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सोमवार, 19 जनवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग दस (10)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग दस  (10)


भाग 10

अंशुमन




"वह कैसी है? क्या वह ठीक है?" मैंने पूछा जब शाश्वत ने मुझे फोन करके बताया कि उसने अपनी माँ से बात की है।

"मुझे नहीं पता। मैंने बहुत गलती कर दी, पापा।" .... "क्या हुआ?" मैंने घबरा कर पूछा।

"मैंने माँ से अपनी आदत की तरह चिढ़ते हुए पूछना शुरू किया कि वह क्या बकवास कर रही है। माँ ने मुझसे कहा कि अगर मैं अनादर करूंगा तो वह मुझसे बात नहीं करेगी।"

"शाश्वत?"

"मैं बेवकूफ़ जैसा महसूस कर रहा हूँ। वह इतनी दुखी और प्यार भरी लग रही थी कि ‘मैं हमेशा तुमसे प्यार करूँगी’ और इससे मैं भभक गया।"

मैं अपने दफ़्तर में अपनी कुर्सी पर पीछे झुक गया और अपनी आँखें बंद कर लीं। "यह तुम्हें परेशान क्यों करता है कि तुम्हारी माँ तुमसे प्यार करे?"

"बात बस इतनी है कि वह हमेशा इतनी ज्यादा उदार रहती है कि वह इसे संतुलित करना कठिन बना देती है, आप समझ रहे हैं न?"

मैंने एक पल के लिए इसके बारे में सोचा और अचानक अपनी आँखें खोलीं। "नहीं बेटा, मैं नहीं समझ रहा। तुम्हारी माँ का तुम्हें प्यार करना? आखिर तुम इतना नाराज़ क्यों हो?"

"मैं... बस... मैं नहीं जानता।"

"क्या तुम उसके साथ ऐसे इसलिए हो गए कि मुझे उसके साथ बुरा व्यवहार करते देखा है?" मुझे यह प्रश्न पूछना अच्छा नहीं लगा, लेकिन मैं जानता था कि यह पूछना ही होगा।

"आप माँ के साथ बुरा व्यवहार नहीं करते, पापा। आप उन के साथ बहुत धैर्यवान हैं; आप उन के साथ बहुत अच्छे हैं।"

"वास्तव में? मैं ‘धैर्यवान’ हूँ? तुम्हें क्या लगता है कि उसने क्या गलतियाँ की हैं जो मुझे ‘धैर्यवान’ होना पड़ा हो? .... वैसे शाश्वत, सभी लोगों में से, केवल तुम ही ऐसा कह रहे हो। बाकी सभी लोग मुझे बधाई दे रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि मैं जान-बूझ कर तुम्हारी माँ के साथ घर के कोने मेँ पड़ी हुई किसी गंदगी जैसा व्यवहार करता रहा हूँ, क्योंकि मैं चाहता था कि इसके कारण वह मुझे छोड़ कर चली जाए।"

"मुझे तो ऐसा नहीं लगता।"

"और सब को लगता है कि मैं काव्या के साथ खिलवाड़ कर रहा हूँ।" मैंने यह बात इसलिए कही क्योंकि मैं निराश था।

.... फोन पर लम्बा विराम था।

"शाश्वत?"

"नीलिमा और मैं भी ऐसा सोच रहे थे। यह हमसे संबंधित बात नहीं है, पापा, और-"

"क्या मतलब है तुम्हारा? कैसे बच्चे हो तुम? तुम्हें यह स्वीकार्य लगा कि तुम्हारी माँ के साथ मैं धोखा करूँ? तुम्हारे मन मेँ अपनी माँ के लिए बस इतनी ही फिक्र है कि तुम्हारे पिता का बाहर अफेयर हो और यह ‘तुमसे संबंधित बात नहीं’ हो? इस बात पर तो बच्चे अपनी माँ के समर्थन में अपने पिता को छोड़ देते हैं!!" मैंने चिल्लाकर कहा।

"मुझे नहीं मालूम। ठीक है? मुझे नहीं मालूम, पापा।" वह भी व्याकुल लग रहा था।

"नहीं बेटे, मैंने प्रियंका को कभी धोखा नहीं दिया। मैं ऐसा नहीं चाहता था। मैं अब भी नहीं चाहता। मैंने हमेशा उससे प्यार किया। मुझे लगता है कि मैं एक अलग दुनिया में हूँ जहाँ मुझे लगता है कि मेरी शादी अच्छी है, वैसी नहीं जैसी मेरे आस-पास के लोग सोचते हैं। और, सबसे बुरी बात यह है, कि मुझे नहीं पता कि प्रियंका क्या सोचती है।"

"पता तो है ही, पापा," शाश्वत ने थके हुए स्वर में कहा। "माँ चली गई न?"

