोग यह मान रहे हैं कि मैं अपनी असिस्टेंट के साथ संबंध बना रहा हूं और अपनी पत्नी को तलाक देने के लिए तैयार हूं?"

रक्षित ने आह भरी। "मुझे समझ नहीं आ रहा क्या कहूँ अंशुमन। यह तो हम सब को वर्षों से स्पष्ट रहा है कि तुम्हें अपनी पत्नी में कोई दिलचस्पी नहीं है। पारिवारिक रात्रिभोज में, हमेशा एक तरफ तुम और जुड़वाँ बच्चे होते हैं, जबकि दूसरी तरफ प्रियंका चुपचाप बैठी रहती है। मुझे उस पर तरस आता था और मैं उससे बात करने की कोशिश करता था, लेकिन देविका ईर्ष्या से भर जाती थी, इसलिए मैंने बात करना बंद कर दिया।"

"देविका प्रियंका से ईर्ष्या क्यों करती है?" यह सब बहुत उलझन भरा था। रक्षित ने उपहास किया और फिर अविश्वास में अपना सिर हिलाया। "तुम्हें पता है कि तुम्हारी पत्नी बहुत खूबसूरत है, है न?"

"हाँ।" प्रियंका एक क्लासिक सुंदरता की मिसाल थी। कभी-कभी, मैं उसके चेहरे से नज़र नहीं हटा पाता था। "और जहां देविका रोजाना डाइट पर रहती है, प्रियंका सहज रूप से छरहरी और सुंदर है। वह प्यारी, मधु-भाषी है और उससे बात करना आसान है। काश मेरी भी ऐसी पत्नी होती..." उसने आह भरी। "तुम्हें तो पता ही है कि देविका कैसी है। बस इसलिए देविका को प्रियंका से ईर्ष्या है" मुझे पता था। देविका एक खास तरह की गड़बड़ थी। मेरा भाई कह रहा था कि मेरी एक अद्भुत पत्नी है, जिसे मैं इस हद तक नजरअंदाज करता रहा हूं कि मेरे मित्रों और परिवार सहित सभी लोग सोचते हैं कि मैं उससे छुटकारा पाना चाहता हूं इसलिए जान-बूझ कर तंग कर रहा हूँ। मैंने व्हिस्की पी ली और अपने लिए कुछ और डाला।

"बच्चे उससे बुरा व्यवहार करते हैं, और तुम इसे कभी नहीं रोकते। खास तौर पर शाश्वत। इस गणेश चतुर्थी के पर्व पर, मुझे उससे बकवास बंद करने के लिए कहना पड़ा, लेकिन शाश्वत ने अनदेखा कर दिया।" यह कैसे हुआ कि मेरा भाई मेरी पत्नी का योद्धा बन गया? वही जिसने उसके मुँह पर उसे लालच मेँ मुझे फँसाने वाली कह कर अपमानित किया था?

"शाश्वत ने क्या कहा था?"

"बस कुछ बकवास था कि वह कुछ नहीं समझ पाएगी क्योंकि वह अनपढ़ है और उसके पास कॉलेज की डिग्री नहीं थी। यह अपमानजनक था, और प्रियंका की आँखों मेँ आँसू आ गए थे।

"मैं कहाँ था?" हां, अंशुमन, इस पूरे समय तुम थे कहां?

“वहीं तो थे - यह सब तुम्हारे सामने ही होता था, अंशुमन। तुम मुझे यह नहीं कह सकते कि तुमने ध्यान नहीं दिया।" जब उसने मेरी आँखों में दर्द देखा, तो वह हैरान रह गया। "तुम सच में मुझसे कह रहे हो कि तुमने नहीं देखा कि कैसे तुम्हारे बच्चे हर बार जब वह बोलने की कोशिश करती थी, तो उसे अपमानित कर के चुप करा देते थे? मेरा मतलब है, नीलिमा तो सिर्फ उसे अनदेखा करती थी, जो बेहतर था, क्योंकि शाश्वत बहुत क्रूर हो जाता है।"

"तुमने कभी कुछ कहा क्यों नहीं?" मैंने घबराकर पूछा।

"जब यह सब तुम्हारे सामने हो रहा था, तो मैं कुछ क्यों कहूँगा?" उसने जवाब दिया। "क्या बकवास है, अंशुमन? मुझे तो यही लगता था कि तुम उससे छुटकारा पाने की कोशिश कर रहे हो। जान बूझ कर यह सब कर रहे हो जिससे वह तुम्हें छोड़ जाए और तुम्हें उसे कुछ देना न पड़े। मुझे तुम्हारे तरीके पसंद नहीं आए, लेकिन मेरी अपनी वैवाहिक समस्याएँ हैं, एक पत्नी के साथ जो हर पाँच मिनट में खाने दौड़ती है, इसलिए तुम अपनी शादी की गड़बड़ी का दोष मुझ पर मत लगाओ।"

मुझे एहसास हुआ कि इसके लिए मैं किसी को दोषी नहीं ठहरा सकता। मैंने अपनी पत्नी को हल्के में लिया और मेरे बच्चे भी मेरे व्यवहार का अनुकरण करने लगे। "पहले ऐसा नहीं था।" रक्षित ने आगे कहा, "ठीक है, तुम हमेशा काम करते रहते थे लेकिन पहले उसके साथ नरमी से पेश आते थे। मुझे लगता है कि जब बच्चे छोटे थे तो वह खुश रहती थी। वह एक बहुत अच्छी माँ है। देविका के साथ मेरे झगड़ों को देखते हुए, मुझे ईर्ष्या होती थी कि तुम कितने खुश-किस्मत थे। अरे, मेरे बच्चे भी प्रियंका के साथ घूमना पसंद करते थे, यही वजह थी कि देविका जलन के मारे उन्हें ऐसा करने नहीं देती थी। लेकिन फिर जुड़वाँ बच्चे किशोर हो गए, और वे बदल गए। वे तुम्हारे साथ अलग हैं। वे तुम्हारा सम्मान करते हैं।"

"वे प्रियंका का भी सम्मान करते हैं," मैंने कहने की कोशिश की।

"नहीं, अंशुमन, वे उसका लगातार अपमान करते हैं। और मेरे ऊपर गुस्सा मत करो; लेकिन वे यह अपमान इसलिए करते हैं क्योंकि तुम खुद उसका हर समय अपमान करते हो। वे यह क्रूरता तुमसे ही सीखे हैं।"

"मैं उसका सम्मान करता हूँ," मैंने झल्लाकर कहा। लेकिन मैं भी अपने दिमाग में अतीत की बातें सुन सकता था। "भगवान के लिए, प्रियंका, मैं काम कर रहा हूँ। क्या तुम खुद अपना काम नहीं संभाल सकती हो?” यह तब, जब उसे मेरी मां के आगे मेरी मदद चाहिए थी।

"क्या तुम सच में डिनर तैयार न कर पाने की बात कह रही हो, प्रियंका? मैंने तुम्हें एक सप्ताह पहले ही बता दिया था कि हमारे यहाँ लोग आ रहे हैं। तुम कैसे भूल सकती हो? तुम बिल्कुल बेकार पत्नी हो" यह तब की बात है जब मैंने उस पर उसकी गलती के बिना ही क्रोध किया और इसके लिए माफी नहीं मांगी, जबकि मुझे पता था कि मैं झूठ बोल रहा हूँ, मैंने उसे हफ्ते पहले नहीं बताया था। मैंने उसे दस लोगों के लिए डिनर तैयार करने के लिए तीन घंटे का समय दिया था, क्योंकि मेरी सेक्रेटरी उसे इस बारे में फोन करना भूल गई थी। लेकिन मैंने प्रियंका पर ही दोष लगाया था।

फिर एक और डिनर के दिन "यह महत्वपूर्ण है, इसलिए कृपया इन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करने का प्रयास करना।" मैं यही कह रहा था कि मुझे शर्मिंदा मत करना। लेकिन उसने तो कभी मुझे शर्मिंदा नहीं किया। तो मैं उसके साथ इतना बुरा व्यवहार क्यों करता रहा था? ऐसे करना मेरी आदत बन गई थी, बिना सोचे कि इससे उसे कैसा लगता होगा। लेकिन जब मैं उसके साथ था, तो उसने जीवन को सुरक्षित और प्रेमपूर्ण बना दिया; उसने मेरी दुनिया को प्रेम और गर्मजोशी का आश्रय बना दिया।

उसे सबके सामने अपमानित करने के बाद रात मेँ मैं अपनी प्यास बुझाने पहुँच गया था "आज रात मुझे ज़रूरत है, बेब," उसकी भावनाओं को पूरी तरह नजरअंदाज करके मैंने बेरुखी से कहा। मेरे लिए सिर्फ अपनी जरूरत महत्वपूर्ण थी "मेरे प्रिय अंशुमन, मैं तुमसे प्यार करती हूँ।" उसने हमेशा की तरह मुस्करा कर मेरे लिए अपनी बाहें खोल दी थीं, कोई शिकवा शिकायत नहीं थी। तब मुझे गर्व होता था कि मेरी पत्नी इतनी समर्पित थी, मेरे दोस्त मुझे कहते थे कि वे मुझसे ईर्ष्यालु थे। अब मुझे समझ आ रहा था कि वे प्रियंका को दया से देखते थे। वे सोचते थे कि घर पर मेरी बेचारी पत्नी मुस्कराती हुई मेरी परवाह करती थी जबकि उसका पति जाहिर तौर पर अपनी सहायक के साथ संबंध बना रहा था। यह सच नहीं था। मेरा अपनी सेक्रेटरी से संबंध नहीं था। लेकिन सब तो ऐसा ही सोचते थे। मैंने बाद मेँ उससे कहा, "प्रियंका, तुम मुझे मना कर सकती हो।"

"मुझे पता है। लेकिन मैं ऐसा नहीं करना चाहती। हम जो कुछ भी करते हैं, प्रिये, वह अद्भुत है क्योंकि हम इसे एक साथ करते हैं। यह हमारी अपनी दुनिया है।" क्या उसे लगता होगा कि अगर वह मेरी बात नहीं मानेगी तो मैं नाराज़ हो जाऊँगा? नहीं, ऐसा नहीं था। उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि यही वह समय था जब मैं उसके लिए पूरी तरह से अकेला होता था। मैं अभी भी अपनी सांसें थाम रहा था। उसने आगे कहा था "यही समय है जब हम सिर्फ़ ‘हम दोनों’ होते हैं, जो अनमोल है।"

मैंने मज़ाक में कहा, "प्रियंका, यहाँ हमेशा सिर्फ़ हम ही रहते हैं। बच्चे पढ़ने चले गए हैं।"

"खैर, तुम काम में व्यस्त रहते हो, इसलिए यह अच्छी बात है।"

"काम की बात हुई है तो, मैं अगले सप्ताह के अंत तक न्यूयॉर्क जा रहा हूँ - हमारा वहां एक बड़ा प्रोजेक्ट है।"

"आह... अम्म ... क्या मैं साथ आ जाऊँ?"

मैंने उसे एक तरफ़ बिठाया और बैठ गया। "यह कोई छुट्टी नहीं है, प्रियंका। मैं काम पर जा रहा हूँ, और हम शायद बिज़नेस डिनर करेंगे।"

"ठीक है।" उसके चेहरे पर निराशा थी, उसकी आंखें उदास थी लेकिन मुझे खुश रखने के लिए मुस्कराई। "चलो प्रियंका, ऐसा मुंह मत बनाओ। तुम काम के बीच में आओगी। मैं काम पर हूँ। तुम वहाँ भी अकेली होगी, तो न्यूयॉर्क के होटल में रहने के बजाय यहीं अकेली रहो।"

"मैं समझती हूँ प्रिय अंशुमन। यह सिर्फ़ एक विचार था। चिंता मत करो।" वह बिस्तर से उठी और बाथरूम में चली गई। मैंने शॉवर शुरू होते सुना। मेरा एक हिस्सा अंदर जाकर उसके साथ दूसरा दौर शुरू करना चाहता था। मैं उससे कभी भी तृप्त नहीं होता था। लेकिन मैं नहीं गया। मैं उसके चेहरे पर उस हार के भाव के बारे में दोषी महसूस नहीं करना चाहता था जब मैंने उसे बताया कि वह मेरे रास्ते में आएगी। लेकिन अहंकार – मैं उसके सामने अपनी गलती स्वीकार नहीं कर सकता था। उफ्फ़! मेरे जैसे ‘समझदार आदमी’ ने उसकी प्यार माँगने की विनती कैसे नहीं सुनी? मैं कैसे नहीं देख पाया कि वह कह रही थी कि मैं उस पर ध्यान दूँ? वह अपने पति से मिलने के लिए कह रही थी। "वह कहाँ गयी है?" रक्षित ने पूछा।

मैंने अपने बालों में हाथ फेरा। "यह सबसे ज़्यादा गड़बड़ वाली बात है रक्षित; मुझे बिल्कुल नहीं पता। उसने सब कुछ छोड़ दिया। उसका फ़ोन, और उसके सारे क्रेडिट कार्ड, सारे गहने। कपड़े भी सिर्फ पुराने कामचलाऊ जींस-टॉप ले गई है, कोई डिजाइनर कपड़े या हैन्ड्बैग नहीं। हर चीज़ यहीं छोड़ गई है। मुझे एक नोट छोड़ा, कि वह पाँच हज़ार रुपये ले रही है, लेकिन वह उस बकवास प्री-नेपुटल समझौते की वजह से उसे भी वापस कर देगी।" मैंने अपना चेहरा अपने हाथों में छिपा लिया और मेरे अंदर आँसू उमड़ कर बाहर निकलने लगे।

"भाड़ में जाओ," रक्षित बुदबुदाया। "बेचारी प्रियंका।"

मैंने ऊपर देखा, मुझे एहसास हुआ कि मेरे चेहरे पर आँसू बह रहे थे। "तुमने तो उसे लालची औरत कहा था। उसके सामने ही।"

"मैं तब एक मूर्ख बच्चा था। मेरा विश्वास करो, मैं ऐसी औरतों से मिला हूँ। प्रियंका खुद सोना थी। उसने हमारी राक्षसी माँ को संभाला। वह तब भी शालीन रहती थी जब देविका या दिव्या क्रूर होती थीं। जानते हो, उसने कभी भी तुम्हारे बारे में शिकायत नहीं की, तब भी नहीं जब मैंने उससे कई बार पूछा कि चीजें कैसी चल रही हैं? वह बस इतना कहती थी कि तुम अपने परिवार के लिए कड़ी मेहनत करते हो, और उसे तुम पर बहुत गर्व है।"

"मुझे बहुत अच्छा लगता था कि वह मेरी ओर ऐसे देखती थी जैसे मैं कोई सुपरहीरो हूँ।"

रक्षित इस बात पर कड़वाहट से हंस पड़ा। मैं उससे सहमत था। सुपरहीरो! मैं तो अपनी शादी की बीसवीं सालगिरह भी भूल गया। "तुम्हें क्या लगता है वह कहां गई होगी?"

