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शनिवार, 31 जनवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग सोलह (16)

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग सोलह (16)

 

भाग 16

अंशुमन




घबराहट से मेरी नसें टूट रही थीं। मैं जैसे बिना किसी राह के अंधेरे मेँ भाग रहा था, मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या कर रहा हूँ। प्रियंका से जुदाई के एक महीने के बाद और उस फोन कॉल के दो हफ़्ते बाद मुझे देखने पर प्रियंका की प्रतिक्रिया क्या होगी, यह कोई भी अनुमान लगा सकता था। मैंने उसे फिर से कॉल नहीं किया था; मैं फिर वही गलती करने का जोखिम नहीं उठाना चाहता था।

मुझे मदद की ज़रूरत थी। मैं मनोचिकित्सक डॉक्टर राहुल वर्मा के सामने बैठा था। मैं शाश्वत के साथ अपनी पत्नी को बताए बिना ही दीपावली के लिए लक्षद्वीप जा रहा था, और जाने के दो दिन पहले मैंने उनसे मिलने के लिए अपॉइंटमेंट ले लिया था। वे एक सख्त दिखने वाले व्यक्ति थे। निगाहें ऐसी, कि लगता था कि वे आपकी आत्मा की परतों को उधेड़ देंगी, लेकिन उनकी आवाज़ अप्रत्याशित रूप से कोमल थी। डॉ. वर्मा ने कहा, "अंशुमन, आपने फॉर्म में लिखा है कि आपने पहले कभी थेरेपी नहीं ली है।"

"हाँ बस डॉ. मिश्रा के साथ तीस मिनट का परिचय सत्र, उन्होंने आपका रेफ़रल दिया।" मैं सोफे पर बैठा खुद को बेवकूफ़ महसूस कर रहा था। क्या मुझे डॉक्टर के क्लिनिक मेँ ऐसे लेटकर अपनी भावनाओं के बारे में बात करनी चाहिए? बकवास! हम उच्च समाज के मजबूत पुरुष थे; हम इस सब मेँ शांत रहने में विश्वास करते थे। ‘मजबूत पुरुष थेरपी नहीं लेते’ मेरे मन मेँ मेरी माँ की लानतें गूंज रही थी।

डॉ. वर्मा मुस्कराए। "आपने जो फॉर्म भरा है, उसमें आपने लिखा है कि आपकी पत्नी आपको छोड़कर चली गई है, और इसीलिए आप थेरेपी ले रहे हैं।"

"हाँ... और मेरे लिए... मेरी अपनी मानसिक शांति और तरक्की के लिए भी," मैंने कहा। "उसके जाने से मेरे पास खुद के बारे में जितने जवाब हैं, उससे कहीं ज़्यादा सवाल हैं।"

हमने कुछ देर बात की और मैंने उन्हें बताया कि प्रियंका और मेरे साथ क्या हो रहा है, और सिर्फ़ मेरे साथ भी। वह हर शब्द पर ध्यान देते रहे। कैसे दुनिया के लिए प्रियंका पीड़ित पत्नी थी, और मैं एक मूर्ख पति था जो नहीं जानता था कि उसके पास सब कितना अच्छा था।

फिर हम डॉ. मिश्रा द्वारा दिए गए होम वर्क पर पहुंचे, जिसके बारे में मैंने डॉ. वर्मा को बताया। "ठीक है, तो चलिए इस बारे में बात करते हैं कि आपने अतिथि कक्ष में सोना क्यों शुरू कर दिया," उन्होंने शान्त स्वर मेँ कहा, उनका स्वर सपाट लेकिन सहानुभूति पूर्ण था।

मैंने सिर हिलाया, और मेरे मुंह से परिचित बहाना निकल गया। "मैं देर से घर आता था या स्टडी में देर तक काम करता था। वह तब तक सो रही होती थी, और मैं गेस्ट रूम में सो जाता था, इसलिए कि मैं उसे परेशान नहीं करूँ।" लेकिन क्या मैं यह नहीं जानता था कि अलग सोने से मैं उसे और परेशान कर रहा हूँ? डॉ. वर्मा थोड़ा आगे झुके, उनकी उंगलियाँ आपस में उलझी हुई थीं। “क्या आपने पहले से ही ऐसा ही इंतजाम रखा है?”

मैंने अपना सिर हिलाया। कमरा अचानक से तंग लगने लगा, हवा घनी हो गई। "नहीं। बस पिछले कुछ महीनों से...शायद एक साल या उसके आसपास, मुझे लगता है।"

"क्या कोई विशेष घटना घटी जब यह शुरू हुआ?"

मैं झिझका, जब मैं आखिरकार बोला तो मेरी आवाज़ सिर्फ़ फुसफुसाहट सी थी। "मैं इस बारे में बहुत सोच रहा था, और मुझे यकीन नहीं है। या शायद मैं निश्चित हूँ। कुछ तो हुआ था, ऐसा कुछ जो तब समझ में नहीं आया लेकिन अब समझ में आ रहा है।" वर्मा ने सिर हिलाया और मेरे आगे बोलने की प्रतीक्षा करने लगे।

मैं फिर से देर से घर आया था ... प्रियंका सो रही थी, लेकिन उसने उस छोटी सी मेज पर एक नोट छोड़ा था जहाँ मैं अपनी चाबियाँ रखता था। मेरे प्यारे अंशुमन, अगर आपने खाना नहीं खाया है तो आपके लिए फ्रिज में प्लेट में खाना रखा हुआ है। आपको बस इसे माइक्रोवेव में एक मिनट के लिए रखना है। साथ में पेकन पाई भी है। -प्रियंका

अपराध बोध ने मुझे अंदर से कुतर दिया। वह इतनी प्यार भरी क्यों थी? मैंने देर रात काम करने के बाद काव्या और कुछ अन्य सहकर्मियों के साथ मार्सेल रेस्तरां मेँ खाना खा लिया था। वास्तव में हमने एक बोतल वाइन के साथ एक बढ़िया डिनर किया था। मैं अपनी कार को काम पर छोड़कर टैक्सी से वहाँ गया था और फिर घर आया था। जब भी मेरी शाम की योजनाएँ बदलती थीं, मैंने प्रियंका को बताने की कभी ज़हमत नहीं उठाई, भले ही वह हर सुबह मुझे शाम के डिनर के बारे में पूछती थी। यदि पहले से डिनर का कोई प्रोग्राम होता तब मैं उसे पहले ही बता देता था, लेकिन अगर दिन में कोई योजना बनती तब नहीं। आज भी कुछ अलग नहीं था, मेरी डिनर योजनाएँ बन गईं, और प्रियंका घर पर घर के बने खाने की प्लेट लेकर अपने पति का इंतज़ार कर रही थी, जो नहीं आया था।

वह मुझसे प्यार करती थी और मेरा ख्याल रखती थी। प्रियंका ने मेरे लिए जो कुछ भी चाहिए था, वह किया। मेरे सूट ड्राई-क्लीन किए गए। मेरी शर्ट इस्त्री की गई। मेरे जूते पॉलिश किए गए। अगर मैं लोगों को रात के खाने के लिए घर पर आमंत्रित करता, तो वह बढ़िया खाना बनाती और उसे बढ़िया वाइन के साथ परोसती। प्रियंका की मेजबानी के हुनर से हर कोई प्रभावित था। अगर मुझे बात करने की ज़रूरत होती, तो वह वहाँ होती। मुझे जो भी चाहिए या जो भी चाहिए, प्रियंका ने दिया।

मैं थका हुआ बेडरूम में गया, उम्मीद कर रहा था कि प्रियंका सो गई होगी ताकि मुझे अपने विचारहीन व्यवहार का सामना न करना पड़े। लेकिन वह नाइट शर्ट और शॉर्ट्स में जाग रही थी, पढ़ रही थी। उसकी नीली झीनी नाइटवियर मेँ उसकी रेशमी त्वचा चमक रही थी। मेरी पत्नी बहुत खूबसूरत थी। उसने अपना आईपैड एक तरफ रख दिया और मेरी तरफ देखकर मुस्कराई। "तुम थके लग रही हो, बेब। क्या तुमने खाना खाया?"

जब वह बिस्तर से उठने वाली थी, मैंने उसकी ओर हाथ हिलाया। "मैंने खाना खा लिया। हम कुछ लोग मार्सेल रेस्तरां गए थे।" जैसे ही रेस्तरां का नाम निकला, मैं उसके चेहरे पर पल भर का तनाव देख सकता था, जो एक पल भर मेँ गायब हो गया, तथा उसकी जगह उसकी मुस्कान ने ले ली। इस बारे में ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं थी कि वह उस क्षण क्यों आहत दिखी। क्या पिछले शुक्रवार को ही प्रियंका ने मार्सेल में आरक्षण करवा कर मुझसे नहीं कहा था? हाँ, यह पिछले शुक्रवार की बात है। सिर्फ़ चार दिन पहले, मैंने उसे साफ़-साफ़ कह दिया था कि मेरे पास डिनर या कुछ और करने का समय नहीं है। मैं एक लंबे हफ़्ते के बाद थक गया था और बस सोना चाहता था। उसने मुस्कराते हुए मुझे बताया था कि वह इसलिए जाना चाहती थी क्योंकि शेफ ने उसे आमंत्रित किया था। वह उससे तब मिली थी जब वह एक आश्रय गृह में स्वयं सेवा करती थी, और उनकी दोस्ती हो गई थी।

मैं इतना लापरवाह कैसे हो सकता था? लेकिन मैं था।

"हम जल्द ही साथ मेँ चलेंगे," मैंने अपना गला साफ़ किया। "आह...मुझे नहाना है।" मैं बाथरूम में भाग गया। जब मैं बिस्तर पर आया, तो वह मेरी तरफ मुँह करके लेटी थी। उसकी आँखें बंद थीं, लेकिन मुझे पता था कि वह जाग रही है। मैं उसके बगल में बैठ गया और तुरंत उसे देख उत्तेजित होने लगा। बुरी तरह! हमेशा की तरह मैं उसके लिए भूखा था। मैं पीठ के बल लेट गया और एक हाथ आगे बढ़ाया। उसने तुरंत अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया, उसके छोटे, नाजुक हाथ मेरी छाती पर थे। मैंने उससे विनती की, "बेब, मैं .... "

उसने अपनी बाहें फैलाईं और पैर फैलाए, "हाँ, मेरे प्यारे अंशुमन।" मेरे पास उसके लिए धैर्य नहीं था, जो मैं लगभग हमेशा करता था। इस बार नहीं। मेरा दिन लंबा और तनावपूर्ण था, और वह मेरा इनाम थी - मेरी कमबख्त मुक्ति। "मैं रुक नहीं सकता बेबी।" उसने मेरी पीठ पर हाथ फेरा और मेरा स्वागत किया। बस इतना ही आमंत्रण था जिसकी मुझे जरूरत थी। मैंने अपनी आवश्यकता पूरी कर ली। मैं जानता था कि उसके लिए यह नहीं हुआ था। मैंने फुसफुसाते हुए कहा, ‘सॉरी।‘ अपराध बोध पर अपराध बोध की परतें चढ़ती गईं। वह मुस्कराई और मेरे मुंह को चूमा। "मुझे तुम्हारा मेरे अंदर होना, तुम्हें अपने इतने करीब महसूस करना बहुत अच्छा लगता है।"

"लेकिन मैं हमेशा तुम्हें भी सुख देता हूँ।"

उसकी आँखें घूम गईं और मैंने पलकें झपकाईं, "प्रियंका?"