यह बात मेरे मन एक वज्रपात की तरह लगी। "हाँ, वह चली गई"

"मैं माँ का नंबर भेज दूँगा।"

"थैंक्स"

"पापा, मुझे नहीं पता कि मैं उनसे माफी कैसे मांगूं।"

"तुम और मैं दोनों ही नहीं जानते, बेटा।"

"पापा?" शाश्वत की आवाज़ एक छोटे लड़के जैसी थी। "हाँ?"

"क्या मैं बहुत ही बुरा बेटा हूँ?"

लानत है! "मेरे लिए नहीं, लेकिन, हाँ, तुम अपनी माँ के साथ बुरा व्यवहार करते रहे हो, और मैं भी यह नोटिस करने में विफल रहा। लेकिन बाकी सभी ने देखा, जिसमें ‘हमेशा नशे में रहने वाला यशस्वी’ भी शामिल था।" इस पर शाश्वत हंस पड़ा, जैसी मुझे उम्मीद थी।

"मुझे लगता है कि मुझे किसी मनोचिकित्सक से बात करनी चाहिए। मुझे ऐसा लगता है। मेरा एक दोस्त किसी समस्या से गुज़रा था, और वह एक मनोचिकित्सक के पास गया था। उसने कहा कि इससे मदद मिली। जानते हैं पापा, जब मैंने माँ से बात की तो वह नाराज़ नहीं थी। वह थकी हुई थी, लेकिन नाराज नहीं। लेकिन मेरे बकवास करने के बाद उन्होंने कहा कि अब वह मेरा अनादर बर्दाश्त नहीं करेगी। इसके बाद ही मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मैं माँ के साथ हमेशा ऐसा करता रहता हूँ। वे कभी कुछ नहीं कहती थीं तो मुझे बलवान महसूस होता था। इस बार वे चुप नहीं रहीं तो मुझे पहली बार समझ आया कि प्यार करने वाले से ऐसा सुनना कैसा लगता है। माँ ने कहा कि वह मुझसे प्यार तो करती है लेकिन अब वे मेरा अनादर बर्दाश्त नहीं करेगी। मुझे अपने आप पर बहुत शर्म आ रही है।"

मैंने उसकी आवाज़ में आँसू सुने। मेरे बेटे ने मेरी नकल भर की थी।

"शाश्वत, इसकी शुरुआत मुझसे हुई। मैंने तुम्हारी माँ की अनदेखी की और अनजाने मेँ तुम्हें ऐसा करना सिखाया। गलती मेरी है। तुम किसी मनोवैज्ञानिक से बात करो, और मैं...मैं माँ से बात करूँगा। मैं सब ठीक कर दूँगा।" मुझे नहीं पता था कि यह कैसे करना है, लेकिन मैं पिता था, है न? चाहे चीजें कितनी भी खराब क्यों न हों, उन्हें ठीक करना मेरा काम था।

"सच?" उसकी आवाज मेँ आशा थी।

"मेरे पास कोई विकल्प नहीं है, बेटा। मैं तुम्हारी माँ के बिना नहीं रह सकता। पिछले दो सप्ताह नरक जैसे रहे हैं। मैं अपनी प्रियंका के बिना साँस नहीं ले सकता।" यह एक कड़वी सच्चाई थी। मैं उसके बिना मर जाऊँगा। शाश्वत से बात खत्म करने के बाद, मैं अपने ऑफिस की खिड़की के पास गया और बैंगलोर शहर का नजारा देखा, मेरा पेट खोखला सा हो रहा था। मैं किस तरह का आदमी था?

"तुम सबसे अच्छे आदमी हो जिन्हें मैं जानती हूँ, मेरे प्यारे अंशुमन ।"

"तुम मुझे हमेशा ऐसा क्यों कहती हो? मेरे प्यारे अंशुमन?" मैंने उसके होंठों को चूमा

"क्योंकि तुम हो, मेरे प्रिय ... मैं... तुम्हें यह पसंद नहीं है क्या?"