"मैं अनुमान लगा रहा हूं - श्रेया।"

रक्षित ने सिर हिलाया, "क्या यह उसकी दोस्त है जिसे कैंसर है?"

"हाँ।" ..... "मैंने उसे पिछले साल कंपनी की नए साल की पार्टी में रोते हुए देखा था।"

मैंने रक्षित की ओर देखा, "क्या?"

उसने सिर हिलाया। "हाँ, वह अकेली ही आग के पास बैठी हुई थी। मुझे उसके लिए बुरा लगा। उसने बहुत बढ़िया खाना पकाया था, पूरी पार्टी का आयोजन किया था, लेकिन वह अकेली थी जिसे इसका कोई मज़ा नहीं आ रहा था। कोई उससे बात नहीं कर रहा था, तुम काव्या के साथ हंस बोल रहे थे। वह बहुत उदास थी।" मुझे याद आया कि मैंने काम से कुछ लोगों को आमंत्रित किया था। काव्या वहाँ आई थी। मैंने बहुत अच्छा समय बिताया - अपने बच्चों, अपने सहकर्मियों, अपने भाई, अपने दोस्तों के साथ समय बिताया। जब हमने नया साल मनाया तो मैंने बच्चों को चूमा। लेकिन मुझे याद नहीं कि अगले दिन क्या हुआ।

क्या मैंने अपनी पत्नी को नव वर्ष की शुभकामनाएँ दी थीं? रक्षित कहता रहा "वह परेशान थी। अगली सुबह उसे अपनी दोस्त के पास जाना था जो कीमोथेरेपी करवा रही थी। वह दो दिन पहले जाना चाहती थी लेकिन तुमने उसे कहा कि तुम्हारी ‘नेटवर्किंग’ पार्टी महत्वपूर्ण है और उसका रहना जरूरी है।" मैं सुबह करीब चार बजे बिस्तर पर कर सो गया था। जब तक मैं उठा, प्रियंका जा चुकी थी। उसने हमेशा की तरह मेरे लिए खाना छोड़ा था, जो वास्तव में कोई मायने नहीं रखता था क्योंकि मैंने काव्या और काम से जुड़े अन्य लोगों के साथ खूब खाया था। "मैंने उससे कहा कि वह एक अच्छी दोस्त है। मेरा मतलब है, वह श्रेया के सभी कीमो उपचारों में गई थी, सिवाय एक दो के, जब मुझे लगता है कि तुम्हारा कोई काम रहा था। यह होती है देखभाल!" बोलते हुए रक्षित सिर हिला रहा था, उसकी आँखों में मेरी पत्नी के लिए विस्मय और सम्मान था। हाँ, प्रियंका ठीक ऐसी थी, देखभाल करने वाली, ध्यान रखने वाली, प्यार करने वाली। मुझे याद है कि उसे वह कीमोथेरेपी छोड़ देनी पड़ी क्योंकि मुझे कार्यक्रम में उसके साथ की ज़रूरत थी। क्या मैंने अपना समय उसके साथ बिताया, या मैंने वही किया जो रक्षित ने कहा था; काव्या और अन्य लोगों के साथ रहा, अपनी ‘पहली’ पत्नी को एक कोने में बैठा कर?

"मैं उससे प्यार करता हूँ, रक्षित।"

"लगता तो नहीं है अंशुमन। किसी को भी नहीं लगता। क्या सच मेँ?"

"हाँ," मैंने ईमानदारी से कहा। "प्रियंका मेरी ज़िंदगी को बेहतर बनाती है। पिछले कुछ महीने हमारे अंतर्राष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स में बहुत व्यस्त रहे हैं, लेकिन जब मैं घर आता हूँ और उसके साथ बिस्तर पर जाता हूँ, तो ऐसा लगता है जैसे मेरी पूरी दुनिया सही है।" तो फिर तुम अक्सर अतिथि कक्ष में क्यों सोते हो, बेवकूफ? मुझे लग रहा था कि मेरे इर्द-गिर्द दुनिया ढह रही है, और अब मुझे पता चल रहा था कि यह सब मेरे ही हाथों से होता रहा है। "मैं उसे कभी धोखा नहीं दूंगा। मैं ऐसा नहीं करना चाहता। बच्चों के बाद भी, सभी कहते हैं कि सेक्स खत्म हो गया, लेकिन हमारे साथ ऐसा नहीं हुआ।" लेकिन हाल ही में हमारा साथ नहीं हुआ, पिछले कई महीनों से नहीं। मैं देर रात तक काम कर के अतिथि कक्ष में सोने लगा था।

"अंशुमन, बिस्तर मेँ अपनी शारीरिक जरूरत पूरी करने के लिए पत्नी को उपयोग कर लेना प्यार नहीं होता मेरे भाई। किसी को नहीं लगता कि तुम्हें उससे प्यार है। मुझे संदेह है कि प्रियंका को भी कभी ऐसा लगता होगा। तुम भाग्यशाली हो।"

"हाँ, मैं भाग्यशाली था।" मैंने आह भरी। "ओह! क्या मैं उसके साथ इतना बड़ा गधा था?"

"पता नहीं जब तुम दोनों अकेले होते थे, तब कैसा था, लेकिन जब मैं आसपास था, हाँ। फिर एक बार तुम नशे में थे, और हम सब शादी के रिश्ते के बारे में बात कर रहे थे।"

मुझे वह रात याद आ गई। हमारे साथ कुछ लोग आए थे। हमारे दोस्त ईशानी और विवेक भी वहाँ थे। एक साल बाद उनका तलाक हो गया। मेरी बहन दिव्या और शुभम भी थे। लेकिन उस रात हम सब इस बारे में बात कर रहे थे कि हम सब कैसे एक साथ आए। "मैं प्रियंका से तब मिला था जब वह यूनिवर्सिटी के पास एक रेस्टोरेंट में काम करती थी," मैंने कहा। "वह बहुत खूबसूरत थी और बेशक, मैं प्यार मेँ पड़ गया। मूर्खता की उम्र थी। हम उन दिनों कैसे बेवकूफ होते थे?" देविका और रक्षित सोफे पर साथ बैठे थे जबकि ईशानी और विवेक कॉफी टेबल के दूसरी तरफ के सोफ़े पर। प्रियंका मेरे पास में एक आराम-कुर्सी पर बैठी थी ताकि वह रसोई में अंदर-बाहर जा सके और सभी का ख्याल रख सके। उसने खाना पकाया था, क्योंकि वह बहुत बढ़िया खाना बनाती थी, जिस पर मुझे हमेशा बहुत गर्व होता था। यहाँ तक कि माँ या देविका भी उसके खाने के बारे में कुछ नहीं कह सकती थीं। हम खाना खा कर अंत में वाइन और कॉफी पी रहे थे। "हमने बच्चों की वजह से शादी आगे भी बनाए रखी। लेकिन कौन जानता है कि अगर वे न होते तो क्या होता।"

प्रियंका ने मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे मैंने उसे थप्पड़ मार दिया हो, और मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं और चिढ़ गया। "मेरा ऐसा मतलब नहीं था, अपने चेहरे से वह दुख भरी नज़र हटाओ, लानत है यार। और यह सालों पहले की बात है; हम इसे भूल सकते हैं, है न?"

"बेशक। क्या कोई और कॉफी या वाइन लेना चाहेगा?"

"क्यों न मैं आपकी मदद करूँ?" रक्षित प्रियंका के साथ रसोई में चला गया।

मैंने अगले दिन प्रियंका से माफ़ी मांगी और कहा कि मैंने बहुत ज़्यादा शराब पी ली थी। उसने मेरी माफ़ी स्वीकार की और नाश्ता बनाया, और बस इतना ही। अब, जब मैंने उस बातचीत के बारे में सोचा, तो मुझे उल्टी आने लगी। मैंने उसे कितना अपमानित किया। कोई आश्चर्य नहीं कि सभी ने मान लिया कि मैं उससे छुटकारा पाना चाहता हूँ; सच ही मेँ, शायद उसे भी यही लगता होगा। रक्षित ने आगे कहा "मैंने अंदर जाकर पूछा कि क्या वह ठीक हैं, मुझे आश्चर्य हुआ था कि तुमने सबके सामने ऐसा कहा। उस पल मेँ, किसी दूसरे पुरुष के पूछने पर, कोई भी दूसरी महिला अपने पति के खिलाफ बोल पड़ती। लेकिन प्रियंका ने मुझे कॉफी को लिविंग रूम में वापस ले जाने में मदद करने के लिए कहा और मुझे उसका हालचाल पूछने के लिए धन्यवाद दिया। कोई शिकायत नहीं की।"

"मैंने उसके लिए उससे माफ़ी मांगी थी"

"हुँह! और माफी मेँ क्या कहा था तुमने?"

"यह ‘लेकिन मैं नशे में था’ वाली माफी थी, जो बिल्कुल भी ईमानदार नहीं थी।"

"क्या जुड़वाँ बच्चों के कारण तुम्हें उससे शादी बनाए रखने की मजबूरी पर कोई क्रोध है?"

मैंने ‘न’ मेँ अपना सिर हिलाया. "मुझे उसके साथ जीवन पर बहुत खुशी है।"

"तो फिर अंशुमन, तुम अपनी पत्नी के साथ कूड़े जैसा व्यवहार क्यों करते रहे हो?" मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था। मुझे लगता था कि मैं खुश हूँ। मुझे लगता था कि हम ठीक-ठाक हैं। नहीं, यह सच नहीं है। मुझे पता था कि वह खुश नहीं थी। मैं सोचता रहा, कि जैसे ही काम मेँ चीजें आसान हो जाएंगी, मैं उसके पास पहुँच जाऊँगा। वह कहीं नहीं जाने वाली, लेकिन मेरे ग्राहक शायद जा सकते थे।

तभी देविका आई, एक बहुत ही टाइट ड्रेस में जो मैं उसकी उम्र की किसी महिला को पहने हुए नहीं देखना चाहता था। मेरा मतलब है, मुझे इस बात से कोई मतलब नहीं था कि कोई महिला क्या पहनती है; यह उसकी अपनी पसंद थी, लेकिन देविका, प्रियंका के बारे में झुग्गी के बारे में की गई सभी बकवास टिप्पणियों के बावजूद, बहुत अभद्र कपड़े पहनती थी। जब प्रियंका झुग्गी में रहती थी, तब भी ऐसी नहीं दिखती थी। वह हमेशा, सस्ते कपड़ों में भी, सुंदर सौम्य और आकर्षक दिखती थी। क्या मैंने उसे कभी यह बताया था? देविका ने नीले रंग का सीक्विन वाला गाउन पहना था जो उसके शरीर को और उभार रहा था। उसने हाल ही में महंगा टमी टक करवाया था जो कारगर रहा, क्योंकि उसका पेट सपाट था। प्रियंका ने बिना सर्जरी के कसरत की और अपना ख्याल रखा। क्या प्रियंका को लगा कि उसे ऐसा करने की ज़रूरत है क्योंकि मैं उसे नहीं चाहता? अब मेरे मन में बहुत सारे सवाल थे। "अंशुमन, तुम्हें देखकर बहुत अच्छा लगा। कैसा चल रहा है?" उसने मुझे हवा में चूमा और फिर अपने पति के पास बैठ गई। "प्रियंका उसे छोड़कर चली गई," रक्षित ने उससे कहा।

देविका ने दोनों भौंहें उठाईं और खुशी से ताली बजाई। "अच्छा, अरे, तब तो हमें शैंपेन खोलनी चाहिए।" मैंने उसकी तरफ देखा। खैर, उसे ऐसा क्यों नहीं लगेगा कि यह जश्न मनाने का क्षण है, क्योंकि मेरा भाई भी, जो मुझे बेहतर जानता था, ऐसा ही सोचता था? "क्या हुआ?" देविका ने हम दोनों की उदासी देख कर चकित आवाज मेँ पूछा।

"मैं नहीं चाहता था कि वह मुझे छोड़ कर चली जाए, देविका," मैंने कहा।

"सच में? क्योंकि हम सब को तो ऐसा लग रहा था कि तुमने जान बूझ कर ऐसा माहौल बनाया। और माँ जी ने कई बार सभी को बताया कि तुम्हारा प्री-नेपुटल समझौता कैसे सेट किया गया था। उन्होंने मुझे बताया था कि प्रियंका ने इसे बिना पढे हस्ताक्षर कर दिए थे। ‘मूर्ख लड़की’, उन्होंने कहा था। मैंने तो भाई, अपने वकीलों से अपने समझौते को बारीकी से जांचने को कहा” देविका अपने पति की ओर मुड़ी। "प्रिय, एक ग्लास वाइन प्लीज।" रक्षित उसके लिए कुछ पीने के लिए लेने चला गया। वह षड्यंत्रकारी ढंग से आगे झुकी। "अंशुमन, कृपया अपनी असिस्टेंट से शादी मत करना। मेरा मतलब है, तुम जो भी कर रहे हो, ठीक है, लेकिन उसे राव-सिन्हा मत बनाओ। प्रियंका जैसी गंदगी की पैदाइश से छुटकारा पाने में तुम्हें बहुत समय लग गया और अब एक और मध्यम वर्ग से आई लड़की को परिवार मेँ ---"

"देविका, मैं अपनी पत्नी से प्यार करता हूँ," मैंने बीच में कहा। " मैं उससे बहुत प्यार करता हूँ। मेरा काव्या के साथ कोई संबंध नहीं है। मैं अपनी पत्नी से प्यार करता हूँ। मैं उसे वापस लाना चाहता हूँ।"

देविका भी रक्षित की ही तरह उलझन में दिखी! "कोई भी विश्वास नहीं कर सकता, कोई नहीं सोचता कि तुम अपनी पत्नी से प्यार करते हो, अंशुमन" उसने उपहास करते हुए कहा।

"हाँ, मुझे एहसास होने लगा है, कि मैं प्रियंका के लिए एक बहुत बुरा आदमी रहा हूँ।"

"खैर, कम से कम वह तुमसे कुछ नहीं ले सकती, यह राहत की बात है।"

"किसके लिए राहत?" ..... "हम सभी जो परिवार की परवाह करते हैं।"

"तुम चाहती हो कि मेरी पत्नी के पास पैसे न हों? बीस साल की शादी के बाद वह कंगाल हो जाए?" मैं उठ खड़ा हुआ, मेरे अंदर उलटी आने का भाव उमड़ रहा था। "क्यों? वह एक अद्भुत पत्नी और माँ है। तुम सब उसे इतना नापसंद क्यों करते हो?"