"हाँ .... हाँ देते हो न .... तुम्हें पता है," उसने कहा, लेकिन मैं जानता था कि वह झूठ था। मैंने उसे चूमा। मैं उसके लिए सब कुछ ठीक कर दूँगा; मैंने खुद से वादा किया, जब इतना थका हुआ नहीं रहूँगा। वैसा करूँगा, जैसा कि मैं पहले करता था।"

“तो, आपकी पत्नी को संभोग सुख नहीं मिला, और आप दोषी महसूस कर रहे थे," डॉ. वर्मा ने अनुमान लगाया। मैंने होंठ चाटे। "और उसके कहने के तरीके से मुझे एहसास हुआ कि यह पहली बार नहीं था जब मैंने उसका ख्याल नहीं रखा था। मुझे एक गधे जैसा लगा।"

"क्या आपने उससे इस बारे में बात की?"

मैं आत्म-ग्लानि में हंसा। "चलो, डॉक्टर, मैं एक मजबूत पुरुष हूँ, हम ऐसी बातों के बारे में बात नहीं करते।" डॉक्टर ने गंभीरता से सिर हिलाया। "नहीं डॉक्टर। मैंने उससे इस बारे में बात नहीं की," मैंने उदास होकर कहा। "मुझे लगा जैसे उसने मुझे अभी-अभी बताया हो कि मैं एक घटिया प्रेमी था, और शायद इसीलिए... मैंने अतिथि कक्ष में सोना शुरू किया।"

"क्या उन्होंने सचमुच ऐसा कहा था?"

"नहीं, नहीं" मैंने चिल्लाकर कहा। "नहीं। उसने नहीं कहा। प्रियंका... वह बहुत प्यारी है। यह सब मेरी गलती थी। मुझे अपराध बोध हो रहा था, और मैं जानता था कि अगर मैं उसके साथ बिस्तर पर गया, तो मैं फिर यही करूंगा। मैं उसके साथ अपने आप को रोक नहीं सकता। मेरे दोस्त शिकायत करते हैं कि उनकी पत्नियाँ उन्हें उत्तेजित नहीं करती हैं, और वे किसी अजनबी के साथ यह करना चाहते हैं। मैं उनकी बात बिल्कुल नहीं समझ पाता। मैं प्रियंका को देखता हूँ, और उत्तेजित हो जाता हूँ।" डॉ. वर्मा पीछे झुक गए मानो वे मेरे कुछ और कहने का इंतजार कर रहे हों और दुर्भाग्य से और भी कुछ हुआ। यह गड़बड़ मैंने खुद ही की। "मुझे संदेह था कि वह खुश नहीं थी, और शायद इसीलिए वह संतृप्त नहीं हुई। मैं हमारे बीच बढ़ती दूरी को महसूस कर सकता था। अलग-अलग सोना इसका सामना करने से ज़्यादा आसान लग रहा था।"

"प्रियंका जी के जाने के बाद से आप कहाँ सो रहे हैं?"

मुझे लगा कि मेरी आँखों में आँसू आ गए हैं। "बिस्तर के उसकी वाली तरफ़।"

“क्यों?” डॉ. वर्मा ने पूछा, उनका स्वर सहानुभूति पूर्ण किन्तु साथ ही जांच पूर्ण था।

"क्योंकि मैं वहां उसकी गंध महसूस कर सकता हूं, और मैं कम अकेला और अधिक सुरक्षित महसूस करता हूं।" मैंने हाउस कीपर से कहा था कि चादरें न बदलें। मैं अपनी प्रियंका को यथासंभव लंबे समय तक अपने पास रखना चाहता था।

"अंशुमन, यह तो बिल्कुल स्पष्ट है कि आप अपनी पत्नी से प्यार करते हैं।"

"बहुत ज़्यादा," मैंने भर्राई हुई आवाज़ में कहा। "बहुत-बहुत, बहुत ही ज़्यादा।"

"आपको क्या लगता है कि इस प्यार के बावजूद आप उनके साथ ऐसा व्यवहार क्यों करते आ रहे हैं, जिसके बारे में आपके आस-पास के सभी लोग सोचते हैं कि यह उन्हें दूर भगाने के लिए किया गया था?" पिछले कुछ सप्ताहों से मैं इस विषय में बहुत सोच रहा था, जब से मेरी पत्नी चली गयी थी। पहले तो मुझे लगा कि वह नाटकीय हो रही है। फिर मैंने खुद को यकीन दिलाया कि वह किसी भी दिन वापस आ जाएगी। लेकिन, आखिरकार, मैं खुद के साथ ईमानदार हो गया कि मैं एक पति और एक आदमी के रूप में कौन था।

"जब हमारी शादी हुई तो मुझे डर था कि वह मेरे लिए एक गलत पत्नी है। मुझे उम्मीद थी कि एक दिन मोह भंग हो जाएगा और मैं उसे तलाक दे दूंगा।" यह याद करके मुझे हमेशा खुद से नफरत होती थी। "मैं उसे तलाक नहीं देना चाहता था, डॉक्टर। मैं उससे प्यार करता था, तब भी। लेकिन…... " .....

"लेकिन?"

मैंने आह भरी, "लेकिन, प्रियंका गलत समाज से है, और मैं राव-सिन्हा खानदान का हूँ।" उन्होंने सिर हिलाया, लेकिन कुछ न कहा, वे जानते थे कि मुझे अभी बहुत कुछ कहना है। "मेरी माँ उससे घृणा करती थी। पहले दो साल तो मुश्किल भरे थे, लेकिन फिर प्रियंका ने," मैं मुश्किल से शब्द निकाल पाया, "उनके अनुरूप होकर चुप रहना शुरू कर दिया।" मैंने अपनी प्यारी, मासूम, प्यारी पत्नी को अपनी माँ के क्रूर हाथों में छोड़ दिया था, जिनसे मैं भी डरता था, क्योंकि मैं कायर था। उस सारी दबंग आदमी वाली बातों और बकवास के बावजूद, मैं एक असफल व्यक्ति था जिसने अपनी पत्नी को अपनी माँ के नीचे रहने दिया। मेरी माँ, जो किसी से प्यार करने या देखभाल करने का अर्थ भी नहीं जानती थी।

"मुझे बताओ कि इस समय तुम्हारे साथ क्या हो रहा है?" डॉ. वर्मा ने पूछा।

मैंने उन की ओर देखा, मेरे गाल आँसुओं से भीगे हुए थे। "मुझे खुद से नफरत है।"

"क्यों?"

"क्योंकि मैंने अपनी पत्नी को उसके हाल पर छोड़ दिया था। क्योंकि मैंने उसे मजबूर किया कि वह मेरे लिए जिए, मेरी ज़रूरतें पूरी करे, लेकिन उससे कभी नहीं पूछा, एक बार भी नहीं पूछा, कि उसे क्या चाहिए।" जब भी हम बहस करते, मैं उस पर झल्लाता, "मैंने तुमसे शादी की है, है न? तुम और क्या चाहती हो?" जैसे मैंने उसे अपनी पत्नी बनाकर उस पर सबसे बड़ा एहसान किया हो।

"क्यों, अंशुमन? आप एक सभ्य आदमी हैं। आप अपने बच्चों से प्यार करते हैं, उनकी देखभाल करते हैं। आपका उनके साथ एक सच्चा और प्रामाणिक रिश्ता है। आपका अपने भाई के साथ भी अच्छा रिश्ता है। प्रियंका जी में ऐसा क्या था जो आपको —"

"मुझे दोषी महसूस हो रहा है," मैंने अचानक कहा। "ठीक है? और मैं दोषी हूँ। मुझे पता था कि उसके साथ क्या हो रहा था, लेकिन तब मुझे लगता था कि वह इसी के लायक थी। उसने उस समाज से आकर भी मुझ जैसे शहजादे को प्यार मेँ फंसा कर मुझसे से शादी कर ली; उसकी उसे कीमत चुकानी ही थी।" अब मैं इस बात से शर्मिंदा था, लेकिन एक समय था जब मैं, अपनी माँ की बातों से प्रभावित था और सच मेँ ऐसा ही सोचता था।

"क्या आप ने कोई कीमत चुकाई?"