"ऐसा नहीं है। बात बस इतनी है...तुम मुझे सालों से इसी नाम से बुलाती आ रही हो।"

"शुरुआत से ही।"

"क्या तुम मुझसे प्यार करती हो?" मैंने उसे घुमाया। वह मुझे चूमकर मुस्कराई।

"मैं तुमसे प्यार करती हूँ, मेरे प्यारे अंशुमन।"

मेरा दिल इतना भर गया कि मुझे लगा कि यह उसके लिए प्यार से फट जाएगा।

अब, मुझे एहसास हुआ कि मैंने उसे यह बात नहीं कही। मैंने उसे यह नहीं कहा कि मैं भी उससे प्यार करता हूँ। आखिरी बार कब मैंने उससे कहा था कि मैं उससे प्यार करता हूँ? मुझे याद तक नहीं आ रहा। क्या मैंने ऐसा कहना बंद कर दिया था? पहले तो मैं कहता था। मैं हमेशा अपने बच्चों से कहता था, लेकिन मुझे नहीं लगता कि पिछले कई सालों मेँ मैंने प्रियंका से कहा था। ऐसा क्यों? मैं अभी भी उससे प्यार करता था। यह बात इस बात से स्पष्ट हो गई कि मैं अभी मुश्किल से ही कुछ कर पा रहा था। मुझे उसकी ज़रूरत थी। मैं यह जानता था। मैंने उससे पूछा, बल्कि आदेश दिया, कि वह कहे कि वह मुझसे प्यार करती है। और मैंने उसे यह शब्द नहीं दिए। न ही अपने व्यवहार से उसे यह दिखाया कि मुझे उसकी फिक्र है – फिर वह यह कैसे नहीं सोचती कि मैं उसे नहीं चाहता?

मेरे अंदर गुस्सा उमड़ आया। मैंने अपनी मुट्ठी दीवार पर दे मारी, जिससे विभाजन की दीवार पर एक हल्का गड्ढा बन गया और मेरी अंगुलियों पर चोट लग गई। काव्या ने मेरे दरवाज़े पर दस्तक दी और मेरे जवाब का इंतज़ार किए बिना ही दरवाज़ा खोल दिया। मैंने पलटकर उसकी तरफ़ देखा और पाया कि उसकी नज़र सीधे दीवार की दरार पर गई थी। "हाँ?" आज मेरे पास उसके लिए वाकई समय नहीं था, न ही धैर्य। यह तथ्य कि उसे लगा कि मैं उसमें दिलचस्पी रखता हूँ, मुझे गुस्सा दिला रहा था। वह मेरा दाहिना हाथ थी। एक करीबी सहकर्मी। मैं अब से केवल पुरुष असिस्टेन्ट को ही काम पर रखने वाला था ताकि लोग चुप हो जाएँ। या शायद अगली अफवाह यह हो कि मैं समलैंगिक हूँ!

"ईशानी अस्थाना आपसे मिलने आई हैं। "

मेरा दिल धड़कना बंद हो गया, फिर वह फिर से धड़कने लगा। मैंने ईशानी से संपर्क करने का सोचा था, ताकि पता चल सके कि श्रेया का रिसॉर्ट कहां है, लेकिन उसके यहाँ होने से मुझे उम्मीद हुई कि आखिरकार ब्रह्मांड मुझे एक सकारात्मक संकेत भेज रहा है।

"अंदर भेजो। धन्यवाद।" उसने सिर हिलाया और बाहर निकल गई।

मुझे उम्मीद थी कि काव्या नौकरी छोड़ देगी क्योंकि अगर मैंने उसे नौकरी से निकाल दिया तो मेरे लिए एचआर समस्या खड़ी हो जाएगी क्योंकि आधी दुनिया को लगता था कि मैं उसके साथ संबंध बना रहा हूँ। मेरे पास उसे नौकरी से निकालने का कोई कारण भी नहीं था क्योंकि उसने अपना काम अच्छे से किया था। लेकिन मैं उसके साथ कैसे पेश आऊँ, इस बारे में भी ज़्यादा सावधान रहूँगा।

ईशानी अंदर आई और मेरी फटी हुई उँगलियों और दीवार को देखकर बोली - "क्या आप मरम्मत करवा रहे हैं?"