"ईमानदारी से कहूँ तो अंशुमन, सवाल तो यह है कि ‘तुम’ उसे क्यों नापसंद करते हो? हम सब तो इसलिए ऐसा करते हैं कि तुमने हमें ऐसा करने के लिए हमेशा प्रोत्साहित किया है।" देविका ने पलटकर कहा।

"मैं उसे नापसंद नहीं करता, थोड़ा सा भी नहीं। मैं उससे बहुत प्यार करता हूँ।"

"जिस तरह से तुम उसके साथ व्यवहार करते हो, जिस तरह से तुम्हारे बच्चे तुम्हारे सामने उसके साथ व्यवहार करते हैं? किसी को भी ऐसा नहीं लगता। रक्षित और मेरे बीच कुछ मुद्दे हो सकते हैं, लेकिन अगर हमारे बेटे कभी मुझसे उस तरह बात करें जैसे शाश्वत प्रियंका से करता है, तो वह अपना आपा खो देगा।"

रक्षित रेड वाइन का गिलास लेकर वापस आया और देविका के सामने रख दिया, और अपनी पत्नी के पास बैठते हुए बोला "मैं सोच रहा था कि यह कौन जानता होगा कि प्रियंका कहाँ है? ईशानी। वे दोनों दोस्त थीं।” “हाँ, ठीक कहा तुमने” मैंने उठते हुए कहा। “मैं ईशानी से बात करूँगा।"


शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग सात (07)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग सात (07)



भाग 7

प्रियंका



"श्रेया कैसी है?" ईशानी ने फोन पर पूछा, जब मैं मेहमानों के सो जाने के बाद सुबह के लिए आटा गूंथ रही थी। यह शांत समय था - जब मैं अगले दिन की तैयारी करते हुए सोच सकती थी। मुझे बैंगलोर छोड़े दस दिन हो गये थे, मेरा दिल टूट गया था। मुझे अंशुमन की याद आती थी। मैं कई बार फ़ोन करने के लिए ललचाती थी, लेकिन खुद को रोक लेती थी। जब मैं घर पर थी, तब भी तो वह फ़ोन नहीं उठाता था, जबकि वह मेरा नंबर पहचानता था, तो अब क्या संभावना थी कि वह फ़ोन उठाएगा, खासकर अपरिचित नंबर से?

"वह धीरे-धीरे खोती जा रही है ईशानी। मैं कल उसके साथ डॉक्टर के पास गई थी, और उसके पास अब ज्यादा समय नहीं बचा है।"

"हे भगवान, प्रियंका, मुझे बहुत खेद है। मैं कल्पना भी नहीं कर सकती कि यह तुम्हारे लिए कितना कठिन है।" ..... "वह बहुत छोटी है। हम दोनों कमोबेश दोनों एक ही उम्र की तो हैं.... उसे ऐसी हालत मेँ देखकर मेरा दिल टूट जाता है।"

"दिल टूटने की बात करें तो, मेरे पास तलाक के सारे कागज़ात तैयार हैं।" मैंने अस्थिर साँस छोड़ी और एक पल के लिए आटा गूंथना बंद कर दिया।

मैंने ईशानी से तलाक की प्रक्रिया संभालने और अंशुमन को कागजात सौंपने को कहा था। मुझे डर था कि मैं कहीं खुद ही कागज उसे दूँ, और फिर वह उन्हें देखकर भी अनदेखा कर दे या अरुचि से हाँ मेँ सिर हिलाए, और फिर अपने कंप्यूटर स्क्रीन पर जो कुछ भी था, उसे देखने लगे। मेरा रहा-सहा दिल भी टूट जाएगा। उस दर्दनाक पल से बचने के लिए, मैंने कायरतापूर्ण तरीका अपनाया और ईशानी से कागजी प्रक्रिया संभालने को कहा था। "ठीक है। कागज मुझे भेज दो, तो मैं हस्ताक्षर करके उन्हें वापस भेज दूँगी।"

"प्रियंका, क्या तुम सच में कुछ पैसे नहीं लेना चाहती हो? हनी, तुमने इतने सालों तक उसके घर और उसके बच्चों का ख्याल रखा था।"

"हमारा घर और हमारे बच्चे ईशानी। मुझे उससे एक पैसा भी नहीं चाहिए।"

"मैं प्री-नेपुटल समझौते को चुनौती दे सकती हूँ। तुम दोनों बीस साल से साथ हो।"

"मैं नहीं चाहती, ईशानी।"

"मुझे इस बात से नफरत है कि तुम्हें तलाक से गुजरना पड़ रहा है। लेकिन मैं समझती हूँ। मेरा मतलब है, यह बात पूरे शहर में है इसलिए...."

"शहर में? क्या बात? क्या हो रहा है?" मैंने पूछा, मेरा दिल धड़क रहा था।

"चलो प्रियंका, तुम्हें पता है।" उस ने अपना गला साफ किया। मुझे जाकर कुछ ही दिन हुए थे, क्या अंशुमन इतनी जल्दी ही आगे बढ़ चुका था? खैर, इससे मुझे समझना चाहिए कि मैं उसकी प्राथमिकताओं की सूची में कहाँ हूँ। "भगवान जाने कब से उसका अपनी सहायिका के साथ प्रेम-संबंध चल रहा है। हर किसी को पता है।"

मैं जोर से हंस पड़ी, "नहीं ईशानी, मुझे ऐसा नहीं लगता।"

"तुम अंशुमन से प्यार करती हो प्रियंका, लेकिन प्यार मेँ हम इतने अंधे नहीं हो सकते।"

"मैं अंधी नहीं हूँ, मुझ पर विश्वास करो ईशानी। मैं अंशुमन को अंदर और बाहर से जानती हूँ। हो सकता है कि वह अब मुझसे प्यार नहीं करता, या शायद उसने कभी सच में किया ही नहीं, लेकिन धोखा देकर अपनी शादी की कसमें तोड़ रहा हो? वह ऐसा नहीं है।"

"मैं एक घरेलू वकील ऑफिस चलाती हूँ प्रियंका! मुझे नहीं पता कि मेरे पास आने वाली कितनी महिलाएं जीवन भर सोचती हैं कि उनके पति उन्हें धोखा नहीं देंगे और—"

"अंशुमन मुझे किसी दूसरी महिला के साथ धोखा नहीं देंगे, ईशानी। यह उससे भी बदतर स्थिति है। उन्होंने मुझसे कभी प्यार ही नहीं किया। और यह सच्चाई पिछले कुछ सालों में और भी स्पष्ट होती जा रही है। शायद उन्हें लगता है कि मुझ से शादी कर के मुझ पर कोई एहसान किया है, क्योंकि मैं एक गरीबी मेँ पली हुई लड़की थी और वे खानदानी अमीर लोग थे। उन्होंने उनकी माँ के हर दुर्व्यवहार पर हर बार मुझ पर एहसान दिखाया कि ‘मैंने तुमसे शादी की न? और क्या चाहती हो?’ और हर बार याद दिलाया कि प्री-नेपुटल समझौते के अनुसार यदि मैंने उन्हें छोड़ा तो मुझे कुछ नहीं मिलेगा। वे यही सोचते और कहते रहे कि मैं पैसे के लिए उनसे बंधी रही, जबकि मैं अपने प्यार के कारण उनके साथ थी।"

"हम्म - क्या कागज मैं उसे किसी के हाथ से पहुंचाऊं या कोरियर से भेज दूँ?"

"वही करो जो तुम आम तौर पर करती हो। ईमानदारी से कहूँ तो, अंशुमन को कोई परवाह नहीं होगी।” उसे तो पता लगने में भी कुछ दिन लग गए होंगे कि मैं चली गई हूँ। ईशानी ने आह भरी, "और तुम्हें उससे कुछ भी नहीं चाहिए?"

"नहीं। बस इतना करना कि मर्सिडीज और पाँच हज़ार रुपये के बारे में एक नोट जोड़ देना। मैंने उसे जो पत्र छोड़ा था, उसमें मैंने कार का ज़िक्र नहीं किया था। अगर वह चाहे तो कार उसे तुरंत वापस मिल सकती है। पैसे.... खैर, पैसे लौटाने के लिए मुझे कुछ समय चाहिए, इसलिए शायद हम मेरे लिए पैसे वापस करने की कोई महीने की किश्तों की योजना बना सकें। और हाँ, यह भी कहना कि मैं प्री-नेपुटल समझौते के कारण नहीं बल्कि प्यार के कारण इतने सालों उसके साथ थी।"

"प्रियंका, वह अमीर आदमी पांच हजार रुपये तो खर्च कर ही सकता है," ईशानी ने खीज कर कहा। "मैं खुद ये तलाक के कागजात अंशुमन राव-सिन्हा को सौंपने जा रही हूँ और जब मैं ऐसा करूँगी, तो मैं उसे कुछ अक्ल की बात भी बता दूँगी।"

"तुम जो करना चाहो करो, ईशानी, लेकिन तुम अपना समय ही बर्बाद करोगी।"

हमने लक्षद्वीप में मेरे जीवन के बारे में थोड़ी और बातें कीं। जब तक मैंने कॉल खत्म की, मैं डबल-रोटी के आटे को रसोई के सबसे गर्म हिस्से में खमीर उठने के लिए छोड़ने को तैयार थी। मैंने एक आवाज़ सुनी और रसोई के दरवाजे पर खड़ी श्रेया की ओर देखा, "क्या तुम तलाक लेने के बारे में निश्चित हो?" ..

"नहीं, लेकिन वापस नहीं जा सकती श्रेया।" मैंने कहा "मैं वहाँ धीरे-धीरे खत्म हो रही थी। और... और...." मेरे आंसुओं ने मेरा गला घोंट दिया।

"ओह, रोना बंद करो," श्रेया ने अपने चिर परिचित शुष्क हास्य के साथ कहा। "रोना इस धरती पर मेरे आखिरी दिनों को उदास कर देगा, और मैं ऐसा नहीं चाहती।" मैंने उसे नाश्ते के कोने में कुर्सी पर आराम से बैठने में मदद की और उसके चारों ओर एक कंबल लपेट दिया। वह थक कर तकिये पर झुक गई। अपने बेडरूम से रसोई तक चलने में ही वह थक गई थी। डॉक्टर ने मुझे एक साल या कुछ महीने बताए थे, लेकिन संभवतः? डॉक्टर ने अस्पताल का सुझाव दिया था, और मैंने मना कर दिया था। श्रेया भी ऐसा नहीं चाहती थी। मैं यहाँ थी, और मैं उसकी देखभाल कर सकती थी। मैं उसे नहलाती, सहारा देती, उसे बाथरूम ले जाती और यदि वह उल्टी करती थी तो उसे सम्हालती। वह सब करती जो उसे चाहिए होता था। वह अब बहुत सोती थी, बहुत कम खाती थी, थोड़ी चाय पीती थी क्योंकि पानी का स्वाद उसे बुरा लगता था। अपनी प्यारी दोस्त को इस तरह मरते हुए देखना दर्दनाक था। "पुदीने की चाय चाहिए?" उसने सिर हिलाया, उसकी साँसें उथली थीं। मैंने केतली चालू की और एक बर्तन में चाय, पुदीने की पत्तियाँ और थोड़ा शहद डाला। उसका गला दुखता था और शहद दर्द को कुछ हद तक कम करने में मदद करता था।

"अंशुमन बुरा आदमी नहीं है," श्रेया ने अचानक कहा।

"नहीं, वह बुरा आदमी नहीं है।"

"वह एक स्वार्थी कमीना इंसान है, लेकिन तुमने भी तो उसे अपने साथ ऐसा व्यवहार करने की अनुमति दी। गलती तुम्हारी भी है, तुमने कभी विरोध नहीं किया"

"मुझे पता है श्रेया, कि मेरी भी गलती है" मैंने चाय के प्याले को मेज पर रख दिया।

श्रेया ने अपने दिवंगत पति के बीमे के पैसे का इस्तेमाल उस घर को रिसॉर्ट में बदलने के लिए किया, घर जो पति ने उसके लिए छोड़ा था। वह जगह, जो कभी उसके पति की दादी की थी, एक अविश्वसनीय संपत्ति थी। पहले यह बस एक उपेक्षित कूड़ा-घर था जिसे कोई नहीं चाहता था, लेकिन श्रेया ने इसकी क्षमता देखी और इसे बहाल करने में खुद को झोंक दिया। जैसे भी मैं मदद कर सकती थी, मैंने मदद की। जब वह दो साल पहले बीमार पड़ी, तो मेरा उस से मिलने जाना और भी ज़्यादा बढ़ गया। मैं उसकी कीमोथेरेपी के दौरान उसके साथ रहना चाहती थी और यह सुनिश्चित करना चाहती थी कि रिज़ॉर्ट का संचालन सुचारू रूप से चलता रहे - आखिरकार यह उसकी आजीविका थी। और अब मेरी भी तो!