मैंने सिर हिलाया। "मैं तो जैसे सोने की खान में गिर गया था। मुझे सबसे अच्छी पत्नी मिली जो एक आदमी चाह सकता है। मेरे बच्चों को एक बहुत प्यार करने वाली माँ मिली जिसने उन्हें बेहतर करने के लिए प्रेरित किया लेकिन कभी भी उन्हें चोट नहीं पहुँचाई, उनका अपमान नहीं किया, जैसा कि मेरे माता-पिता ने किया था। जैसा मेरे आस पास कई पत्नियाँ करती हैं। वह मेरे लिए हमेशा मौजूद थी। सिर्फ़ बिस्तर पर ही नहीं बल्कि हर जगह। वह मेरी सबसे अच्छी दोस्त है, डॉक्टर, लेकिन मैं उसका दोस्त नहीं रहा हूँ।" डॉ. वर्मा ने टिश्यू का डिब्बा मेरी ओर बढ़ाया और इस स्थिति का निचोड़ सोच कर मुझे हंसी आ गई। एक मनोचिकित्सक के दफ़्तर में रोना! लेकिन मुझे शर्मिंदगी महसूस नहीं हुई। नहीं, मुझे लगा... मुझे हल्का पन महसूस हुआ। "मैंने उसे खुद को सम्हालने के लिए छोड़ दिया क्योंकि मैं नहीं जानता था कि उसे कैसे खुश किया जाए, और मैं सीखना भी नहीं चाहता था। उसे टालना, हमारी समस्याओं को टालना, यह स्वीकार करने से कहीं अधिक आसान था कि मैंने एक पति के रूप में उसे निराश किया है" मैंने स्वीकार किया, शब्दों का वजन मेरे पेट में पत्थरों की तरह था।

डॉ. वर्मा ने फिर से ऊपर देखने से पहले अपने नोट्स में कुछ लिखा। "जब चीजें वास्तविक हो जाती हैं, तो बच निकलना ही आपकी आदत रही है। आपने अपने माता-पिता के साथ ऐसा किया, आप प्रियंका जी के साथ भी ऐसा कर रहे हैं, और मुझे यकीन है कि आप अपने जीवन में हर रिश्ते के इर्द-गिर्द इसी तरह बचते बचाते जीते हैं। लेकिन समस्या यह है कि यदि युद्ध मेँ आप पर्याप्त गोलियों से बच निकलते हैं, और आप खुद को युद्ध क्षेत्र में अकेला पाएंगे। अगर आप प्रियंका जी के साथ चीजों को बचाने का कोई मौका चाहते हैं, तो आपको स्क्रिप्ट को पलटना होगा। स्थिति का सामना करना होगा। अपनी सारी बातें कहनी होंगी, और फिर चुप होकर उनकी बात भी सुननी होगी - वास्तव में सुननी होगी, कि ‘वह’ क्या कह रही हैं। भागना नहीं, छिपना नहीं। सामना करना होगा। अगर आप प्रियंका जी के साथ चीजों को सच मेँ बचाने का कोई मौका चाहते हैं, तो।”

"मैं उसे फिर से कैसे पाऊँ?" मेरी आवाज़ में हताशा थी। "मैं उसे वापस कैसे जीतूँ?"

"अब, अंशुमन, स्पष्ट है कि आप एक लक्ष्य-उन्मुख व्यक्ति हैं, और आप अपनी मंजिल तक पहुँचना चाहते हैं और अपनी पत्नी को वापस जीतना चाहते हैं" उन्होंने एक छोटी सी मुस्कान के साथ कहा। "लेकिन आपको अपनी मानसिकता बदलनी होगी। आप प्रियंका जी को खुश नहीं कर सकते। केवल वह खुद को खुश कर सकती हैं - आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि आप की तरफ से उसे कोई दर्द न हो, ताकि वह अपनी खुशी तक पहुँच सके। इसका कोई त्वरित समाधान नहीं है।"

"मुझे इस बात का डर था," दुखी होकर मैंने मज़ाक करने का प्रयास किया।

"अंशुमन, ऐसा नहीं है कि आपकी शादी के सभी बीस साल बुरे रहे हों। अच्छे समय भी होंगे?

मैंने अपना सिर हिलाया और फिर कंधे उचका दिए। "मेरे लिए तो अच्छे थे। प्रियंका के लिए? मुझे नहीं पता।"

"मैं जो देख सकता हूँ, और यह सच है कि यह हमारा पहला सेशन है, आपके बीच अच्छे और बुरे दोनों ही दौर रहे हैं। मुझे लगता है कि बुरे से ज़्यादा अच्छे दौर तब तक रहे जब तक कि आपके बच्चे चले नहीं गए। आप दोनों खाली घोंसले वाले पंछी हो गए और अपने रिश्ते को बनाए रखने के लिए ज़रूरी प्रयास नहीं किया। आपके बच्चों ने सहज रूप से आप दोनों के बीच दरार को देखा और आपका पक्ष ले लिया।" मैंने अपने हाथ में इस्तेमाल किए गए टिशू को कुचल दिया। जिस चीज को टूटने में सालों लग गए थे, उसे कुछ दिनों में ठीक नहीं किया जा सकता था। मुझे यह पता था। लेकिन रिश्ता ठीक करने के हम दोनों मेँ यह करने की इच्छा होनी चाहिए। और मुझे डर था कि उसमें वह इच्छा नहीं बची है। मुझे नहीं पता था कि अगर वह रिश्ता वापस नहीं जोड़ना चाहती, तो मैं क्या करता।

डॉ. वर्मा ने आगे कहा, "यदि आप अपनी पत्नी को वापस लाना चाहते हैं तो इसकी शुरुआत उनकी ज़रूरतों, इच्छाओं और चाहतों को समझने से होगी। आपको उन्हें विश्वास दिलाना होगा, और करके भी दिखाना होगा कि आप प्रतिबद्ध हैं। सच तो यह है कि आप अपनी पत्नी को खुश नहीं कर सकते और न ही वह आपको खुश कर सकती हैं। खुशी हमारे भीतर से आती है। आपको जिस चीज़ पर ध्यान केंद्रित करने की ज़रूरत है, वह है बिना क्रोधित हुए एक-दूसरे की बात सुनना, सीखना, एक-दूसरे की ज़रूरतों को सही मायने में सुनना और समझना, और उन्हें पूरा करने के लिए मिलकर काम करना।"


ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग पंद्रह (15)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग पंद्रह (15)


भाग 15

प्रियंका

 

"श्रेया, तुम ने दीपावली के सप्ताह के लिए दो कमरे बुक किए हैं, कोई नाम या क्रेडिट कार्ड नहीं है," मैंने श्रेया को पुकारा जब वह धीरे-धीरे लाउंज में आई जहाँ मैं जा रही थी। वह अपने लैपटॉप पर बुकिंग कर रही थी। "मुझे पता है। वे मेरे दोस्त हैं। कोई पेमेंट नहीं होगी इसलिए क्रेडिट कार्ड की जरूरत नहीं है।"

मैंने भौंहें चढ़ाईं, "अच्छा? मुझे नहीं पता था कि मेरे अलावा भी तुम्हारे और दोस्त हैं।"

"ए लड़की, मेरे पास दोस्त भी हैं और प्रेमी भी हैं," उसने शरारती अंदाज में कहा। "बस उस बुकिंग को वैसा ही छोड़ दो और उस की चिंता मत करो।" मैंने श्रेया के दोस्तों के लिए कमरे दर्ज किए और साप्ताहिक मीनू देखना शुरू किया, तथा जो किराने का सामान मुझे खरीदना था उसे एक नोट पर लिख लिया।

"नीलिमा और यशस्वी कब पहुंचेंगे?" श्रेया ने पूछा।

मैं मुस्कराई, अपनी बच्ची को जल्द ही देखने की खुशी में झूम रही थी। "शुक्रवार को। यकीन नहीं हो रहा कि नीलिमा सनशाइन होम्स में होगी। मैं विश्वास ही नहीं कर सकती।"

श्रेया ने मेरे हाथ पर हाथ रखा। "प्रियंका, तुम एक बहुत अच्छी माँ हो। तुम्हारे बच्चों ने भले ही बुरा व्यवहार किया हो, लेकिन मुझे लगता है कि एक बार जब उन्हें एहसास होगा कि उन्होंने तुम्हें कितना दुख पहुँचाया है, तो वे दोनों तुम्हारे पास लौट आएंगे।"

"तुम्हें लगता है?" मैं यह उम्मीद भी नहीं कर रही थी कि शाश्वत बदलेगा। उस दिन के बाद उसने फ़ोन नहीं किया। काश मैंने उस पर इतना कठोर व्यवहार न किया होता। मैं उसे मैसेज करके माफ़ी मांगना चाहती थी, लेकिन डॉ. मिश्रा ने मुझे अपनी सीमाएँ बनाए रखने की सलाह दी थी। बच्चे मेरे साथ वैसा ही व्यवहार करेंगे जैसा मैं उन्हें करने देती हूँ। मुझे कठोर शब्दों से खुद को बचाने के लिए सुरक्षा कवच लगाने की ज़रूरत थी। इससे मैं बुरी माँ नहीं बनी, बल्कि एक अच्छी माँ बनी। अपने बच्चों को लोगों का, ख़ासकर अपने माता-पिता का, सम्मान करना सिखाना एक अच्छा सबक था जिसे उन्हें अवश्य सीखना चाहिए।

इन सबके बावजूद, मुझे शाश्वत की याद आती थी। मुझे नीलिमा की याद आती थी। मुझे अंशुमन की याद आती थी - सबसे ज़्यादा उसकी ही। मुझे बिस्तर पर उसकी बाँहों में लिपटे रहने की याद आती थी। मुझे उसके साथ प्यार करना याद आता था। मुझे वह याद आता था जब वह मुझसे बात करता था। मुझे उसकी खुशबू याद आती थी।

श्रेया सोफ़े पर बैठ गई। अपने कमरे से लाउंज तक का छोटा सा रास्ता उसे थका देता था। "मुझे पक्का पता है कि तुम्हारे बच्चे तुम्हारे पास वापस आएंगे, प्यारी लड़की। मुझे लगता है कि मौत के इतने करीब होने से मैं भविष्य वक्ता हो रही हूँ।" उसने हँस कर कहा। उसका चेहरा पीला और मुरझाया हुआ था। यह सिर्फ़ दो-तीन महीनों या शायद इससे भी कम समय की बात थी; डॉक्टर ने मुझे एक दिन पहले ही चेतावनी दी थी जब हम उसकी नियमित जाँच के लिए गए थे। डॉक्टर ने एक बार फिर मुझे श्रेया को अस्पताल ले जाने के बारे में सोचने को कहा, और मैंने एक बार फिर कहा कि श्रेया अपने घर में ही मरना चाहती है। मैं नर्स का खर्च नहीं उठा सकती थी, और हमें उसकी ज़रूरत भी नहीं थी। मैं ही उसकी नर्स थी। मैं ही उसकी माँ थी, बेटी भी और बहन भी। हम दोनों एक दूसरे की सब कुछ थीं। मैं उसे नहलाती, साफ़ करती, जो भी ज़रूरी होता वो करती। मैं उसके लिए मौजूद थी।