मैं उसके पास आया और उसे गले लगा लिया। "मैं आपको फ़ोन करने वाला था।"

वह भौंचक्की हुई और बोली, "सच मेँ?"

मैंने उसे कुर्सी पर बैठने को कहा और अपनी मेज के पीछे बैठ गया।

"हाँ... यह शर्मनाक है, लेकिन.... क्या आपको पता है कि प्रियंका की दोस्त श्रेया कहाँ रहती है?" मैंने उससे पूछा, मुझे पूरी तरह से असफल महसूस हो रहा था।

"आपको नहीं पता कि आपकी पत्नी की सबसे अच्छी दोस्त कहाँ रहती है?" उसका स्वर तीखा था। मैंने आह भरी। "मुझे पता है कि यह एक द्वीप है, और उसके पास एक रिसॉर्ट भी है, लेकिन बस इतना ही।"

ईशानी ने सिर हिलाया और अपना बैग टेबल पर रख दिया। उसने कुछ दस्तावेज निकाले। "साफ समझ में आता है कि वह तलाक क्यों चाहती है।" मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे दिल में चाकू घोंप दिया हो क्योंकि मैं साँस नहीं ले पा रहा था। मुझे अब जाकर एहसास हुआ कि ईशानी यहाँ क्यों थी। वह एक पारिवारिक वकील थी। मुझे पता होना चाहिए था।

"नहीं," मैंने विलाप किया। "नहीं। नहीं। नहीं। बिलकुल नहीं। यह नहीं हो सकता" मैं अपने आँसुओं को रोक नहीं सका। यह कहना कि ईशानी चौंक गई थी, कमतर विवरण होगा। अगर मैं अपने दफ़्तर में चिम्पांजी के साथ नाच रहा होता तो उसे कम झटका लगता।

"अंशुमन?"

मैंने आँसू पोंछे और सिर हिलाया। "नहीं। कृपया। नहीं। वह ऐसा नहीं कर सकती।"

ईशानी ने अपने होंठ चाटे और आह भरी। "क्या बकवास है, अंशुमन? अगर आप नहीं चाहते थे कि वह आपको तलाक दे, तो आप उसके साथ ऐसा बर्ताव क्यों कर रहे थे कि ..... "

"कृपया मेरी असिस्टेंट के साथ सेक्स के बारे में मत कहिए क्योंकि मैंने ऐसा नहीं सोचा। मैं कभी नहीं करूंगा। मैं अपनी पत्नी से प्यार करता हूं। मुझे कोई दूसरी नहीं चाहिए। मैं क्यों करूंगा? क्या आपने प्रियंका को देखा है? कोई भी पुरुष दूसरी महिला के साथ सेक्स क्यों करना चाहेगा, जब वह उसके घर पर हो?" मैं चीख रहा था। कैसी बकवास थी मेरी ज़िंदगी? मैं सोचता रहा कि सब ठीक है और मैं खुश हूँ, ज़िंदगी इस हालत पर कब पहुँच गई?

ईशानी ने अपना सिर हिलाया। "मुझे नहीं पता आप क्या कर रहे हैं अंशुमन, लेकिन भगवान की कसम, अगर आप मेरे साथ बकवास कर रहे हैं तो ..... "

"ईशानी, मैं प्रियंका से प्यार करता हूँ। मैं उससे बहुत प्यार करता हूँ। मुझे नहीं पता कि मेरी ज़िंदगी में क्या हो गया?" मैंने अपना सिर नीचे कर लिया।

"अंशुमन, ..... हे भगवान! यदि यह सच है तो .. लेकिन....। अंशुमन मैं बहुत नाराज हूँ।"

मैंने अपना सिर उठाया और ईशानी को उदास भाव से देखा। "नाराज हो? कल्पना करो कि मैं अपने आप पर कैसा क्रोध महसूस कर रहा हूँ।"

"आपके सारे दोस्त जैसी पत्नी चाहते हैं, वैसी आपको मिल गई। अरे, आपका भाई तक उसे छीन लेना चाहेगा। लेकिन आपकी बेवकूफ़ प्यार मेँ पागल बीवी की नज़र सिर्फ़ आप पर थी। वह आपको पूजती थी। और आप उसे अनदेखा करते थे जब तक कि ‘आप’ उससे कुछ नहीं चाहते थे।" ईशानी अपनी बाँहें क्रॉस करके बैठी गुस्से से चिल्ला रही थी।

"मुझे नहीं पता था, ईशानी।" ऐसा लगा जैसे वह मेरा सिर कलम करने वाली थी, तो मैंने अपने हाथ ऊपर उठा दिए। "मुझे पता तक नहीं था कि मैं ऐसा कर रहा हूँ। ठीक है? मुझे लगा कि हम ठीक हैं। मैं व्यस्त रहता था और, हाँ, मैं कुछ चीजें मिस कर गया और...."