"तुमने बच्चों को मेसेज कर लिया?" श्रेया ने पूछा।

मैंने अपना सिर ना मेँ हिलाया। "मुझे डर लग रहा है। शनिवार को करूँगी। लेकिन चिंता की ज़रूरत नहीं है - वैसे भी जब मैं फ़ोन करती हूँ तो वे शायद ही कभी फ़ोन उठाते हैं।"

"प्रियंका, तुम अपने परिवार से बहुत प्यार करती हो।"

मैंने श्रेया के हाथ को थपथपाया। जब हम छोटे थे, तो लोग हमें ब्लैक एंड व्हाइट कहकर बुलाते थे। हम अविभाज्य थे, जैसे आप तभी हो सकते हैं जब आपका घर संकट में हो, और आप एक दूसरे की जीवन रेखा हों। हमने अपने लिए अच्छा किया। हम झोंपड़ पट्टी से बाहर निकल आए। अब हमको देखो! "मैं अपने परिवार से प्यार करती हूँ, लेकिन मुझे भी तो प्यार की ज़रूरत है," मैंने कहा। "मैं उन लोगों की देखभाल करते-करते थक गई हूँ जो मेरा कभी साथ नहीं देते।" ... "इसमें मैं भी शामिल हूँ क्या?" श्रेया ने कर्कश स्वर में कहा।

मैं हँस पड़ी "तुम मेरी हो, श्रेया। हमारा साथ हमेशा का है, प्यारी सखी।" उसने एक कमजोर हंसी निकाली जो खाँसी में बदल गई। उसने अपना गला शांत करने के लिए थोड़ी चाय पी। "तुम्हें उन्हें बताना तो होगा न, कि तुम कहाँ हो।"

“वे जानते हैं कि मैं तुम्हारे साथ हूँ। वे जानते हैं तुम ही मेरी दोस्त हो। और उन्होंने मेरी एकमात्र मित्र से मिलने की कभी जहमत नहीं उठाई। मैंने उनसे लक्षद्वीप का ज़िक्र किया, लेकिन पता नहीं वे मेरी बात सुन भी रहे थे या नहीं।" मैं कड़वाहट से भरी थी। अपने परिवार के लिए मैं कुछ नहीं थी - सिर्फ माँ और पत्नी; जो “मौजूद” थी एक कुर्सी टेबल की तरह। उनकी सुविधा के लिए। मेरा अपना कोई अस्तित्व नहीं था उन सब के लिए।

"प्रियंका, अकेले रहना कोई बुरी बात नहीं है। मैं अकेली थी, लेकिन मेरे पास तुम थी। अरे, मेरे चले जाने के बाद तुम्हारे पास वह भी नहीं रहेगा। देखो, अकेले रहना ठीक है; एकाकी हो जाना ठीक नहीं है। इसलिए, जब अंशुमन तुम्हारे पास आए, क्योंकि वह आएगा, तो तुम सुनिश्चित करो कि उसे पता हो कि वह तुम्हें वापस क्यों चाहता है।"

मेरे मुँह से सिसकी निकल पड़ी। "मुझे नहीं लगता कि वह मुझे वापस चाहता है, श्रेया। मुझे नहीं लगता कि वह मुझे पहले भी सच्चे मन से चाहता था। उसने हमेशा मुझे एहसास दिलाया कि उसने मुझसे शादी कर के मुझ पर एहसान किया है। और एक समझौते पर हस्ताक्षर के कारण मैं उसके साथ रहने पर मजबूर हूँ।"

मैंने अपना सिर उसके कंधे पर टिका दिया और उसने मुझे अपने पास खींच लिया। हम साथ में वैसे ही बैठे रहे, जैसे बचपन में झोंपड़ पट्टी मेँ बैठते थे। तब बाहरी दुनिया हमारी दुश्मन थी। और अब?

अब, हमारे शत्रु हमारे अंदर बस गए थे - उसका कैंसर और मेरा टूटा हुआ दिल।

शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग छः (06)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग छः (06)


भाग 6

अंशुमन

मुझे ऐसा लग रहा था जैसे घर मेँ कोई मर गया हो। बच्चों और मुझे पूरे एक हफ़्ते से प्रियंका की कोई खबर नहीं मिली थी। दीपावली कुछ ही दूर थी, और मेरे दिल में बिल्कुल भी खुशी नहीं थी। घर में कोई आत्मा नहीं थी, सिर्फ़ मैं, आधी ज़िंदा आत्मा, भटकती, इधर-उधर भागती हुई। मैं हर दिन काम से लौटता था, इस उम्मीद में कि आज वह वापस आएगी। शाश्वत ने फोन पर मुझसे बेरुखी से कहा, "पापा, माँ को अपने मध्य जीवन संकट/ नर्वस ब्रेकडाउन से निपटने दीजिए, और फिर वह घर आ जाएंगी"

"बदतमीजी बंद करो, शाश्वत। मैं गंभीर हूँ। तुम लगातार माँ का अनादर कर रहे हो।"

"क्या????"

नीलिमा ने ग्रुप कॉल पर कहा, "पापा सही कह रहे हैं, शाश्वत, माँ इस तरह के बर्ताव की हकदार नहीं है। हम सब ने उसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया है। यशस्वी ने कहा कि उसे बिल्कुल आश्चर्य नहीं हुआ कि माँ हम सब को छोड़ कर चली गयीं।”

शाश्वत "हूँ? वह सिर्फ एक बार माँ से मिला है।"

"हाँ, और उसके लिए एक मुलाकात ही यह देखने के लिए काफी थी कि हम माँ के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते। उसने कहा कि उसने माँ से बात की और उन्हें काफी दिलचस्प पाया। वह आश्चर्यचकित था कि हम लोगों ने माँ के साथ कोई बातचीत नहीं की...सिवाय इसके कि....कि .."

"सिवाय किस बात के नीलिमा? बोलो न?" शाश्वत ने पूछा।

"मुझे बहुत शर्म आ रही है, पापा। यशस्वी को याद है कि आप फ्रैंक लॉयड राइट के बारे में बात कर रहे थे, और माँ ने कहा कि वह उनके घरों में से एक में गई थी, और वह घर उनकी पसंद के हिसाब से बहुत ही कठोर था। तब शाश्वत ने कहा कि वह उनकी शैली को नहीं समझ पाई क्योंकि वह अनपढ़ जैसी हैं, क्योंकि वे कॉलेज नहीं गई थी।"

शाश्वत ने बचाव करते हुए कहा, "मैंने ऐसा कभी नहीं कहा था।"

"यशस्वी को इस बात का हर शब्द याद है, शाश्वत। तुमने कहा था, ‘मुझे नहीं लगता कि आप उसकी प्रतिभा की सराहना कर सकती हो, माँ, क्योंकि आपने मेरी तरह इसका अध्ययन नहीं किया। मेरा मतलब है, आप तो कभी कॉलेज भी नहीं गई हो!’ और फिर तुम व्यंग्य से हँसे और विषय बदल गया। यशस्वी ने मुझे बताया कि माँ सदमे में दिख रही थी कि उन के अपने बच्चे उनके पति और यशस्वी के साथ खड़े होकर उनका मखौल उड़ा रहे हैं। उनकी आँखों मेँ एक पल को आँसू आए थे और उन्होंने पलकें झपक कर आँसू रोके और खुद को नियंत्रित कर लिया था। फिर रसोई से कुछ लाने के लिए उठ गईं। जब वह वापस आई, तो वह अपने आप में मुस्करा रही थी, लेकिन उन्होंने उस शाम के बाकी समय कोई बात नहीं की। यशस्वी को लगता है कि तुम एक बेवकूफ हो, शाश्वत, और पापा और मैं तुम्हें इस तरह के व्यवहार मेँ प्रोत्साहित करते हैं, क्योंकि वे गरीब घर से आईं, जल्दी बच्चे हो जाने के कारण पढ़ नहीं पायीं, और हम पढ़े-लिखे, अमीर, बड़े लोग हैं।

"यशस्वी नशे में था। मैं उसकी बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं दे सकता," शाश्वत बुदबुदाया।

मुझे यह बात याद थी, लेकिन यह एक खुली बात थी कि कैसे प्रियंका को हाईस्कूल की पढ़ाई से आगे की शिक्षा नहीं मिल पाई, क्योंकि वह गर्भवती हो गई थी। उसे एक साथ दो बच्चे पालने थे। हमारे अमीर समाज की महिलाएं बच्चों को संभालने के लिए अक्सर आया रख लेती थीं, घरवालों से मदद की आवश्यकता ही नहीं होती, लेकिन प्रियंका ने आया नहीं रखी थी। अपने बच्चों को बड़े प्यार से अपने हाथों ही संभाला था। मेरे परिवार मेँ मेरे सहित किसी ने उसे सहारा नहीं दिया कि वह आगे पढ़ पाती। यह कोई रहस्य नहीं था। लेकिन यह कोई जायज कारण नहीं था कि वह जो भी महसूस करती हो उसे अमान्य कर दिया जाए।

"शाश्वत, जहां बात तुम्हारी माँ की आती है, तो तुम और मैं गलत तो हैं ही" मैंने धीरे से कहा। "मैंने ही तुम्हारे लिए एक बुरा उदाहरण पेश किया है। मेरी देखा देखी तुम दोनों उसका अनादर करने लगे। मुझे पता भी नहीं चला मैंने कब उसे अपने ही घर मेँ एक तिरस्कार की वस्तु बना दिया। मैं शर्मिंदा हूँ, और तुम्हें भी अपने बर्ताव पर सोचना चाहिए।"

शाश्वत ने कराहते हुए कहा, "मुझे इस तरह की आत्म-प्रहार से नफरत है। वह खुद चली गईं। यह उन की अपनी जिम्मेदारी है। मैं फोन रख रहा हूँ।"

उसने फ़ोन काट दिया, लेकिन नीलिमा लाइन पर बनी रही। "मैंने माँ को हमेशा अनदेखा किया," उसने धीरे से कहा। "हमेशा.. सिर्फ इसलिए कि वह आपकी तरह नहीं। वह .... वह घरेलू हैं, घर पर ही रहती हैं। वह राज्यपाल या मेयर से बात नहीं करती। वह सिर्फ खाना बनाती है और... और ..." नीलिमा अब रो रही थी, "मैं एक घटिया बेटी रही हूँ, पापा।"

"नहीं, हनी। ओह, स्वीटहार्ट।" मुझे नहीं पता था कि उसे कैसे सांत्वना दूँ।

"यशस्वी ने बताया कि हम तीनों ने एक इन-ग्रुप बनाया था और वह आउट-ग्रुप में थी।"

"क्या?"

"वह मनोविज्ञान की पढ़ाई कर रहा है," नीलिमा ने बताया। "और वह सही कह रहा है। मैं अपने दिमाग पर जोर डाल रही थी; हम तीनों बातें करते, और वह चुप रहती थीं। अगर वह कुछ कहने की कोशिश करती, जैसे उस दिन, तो हम अनसुना कर देते, या चुप करा देते जैसे उस दिन शाश्वत ने किया। यह सिर्फ़ उस दिन, या उस बात, या शाश्वत की बात नहीं है। यह आपकी भी बात है और मेरी भी।"

"जानता हूँ बेटी।"

"हम माँ के लायक नहीं हैं। माँ ने एक दिन ने मुझे बताया कि श्रेया आंटी की मौत के डर से वह कितनी दुखी है, और मैंने झिड़क कर कहा कि मेरी क्लास चल रही है और मेरे पास ये बेकार बातें करने का समय नहीं है।" मेरा दिल टूट गया कि मेरी बच्ची रो रही थी, लेकिन इससे भी ज्यादा दुख इस बात से हुआ कि मैंने अपनी पत्नी को उसके जीवन से निपटने के लिए अकेला छोड़ दिया: एक मरती हुई दोस्त, एक मतलबी सास, एक मुश्किल ननद, बच्चे जो उसका सम्मान नहीं करते, सब कुछ ही.... मैंने नीलिमा को सांत्वना देने की कोशिश की, लेकिन हम दोनों जानते थे कि हमने गलत किया है। यह बात बिल्कुल स्पष्ट थी।

प्रियंका से कोई संपर्क न होने से मैं बहुत परेशान था। मुझे लगा कि शायद वह अपनी दोस्त श्रेया से मिलने गई होगी, लेकिन मुझे यह भी नहीं पता था कि श्रेया कहाँ रहती है। किसी द्वीप पर या कुछ और। बच्चों को भी नहीं पता था। यह हमारी उपेक्षा का एक और प्रमाण था। उसकी सबसे करीबी दोस्त मर रही थी, और प्रियंका पिछले सालों में अक्सर उससे मिलने जाती थी। उसने कई बार मुझसे कहा था कि मैं साथ चलूँ, लेकिन न सिर्फ मैं नहीं गया बल्कि एक दो बार उसे भी नहीं जाने दिया था। शायद ईर्ष्या थी, कि मेरे अलावा भी उसका कोई और है? फिर भी, मुझे यह तक नहीं पता था कि श्रेया कहाँ रहती है।

मैं अब तक प्रियंका को शांत होने के लिए कुछ समय दे रहा था। जैसे ही उसे एहसास होगा कि वह नाटकीय हो रही है, वह फोन करेगी और हम इस मामले को सुलझा लेंगे। मुझे इस बात का पूरा यकीन था। वह अपने परिवार से प्यार करती थी। वह हमारे प्रति समर्पित थी। इस बारे में मेरे मन में कभी कोई संदेह नहीं था। लेकिन वह चली गई और गायब ही हो गई। मैं प्रियंका से बहुत नाराज़ था। मैं खुद से भी नाराज़ था। मैं दुखी था, मैं दर्द में था। मैं एक ही समय में जुदाई के सभी चरणों से गुज़र रहा था। मैंने अपने मेसेज देखे कि शायद उसने कुछ भेजा हो? सबसे ताजा मेसेज शादी की सालगिरह के दिन का था। “उम्मीद है कि तुम आज जल्दी घर आ जाओगे। मैं शैंपेन की बोतल खोलकर रात के खाने के लिए तुम्हारी पसंदीदा चीज़ें बना रही हूँ। मैं तुमसे प्यार करती हूँ।

मैंने उस मेसेज को आज तक देखा भी नहीं था। मैंने पुराने मेसेजेस को स्क्रॉल करना शुरू किया। उसने मुझे हमारी सालगिरह वाले दिन से पहले महीनों तक कोई मेसेज नहीं भेजा था, आखिरी संदेश अप्रैल में आया था, ‘अंशुमन, तुम घर कब आओगे?’ अधिकतर इसी प्रकार के प्रश्न थे, जिनका मेरी तरफ से कोई उत्तर नहीं था। मैंने पढे तक नहीं थे। एक था जिसका उत्तर था - क्या तुम छह बजे तक घर आ जाओगे? दिव्या और शुभम डिनर के लिए आ रहे हैं। मेरा उत्तर - हाँ । मेरी बहन के मेहमान होने पर तो मैंने उत्तर दिया था! ‘आज मेरा जन्म दिन है। क्या तुम आठ बजे तक घर आ सकते हो? मैं उम्मीद कर रही थी कि हम साथ में खाना खा सकें’ - कोई जवाब नहीं। फिर ‘मैंने मलाई कोफ्ता बनाया है। मैं तुम्हारे लिए रख देती हूँ’ कोई जवाब नहीं। शायद देर से घर आने के बाद मैंने कोफ्ता खा लिया होगा।

‘आज हमारे बच्चों का जन्मदिन है। क्या हम उन्हें घर एक साथ बुला सकते हैं?’ मेरा जवाब था, ‘उनसे मेरी पहले ही बात हो चुकी है, वे नहीं आ रहे’ क्या उसे उन्हें शुभकामनाएँ देने का भी मौका मिला? क्या उन्होंने उसका कॉल उठाया होगा?