मैं सोफे पर उसके बगल में बैठी थी और घड़ी पर नज़र रखे हुए थी। मैंने ओवन में कुछ रखा हुआ था और आठ मेहमानों को एक घंटे में खाना परोसा जाना था: दो जोड़े और एक किशोर परिवार। मैंने पूछा, "तुम्हें कुछ दर्द निवारक दवाएँ चाहिए?" उसने अपना सिर हिलाया।

"वे दर्द तो दूर करते हैं, लेकिन मुझे नींद भी आने लगती है। मेरे पास बहुत कम समय बचा है, मैं कुछ समय तक जागना चाहती हूँ।" मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लिया और हम लाउंज की बड़ी खिड़कियों से सामने के बगीचे और उसके आगे समुद्र को देखने लगे। "क्या तुमने अंशुमन से कुछ सुना?" श्रेया ने आगे पूछा।

"उस कॉल के बाद से नहीं जब उसने मुझ पर चिल्लाया था।"

"मुझे पता है कि तुम उससे प्यार करती हो, लड़की।" उसने अपने हाथ से मेरा हाथ थपथपाया। "लेकिन मुझे नहीं लगता कि तुम मानती हो कि वह तुमसे प्यार करता है ।"

"नहीं करता।" अब यह निश्चित हो गया था। वह तलाक के कागज़ात पर हस्ताक्षर करने जा रहा था, जैसा कि उसने कहा था। ईशानी ने कहा था, जल्द ही कुछ मिलेगा। कुछ महीने लगेंगे। लेकिन मैं पहले ही घर से निकल चुकी थी और अंशुमन से कुछ नहीं चाहती थी, इसलिए सब सरल होने वाला था। तो, इस तरह मेरी बीस साल की शादी बिना किसी परेशानी के खत्म हो गई। यही तो तलाक लेने वाला हर व्यक्ति चाहता था, है न? यह अच्छी बात थी, है न? अंशुमन से झगड़ा मुझे बर्बाद कर देता। मुझे पता था कि टूटी शादी से उबरने में मुझे बहुत समय लगेगा। और, श्रेया जाएगी तब मैं सचमुच अकेली हो जाऊँगी, तब मुझे फिर से खुद को संभालना होगा। यह आसान नहीं होने वाला था।

श्रेया ने मुझे आश्चर्यचकित करते हुए पूछा, "अंशुमन को तुम्हें अपने प्यार का यकीन दिलाने के लिए क्या करना होगा?" मेरे मनोचिकित्सक ने भी मुझसे यही प्रश्न पूछा था, और मेरे पास इसका कोई स्पष्ट उत्तर नहीं था।

"मुझे नहीं पता," मैंने स्वीकार किया। "लेकिन सवाल निरर्थक है, श्रेया। वह मुझसे प्यार नहीं करता, और वह मुझे मनाने के लिए एक उंगली भी नहीं हिलाएगा। उसके अनुसार, मुझे बस अपने घर चले जाना चाहिए और इतना ‘नाटक करना’ बंद कर देना चाहिए।"

श्रेया ने रूखे स्वर में कहा, "मैडम, आप ‘रियल हाउस वाइव्स’ सीरियल की कड़वी पत्नियों में से एक लगती हैं।"

"हाँ तो? मैं उनमें से एक हूँ," मैंने हँस कर कहा। "मैं उन अमीरों के बीच ही रहती थी।"

श्रेया हँसी और फिर संभल गई। "शुरू में, मुझे लगा कि अमीरी से तुम बदल जाओगी। उन जैसी ही बन जाओगी। लेकिन तुम कभी नहीं बदलीं। तुम हमेशा तुम ही रही हो।"

"यह सच नहीं है," मैंने धीरे से कहा। "मैंने खुद को खो दिया, श्रेया। अदृश्य हो गई। शादी के बारे में कोई भी यह नहीं बताता कि आपको खुद को पूरी तरह से इसके लिए समर्पित करना होगा। हम निस्वार्थ भाव से यह करते हैं। हमारे बच्चे, पति, वे ही हमारी ज़िंदगी बन जाते हैं। लेकिन ‘हम’ उनकी ज़िंदगी नहीं बन पाते। कोई ‘धन्यवाद’ भी नहीं कहता। ऐसा लगता है कि मुझसे माँ और पत्नी बनने के लिए खुद अपनी पहचान को खो देने की उम्मीद की गई थी। मैं अब खुद भी नहीं जानती कि ‘प्रियंका सिंह’ कौन है। यह सच है कि उन्होंने मुझे नहीं देखा, लेकिन गड़बड़ तो है यह है श्रेया, कि मैंने भी खुद को नहीं देखा।"

श्रेया झुकी और मैंने उसके माथे को चूमा, उसके पतले, कमज़ोर शरीर को अपने पास समेटा। उसकी खुशबू पुदीने जैसी थी। "मैं नहीं चाहती कि जब मैं चली जाऊं तो तुम यहां... इस दुनिया में अकेली रहो।" उसने अपने मुंह से मौत का बदबूदार स्वाद (उसके शब्द) दूर करने के लिए पुदीने की पत्तियों को चबाना शुरू कर दिया था। "तुम ने ही कहा था कि ‘अकेले रहना ठीक है, बस अकेलापन नहीं।’ मैं यहाँ अकेलेपन मेँ नहीं रहूंगी प्रिय श्रेया।"

"मुझे बुरा लग रहा है कि तुम दुखी हो, प्रियंका। मुझे इस बात से नफरत है।" उसने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया। "लेकिन मैं तुम्हें एक बात बताऊँगी जो मुझे पक्का पता है कि सच है। तुम्हारा परिवार तुमसे प्यार करता है। हो सकता है कि उन्होंने हाल ही अपनी हरकतों और बातों में इसे दिखाया न हो, लेकिन वे करते हैं।" यह अच्छी कल्पना थी। लेकिन मुझे नहीं लगता था कि यह सच है। मैं रोमांचित थी कि नीलिमा आ रही थी, लेकिन यह सिर्फ उसके अपराध बोध के कारण था। मैं यह जानती थी और मुझे इसकी परवाह नहीं थी। मैं किसी भी कारण से अपने बच्चे को अपने साथ चाहती थी। शाश्वत ने तो मुझसे संपर्क करने की भी जहमत नहीं उठाई थी। और फिर अंशुमन का फोन पर व्यवहार भी तो एक संकेत था।

"जब वे छोटे थे, बच्चे भी और अंशुमन भी, तब उन्हें मेरी ज़रूरत थी, ताकि वह काम कर सकें, और मैं घर की देखभाल करूँ।" मैंने एक अच्छी माँ और पत्नी बनने के लिए बहुत मेहनत की थी। और इस सबके बाद, मैं यहाँ, अड़तीस साल की उम्र मेँ अकेली थी। "अब, उनका अपना जीवन है। मैं यह समझती हूँ। मैं बस यही चाहती हूँ कि वे मुझे चाहते, भले ही उन्हें मेरी ज़रूरत न हो, फिर भी वे मुझे मेरे लिए चाहते, प्यार करते, सम्मान करते।" मैंने डॉ. मिश्रा से इस बारे में अक्सर बात की थी, कि कैसे मैं अक्सर एक पत्नी, माँ और वेश्या की तरह महसूस करती हूँ, जिसकी अपनी कोई निजता नहीं है। वहाँ कोई प्रियंका नहीं थी, बस उसके अलग-अलग अवतार थे जो परिवार की सेवा करते थे।

श्रेया की सांसें धीमी हो गई, और मैं समझ गई कि वह सो गई है। मैंने उसके सिर को कुशन पर इस तरह से एडजस्ट किया कि वह आराम कर सके। वह बड़े सोफे पर छोटी सी लग रही थी। मैंने उसके ऊपर एक कंबल डाला और उसे सोने के लिए छोड़ दिया, जबकि मैंने अपने ओवन की जाँच की और एक नए अवतार में आ गई। एक रिज़ॉर्ट की मालकिन- प्रियंका सिंह, जो खाना बनाना, साफ-सफाई करना और एक बेहतरीन परिचारिका बनना जानती थी - लेकिन इस बार, इस सब की सराहना होती थी। इस बार मैं यह सब अपने लिए कर रही थी, और यह एक आज़ादी जैसा था।


गुरुवार, 29 जनवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग चौदह (14)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग चौदह (14)


भाग 14

अंशुमन




"मैं आपसे प्रियंका जी के बारे में बात नहीं कर सकती।" वह एक लंबी एंग्लो-इंडियन महिला थीं, जिनका चेहरा कोमल और व्यवहार शांत था। वह दृढ़ और सरल स्पष्ट भी थीं।

"मैं जानता हूँ, लेकिन उम्मीद है कि आप मेरी मदद कर सकती हैं। मैं खो गया हूँ।"

डॉ मिश्रा ने सिर हिलाया "ठीक है, आप किस बारे में बात करना चाहते हैं?"

"मेरी पत्नी ने मुझे छोड़ दिया है" मैंने शुरू किया, और फिर सब कुछ बता दिया, शब्द बह निकले। मैंने बताया कि कैसे मेरे आस-पास के सभी लोग मेरी शादी को बर्बाद मानते थे, सोचते थे कि मेरा अपनी असिस्टेंट से अफेयर है, और मैं यह समझता रहा था कि मेरी शादी कितनी अच्छी चल रही थी। प्रियंका के साथ मेरी आखिरी कॉल के दौरान, मैंने कैसे बेवकूफी की थी, मैं एक बेवकूफ़ था; मैं यह समझने के लिए संघर्ष कर रहा था कि मैंने अपनी पत्नी को कैसे-कैसे अनदेखा किया, जो वह इस तरह सोच रही थी। मैंने कबूल किया, "मुझे यह भी समझ में नहीं आ रहा है कि जाने से पहले उसने मुझसे बात क्यों नहीं की।"

“आपको क्या लगता है, उन्होंने बात क्यों नहीं की होगी?"