मैं और क्या कह सकता था? मैंने गलती कर दी थी। इसमें कोई दो राय नहीं है।

"आप उसका जन्मदिन भूल गए, अंशुमन। लगातार तीन साल। अपनी एनिवर्सरी भी। और भी कितने प्रोग्राम कैन्सल कर दिये। ऐसा कौन करता है?" एक घटिया पति? "आप उसका जन्म-दिन भूल गए और फिर उसे डाँट कर परेशान किया क्योंकि वह फार्म हाउस मेँ मनाना चाहती थी और देविका को फार्म हाउस चाहिए था या कुछ और। क्या आपको देविका की जगह प्रियंका का पक्ष नहीं लेना चाहिए था? आप तो उसके पति थे! आपने अपने परिवार, अपने बच्चों और खुद अपने आप को हमेशा प्रियंका से आगे रखा है। कभी-कभी दूसरों को अपनी पत्नी से आगे रखना ठीक है; ऐसा होता है। लेकिन हर बार?"

ईशानी और प्रियंका दोस्त थे - असली दोस्त, अमीर समाज में हवाई चुंबन वाली बकवास नहीं। जब विवेक और ईशानी का तलाक हो गया, तो मैंने विवेक के साथ अपने रिश्ते को जारी रखा। मैंने प्रियंका से कहा कि अगर विवेक अपनी नई पत्नी के साथ हमारे घर पर पार्टियों में होगा तो वह ईशानी को आमंत्रित नहीं कर सकती।

"लेकिन, वह मेरी दोस्त है अंशुमन," प्रियंका ने विरोध किया था।

"विवेक और मैं साथ मिलकर काम करते हैं। तुम जानती हो कि यह कैसा है।"

"तो फिर चलो विवेक को इस बार न बुलाएं? शायद हम ईशानी को यहाँ बुला सकें—"

"मैं तुमसे सलाह नहीं कर रहा, प्रियंका, मैं बता रहा हूँ।"

"लेकिन अंशुमन, ईशानी तो—"

"मेरी समस्या नहीं है। ईशानी से अपने समय पर मिलो," मैंने बात खत्म की। "मुझे काम है। मैं आज रात तुमसे मिलूंगा।"

तो, यह कहते हुए, मैंने उसे रसोई में छोड़ दिया, मन मेँ गुस्सा करते हुए कि वह ऐसी बातों में मेरा समय बर्बाद कर रही है कि पार्टी में किसे आमंत्रित करें। ही भगवान, क्या इतना भी नहीं जानती कि हमारी कंपनी के लिए विवेक ज़रूरी था? उसके संपर्क और उसके प्रभाव ने हमें सौदे हासिल करने में मदद की। लेकिन, वह अपनी दोस्त का पक्ष लेना चाहती थी। व्यापार में कोई पक्ष नहीं होता। लानत है, मुझे किसी ऐसी लड़की से शादी करनी चाहिए जो इस सब को समझती हो – हमारे व्यावसायिक समाज से आई पत्नी ऐसा करती।