एक और यह ‘देविका बच्चों के अस्पताल चैरिटी बॉल के बारे में पूछना चाहती थी। क्या मैं भी आपके साथ शामिल होऊंगी?’ मैंने जवाब दिया: हाँ ।

‘देविका अगले सप्ताहांत के लिए फार्म हाउस की मेरी बुकिंग से परेशान है। वह चाहती है कि मैं बुकिंग रद्द कर दूं’ मुझे याद आया कि इस मेसेज के बाद मैंने उसे फोन किया था, उसके मेसेज के लिए नहीं बल्कि इसलिए कि देविका ने फोन कर के प्रियंका के बारे मेँ बहुत कड़वी बातें की थीं। और उसके अनुरोध के लिए मेरा उत्तर ‘नहीं’ था "प्रियंका, तुम्हें पहले से देविका और रक्षित से पूछना चाहिए था। उनकी योजनाएँ थीं," मैंने उसे फ़ोन पर झिड़क दिया था।

"लेकिन अंशुमन, मैंने देविका से पहले ही पूछा हुआ है।"

"खैर, प्रोग्राम रद्द कर दो। मुझे नहीं लगता कि मैं इसमें शामिल हो पाऊंगा, और बच्चों ने भी कहा है कि वे इसमें शामिल नहीं हो सकते।"

"लेकिन, अंशुमन हमने जन्मदिन मनाने का प्लान....."

"प्रियंका, मेरी अभी एक मीटिंग है। बस इसे संभालो, ठीक है न?" मैंने खीज कर कहा था।

मैंने संदेश की तारीख देखी और आह भरी। लानत है! मैं एक बेवकूफ़ इंसान था। उसने अपने जन्मदिन के लिए घर बुक किया था, कि परिवार इसे एक साथ मना सके, और हम सब? क्या मुझे उसका जन्मदिन याद रहा था? क्या मैंने उसे कोई उपहार दिया था? मैं अपनी शादी के साथ क्या करता आया था?

काव्या ने मेरे खुले ऑफिस के दरवाजे पर दस्तक दी और मैंने उसे अंदर आने का इशारा किया। वह मेरी कार्यकारी सहायक थी और अब तक की सबसे अच्छी सहायक थी। वह उम्र के बीसवें दशक के अंत में थी और अपने काम में बिल्कुल परफ़ेक्ट थी। "अंशुमन, हमें कुछ चीजों के लिए आरएसवीपी करना है।" वह मुस्करा कर बैठ गई। वह गोरी, सुडौल और सुंदर थी, साथ ही सक्षम भी थी। रक्षित ने मुझे चिढ़ाते हुए कहा था कि मैं उस से अफेयर चला रहा हूँ। लेकिन मैं धोखेबाज़ नहीं था, और मैं ऐसा करना भी नहीं चाहता था। प्रियंका और मेरे बीच एक बेहतरीन सेक्स लाइफ़ थी। हमने कब सेक्स करना बंद कर दिया था? आख़िरी बार कब किया था? क्या यह उस रात के बाद था जब मेरा मतलब जल्दी पूरा हो गया था और उसे संतुष्ट नहीं कर पाया था क्योंकि मैं बहुत थक गया था? हाँ, मुझे पूरा यकीन था कि ऐसा ही था। वही आखिरी रात थी, फिर मैं गेस्ट रूम मेँ सोने लगा था। शर्म ने मेरे अंदर फिर से जगह बना ली। हर बार जब मैं सोचता कि मैंने प्रियंका के साथ लगातार कैसा व्यवहार किया, तो मेरा खुद के प्रति सम्मान कम होता जाता।

काव्या ने पूछा, "क्या प्रियंका जी अगले सप्ताहांत मेयर बारबेक्यू में शामिल होंगी?" मैंने अपना सिर न मेँ हिलाया। मुझे नहीं पता था। "नहीं? क्यों नहीं? क्या उनकी भी कोई व्यस्तता है?" उसके चेहरे पर व्यंग्य की मुस्कान थी जैसे प्रियंका को ऐसे समारोहों से मना करने का कोई अधिकार ही नहीं था। "इसका क्या मतलब हुआ?"

"बस इतना है कि वे... घर पर ही तो रहती हैं, और ज़्यादा कुछ नहीं करती हैं।"

"क्या?"

काव्या ने बस कंधे उचका दिए। "मैं...खैर, चलो आगे बढ़ते हैं-"

"नहीं। अपनी बात समझाओ।"

"आपने मुझसे एक बार कहा था कि जब तक कोई मर न जाए तब तक उसके कॉल आपको न लगाऊँ, क्योंकि ‘उसके पास करने के लिए कुछ नहीं है और फालतू कॉल करती रहती है, और वह समझ नहीं पा रही कि हम काम से घिरे होते हैं’, ठीक यही आपके शब्द थे” क्या? क्या मैंने ऐसा कहा था? मैं एक मूर्ख था। "मैंने यह कब कहा?"

"आपके लिए काम करना शुरू करने के कुछ महीने बाद, उन्होंने फोन किया था, और मैंने आपको कॉल कनेक्ट किया था; तब आपने मुझे कहा था कि ऐसा दोबारा न करूँ” अजीब बात यह थी कि मुझे याद भी नहीं था, लेकिन ऐसा लग रहा था कि संभव है कि जिस तरह मैं उस के साथ था, यह संभव था कि मैं ऐसा कहूंगा और करूंगा।

"तो, वह कितनी बार फोन करती रही है? "

काव्या ने कंधे उचका दिए। "कभी कभार। पहले ज्यादा करती थीं। फिर जब मैंने कनेक्ट करना बंद कर दिया तो धीरे-धीरे छोड़ दिया। एक हफ़्ते पहले एक बार फ़ोन किया था।"

हमारी शादी की सालगिरह के दिन किया होगा, उसने मुझे फ़ोन करके और मैसेज करके संपर्क करने की कोशिश की थी - मेरी प्रियंका जो मेरे आने और उससे मिलने का इंतज़ार कर रही थी। "उसने उस दिन फोन पर क्या कहा?"

काव्या ने अपने होंठ चाटे, मैंने इंतजार किया। उसने आँखें घुमाईं। "बस इतना ही कि शादी की सालगिरह थी या कुछ और। मैंने सिर्फ़ इतना बताया कि आप मीटिंग में हो।"

"और तुमने मुझे क्यों नहीं बताया?"

"मैं क्यों बताती?" काव्या ने विरोध किया। "आपने कभी अपनी पत्नी में दिलचस्पी नहीं दिखाई अंशुमन। आज ये सारे सवाल क्यों?"

"लेकिन उसने तो सालगिरह कहा था न? और तुम्हारा क्या मतलब है यह कहने से कि मुझे अपनी पत्नी में कभी कोई दिलचस्पी नहीं रही? वह मेरी पत्नी है, काव्या।"

काव्या परेशान दिख रही थी। "बस यही कि, आप हर समय काम करते रहते हैं। आपके कैलेंडर में साथ बाहर जाने की कोई योजना नहीं होती है, सिवाय किसी सामाजिक कार्यक्रम के। हफ़्ते में तीन बार मेरे साथ दफ़्तर या किसी रेस्तराँ में खाना खाते हैं। मुझे पता है कि आप उन के बिना बच्चों से मिलने जाते हैं, क्योंकि मैं ही फ्लाइट बुक करती हूँ।" फिर से शर्मिंदगी महसूस हुई। मैं अपनी पत्नी की इतनी उपेक्षा कर रहा था कि मेरी सहायक को भी लगा कि मैं उसकी परवाह नहीं करता। उसने चुप होकर कहा, "आज क्या हुआ है?”

"प्रियंका मुझे छोड़ गई, काव्या।"

उसने मुस्कराकर मुझे चौंका दिया। "अच्छा। हाँ, यह तो अच्छी ही बात है, है न?"

"क्या?" मैंने गुस्से में फुसफुसाया।

"आप यही तो चाहते ही थे कि वे चली जाएं, है ना?"

"क्या??? ऐसा क्यों सोचा तुमने?" मैं चौंककर गुस्से से उठ खड़ा हुआ "क्यों?"

"क्योंकि आपने मुझसे कहा था कि आप उनसे दफ़्तर में बात नहीं करना चाहते। आप मुश्किल से कभी ही अपनी पत्नी से मिलते हैं। अपनी सालगिरह और उनके जन्मदिन को भी याद नहीं करते। और आप मेरे साथ बहुत समय बिताते हैं, तब भी जब वे आसपास हों।" मैं काव्या को घूरता रहा। क्या उसने अभी वही कहा था जो मैंने सुना था? "मुझे पता है कि आप एक अच्छे इंसान हैं और अपनी पत्नी को धोखा नहीं देंगे, लेकिन मुझे ही नहीं बल्कि सभी को पता है कि... यहाँ तक कि जब हम किसी पार्टी में होते हैं, तो आप मेरे साथ होते हैं, उनके साथ नहीं। लोग बातें करते हैं, कि हम दोनों, कि आप और मैं ... हम साथ हैं...। आप जानते हैं कि सब लोग आपको और मुझे एक जोड़े के रूप मेँ देखते हैं। और यह भी कि आप उन्हें इसलिए उपेक्षित करते रहते हैं कि वह चली जाएं और हमारा रास्ता साफ हो जाए।"

"क्या कहा? लोग क्या कहते हैं? कि तुम्हारा और मेरा अफेयर चल रहा है????"

"हाँ। मेरा मतलब, हम दोनों जानते हैं कि अफेयर नहीं हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि हमारे बीच कुछ तो है ही। मैं इसे महसूस करती हूँ। मुझे पता है कि आप भी महसूस करते हैं।"

यह सब क्या था? मेरा दिमाग रुक गया ... " काव्या, तुम सिर्फ मेरी कार्यकारी सहायक हो। मेरा दाहिना हाथ। तुम मेरी रखैल, प्रेमिका या कुछ और नहीं हो, मैंने तुम्हें कभी ऐसा आभास नहीं दिया, कम से कम जानबूझकर तो नहीं।" क्या बकवास है! वह मेरे पास आई और मेरे कंधे पर हाथ रखा। मैं झेंप गया और दूर चला गया। मैं काम पर हमेशा महिलाओं के साथ सावधान रहता था। मैं ऐसा आदमी नहीं था जो किसी महिला की पीठ या कंधे पर हाथ रखता हो - ऐसा कुछ भी नहीं। मैंने यह सुनिश्चित किया कि मैं ऐसा कोई व्यवहार न करूँ जिसका गलत अर्थ निकाला जा सके। जब मैंने पिता जी के बाद पदभार संभाला, तो मैंने खुद से वादा किया था कि मैं महिलाओं के साथ व्यवहार करने के तरीके के बारे में बहुत सावधान रहूँगा। "क्या आप यह कह रहे हैं कि आप मेरे लिए कुछ भी महसूस नहीं करते?" काव्या ने पूछा, और उसके आत्मविश्वास ने मुझे और नाराज़ कर दिया।

"मैं तुम्हारे लिए वैसा ही महसूस करता हूँ जैसा मैं किसी भी कर्मचारी के लिए करता हूँ। मुझे किसी और तरह से तुममें कोई दिलचस्पी नहीं है। मैं अपनी पत्नी से प्यार करता हूँ। मैंने हमेशा अपनी पत्नी से प्यार किया है।"

वह उपहास से हंसी "यह बात कोई नहीं मानेगा अंशुमन। कोई नहीं सोचता कि आप अपनी अनपढ़ गंवार पत्नी से प्यार करते हो। यहाँ तक कि आपके बच्चे भी नहीं। जिस तरह से आप उनके साथ, और उनके बारे में भी, रूखी और अपमानजनक बात करते हो, कोई ऐसा सोच भी नहीं सकता।" हैं!! ऐसा लगा जैसे मैं अपनी ज़िंदगी के बारे में नहीं जानता। पत्नी छोड़कर चली गई, जिससे मैं बे-इंतहा प्यार करता था, जिसके साथ मैं सोचता था कि मेरी शादी बहुत अच्छी चल रही है; और असिस्टेंट सोचती है कि मैं उसे चाहता हूँ!