मैंने इस बारे में सोचा और होंठ सिकोड़ लिए "पिछले दो सालों से मैं ज़्यादा मौजूद नहीं रहा। नहीं, दरअसल, पिछले कई सालों से। शायद...उसे लगा कि वह बात नहीं कर सकती?"

"क्या उन्होंने पहले भी आपसे किसी विषय पर बात करने की कोशिश की है?"

"मुझे ऐसा लगता है ..... मेरा मतलब है, हाँ, उसने कई बार प्रयास किए हैं।"

"वह प्रयास कैसा रहा? क्या बातचीत हुई?"

मुझे पता था कि वह क्या कहना चाह रही थीं। "मैंने उसके मुद्दों को एक बाधा की तरह लिया, अनदेखा किया। कुछ ऐसा कि उसे खुद ही अपने मुद्दे हल करने चाहिए।

डॉ. मिश्रा ने मेरी ओर देखा, "यह जानकर आपको अब कैसा महसूस हो रहा है?"

"शर्मिंदा।" .....

"बस शर्मिंदा? और कुछ नहीं?"

"मुझे डर है कि मैं उसे वापस नहीं पा सकता। कि मैंने उसे हमेशा के लिए खो दिया है; कि मैं उसे खोने के ही लायक हूँ।" डॉ. मिश्रा ने कुछ नोट्स बनाए और फिर मेरी तरफ देखा। "आप कहते हैं कि आप तलाक नहीं चाहते। मुझे बताइए कि ऐसा क्यों है।"

"मैं उससे प्यार करता हूं।"

"इस ‘प्यार करता हूं’ से आपका क्या मतलब है?"

मैंने पलक झपकाई। "बस इतना ही कि मैं...उससे प्यार करता हूँ।"

“आपके लिए इस ‘प्यार करने’ का क्या मतलब है?"

मैंने इसके बारे में सोचा, और मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई, भले ही मैं कितनी भी मुश्किलों में क्यों न फंसा हुआ हूँ। "वह मुझे सुरक्षित महसूस कराती है। जब मैं उसके साथ बिस्तर पर लेटता हूँ तो मुझे शांति महसूस होती है, और वह मेरे साथ होती है। मेरा दिन सबसे खराब हो सकता है, लेकिन जब मैं उसके साथ लेटा होता हूँ, तो यह सब दूर हो जाता है।"

"वह आपका ‘सेफ स्पेस या सुरक्षित स्थान या शरणस्थली या आश्रय’ हैं?"

"हाँ," मैंने सहमति जताई।

"तो, जब वह समस्याएं या चिंताएं आपके सामने लाती हैं, तो क्या होता है?"

"मैं..." मैंने आह भरी जब मुझे एहसास हुआ कि वह क्या कह रही थी और मैं क्या कर रहा था। "मुझे यह पसंद नहीं आता है क्योंकि यह मेरी शांत सुरक्षित जगह छीन लेता है। यह संघर्ष को बढ़ाता है जो मैं नहीं चाहता। मैं चाहता हूँ कि प्रियंका के साथ सब कुछ शांतिपूर्ण रहे। मेरे चारों ओर संघर्ष है, और बिस्तर पर, मैं चाहता हूँ कि मेरी पत्नी मेरी बाँहों में हो, कहे कि वह मुझसे प्यार करती है, न कि मुझे यह बताए कि उसका जीवन कठिन है।"

"आप ‘बिस्तर’ कहते रहते हैं। जब मैं घर आता हूँ और उसके साथ ‘लेटता’ हूँ। जब मैं ‘बिस्तर पर’ होता हूँ। क्या आप ‘सेक्स’ के बारे में बात कर रहे हैं?"

मैंने अपने चेहरे के एक तरफ हाथ रगड़ा। "हाँ, आंशिक रूप से। हमारा सेक्स जीवन हमेशा शानदार रहा है। बीस साल हो गए हैं, और हम अभी भी कई बार सेक्स करते हैं। नहीं, हम पहले करते थे। पिछले कुछ महीनों में यह कम हो गया है, असल में, बिलकुल नहीं।"

"क्यों? ऐसा क्या हुआ था?"

"मैंने अक्सर अतिथि कक्ष में सोना शुरू कर दिया। मैं देर रात तक स्टडी में काम करता और गेस्ट रूम मेँ सो जाता, ताकि वह जाग न जाए।"

"आप तो हमेशा से ही बहुत काम करते रहे हैं। तो अब ही अलग कमरे मेँ क्यों सोने लगे?"

मैंने कंधे उचका दिए. "मैं उसे परेशान नहीं करना चाहता था।"

"आप ने अभी कहा कि हर कोई सोचता है कि आप अपनी असिस्टेंट के साथ सो रहे हैं। क्या आपके मन में आपकी असिस्टेंट के लिए कोई भावनाएँ हैं?"

"नहीं," मैंने जोरदार विरोध किया। "बिलकुल नहीं। आप समझ नहीं रही हैं। मैं प्रियंका के अलावा किसी और के साथ सेक्स नहीं करूँगा। मैं करना ही नहीं चाहता। मैं उसका हूँ और वह मेरी है। और वही मेरे लिए सब कुछ है।"

डॉ. मिश्रा ने कुछ और नोट्स लिये। "आप कहते हैं कि हर कोई देख सकता है कि आप अपनी पत्नी की उपेक्षा कर रहे हैं। क्या आप यह देख पा रहे थे?"

"नहीं, मुझे तो लगता था सब ठीक है, बल्कि बढ़िया है। लेकिन अब देख पा रहा हूँ।"

"मुझे इसके बारे में बताइए।”

मैंने अपने बालों में हाथ फेरा। एक के बाद एक सवालों के जवाबों के बारे में सोचना बहुत मुश्किल काम था। मेरे पास सभी जवाब नहीं थे, और जो जवाब मेरे पास थे, उनसे मुझे पता चला कि मैं अपनी पत्नी के साथ कितना बुरा व्यवहार कर रहा था। यहाँ डॉ. मिश्रा के साथ कुछ मिनटों के अंतराल में मैंने जो कुछ समझा था, असलियत को उजागर कर रहा था।

प्रियंका मेरा ‘आश्रय’ थी, इसलिए मेरे मन की दुनिया मेँ उसके पास अपनी कोई समस्या या मुद्दा होने की अनुमति नहीं थी। उसे एक गुड़िया जैसी मानना चाहता रहा था जो मेरी देखभाल करने और मुझे बेहतर महसूस कराने के लिए मौजूद रहे। और जब वह हो जाता, तो मैं अपने रास्ते पर चला जाता, और वह? खैर, हकीकत यह सामने आ रही थी कि वह तो मेरा ‘आश्रय’ बन गई थी, लेकिन मैं कभी उसकी शरणस्थली नहीं बन सका था, न कभी मुझे उसके लिए बनने की इच्छा हुई थे। वह एक सहारा थी जिस पर झुक कर मैं आराम पाता था। बदले मेँ मैंने उसे यह बताने का मौका नहीं दिया कि उसके साथ क्या हो रहा था। मैं उससे किसी भी चीज़ के बारे में बात कर सकता था, और वह सुनती भी थी। लेकिन वह नहीं बोल सकती थी। जब डॉ. मिश्रा और मेरी बातचीत खत्म हुई, मैं थक कर निढाल हो चुका था। और यह सिर्फ़ आधे घंटे का सत्र था?

डॉ. मिश्रा ने कहा, "जाने से पहले मैं चाहती हूँ कि आप दो बातों के बारे में सोचें, इसे होम वर्क की तरह सोचें। सबसे पहले, मैं चाहती हूँ कि आप जानें और समझें कि आपने अपनी पत्नी से अलग सोना क्यों शुरू किया, जबकि आपका रिश्ता वैवाहिक बिस्तर के बारे में बहुत कुछ रहा है। दूसरा, मैं चाहती हूँ कि आप कल्पना करें कि अगर आपकी पत्नी ने आपसे अपने अवसाद के बारे में बात की होती तो उसके साथ बातचीत कैसी होती। एक ऐसी बातचीत जिसे आपने गंभीरता से लिया होता, या वैसा ही होता जैसे कि जिस तरह से आपने उसे फोन पर फटकार लगाई जब उसने अपने विवाह मेँ खुश न होने का ज़िक्र किया।"

मैं सोफे से उठ खड़ा हुआ, मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं गन्ने का रस निकालने वाली मशीन से गुज़रा हूँ। "धन्यवाद, डॉ. मिश्रा।"

"अंशुमन जी, मेरी पेशेवर राय में, आपको अभी भी इस संकट के समय मेँ थेरेपी जारी रखनी चाहिए। आपको सप्ताह में कम से कम दो बार किसी से मिलना चाहिए। मैं आपको रेफ़रल दे देती हूँ। मुझे लगता है कि आप किसी पुरुष के साथ बेहतर कर सकते हैं।"

मैंने हैरानी से उन्हें देखा, "ऐसा क्यों?"

"मैंने आपसे बहुत देर तक तो बात नहीं की है, और हो सकता है कि मैं गलत भी होऊं। लेकिन, मेरा मानना है कि आप महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों का अधिक सम्मान करते हैं।"

"नहीं," मैंने तुरंत कहा। "मैं उन बेवकूफ लोगों में से नहीं हूँ।"

वह मुस्कराई। "हम सभी में पूर्वाग्रह होते हैं। मेरे मन में गोरे पुरुषों के प्रति थोड़ा पूर्वाग्रह है, लेकिन इससे यह तथ्य नहीं बदलता कि मेरे पति गोरे हैं। मैं आपको कुछ संदर्भों के साथ एक ईमेल भेजूंगी।"

"लेकिन आप मुझे सेशन के लिए नहीं लेंगी?"