ऐसी परिस्थितियों में मैंने कितनी बार सोचा कि वह मेरे लिए गलत पत्नी है? कई बार ऐसा हुआ। मैं हर किसी से झूठ बोल सकता था, लेकिन खुद से नहीं। सच तो यह था कि मुझे प्रियंका से नाराजगी थी क्योंकि उसने मुझे अपने ‘प्यार के जाल में फंसाया’ था। अब यह वाक्य सोच कर मुझे इसमें अपनी माँ की बातों की बू आती थी, लेकिन जाने कब मैं बिल्कुल अपनी माँ जैसा ही हो गया था? पहले कुछ सालों में मुझे नाराजगी रही थी, कि उसके कारण मैं अपने परिवार के विरुद्ध गया, वनिता से शादी न कर के उससे की। बच्चे होने के बाद मैं उनसे प्यार करने लगा, तो यह सब सोचना खत्म हो गया। लेकिन बिना उसकी गलती के उससे नाराज होने की आदत बनी रही। हर बात पर उसपर आरोप लगा देना, हर गलती, हर असफलता का ब्लेम उस पर डाल देना एक आदत बन गई थी। मैं कभी यह सोचने नहीं रुकता कि उसे कैसा लगता होगा। जैसे मैंने उस पर शादी कर के उसपर एहसान किया था और यह मूल्य उसे चुकाना ही था। जाने अनजाने में, या जानबूझकर भी मैंने उसे बार-बार चोट पहुंचाई। अपनी हर हताशा का गुस्सा उस पर उतारना एक आदत हो गई थी, और वह कुछ बोलती भी तो नहीं थी, तो मेरे हौसले अगली बार के लिए और बढ़ जाते थे।

"आप क्या कह रही हैं ईशानी?" मैंने अपने कंधों पर दुनिया का भार महसूस करते हुए पूछा।

उसने कागज़ मेरी ओर बढ़ाए। "कि आप इन पर दस्तखत कर दें। वह पैसा भी नहीं मांग रही। वह मर्सिडीज़ वापस करने की पेशकश कर रही है, बस अनुरोध है कि आप कार यहाँ लाने का इंतज़ाम करो, अगर नहीं तो वह इसे जल्द से जल्द वापस पहुंचवाएगी”

मेरा दिल धड़क उठा। मैंने तलाक के कागजात देखे और जल्दी से उन्हें सरसरी तौर पर पढ़ा। वह कुछ भी नहीं मांग रही थी। कुछ भी नहीं। उसने घर के खाते से लिए पाँच हज़ार रुपये को वापस करने के लिए एक मासिक किश्तों की योजना भी बना रखी थी। राव-सिन्हा देश के सबसे धनी परिवारों में से एक थे, और मेरी पत्नी ने पाँच हज़ार रुपये वापस करने के लिए मासिक भुगतान वाली एक साल की योजना बनाई थी। यह हमारी शादी पर अंतिम टिप्पणी थी - प्रियंका को नहीं लगता था कि उसके पास कोई अधिकार है। लिखा था कि उसे प्री-नेपुटल याद है और वह कुछ नहीं लेगी। यह मेरी माँ का किया धरा था। जब हम एक दूसरे से मिलने लगे, तो उस डाइनर वेटर यूनिफोर्म में भी, वह बहुत खूबसूरत थी, बहुत ही प्यारी। उन दिनों मेरी एक गर्लफ्रेंड भी थी, जिसे पाने के लिए मेरी मां मुझ पर दबाव डाल रही थी। मेरी माँ के मुताबिक, राजनेता नारायण शंकर की बेटी वनिता नारायण शंकर, मेरे जैसे ‘राव-सिन्हा’ की ‘परफेक्ट पत्नी’ बनेगी। वनिता सुसंस्कृत और सुंदर थी और जॉर्जिया विश्वविद्यालय में पढ़ रही थी। वह प्रियंका जितनी अच्छी नहीं थी, लेकिन ज्यादातर लड़कियां उस जैसी नहीं होतीं।

"मुझे अपनी पत्नी वापस चाहिए।"

"आप उसके लायक नहीं हो," ईशानी ने रूखी टिप्पणी की।

"हाँ, ठीक है, उसने विवाह के वचन लिए हैं, समझौता साइन किया है और वह उन्हें पूरा करेगी।" मैंने रूखे स्वर मेँ उत्तर दिया। मैं तलाक के कागजात हस्ताक्षर नहीं करने वाला था। अगर वह सोचती थी कि मैं ऐसा करूँगा तो वह पागल थी। उफ्फ़ - मेरा अहंकार।

"आपने भी तो वचन लिए थे, लेकिन आपने सब वचन तोड़ दिए। उन्हें पूरा नहीं किया।"

"मैंने कहा न, कि मेरा कोई अफेयर है," मैंने झल्लाकर कहा।

"सिर्फ अफेयर की बात नहीं। आप ने शादी मेँ प्यार और देखभाल करने का वादा किया था, अंशुमन।" ईशानी उठ गई। कहा। "आप ने ऐसा नहीं किया। कागज़ात पर हस्ताक्षर करके उन्हें मुझे वापस भेज दो। और बताओ कि आप कार को कैसे मँगवाओगे। मैंने उससे कहा था कि इसे रख लो, लेकिन वह उस प्री-नेपुटल समझौते की बात करती रहती है।"