"मैं अपनी पत्नी के बारे में कैसे बात करता हूँ??" मैं वास्तव में जानना चाहता था।

"जैसे कि वह बिल्कुल महत्वपूर्ण नहीं है।" काव्या पीछे हट गई। "अगर आप कह रहे हैं कि आप उससे प्यार करते थे, तो भगवान का शुक्र है कि आप मुझसे प्यार नहीं करते। ऐसा जहरीला क्रूर प्यार कोई स्त्री नहीं चाहेगी जिसमें उसका हर जगह मजाक उड़ाया जाए या हर किसी के सामने हर समय अपमान किया जाए। भगवान का शुक्र है कि हमने अपने रिश्ते को पेशेवर बनाए रखा है।"

"मैंने तुम्हें कभी ऐसा कोई संकेत नहीं दिया कि ..... "

"नहीं, आपने ऐसा नहीं किया है," उसने बीच में टोकते हुए कहा। "मैंने खुद ही यह मान लिया। यह मेरी गलती है। लेकिन मैं और क्या सोच सकती थी? आप प्रियंका जी के प्रति बहुत ही उदासीन लगते रहे हैं। आपने मुझे कहा कि उनके फोन आपको न कनेक्ट करूँ उनके संदेश आपको न सुनाऊँ। यह स्पष्ट है कि आपके और आपके बच्चों में उनके लिए कोई सम्मान नहीं है, खासकर शाश्वत। और आपने अपने बच्चों को बढ़ावा दिया कि वे दोनों आपकी पत्नी का सारे-आम अपमान करते रहें।"

"तुम्हें यह सब कैसे और कहां से लग रहा है?"

"मैं तीन साल से यहाँ काम कर रही हूँ, अंशुमन। आपके बच्चे यहाँ आते हैं। उस दिन शाश्वत यहाँ था और माँ का फ़ोन आया, और उसने उसे वॉयस मेल पर जाने दिया और कहा, ‘माँ बहुत उबाऊ है’ आपने उसे नहीं टोका। और आपका भी तो हमेशा यही रवैया रहा? मैं और क्या अर्थ निकालती? सिर्फ मैं ही नहीं, सब लोग यही सोचते हैं।” मैं हमेशा देखता था कि बच्चे प्रियंका का सम्मान नहीं करते, लेकिन क्यों? और फिर, मुझे एहसास हुआ। वे सम्मान इसलिए नहीं करते क्योंकि मैं सम्मान नहीं करता। उन्होंने मुझसे सीखा है। मेरा दिल धड़कने लगा, और मुझे एहसास हुआ कि ‘प्रिय जॉनी’ वाला पत्र प्रियंका से पाना कोई आश्चर्य नहीं था। मेरी प्यार करने वाली प्यारी पत्नी, जो खुद विनम्र थी, उसके साथ मैंने कूड़े जैसा व्यवहार किया था। वह कभी चीखती चिल्लाती नहीं थी। उसने कभी अपनी आवाज़ ऊँची नहीं की। उसने मुझसे लड़ाई नहीं की। उसने हमें संयत और शांत किया। वह हमारी संरक्षक देवदूत जैसी थी, और हम सभी ने उसके साथ एक डोर मैट की तरह व्यवहार किया।

"बात यह है कि आप भी हमेशा उनके बारे में इसी तरह बेपरवाही से ही बात करते हैं। हो सकता है कि आज आप 'ना' कहें, लेकिन व्यवहार से कमोबेश यह बात स्पष्ट हो जाती है, इसलिए मैंने मान लिया..." उसने घबरा कर चारों ओर देखा "देखिए, मैं अपने कार्यालय वापस जा रही हूँ, इससे पहले कि मैं कुछ ऐसा कह दूँ जिसका मुझे पछतावा हो।"


मैं इतना सदमे में था कि कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं था, इसलिए मैं चुपचाप खड़ा रहा, मुझे लगा कि मेरी दुनिया पहले से कहीं ज़्यादा बिखर गई है। आखिर मेरी ज़िंदगी यह कैसे बन गई?

मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग पाँच (05)

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग पाँच (05)



भाग 5

प्रियंका


जैसे ही मैंने सनशाइन होम्स रिज़ॉर्ट के बरामदे में कदम रखा, मुझे हल्का महसूस हुआ, जैसे अपने परिवार को पीछे छोड़ देने का दुख मेरे दिल पर अपनी पकड़ ढीली करने लगा है।

"हे, हॉट गर्ल," श्रेया ने हंस कर अभिवादन किया। मैंने उसे गले लगाया और महसूस किया कि कैसे मेरी बहादुर दोस्त हड्डियों का ढांचा बन गई थी। मैं उसके लिए दुखी थी, निराश थी कि मैं दुनिया में उस एकमात्र व्यक्ति को खोने जा रही थी, जो मुझे बिना किसी शर्त के प्यार करता हो। मेरे पति और बच्चे अपने जीवन में आगे बढ़ते हुए मुझे पीछे छोड़ गए, लेकिन श्रेया और मैंने एक-दूसरे के साथ यह कभी नहीं किया। गरीबी में पले-बढ़े होने के कारण, हम दोनों ने जल्दी ही सीख लिया कि सच्चे रिश्ते ही अच्छे जीवन की कुंजी हैं।

"अच्छा, चलो तुम्हें देखूँ।" श्रेया पीछे हट गई, और उसकी हड्डियों जैसी उंगलियों ने मेरी बाँहों को पकड़ लिया। उसने ठंड से बचने के लिए ऊनी टोपी पहनी थी। कीमोथेरेपी के आखिरी दौर ने उसे दुबला और थका हुआ बना दिया था। मैं उसके बगल में थी जब वह कीमोथेरेपी के धुंध में खो गई थी... कम से कम ज्यादातर समय तो मैं उसके साथ ही थी। उस एक बार एक दिन देरी से आ पाई थी, उसके अलावा हर बार....

"प्रियंका, यह नेटवर्किंग का मामला है। तुम बाद में श्रेया से मिलने नहीं जा सकती?" अंशुमन भड़क गया था जब मैंने उसे बताया कि मैं उसकी कंपनी के कार्यक्रम में भाग नहीं ले सकती क्योंकि उसी दिन श्रेया की कीमोथेरेपी थी। "लोग क्या सोचेंगे, कि मेरी पत्नी कहाँ है?"

"वह मर रही है, अंशुमन" मैंने कोशिश की, लेकिन उसने कंधे उचका दिए थे। "जो चाहे करो। तुम वैसे भी अपनी मर्जी ही करोगी।" जब उसने मुझसे यह बात कही तो मैं हैरान रह गई, वह ऐसा क्यों कह रहा था कि जैसे एक पत्नी के रूप में मुझसे बहुत निराश था? जो चाहूँ करूँ? मैंने वो कब किया जो मैं चाहती थी? मैं पार्टी के लिए रुक गई, जहाँ उसने पूरी रात मुझे अनदेखा किया और मैं मुस्कराती हुई उन लोगों से बातें करती रही जो मुझसे बात करने की जहमत उठाते थे। अंशुमन ज़्यादातर समय काव्या के साथ था। उसने अपनी पार्टी के लिए मुझे श्रेया के पास जाने नहीं दिया था, और फिर पूरी पार्टी मेँ मुझे अनदेखा किया था।

मुझे श्रेया की देखभाल करने के लिए उस दिन वहाँ न होना बहुत बुरा लगा था; अंशुमन ने मेरे त्याग को न देखा और न ही उसकी सराहना की। उसे बस यही उम्मीद थी कि मैं अपनी योजनाएँ बदल दूँ। पहले वह प्रेमपूर्ण हुआ करता था, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, और वह अपनी कंपनी में अधिक व्यस्त होता गया, उसने अनुरोध करने की जगह आदेश देना शुरू कर दिया था। मैं अगले दिन श्रेया के पास गई थी, और उसने कुछ भी नहीं कहा था, बस समझ गई थी मेरी मजबूरियों को। लेकिन अब नहीं! खैर, अब यह सब कोई अर्थ नहीं रखता था। मुझे अपनी दोस्त के साथ रहने की ज़रूरत थी क्योंकि जीवन ने उसे छोड़ दिया था। यह दिल तोड़ने वाला सच था, और हम दोनों को पता था कि अब वह नहीं बचेगी। मैं चाहती थी कि मेरे जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति हो जिस पर मैं भरोसा कर सकूं, जिसके सामने रो सकूँ। लेकिन मेरे पास एकमात्र श्रेया थी, और उसे मेरी ज़रूरत थी, कि मैं उसके लिए मजबूत रहूँ, जो मैं पूरी तरह से करने वाली थी।

सनशाइन होम्स रिज़ॉर्ट सपनों के साकार होने का प्रतीक था। इसे प्यार से बनाए रखा गया था। प्राचीन घर की सुंदर संरचना को हमने सावधानीपूर्वक बारह बेडरूम वाले रिज़ॉर्ट में बदल दिया था। अनूठे आकर्षण के साथ, प्रत्येक कमरा उन यात्रियों की कहानियाँ सुनाता, जिन्होंने यहाँ खुशियां पाई थी। काले पत्थर के फर्श वर्षों की इस्तेमाल और पोंछे की चमक लिए पुरातन थे। मैंने रिज़ॉर्ट की देखभाल करना शुरू कर दिया था। सबसे आकर्षक विशेषता कवर किया हुआ स्विमिंग-पूल था जो घर के अंदर और बाहर के वातावरण को एक साथ मिलाता था। रिज़ॉर्ट के पीछे बिना छत के गर्म पूल के चारों ओर बड़े कांच के पैनल लगे थे, जो महासागर के अबाधित दृश्य प्रस्तुत करते थे। अद्भुत नज़ारा था। सुबह-सुबह, मैं पूल के किनारे बैठ जाती, और पानी पर नाचती धुंध को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाती। गर्म पूल से उठती भाप ठंडी समुद्री हवा के साथ मिलकर एक अलौकिक नजारा बनाती। समुद्र, मेरी नई शुरुआत का मूक गवाह, स्थिर रूप से मेरे सामने था। इसकी अलौकिक सुंदरता मेरे घायल दिल को सुकून देती, मुझे याद दिलाती कि जीवन, मेरे सामने के परिदृश्य की तरह, प्रकाश और छाया, खुशी और दुख का एक जटिल मिश्रण है। यह जगह एक आश्रय थी जहाँ आत्माएँ खुद को फिर से ढूँढने, प्राप्त करने, हँसने, रोने और शांति पाने के लिए आती थीं। मेरे लिए, यह एक अप्रत्याशित यात्रा की शुरुआत थी - आत्म-खोज, उपचार और शायद, अंततः, जीवन के उतार-चढ़ाव को स्वीकार करने की शुरुआत।

लीला, वह युवती जो रिसॉर्ट की सफ़ाई करती थी, मुझे देखते ही गले लग गई। सनशाइन होम्स में एक छोटा सा पूल हाउस था, जहाँ लीला, जो सिर्फ़ सत्रह साल की थी, अपनी दो साल की बच्ची मीनू के साथ रहती थी। मेरी नीलिमा से भी छोटी थी लीला! लेकिन मैं उससे खुद को जोड़ सकती थी। "मुझे बहुत खुशी है कि आप यहाँ हैं, क्योंकि मिस श्रेया को आराम की जरूरत है और उन्हें अब इधर-उधर नहीं भागना पड़ेगा" लीला ने कहा।

मैं ग्राउंड फ्लोर पर श्रेया के बगल वाले कमरे में रहने लगी। ये दो कमरे आपस में जुड़े हुए थे। पहले ये उन परिवारों के लिए रहते थे जो छुट्टी मनाने आते थे। लेकिन श्रेया अब सीढ़ियाँ चढ़ने में बहुत थक जाती थी, इसलिए मैं उसे महीनों पहले यहाँ नीचे ले आई थी। "आज रात कोई मेहमान नहीं है," श्रेया ने मुझे बताया जब मैं उसके लैपटॉप पर रिज़ॉर्ट का हिसाब किताब देख रही थी। वह बिस्तर पर लेटी हुई थी और टीवी म्यूट था। "लेकिन कल, पूरा घर भरा होगा। रंजीत ने सामान लाकर फ्रिज में रखा है।" रंजीत लीला का चचेरा भाई था। वह पूल साफ करता था, बगीचे की देखभाल करता था और घर के अंदर और बाहर के सभी छोटे-मोटे काम निपटाता था। "मैं सब कुछ संभाल लूंगी," मैंने धीरे से कहा।

"क्या तुम सच में यह करना चाहती हो, प्रियंका? तुम अभी तक उन तीन कृतघ्न बेवकूफों का ख्याल रखती रही हो, और ऊपर से अब तुम्हें मेरा भी ख्याल रखना होगा?"

"कम से कम तुम कृतघ्न तो नहीं हो," मैंने टिप्पणी की। "और मेरे बच्चों को बुरा मत कहो।" इस पर श्रेया ने हंसते हुए कहा, "लेकिन तुम्हारे पति को मैं ऐसा कह सकती हूँ?"