"अगर आप यही चाहते हैं, तो बिल्कुल ले सकती हूँ। मैं बहुत से विवाहित जोड़ों को साथ में भी और अलग-अलग भी परामर्श देती हूँ। लेकिन मुझे लगता है कि आप किसी पुरुष के साथ बेहतर महसूस करेंगे। आप यदि मेरे साथ बने रहना चाहते हैं तो अवश्य मुझसे फिर से मिल सकते हैं। अपॉइंटमेंट लेने के लिए बस मेरी वेबसाइट पर पोर्टल का उपयोग करें। फिर भी मैं कुछ और नाम आपको भेज दूँगी।"

मैं दरवाजे पर पहुंच कर रुक गया, और पीछे मुड़ कर कहा, "मेरी पत्नी की मानसिक सेहत बचाने के लिए धन्यवाद।"

"आपका दिन अच्छा रहे, अंशुमन जी।" मैं जानता था कि वह यह स्वीकार नहीं कर सकतीं कि प्रियंका उनकी मरीज़ थी। लेकिन मैं बताना चाहता था कि उन्होंने उसके लिए जो किया उसके लिए मैं उसका आभारी हूँ। और जो उन्होंने मेरे लिए किया था उसके लिए भी। जाने से पहले मैंने उनके सहायक से बात की, जिसने प्रियंका का बही खाता देखा और भुगतान की व्यवस्था की; जाहिर है, इस मेँ कोई समस्या नहीं थी। मैंने पूरा भुगतान कर दिया।

घर लौटते समय मैंने अपने आर्किटेक्चर विभाग के प्रमुख प्रभाकर को फ़ोन किया। प्रभाकर चार साल पहले ही हमारे साथ जुड़े थे और उन्होंने कई बार खुद को एक बेहतरीन आर्किटेक्ट और लीडर के तौर पर साबित किया था। "कैसा चल रहा है, बॉस?" प्रभाकर ने पूछा।

"कल इस बारे में विस्तृत बात करूंगा, लेकिन मुझे छुट्टी लेनी है।" ...चुप्पी थी... "प्रभाकर?"

"क्या आपके साथ सब कुछ ठीक है? आपका स्वास्थ्य ठीक है?"

"हाँ, कोई चिंता की बात नहीं है।"

मैं उसकी उलझन सुन सकता था। "आप छुट्टी लेने वाले हैं? आप तो सप्ताहांत की भी छुट्टी नहीं लेते, अंशुमन। क्या हो रहा है?" बता देना बेहतर होगा।

"प्रियंका ने मुझे छोड़ दिया है। मुझे अपना परिवार बचाना है।"

"मुझे खेद है, अंशुमन। प्रियंका जी बहुत अच्छी इंसान हैं। आपको कितना समय चाहिए?"

मैंने इसके बारे में सोचा और कहा, "जितना समय लगे। कम से कम छह महीने।" अगर प्रभाकर को आश्चर्य हुआ, तो उसे नहीं पता था कि मैं खुद इस बात पर कैसा महसूस कर रहा हूँ। मैंने राव-सिन्हा-आर्किटेक्ट्स-एण्ड-बिल्डर्स कंपनी को मेरे पिता कि बनाई एक स्थानीय कंपनी से एक अंतरराष्ट्रीय दिग्गज में बदल दिया था। मैंने इसे खून-पसीने की कीमत दे कर किया था। और अब समझ आया कि अपनी शादी की कीमत भी दे दी थी। "क्या आप इस बारे में निश्चित हैं? आप दूर से काम कर सकते हैं या --"

"नहीं, मुझे छुट्टी ही चाहिए। मुझे यकीन है।"

"यह कब करना चाहते हैं? उसने पूछा

"कल हमारी बैठक मेँ हम परिवर्तन योजना पर बात करेंगे। बाद मेँ मैं वहाँ से भी किसी सलाह के लिए उपलब्ध रहूँगा। बस एक फ़ोन कॉल और ईमेल की दूरी पर। लेकिन मुझे अपनी पत्नी को घर लाना है, प्रभाकर! ... आप कार्यकारी सीईओ और अध्यक्ष होंगे।"

"मैं आपको निराश नहीं करूँगा," उसने धीरे से कहा, लेकिन मुझे पता था कि वह हैरान था कि मैं यह जिम्मेदारी उसे सौंप रहा हूँ जिसके लिए मैंने इतनी मेहनत की थी। लेकिन कभी-कभी ‘जीवन’ पैसा कमाने से ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है; वास्तव में, यह हमेशा से ही था। मुझे अब जाकर इसका एहसास हुआ, जब प्रियंका ने मुझे छोड़ दिया।

"प्रभाकर, तुमने मुझे कभी निराश नहीं किया है, मुझे विश्वास है कि कभी नहीं करोगे।"

"विश्वास-मत के लिए धन्यवाद अंशुमन। तो प्रियंका जी अभी कहां है?"

"है एक खूबसूरत जगह। तो ठीक है। मैं सभी परियोजनाओं और उनकी स्थिति की एक सूची बनाऊँगा, और मेरे जाने के पहले हम उन पर विचार कर सकते हैं। मैं कर्मचारियों को विवरण देने के लिए के लिए एक प्रस्तुति भी तैयार करूँगा। अभी यह गोपनीय रखना। मैं नहीं चाहता कि जब तक हम इस पर चर्चा पूरी नहीं कर लेते और इस नेतृत्व परिवर्तन को अंतिम रूप नहीं दे देते, तब तक किसी को भी इसके बारे में पता चले।"

"बिल्कुल।"

"प्रभाकर," मैंने गहरी साँस ली और आगे कहा, "क्या तुम्हें भी ऐसा लगता रहा है कि मेरा काव्या के साथ कुछ चल रहा है?" ..... फिर से एक लंबी चुप्पी ......

"हर कोई ऐसा क्यों सोच रहा है? क्या मैं ऐसी छवि रखता हूँ?" मैंने पूछा। प्रभाकर ने ठंडी आह भरी। "नहीं। मैं आपको जानता हूँ, इसलिए मैंने कभी इस पर यकीन नहीं किया। लेकिन काव्या खुद आपके बारे में हर किसी से इस तरह बात करती है। ऐसा नहीं है कि आप ... आप लोग कुछ कर रहे हो, लेकिन आप हफ्ते मेँ 3-4 बार उसके साथ डिनर करते हैं अक्सर देर तक काम करते रहते हैं। वह कई बार बातचीत मेँ इस बात का संकेत देती रही है कि आप दोनों एक साथ हो। और, मुझे आपके कॉल करने से पहले ही प्रियंका जी के चले जाने के बारे में पता था, क्योंकि ..... "

"क्योंकि काव्या ने सब को बता दिया था?" मैंने उसकी बात पूरी की।

"हाँ, और यह कि आप दोनों जल्द ही अपने रिश्ते को आधिकारिक बना दोगे।"

"ठीक है। काव्या अब तुम्हारी समस्या है क्योंकि तुम अब कार्यकारी अध्यक्ष और सीईओ बनने जा रहे हो। किसी कार्यकारी सहायक का अपने बॉस के बारे मेँ ऐसी खबरें फैलाना पॉलिसी के विरुद्ध है। मुझे यकीन है कि नए सीईओ के रूप मेँ तुम इस समस्या से निबट लोगे।"

प्रभाकर ने हंसते हुए कहा। "बॉस, मुझे काव्या से कोई परेशानी नहीं होगी। लेकिन मेरे पास पहले से ही एक एग्जीक्यूटिव असिस्टेन्ट है, और मैं उसके काम को बहुत पसंद करता हूं। हम काव्या के लिए कुछ और काम ढूंढ लेंगे। मुझे एचआर के साथ इस मामले को संभालने दो। इसकी चिंता मत करो। आप अपनी पत्नी को मनाने पर ध्यान केंद्रित रखो।"

"प्रभाकर, जब तुमने मुझे और प्रियंका को साथ देखा तो हमारी शादी के बारे में क्या सोचा?"

"यही कि आप बहुत भाग्यशाली थे कि आपकी पत्नी आप से इतना प्यार करती थीं।"

"और प्रियंका के बारे में कैसा लगता था?"

"अरे यार, अंशुमन," वह झेंप गया।

"मुझे बताओ।"

"बहुत बुरा लगता था, आप पर बहुत गुस्सा आता था। यह बहुत दुखद था क्योंकि वह हमेशा अकेली दिखती थीं, खासकर काम की पार्टियों में, जहाँ मैं उन्हें ज़्यादातर देखता था। वह लोगों से बात करती थीं और आपको घुलते-मिलते देखती थी। यह स्पष्ट था कि वह सिर्फ़ आपके साथ रहना चाहती थीं। मैंने कभी भी हनी ट्रैप की अफ़वाहों पर विश्वास नहीं किया। और वह बहुत खूबसूरत हैं।" हनी ट्रैप की अफ़वाहें? हाँ, तो पूरा शहर जानता था कि हमने कम उम्र में ही शादी कर ली थी। जब गरीब घर से आई प्रियंका सिंह अमीर परिवार की श्रीमती अंशुमन राव-सिन्हा बनीं तो यह एक घोटाला होना ही था। मुझे अभी भी याद है कि जब मैं उसे अपने माता-पिता के घर ले गया और वहाँ छोड़ दिया तो वह कितनी खोई हुई दिख रही थी - अठारह साल की, डरी सहमी हुई।

मेरी मां ने प्रियंका से कहा था, "तुम सोने की खान में गिर गई हो, लड़की, लेकिन ध्यान रखना, प्रियंका सिंह, अगर तुमने राव-सिन्हा परिवार के नाम के साथ खिलवाड़ किया, तो मैं तुम्हें वापस झोंपड़ पट्टी में भेज दूंगी।" प्रियंका ने मेरी तरफ असहाय भाव से देखा, उम्मीद थी कि मैं कुछ कहूंगा, उसके बचाव में कुछ करूंगा, लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। क्योंकि गलती करने के बाद प्रियंका को वापस मनाने के लिए मेरे पास अपने तरीके थे, लेकिन मेरी मां के साथ मेरे पास कोई तरीके नहीं थे। इसलिए मैंने कुछ ऐसा कहा जो मुझे खुद भी स्पष्ट नहीं था, जैसे, "माँ, उसे यहाँ थोड़ा सेटल होने दो" या कुछ ऐसा ही बकवास। मुझे उसके हमारे समाज के हिसाब से गलत पत्नी होने का बहुत डर था। प्रियंका ने मुझे दो प्यारे बच्चे दिए। शाश्वत और नीलिमा ने मुझे एक बेहतर इंसान बनाया और मेरे जीवन को उन तरीकों से समृद्ध किया, जिनकी मैं एक इक्कीस वर्षीय डरे हुए युवा के रूप में कभी कल्पना भी नहीं कर पाया था। लेकिन प्रियंका तो उससे भी छोटी थी, और नए घर के माहौल मेँ थी। मेरे पास तो कई लोगों का सहारा था, मेरे माता-पिता, दोस्त, भाई। उसके पास तो कोई नहीं था। सिर्फ़ उसकी दोस्त श्रेया, जिसके बारे में मेरी माँ ने कहा था कि वह उसे सार्वजनिक रूप से नहीं मिल सकती या अपनी शादी में भी नहीं बुला सकती।