"ज़रूर," मैंने हंसते हुए जवाब दिया। मैंने अपना पढ़ने का चश्मा नीचे रख दिया और श्रेया का लैपटॉप बंद कर दिया। मैंने अपना लैपटॉप घर पर ही छोड़ दिया था, जिसे मैंने उसके बीमार होने पर खरीदा था, और जिस पर मैंने उसका लेखा-जोखा, सोशल मीडिया, वेबसाइट प्रबंधन और सभी सामान्य मार्केटिंग और बही खाते का काम वहाँ से ही संभाल लिया था।

"क्या कोई संदेश आया उन लोगों से?" उसने अपना हाथ मेरे हाथ पर रख दिया। मैं बिस्तर पर उसके बगल में बैठ गई, और उस पल में, मुझे एक ऐसी आत्मीयता महसूस हुई जो मैंने सिर्फ़ अंशुमन के साथ ही साझा की थी। पिछले कई सालों में, श्रेया और मैं कई बार साथ-साथ सोए थे। बचपन में अक्सर मैं उसके साथ सोती थी। जब मैं बड़ी होकर उससे मिलने जाती थी, और उसके पास कोई खाली कमरा नहीं होता था, और फिर हाल ही में, उसकी कीमोथेरेपी के सत्रों के दौरान। हर घटना ने हमारे बीच के रिश्ते को और गहरा बनाया था, जो समर्थन और कमज़ोरी के अनगिनत साझा पलों में निहित था। मैंने उससे कहा, "उनके पास मुझ तक पहुंचने का कोई रास्ता नहीं है श्रेया।"

"मैं जानती हूँ कि तुमने ऐसा इसलिए किया, कि अगर वे न ढूंढें, तो तुम्हें बुरा न लगे।"

"पता नहीं बच्चों के साथ मैंने क्या गलती की, कि अंशुमन की तरह वे भी मुझे बोझ समझते हैं।" मैंने गहरी साँस ली। .... "प्रियंका, तुम कभी गलत नहीं रही। तुम्हारा परिवार ही घटिया है। उम्मीद है कि अब उन्हें एहसास होगा कि उन्होंने क्या खोया है। मैं उम्मीद कर रही हूँ कि वे मेरे रहते आएंगे। क्योंकि तुम इस लायक हो। और मैं अभी तुम्हारे उस नाशुक्रे आदमी को पीटने लायक भी हूँ।" मैंने अपने चेहरे को दोनों हाथों से सहलाया "मेरे चेहरे पर झुर्रियाँ और खिंचाव के निशान हैं, और मैं लगभग दस लाख साल बूढ़ा महसूस करती हूँ," मैंने कबूल किया। "अब, क्यों न तुम थोड़ा आराम कर लो, और मैं नाश्ता बनाना शुरू कर दूँ।"

वह चुप हो गई थी, और मुझे एहसास हुआ कि वह सो गई थी। अब वह बार-बार झपकी लेती थी। मैंने उसका आईपैड बेडसाइड टेबल पर रख दिया, जहाँ वह अपनी रोमांस उपन्यास पढ़ती रही थी। मैंने उसके कंधों तक उसका कंबल खींच कर टीवी और लाइटें बंद कर दीं, उसे आराम करने के लिए छोड़ दिया ताकि वह एक और दिन को पूरी तरह से जी सके।


शुक्रवार, 12 दिसंबर 2025

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग चार (04)

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग चार (04)


अंशुमन


मैं घर पहुंचा तो घर में अंधेरा था। मैंने सोचा कि प्रियंका सो रही होगी। लेकिन वह तो हमेशा मेरे लिए कुछ लाइटें जलाकर छोड़ देती है! मैंने स्विच दबाया और मेरे अंदर एक ठंडी सी लहर दौड़ गई। कुछ गड़बड़ थी। मैंने इसे हवा में महसूस किया।

"प्रियंका, बेब," मैंने पुकारा। अभी नौ ही बजे थे। तनी जल्दी सो तो नहीं सकती थी! कहीं उसकी तबीयत तो खराब नहीं? मैं उसे खोजते हुए हमारे बेडरूम, किचन और फिर डाइनिंग रूम में गया। खाली। मेज पर मेरा तोहफा अभी भी वहीं सुंदर कागज मेँ लपेटा हुआ रखा था। मैंने उसे खोलने की भी जहमत नहीं उठाई थी। लानत है! उपहार के बगल में एक लिफाफा था जिस पर मेरा नाम लिखा था।

जब हमने पहली बार डेटिंग शुरू की थी, तो उसके पास पैसे नहीं थे, तब वह मुझे हाथ से बने कार्ड देती थी, जिन पर मेरे लिए कविताएँ लिखी होती थीं। लिफाफा उठाते हुए मैं मुस्कराया। फिर कोई प्रेम कविता? लेकिन यह लिफाफा भारी था। मैंने उसे खोला, और धातु और प्लास्टिक हमारे खाने की मेज पर गिर पड़े। मेरा दिल रुक गया, फिर तेजी से धड़कने लगा। उसकी अंगूठियाँ पॉलिश किए हुए टेबल पर पड़ी थीं, उसके क्रेडिट कार्ड के साथ। मैंने झपटकर वह मुड़ा हुआ पन्ना उठाया जो उनके साथ गिर गया था। यह एक चिट्ठी थी।

मेरे प्रिय अंशुमन,

मैं जानती हूं कि इससे तुम परेशान हो जाओगे, (या शायद न होगे; शायद तुम इसका इंतजार कर रहे थे) मैं जा रही हूँ। हमारा घर, कर्नाटक, तुम, हम। सब कुछ छोड़े जा रही हूँ। स्थिति स्पष्ट होते ही, मैं वकील से संपर्क कर के तलाक के कागजात भेज दूंगी। या तुम भी तलाक की प्रक्रिया शुरू कर सकते हो।

मैं अपना फोन, क्रेडिट कार्ड, अंगूठियाँ, वो सब कुछ जो मैं सोच सकती हूँ, छोड़ रही हूँ। सारे गहने और डिजाइनर कपड़े अलमारी में हैं। मैंने सिर्फ़ अपने रोज़मर्रा के इस्तेमाल के कुछ कपड़े और चीज़ें ली हैं। मैंने घर के खाते से पाँच हज़ार रुपये निकाले हैं। मैं जानती हूँ हमारे विवाह-पूर्व के प्री-नेपुटल में क्या लिखा है, मैं जल्द से जल्द पैसे वापस कर दूँगी। मैं बच्चों से बात कर के जितना हो सके उतना समझाऊंगी। चिंता मत करो, मैं उन्हें कहूँगी कि यह मेरी गलती है, कि मैं तुम्हें यह बिना बताए, बिना हमें मौका दिए चली गई।

सच तो यह है कि मैं इतने सालों से तुमसे कहने की कोशिश कर रही हूँ, लेकिन तुम्हारे लिए मैं हमेशा अदृश्य बनी रही। तुम्हारा हमारी बीसवीं सालगिरह को भूल जाना आखिरी तिनका था, इसलिए नहीं कि सालगिरह थी, बल्कि इसलिए कि मेरे लिए यह स्पष्ट था कि तुम्हारे पास हमेशा कुछ और मुझसे ज़्यादा महत्वपूर्ण होगा, मुझसे ज़्यादा वास्तविक होगा।

मैं लगभग चालीस के नजदीक पहुँच चुकी हूँ। अगर मैं भाग्यशाली रही तो मेरे पास जीवन के और तीस-चालीस साल बचे हों शायद। मैं उन सालों को “अदृश्य प्रियंका” के रूप में नहीं जीना चाहती जो परिचारिका, माँ और प्रेमिका की भूमिका निभाने के लिए बाहर आती है, और बाकी समय किसी कुर्सी-मेज की तरह पृष्ठभूमि मेँ अदृश्य हो जाती है। मैं भी एक संपूर्ण व्यक्ति बनना चाहती हूँ। एक ऐसी व्यक्ति जिसे उसके आस पास के लोग अपने ही जैसा हाड़-माँस का मनुष्य मानें, न कि एक कामकाजी रोबोट मानें जिसे कोई दर्द नहीं होता।

मुझे सचमुच खेद है, अंशुमन। अपना ख्याल रखना।

प्रियंका

नोट: मैंने अगले दो सप्ताह के लिए फ्रीजर में पर्याप्त खाना बना कर रख दिया है। आसान भोजन, जिसे तुम्हें बस ओवन में गर्म करना है। तब तक तुम्हारी सेक्रेटरी किसी अच्छे खानसामा का इंतजाम कर लेगी।

पत्र मेरे हाथों में काँप रहा था और मैं सदमे में था। मुझे अपने सीने में खोखलापन महसूस हुआ, जैसे मेरा एक हिस्सा शरीर से बाहर निकाल लिया गया हो। मेरी आँखें फिर से शब्दों पर धुंधली हो गईं, हर वाक्य हथौड़े के प्रहार जैसा था। मैं देखता और जानता रहा था कि वह उपेक्षित जी रही है, दुखी दिखती है। लेकिन मैं अपने काम मेँ जानते बूझते सब अनदेखा करता रहा। मैं इतना अंधा कैसे हो सकता था? नहीं। ऐसा नहीं था कि मैंने संकेत देखे न हों। मैंने जानबूझकर अनदेखा किया था। मैंने सोचा था कि वह हमेशा मेरे साथ रहेगी। मैंने अपना फ़ोन उठा कर प्रियंका को फोन किया, तो वह यहीं घनघनाने लगा। फिर शाश्वत को फ़ोन किया। जब उसने फ़ोन उठाया तो वह कहीं बाहर था। मुझे पीछे से संगीत बजता हुआ सुनाई दे रहा था। "बेटा, तुम कहाँ हो?"

"दोस्तों के साथ बाहर हूँ पापा। बताइए, क्या हाल है?"

"क्या तुम्हारी माँ ने आज तुम्हें फोन किया?"

मैंने उसे किसी से बात करते और हंसते हुए सुना और फिर मुझसे जवाब देते हुए कहा, "हाँ, मुझे लगता है कि माँ की मिस कॉल तो है। क्यों?"

"उसने तुम्हारे लिए कोई मेसेज छोड़ा है क्या?"

मैंने उसे फोन पर बात करते हुए सुना। "हाँ।"

"क्या तुमने इसे सुना?"

"नहीं, पापा। आप तो जानते ही हैं कि माँ कैसी है।" नहीं, मुझे नहीं पता था कि वह कैसी थी। वह झल्लाती नहीं थी। वह कोई मांग नहीं करती थी। और फिर भी, शाश्वत ऐसे बात कर रहा था जैसे वह जरूरतमंद और नियंत्रणकारी हो। “मेसेज की बात सुनो और इसे मुझे फॉरवर्ड करो।" मैंने फोन रख दिया और नीलिमा को फोन किया; जो सीधे वॉयस मेल पर चला गया। मैंने उसे मैसेज किया और कहा कि वह प्रियंका का वॉयस मेल सुने और मुझे भेजे। मुझे यकीन था कि उसने दोनों बच्चों के लिए संदेश छोड़ा होगा, और हमारी शादी की बर्बादी का दोष अपने ऊपर ले लिया होगा।

मैंने सगाई की अंगूठी उठाई और उसे अपनी उंगलियों में लपेट लिया। मेरी माँ ने अंगूठियाँ खरीदी थीं और सुनिश्चित किया था कि सगाई के बारे में कर्नाटक के सारे प्रमुख अखबारों मेँ में शादी की घोषणा हो। मुझे वह फोटो सेशन याद है जो मेरी माँ ने आयोजित किया था। प्रियंका उस दिन ‘मेरी प्रियंका’ जैसी बिल्कुल ही नहीं दिख रही थी। माँ ने उनके पार्लर से उसका मेकअप करवाया था और हमारे अमीर समाज की दूसरी लड़कियों की तरह दिख रही थी, इसलिए फोटो शूट के बाद मैं उस पर भड़क गया "ऐसा लग रहा है कि तुम ड्रेस अप खेल रही हो," मैंने चीखते हुए ही कहा था। "यह मेकअप हटाओ। या कम से कम ठीक से करना सीखो ताकि तुम एक वेश्या की तरह न दिखो।" उफ्फ़ मैंने ऐसा कैसे कह दिया था? इस बात को याद कर के मैंने अंगूठी को मुट्ठी में भींच लिया, उसके तीखे कोने चुभे। मैं अच्छी तरह जानता था कि उस दिन बेचारी प्रियंका ने अपना मेकअप थोड़े ही किया था! माँ की पार्लर वाली आई थी जो उसे लीप-पोत कर चली गई थी। उसने चुप-चाप मेकअप करवाया था क्योंकि वे मेरी माँ थीं। जानते हुए भी मैं उस पर भड़क गया था क्योंकि वह ‘मेरी प्रियंका’ लग ही नहीं रही थी, हमारे अमीर समाज की लड़कियों जैसी दिख रही थी। बाद मेँ मैंने उस से इस तरह चिल्लाने के लिए माफ़ी मांगी "तुम मेरी प्रियंका जैसी नहीं दिख रही थीं, इससे मुझे गुस्सा आया।" उसने मेरे गाल सहलाए। "उदास मत हो मेरे प्यारे अंशुमन। मैं मेकअप करना सीख लूँगी। मैं दुनिया की सबसे अच्छी पत्नी बनूंगी, ऐसी कि तुम कल्पना भी नहीं कर सकते।" बाद मेँ बेचारी ने मेकअप करना सीख लिया था। सूक्ष्म और नाजुक मेकअप।

मेरी आँखों में आँसू भर आये। वह सच मेँ ही सबसे अच्छी पत्नी बनी थी जिसकी कोई भी पुरुष कल्पना कर सकता है या चाह सकता है। जब मेरे माता-पिता की मृत्यु हुई, तब भी वह मेरे साथ मेरा हाथ थामे रही, भले ही उन्होंने उसके साथ चाहे जैसा व्यवहार किया हो। वह हमारे बच्चों के लिए हर कदम पर मौजूद रही। वह मेरे काम और मेरी समस्याओं के बारे में अंतहीन बातें सुनती थी, हमेशा मेरे साथ रहती थी। कभी मुझ पर संदेह नहीं किया। उसने मुझे हमेशा मजबूत, बेहतर महसूस कराया। कब से हमारी बातचीत नहीं हुई थी? "हमने एक हफ़्ते से साथ में खाना नहीं खाया है। मैंने होटल मेँ रिज़र्वेशन करवा लिया है ...."

"भगवान के लिए, प्रियंका, मेरे पास काम है। मैं तुम्हारा मनोरंजन नहीं करता रह सकता।"

यह कब हुआ था, कुछ साल पहले? हाँ, जब हमारी कंपनी ने अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं के साथ विस्तार किया, तो मेरा शेड्यूल वैश्विक हो गया था, अंतहीन बैठकें, लंबी यात्राएं और कठिन परिश्रम। मैंने अगले दिन उससे माफ़ी मांगी क्योंकि मैं उसके साथ नहीं सोया था, रात में काम करने और गेस्ट रूम में सोने का विकल्प चुना था। क्या यह पहली बार था जब मैंने ऐसा किया था? एक दरार जो मैंने खुद बनाई थी। "कोई बात नहीं अंशुमन," उसने बिना कोई गुस्सा दिखाए कहा। "तुम व्यस्त हो; मुझे थोड़ा और सोच-समझकर प्लान करना चाहिए था। क्यों न मैं कढ़ाई पनीर बनाऊं।" मुझे यह पता था कि मैंने उसे चोट पहुंचाई है। लेकिन उसे इससे कोई मतलब नहीं था, इसलिए मैंने अपने आप से दिखावा किया कि मेरा आधा-अधूरा कहना कि "मुझे खेद है कि मैं तनाव में हूं" काफी था।

तभी मेरा फ़ोन बजा और मैंने देखा कि ग्रुप कॉल था। "क्या बकवास है, पापा?" शाश्वत ने कहा। "क्या आपको पता था?" नीलिमा ने पूछा। हाँ, मुझे अंदर से पता था, भले ही मैं इसे देखना या इस पर विश्वास करना न चाहता होऊँ। "उसने मेरे लिए एक चिट्ठी छोड़ी है।"

"पत्र?" शाश्वत ने गुस्से से चिल्लाते हुए कहा। "आप जानते हैं कि मैं माँ से प्यार करता हूँ, लेकिन वह बहुत ही – बहुत ही चिड़चिड़ी और आक्रामक हो सकती है...." चिड़चिड़ी? आक्रामक? क्या मेरा बेटा मेरी पत्नी, अपनी माँ को यह कह रहा था? प्रियंका कभी भी ऐसी नहीं थी। वह कभी भी आक्रामक नहीं थी। वह प्यार करने वाली और विनम्र थी।

नीलिमा ने चिंता भरी आवाज़ में कहा। "मैंने फ़ोन करने की कोशिश की लेकिन---" "उसका फोन यहीं है, बंद है।" मैंने वह आईफोन उठाया जो उसने पत्र के पास छोड़ा था।

शाश्वत ने गुस्से में कहा, "ठीक है, जब माँ क्रेडिट कार्ड आदि इस्तेमाल करें तो आप क्रेडिट कार्ड कंपनियों को फोन कर देना।" मैंने उनसे कहा, "वह उन्हें भी यहीं छोड़ गई है।"

"क्या? क्यों?" नीलिमा हताश सी बोली। मुझे पता था क्यों। मैंने खाते से पाँच हज़ार रुपये निकाले हैं। मुझे पता है कि हमारे प्री-नेपुटल समझौते में क्या लिखा है, जल्द से जल्द वापस कर दूँगी। "क्या आपको कोई अंदाज है वह कहाँ जाएंगी?" नीलिमा ने पूछा।

"वह वापस आ जाएंगी" शाश्वत ने बड़बड़ाते हुए कहा। "यह सब ड्रामा क्वीन होना है।"

"शाश्वत, बेटा, बस। चुप रहो। मैं समझ सकता हूँ तुम नाराज़ हो, लेकिन वह तुम्हारी माँ है, है न? सम्मान से बात करो।"

"क्या आप नाराज़ नहीं हैं, पापा?" शाश्वत ने पूछा। "वह हम सब को छोड़कर चली गई हैं।"

क्या सच ही वह हमें छोड़ गई थी? या हम तीनों उसे सालों पहले छोड़ गए थे? उसे अपने बच्चों के लिए वॉयस मैसेज छोड़ना पड़ा था, क्योंकि वे उसकी कॉल का जवाब नहीं देते थे। लेकिन उन्होंने मेरी कॉल का जवाब दिया था। मुझे भी पत्र छोड़ा, क्योंकि मैं उसके बहुत से मेसेज मिस कर चुका था, इसलिए उसने मुझे संदेश भेजना बंद कर दिया था। वह शायद ही कभी फोन करती थी। कार्य दिवस के दौरान, मेरा फोन काव्या को फॉरवर्ड होता था, जो मुझे कॉल भेजती थी। मैंने उसे कभी नहीं कहा कि मेरी पत्नी के कॉल को प्राथमिकता दे; मुझे यह भी नहीं पता था कि प्रियंका काम के घंटों के दौरान कॉल करती है या नहीं।

"नहीं शाश्वत, तुम्हारी माँ हमें छोड़ कर नहीं गई बेटे। हम तीनों ही ने बहुत पहले उसे पीछे छोड़ दिया, यही सच है। वह अकेली ही इतने सालों से, हमारे बुरे बर्ताव के बावजूद, हमारे रिश्तों को अकेले उठाए जीती रही। आज आखिर उसने हार मान ही ली। न मैंने, न तुम दोनों ने कई वर्षों से उसकी सुध ली। पिछली बार कब हममें से किसी ने उसका फोन उठाया, उससे एक परिवार के सदस्य की तरह बात की, उसके मेसेज का जवाब दिया या उससे प्रेम के दो शब्द बोले? वह हमारी हर तकलीफ मेँ हमारा सहारा बनी लेकिन क्या हम तीनों मेँ से किसी ने कभी भी उसके सुख दुख की या उसकी बीमारी वगैरह की कोई खबर भी ली? नहीं शाश्वत, मैं बहुत दुखी हूँ बेटा, लेकिन नाराज़ नहीं हूँ।"

"माँ ने आपको क्या लिखा था?" नीलिमा की आवाज़ में आँसू थे। मैंने पत्र की तस्वीर उन्हें भेज दी। शाश्वत ने कहा, "मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि माँ ने हम पर यह बम फेंका।" वह अभी भी गुस्से मेँ था, जैसे उसने मेरी बात सुनी ही न हो।

"शाश्वत, बस।" मैंने विरोध किया। "मुझे इस बारे में सोचना होगा। मैं... शुभ रात्रि। मैं कल फ़ोन करूँगा।" मैं रसोई में गया और फ्रीजर खोला। बड़े करीने से रखे हुए, खाने के अलग-अलग हिस्से थे। उसने अपने सुंदर कर्सिव हाथ से लेबल पर लिखा था कि प्रत्येक व्यंजन क्या है, भोजन को कैसे कितने तापमान पर कितने मिनट गर्म करना है, और तारीख। उसने मेरे लिए स्वस्थ चीजें बना कर रख छोड़ी थीं। फ्रिज में सलाद को कांच के जार में भरकर रख दिया था, सभी पर बड़े करीने से लेबल और तारीख लिखी हुई थी।

"हम तुम्हारी माँ के झोंपड़ पट्टी में नहीं रहते, प्रियंका; हम ऐसा खाना नहीं खाते। क्या हम कुछ मछली, सलाद, हरी सब्जियाँ खा सकते हैं?" जब हमने पहली बार अपना अलग घर बसाया तो एक दिन मैंने उसके बनाए खाने पर चिल्लाते हुए कहा था। तब बच्चे डेढ़-दो साल के थे। पहले हम मेरे पारिवारिक घर मेँ ही रहे थे। वह शादी के बाद से ही अलग घर के लिए विनती कर रही थी, लेकिन मुझे सहमत होने में इतना समय लग गया। जबकि मैं जानता था कि मेरी माँ उससे दुर्व्यवहार करती है, वहाँ उसका दम घुट रहा है।

जब मैंने फ्रीजर में रखे खाने को देखा तो मेरे गालों पर आँसू बहने लगे। यह उस प्यार करने वाली पत्नी की देखभाल का अंतिम कार्य था जो अपने ही घर में खुद को अदृश्य महसूस कर रही थी। यह उस रोज़मर्रा के प्यार की मार्मिक याद दिलाता था जो उसने दिखाया था, ऐसा प्यार जिसे मैंने हल्के में लिया था। जाते हुए भी वह मेरे दो हफ्ते के भोजन का इंतजाम करना नहीं भूली, जिससे तब तक मैं खानसामा का इंतजाम कर सकूँ। उसे यह सब करने में घंटों लग गए होंगे। क्या उसने यह कल किया था? या परसों हमारी शादी की सालगिरह पर, जो मैं भूल गया था? मैं डाइनिंग रूम में गया और उसने मेरे लिए जो उपहार छोड़ा था, उसे देखा। जिसे मैंने खोलने की तक जहमत नहीं उठाई थी। मैं कम से कम उसे खोलकर उसका शुक्रिया अदा तो कर सकता था; इसके बजाय, मैंने उससे कहा कि मुझे काम पर जाना है और मैं गेस्ट रूम में सोता हूँ। फिर से सालगिरह भूल जाने के बाद भी! मेरा कोई दोस्त सालगिरह भूल गया होता तो पत्नी के आगे नाक रगड़ रहा होता, और मैंने कहा था मैं उस कमरे मेँ सोऊँगा। मैंने उपहार खोला, मेरा दिल तेजी से धड़क रहा था। यह एक घड़ी थी। एक रोलेक्स। लेकिन कोई भी रोलेक्स नहीं। यह उसी मॉडल की घड़ी थी जो मेरे पिता ने मुझे दी थी, जिसे मैंने सालों पहले खो दिया था जब हम न्यू-ऑरलियन्स में हमारी सालगिरह के लिए घूमने गए थे। मैं इसे खोने से बहुत दुखी था।

"मुझे बहुत खेद है, अंशुमन। आप एक नई घड़ी खरीद सकते हैं ---"

"तुम्हें नहीं पता कि तुम क्या बकवास बात कर रही हो। यह एक पारिवारिक विरासत है - 1935 का बेहतरीन ऐतिहासिक मॉडल - तुम नहीं समझ सकोगी यह सब।" मैंने खुद को बेहतर महसूस कराने के उसके प्रयासों को क्रूरता से बंद कर दिया। क्या मैं उसके साथ एक बिगड़ैल अमीर बच्चे की तरह व्यवहार नहीं करता रहा था? घड़ी उसने नहीं, मैंने गुमाई थी, और बच्चों की तरह मैं अपनी खीज उस पर उतार रहा था। हाँ, मुझे यह कहने में शर्म आ रही है लेकिन यही सच था। वह मुझ पर गुस्सा नहीं हुई, आवाज नहीं उठाई, कोई विरोध नहीं किया, लेकिन मैं जब रात मेँ बाथरूम जाने के लिए उठा तो उसके सोये चेहरे पर आंसुओं के निशान थे – जिसे मैंने अपने अहंकार मेँ अनदेखा कर दिया था। मैंने अगले दिन माफी भी नहीं मांगी थी, जैसे मैं उसे सजा दे रहा था कि उसने यह यात्रा आयोजित की, जिसके कारण मेरी घड़ी गुम हो गई। मेरे मन के विकृत तर्क के अनुसार उसे सजा मिलनी ही चाहिए थी, क्योंकि मेरा प्यारा खिलौना जो गुम हो गया था उसकी बनाई यात्रा मेँ।

मैंने घड़ी निकाली। उसे इसे खोजने में बहुत समय लगा होगा। वे ऐतिहासिक मॉडल दुर्लभ थे। यह उससे बेहतर थी जो मैंने खो दी थी। इसका सोने का केस एक नरम इतिहास की चमक से चमक रहा था। रोमन अंकों से चिह्नित हाथी दांत का डायल, फ़्लूटेड बेज़ल फ़्रेम! संयमित विलासिता की विरासत को दर्शाता हुआ। घड़ी के साथ लिखे नोट में लिखा था: ‘मेरे प्यारे अंशुमन, मैं जानती हूं कि जो घड़ी तुमने खो दी है, उसकी भरपाई मैं नहीं कर सकती, लेकिन मुझे उम्मीद है कि यह घड़ी तुम्हारे दिल को सुकून देगी’ मैंने घड़ी पहन ली और मुझे दुःख की लहर महसूस हुई। मैंने खुद ही अपनी घड़ी खो दी और इसके लिए उसे दोषी ठहराया। जैसे कि मैं अपने जीवन में होने वाली लगभग हर गलती के लिए उसे जिम्मेदार ठहराता था। यह एक आदत बन चुकी थी। मैं उसे हमेशा से ही दोषी ठहराता रहा हूँ, है न?

ऐसा क्यों, जबकि उसने मुझे दो खूबसूरत बच्चे दिए थे, एक घर जो एक शान्त मंदिर जैसा था, एक प्यार जिस पर मैं हमेशा भरोसा कर सकता था? उसका शुक्रिया अदा करने के बजाय, मेरा एक हिस्सा उससे नाराज़ रहता था कि उसने मुझे मेरी माँ की पसंद की लड़की से शादी न कर के उसके साथ “फंसा” दिया! क्या यह मेरी माँ की ही बातें नहीं थीं, जो मेरे मन मेँ इतनी गहरी धंस गई थीं कि मैं उन जैसा ही बन गया था? मैं शुरू मेँ यह इसलिए करता था कि माँ को यह दिखा कर कि ‘देखो मैं इस पर गुस्सा कर रहा हूँ’ उन की नाराजगी दूर कर सकूँ, लेकिन धीरे-धीरे यह मेरी आदत हो गया, वह मेरे लिए एक गुस्सा उतारने की वस्तु हो गई। उसने कभी विरोध नहीं किया और मैंने यह अपना अधिकार समझ लिया।

उस रात मैं बिस्तर पर प्रियंका की तरफ सोया और उसकी खुशबू महसूस करता रहा। उसकी खुशबू प्रियंका जैसी थी, बिल्कुल उसके नाम की तरह। उसके साथ इस बिस्तर पर लेटने की यादें मुझ पर हमला करती रहीं - मेरी भावुक प्रियंका। हमारा समागम कभी उबाऊ नहीं हुआ। मेरे दोस्त नई लड़कियां पाने के बारे में बात करते थे, लेकिन मैंने कभी नहीं की, मुझे कभी ऐसी जरूरत नहीं लगी क्योंकि घर पर मेरी पत्नी मेरा इंतज़ार करती थी। चाहे मैं उसे कितना भी अनदेखा करूँ या उसके बारे में भूल जाऊँ, जब भी मुझे उसकी ज़रूरत होती, वह अपनी बाँहें फैला देती और मुझे अपने अंदर समाने देती, मुझे वह शांति महसूस होती जो सिर्फ़ वही मुझे दे सकती थी। जब मुझे उसका स्नेह और उदारता याद आई, तो मेरा दिल इतने टुकड़ों में टूटने लगा, कि मुझे लगा कि मैं उन्हें फिर से नहीं जोड़ पाऊँगा। मैंने अपने जीवन का प्यार खो दिया। उस एकमात्र संगिनी को खो दिया जिसने मेरे दिल को थामा था, जिसने मुझसे जितना लिया उससे कहीं ज़्यादा मुझे दिया था।