मां ने प्रियंका से कहा कि श्रेया हमारे समाज के सामने आने के लायक नहीं है। और अगर वह शादी में आती तो उसके और प्रियंका की पृष्ठभूमि के बारे में बहुत सारे सवाल पूछे जाते। प्रियंका ने मुझसे मेरी माँ को मनाने के लिए बहुत अनुनय की थी। वह दुनिया में अपने परिवार के एकमात्र सदस्य श्रेया के बिना शादी नहीं करना चाहती थी। मैंने कुछ नहीं किया, उसे खुद ही माँ से बात करने के लिए कहा। आखिरकार श्रेया शादी में नहीं आई। श्रेया कभी-कभार ही मिलने आती थी, और भले ही मैं उससे मिल चुका था, लेकिन मैं उसे नहीं जानता था। वह बैंगलोर आने पर होटल में रुकती, हमारे घर पर नहीं। आमतौर पर, प्रियंका पहले पुणे और फिर लक्षद्वीप में अकेले ही उससे मिलने जाती थी। प्रियंका के पास दुनिया में एक ही व्यक्ति था जो उसका अपना था, और मेरा परिवार और मैं चाहते थे कि वह उस बंधन को तोड़ दे। यह प्रियंका की दृढ़ता को दर्शाता है कि उसने हममें से किसी की मदद के बिना भी अपनी दोस्ती को जीवित रखा। "अंशुमन, मुझे लगता है कि आप अपनी शादी बचा लेंगे" प्रभाकर ने भरोसा दिलाया। "बस अपनी पत्नी के पास जाकर यह दिखाना होगा, कि आप उनसे प्यार करते हैं। और याद दिलाना होगा कि वह भी आपसे प्यार करती हैं।"

हाँ, मुझे पता था कि वह मुझसे प्यार करती है, हमेशा से पता था। इसी कारण मैंने ऐसा व्यवहार किया, है न? इसीलिए मैंने उसे हल्के में लिया, यह सोचकर कि यह मुझे छोड़ कर कहाँ जाएगी? शुरुआती सालों में जब हम झगड़ते थे, तो क्या मैंने उसके स्वाभिमान के मुंह पर एक थप्पड़ की तरह बार-बार वह मूर्खता पूर्ण विवाह-पूर्व समझौता नहीं फेंका था? "प्रियंका सिंह, अगर तुम्हें यह पसंद नहीं है तो चली जाओ। बस याद रखो, अगर तुम मुझे छोड़कर चली जाओगी तो तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा, हमारे बच्चे भी नहीं।" मैं जब भी उससे नाराज होता था तो उसे प्रियंका सिंह कहकर बुलाता था ताकि उसे याद दिला सकूँ कि वह किस गंदगी से आई है। मैंने सालों से ऐसा नहीं किया था। क्यों? मैं बिना ज़्यादा दिमाग लगाए समझ गया कि यह इसलिए था क्योंकि अब वह मुझसे बहस ही नहीं करती थी। अगर मैं कुछ कहता तो वह या तो धीरे से मेरा मन बदलने की कोशिश करती या फिर बस मान जाती। हम कभी झगड़ते नहीं थे, कभी नहीं। इस बात पर दोस्त मुझसे ईर्ष्या करते थे।

"मेरी पत्नी बहुत गुस्से में है। मैं उसके लगातार परेशान करने से थक गया हूँ," विनय शॉ ने कहा था, जब हम में से कुछ लोग ड्रिंक के लिए मिले और उसने टेबल पर रुपये फेंके। "मुझे जाना होगा, नहीं तो वह मेरी जान ले लेगी।"

मैंने अपनी घड़ी देखी, "इतनी जल्दी?"

उस ने कहा, "हम सभी का विवाह संत प्रियंका से नहीं हुआ है अंशुमन।"

मैंने असमंजस में दूसरों की ओर देखा, "यह क्या है?"

गंगाधर मूर्ति ने हंसते हुए कहा, "तुम्हारी पत्नी बहुत अच्छी है। मेरा मतलब है, क्या तुम लोग कभी लड़ते भी हो?"

"अच्छी या डोर मैट?" तेजस नरसिम्हा, जो थोड़ा नशे में था, ने तीखे स्वर मेँ कहा।

मैंने विरोध करते हुए कहा, "प्रियंका डोर मैट नहीं है," हालांकि ऐसा कहने वाला वह पहला व्यक्ति नहीं था। दिव्या, देविका और रक्षित ने अक्सर ऐसा कहा था। 

"डोर मैट गलत शब्द है, सॉरी" तेजस ने धीरे से कहा। "लेकिन यार, मैं चाहता हूँ कि मेरी पत्नी हर दिन, हर पल मुझे परेशान न करे। जैसे प्रियंका जी तुम्हारा ख्याल करती हैं वह भी करे। इतना ही।"

"ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रियंका हमारे समुदाय से नहीं आती है," मैंने समझाया।

"ठीक है। या शायद यह तुम्हारी प्री-नेपुटल समझौते की वजह से है," तेजस बुदबुदाया। मुझे यह बात पसंद नहीं थी कि हर कोई इस बारे में जानता था, लेकिन दिव्या और देविका ने यह बात खूब फैलाई थी। वह हर किसी के सामने प्रियंका को अपमानित करने के लिए इसका प्रचार करती थी। मुझे इस बारे में बात करना पसंद नहीं था। "या शायद इसलिए कि मैं अपनी पत्नी को खुश रखता हूँ," मैंने झल्लाकर कहा। गंगाधर ने नाक भौंह सिकोड़ी। "क्या कहना चाहते हो?" मैंने खीज कर पूछा था।

"अंशुमन, तुम और अपनी पत्नी को खुश रखना? तुम तो खुश हो, लेकिन प्रियंका जी के बारे में नहीं पता। उन की खुशी का ध्यान रखो। तुम नहीं जानते तुम कितने खुशकिस्मत हो।"

"क्या बकवास है। मैं अपनी पत्नी और अपनी शादी को जानता हूं," मैंने गुस्से से कहा और विषय बदल दिया। हे भगवान! जब भी मैं पुरानी यादें ताज़ा करता, मुझे और भी बुरा लगता, क्योंकि मैं प्रियंका और उसकी भावनाओं के प्रति अपनी बेरुखी और अंध उपेक्षा का सामना करता। क्या मैंने उसे कभी भी खुश रखने का प्रयास किया था? जो सब देख पाते थे वह मुझे क्यों नहीं दिखता था?

मुझे कुछ साल पहले की एक रात याद आई, जब बच्चों के पढ़ने चले जाने के बाद एक बार हमने प्यार किया था। मैं अभी भी जोर से सांसें ले रहा था, सुख का स्वाद अभी भी मेरे मुंह में था। उसने सुस्ती से अंगड़ाई लेकर पूछा था, "अंशुमन, क्या मैं तुम्हें खुश करती हूँ?"

"तुम्हारे साथ यह करना मुझे बहुत खुश करता है, बेब।"

"और इसके अलावा, मेरे बाकी हिस्से के बारे में क्या?" उसने पूछा।

क्यों मुझे अक्ल नहीं आई कि जब उसने यह सवाल पूछा था तो वह मन से क्या महसूस कर रही होगी? मैंने क्यों नहीं देखा कि वह कह रही है कि मैं उसे एक इंसान की तरह, एक साथी की तरह देखूँ? इसके बजाय, मैंने उसके शरीर के हर हिस्से को छुआ और कहा कि क्यों और कैसे उसकी कमर, त्वचा, उसके बदन का हर हिस्सा मुझे गर्म और कामुक बना देता है।

वह शर्म से मुस्कराई। "मेरा मतलब था, मेरे शरीर के अलावा।"

"तुम्हारी मुस्कान मुझे खुश करती है। तुम्हारा खाना बनाना मुझे खुश करता है। जिस तरह से तुम्हारा शरीर मेरे शरीर के साथ काँपता है, उससे मुझे खुशी मिलती है।" मैंने उसे चूमा और हमेशा की तरह, मैं उससे तृप्त नहीं हो पाया। जल्द ही, हम फिर प्यार करने लगे। ऐसा कितनी बार हुआ था? उसने मुझसे खुद से मिलने के लिए कहा था, और मैंने सिर्फ उसका शरीर देखा था, बस यह कि उसने मेरे लिए क्या किया था। लेकिन जिस बात ने मुझे सबसे ज़्यादा परेशान किया, वह था वह सवाल जो मैंने कभी उससे पूछने के बारे में नहीं सोचा था: प्रियंका, क्या मैं तुम्हें खुश करता हूँ? अब समय आ गया था कि मैं न केवल पूछूं, बल्कि यह भी गारंटी दूं कि उसका जवाब ‘हाँ’ हो। मैंने अपना फोन उठाया और उस व्यक्ति को कॉल किया जिसे मैं जानता था कि वही मेरी मदद कर सकता है। मुझे बस उम्मीद थी कि वह मुझे उसके दोस्त के साथ किए गए व्यवहार के लिए माफ कर देगी - ताकि मैं अपनी पत्नी को वापस पा सकूं। 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग तेरह (13)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग तेरह (13)


 

भाग 13

प्रियंका




मैंने डॉ. मिश्रा के साथ अपनी सेशन की बातचीत पूरी की और सीधे रसोई में आ गई। मौसम अच्छा था, सनशाइन होम्स रिज़ॉर्ट में अच्छी ऑक्यूपेंसी थी। यह अच्छी बात थी क्योंकि हमें आय की आवश्यकता थी। पिछले कुछ महीने थोड़े निराशाजनक रहे थे, क्योंकि श्रेया काम नहीं कर पा रही थी, और उसे कैलेंडर के कुछ हिस्सों को ब्लॉक करना पड़ा था।

"इतनी अच्छी खुशबू किस चीज की है?" रंजीत ने रसोई में आते हुए अपने हाथ रगड़े।

"मैंने अभी-अभी बेसन के लड्डू बनाए हैं। थोड़ा ठंडा होने दो, फिर खा सकते हैं," मैंने कहा।

वह नाश्ते की टेबल पर बैठा था। रंजीत बीस साल का था, मेरे बच्चों की उम्र के आसपास, और मैं उसके साथ उन जैसा ही व्यवहार करती थी। वह कॉलेज में मैकेनिक बनने की पढ़ाई कर रहा था, और साथ ही छोटे-मोटे काम करके पैसे कमा रहा था। उसका काम सम्हाल लेना हमारे रिज़ॉर्ट के लिए एक वरदान था। मैंने उसके सामने नाश्ते के साथ गरमागरम लड्डू रख दिये, और उसने खुशी-खुशी खाना शुरू कर दिया। "प्रियंका आंटी, आप एक बेहतरीन कुक हैं। श्रेया आंटी को यह मत बताना, लेकिन आपके पकाने और उनके पकाने मेँ दिन और रात का अंतर है। आपके बच्चे आपके खाना पकाने को जरूर मिस करते होंगे। मुझे ज़रूर याद आएगा जब मैं कॉलेज जाने पर यहाँ उतना नहीं आ पाऊँगा।"

"सेमेस्टर के लिए तैयार?" एक कप चाय के साथ उसके सामने बैठते हुए मैंने पूछा।

उसने सिर हिलाया, "हाँ।"

"तुम्हारे घर की स्थिति क्या है, रंजीत?" ..... "कुछ नहीं," उसने टालते हुए कहा।

लीला ने बताया था कि उसे रंजीत को अपने साथ रहने के लिए बुलाना पड़ सकता है क्योंकि उसके मकान मालिक ने अपना किराया बढ़ा दिया है और वह इसे वहन नहीं कर सकता। लीला का कमरा छोटा था और उसके साथ पहले से ही एक बेटी थी। रंजीत को फर्श पर सोना पड़ता; लेकिन ऐसे रहना उसके लिए ठीक नहीं था, क्योंकि उसे पढ़ाई भी करनी थी।

"क्या तुम्हें अपने कमरे से बाहर निकाला जा रहा है?"

"मैं ठीक रहूँगा मिस प्रियंका।"

"तुम्हें कितने पैसे की जरूरत है बेटे?" मैंने पूछा।

"प्रियंका आंटी, मैं आपके पैसे नहीं लूंगा।" रंजीत चुपचाप खाना खाता रहा। मैं अपने बेडरूम में गई और सौ रुपये के दस नोट ले आई। मैंने उन्हें उसकी प्लेट के पास रख दिया।

"आंटी?" वह चौंककर बोला। उसे मुझसे ज़्यादा पैसों की ज़रूरत थी। मेरे पास अभी कोई खर्च नहीं था। मेरा खाना और रहने का खर्च रिज़ॉर्ट अकाउंट से आता था।

"इसे ले लो।"

"नहीं-नहीं, मैं आपकी उदारता के लिए आभारी हूँ, लेकिन .... "

"तुम श्रेया के अपने बेटे की तरह हो, इसलिए तुम इसे चुपचाप ले लोगे। अगर श्रेया को पता चल गया, तो वह परेशान हो जाएगी। वह मर रही है, और क्या तुम चाहते हो कि वह अब तुम्हारे लिए भी चिंता करे?" जाहिर तौर पर मुझे पता था कि जब बात मनवानी हो तो भावनात्मक ब्लैकमेल कैसे करना है, मैंने अपने मन मेँ अपनी तारीफ की, खुद को प्रभावित करने के लिए। मुझे अपने बच्चों के साथ ऐसा करना चाहिए था, और शायद वे मेरे साथ बेहतर व्यवहार करते। लेकिन फिर यह भी है कि मैं अपने लाभ के लिए कभी किसी को हेरफेर नहीं करूंगी। मैं एकदम बेवकूफ हूँ! पैसे लेते समय रंजीत की आंखों में आंसू थे। "मैं आपको पैसे लौटा दूंगा, आंटी"

"पहले सब ठीक कर लो, फिर बाद मेँ कभी लौटा सकते हो। श्रेया को कील ठोकना और दीवार पर पट्टी बांधना वगैरह आता था; मुझे इनमें से कुछ भी नहीं आता। इसलिए, मुझे एक सहायक की ज़रूरत है, और वह तुम बनोगे।"

“आपके लिए मैं कुछ भी करूंगा ।"

"अच्छा। तो अब तुम सनशाइन होम्स रिज़ॉर्ट के आधिकारिक सहायक हो गए हो, और यह रिटेनर था, वापस देने के लिए कुछ भी नहीं है।" उसने अपना चम्मच नीचे रखा और मेरे पास आया। उसने झुककर मेरे पैर छूए। "आप एक परी हैं आंटी।”

मैंने उसका हाथ पकड़ा और उसके सिर पर थपथपाया। काश मेरे बच्चे भी ऐसा सोचते।

"सब ठीक हो जाएगा, रंजीत। आमतौर पर चीजें हो जाती हैं।"

वह मेरी ओर देखकर मुस्कराया, "अब मुझे जलाने की लकड़ी अंदर ले आना चाहिए।"

मैंने उसे जाते हुए देखा और एक बार फिर से यह निश्चितता महसूस की कि यह मेरा नया घर है। यहाँ, ऐसे लोग थे जिन्होंने मुझे देखा था और मेरी सराहना की थी। जिन्होंने मेरे खाने की तारीफ़ की, जिन्होंने मुझे हल्के में नहीं लिया। अदृश्य न होना अच्छा लग रहा था। यहाँ मेरे पास मेहमान थे जो मुझसे बात करते थे। मेरे पास श्रेया थी, और भले ही वह मर रही थी, उसने मेरा हाथ थामा और अपने साथ मुझे हंसाया था। लीला थी, जिसकी छोटी लड़की मीनू से मैं बहुत प्यार करने लगी थी, और रंजीत, जो बहुत अच्छा लड़का था, जिसका यहाँ अपनी चचेरी बहन लीला के अलावा कोई नहीं था।

बैंगलोर में, अभी मैं घर पर अकेली होती, अंशुमन का इंतज़ार कर रही होती। यहाँ, मैं आठ लोगों के लिए खाने की मेज़ सजाने में व्यस्त थी। यहाँ लोग मेरे खाने का आनंद लेते थे, जो ठंडा नहीं हो जाता था क्योंकि कोई खाना भूल गया था या देर से आया था। मैं उनकी बातचीत सुनती थी और यह सुनिश्चित करती थी कि उनके वाइन ग्लास भरे हुए हों और उनके पास वह सब कुछ हो जिसकी उन्हें ज़रूरत है। वे मुझे अपनी चर्चाओं में शामिल करते थे और मुझे यह महसूस नहीं करवाते थे कि मैं उनसे कम हूँ।

रात के खाने के बाद, मैं श्रेया के पास गई और सुनिश्चित किया कि वह कुछ खा ले। हम उसके बिस्तर पर बैठे रहे और तब तक खराब टीवी देखते रहे जब तक वह सो नहीं गई। जब वह चली जाएगी तो मेरी दुनिया की रोशनी फीकी पड़ जाएगी। वैसे तो बैंगलोर छोड़ने के बाद से ही जीवन की रोशनी फीकी पड़ ही गई थी। मुझे बस एक नया जीवन बनाना था जो उज्ज्वल हो, और मैं बनाऊँगी। अंशुमन के साथ मेरी बातचीत के बाद मेरा निर्णय और सुदृढ़ हुआ कि मेरा घर छोड़ने का फैसला सही है। वह मुझे इसलिए वापस चाहता था कि ‘लोग क्या कहेंगे’, इसलिए नहीं कि वह मुझे चाहता था, या कि मुझसे प्यार करता था।

उसने मुझे यह बताने की भी ज़रूरत महसूस नहीं की कि वह काव्या के साथ मुझे धोखा नहीं दे रहा है; वह बस उम्मीद करता था कि मैं इस पर यकीन करूँ। क्यों? वह कोई आदर्श पति तो था नहीं, और हर कोई सोचता था कि वह काव्या के साथ सो रहा है। और, फिर भी उसने मुझे विश्वास दिलाने की कोई कोशिश नहीं थी. न माफी मांगी थी। बल्कि गुस्सा ही किया, जैसे सब कुछ पहले की ही तरह हो। नहीं, मैंने उसे छोड़ कर बिल्कुल ठीक किया। पहले मुझे लग रहा था कि बिना बातचीत किए चले जाना कहीं मेरा स्वार्थ तो नहीं है? सच तो यह था कि मुझे लगा कि मैं उससे बात कर ही नहीं सकती थी, क्योंकि मुझे डर था कि यह कितना अप्रिय होगा। और यह सच साबित हुआ। मैं इस अप्रियता से तंग आ चुकी थी!

मैं बस शांति से रहना चाहती थी और अवसाद मेँ नहीं रहना चाहती थी। जीवन के पतझड़ के कुछ काले दिन थे जब मैं डॉ. मिश्रा को लगभग नियमित रूप से ईमेल लिख रही थी। डॉ. मिश्रा ने मुझसे कहा था कि मुझे अभी सिर्फ़ खुद को देखना चाहिए। इसलिए, अगर मुझे घर से बाहर निकलना सबसे सुरक्षित लगता है, तो मुझे ऐसा करना चाहिए। अगर मैं ‘अपने लिए’ चाहती हूँ तो मुझे अंशुमन से बात करनी चाहिए, न कि इसलिए कि वह चाहता है। उन्होंने मुझसे कहा कि कभी-कभी स्वार्थी होना बुरी बात नहीं होती - वास्तव में आत्मरक्षा के लिए यह अच्छा है कि हम खुद को पूरी तरह दूसरों को न दें जिस तरह मैंने किया था।