मैंने अपना सिर हिलाया, "वह कमबख्त प्री-नेपुटल समझौता।"

ईशानी ने कहा, "आप अपनी मां को इतनी अपमानजनक बात पर उससे जबरदस्ती हस्ताक्षर करवाने से रोक सकते थे। फिर आप भी जीवन भर उसका हर पार्टी मेँ हर किसी के सामने मजाक उड़ते हुए उस समझौते की बार-बार याद दिलाते रहे – नहीं क्या?"

"प्रियंका ने खुद समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। अगर उसे कोई समस्या थी, तो उसे बता देना चाहिए था। अब उसे शर्तों को निभाना होगा।" मैंने बेरुखी से वही कहा, यह जो मैं सालों से कहता और सोचता रहा था। दुर्भाग्य से, ऐसा करना अब आदत बन गई थी। बोलते ही मैं समझ गया कि मैंने गलती की है, लेकिन आदत से यह निकल गया था। लेकिन मैं भूल गया कि मेरे सामने मुझे प्यार करने वाली प्रियंका नहीं बैठी, जो माफ कर के चुप हो जाएगी। प्रियंका के क्रूर पति से नफरत करने वाली इशानी बैठी है। ईशानी ने मेज़ पर अपनी मुट्ठी पटकी और मुझे घूर कर देखा।

"गिरे हुए बिगड़े अमीर इंसान!!! तब वह अठारह साल की बच्ची थी, एक कमीने अमीर शहजादे से सच्चे प्यार मेँ पड़ी हुई थी। उसे आपकी और आपके परिवार की क्रूरता का अंदाजा भी नहीं था। वह तो यह समझ बैठी थी कि यह शहजादा उसे प्यार करता है, उसे नहीं पता था कि शहजादे के मुखौटे के पीछे राक्षस छुपा है। उसे जो भी कागज दिया गया, उसने उस पर हस्ताक्षर कर दिए क्योंकि उसे पैसों की परवाह नहीं थी, वह सिर्फ अपने प्यार को पाना चाहती थी। जो आप अमीर राक्षसों ने कभी नहीं समझा। ये कागज़ात प्रियंका की तरफ से बता रहे हैं कि उसे अभी भी आपके पैसों की परवाह नहीं है। आपने उसे बीस साल तक घर और कपड़े दिए; लेकिन उसके बदले मेँ आपको एक मुफ़्त नौकरानी, बच्चों की माँ, बच्चों की आया, रसोइया, घर की नौकरानी और सबसे बढ़कर अपनी हवस मिटाने के लिए एक वेश्या मिली। इसलिए बकवास मत करो। आप एक गिरे हुए इंसान हैं, जिसने एक गरीब भोली लड़की को अपने प्रेम जाल मेँ फँसाया, फिर जीवन भर प्यार करने की सजा देते रहे। आप एक राक्षस, एक कुत्ते से भी गिरे हुए हो, जो कह रहे हो कि उसने समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं तो उसे पूरा करे?? हाँ तो वह पूरा कर रही है। वह उस समझौते की शर्त के अनुसार आपके क्रूर परिवार के और अपने क्रूर पति के गंदे पैसे को नहीं छू रही, जो आपने उसके अरमानों के खून से बढ़ाया है।" सुन कर मेरा दिल रुक गया। अब तक मैं खुद को महान महसूस कर रहा था कि देखो मैं अपनी गलती मान रहा हूँ। मेरे आस पास के लोगों ने जो थोड़ा-बहुत कहा भी था, उसमें उनकी असल संवेदना मेरे साथ थी, वे मेरे अपने थे, प्रियंका के नहीं। लेकिन ईशानी की आवाज की हिकारत ने मुझे आईना दिखाया।

"मेरी पत्नी को वेश्या मत कहो।"

“हंह – अब यह नाटक तो करो मत। प्रियंका को भी ऐसा ही लगता है कि तुमने उसे ऐसे इस्तेमाल किया। ये उसके अपने शब्द हैं। मेरी नजर मेँ तुम एक गिरे हुए क्रूर राक्षस हो"

मुझे लगा जैसे मेरे अंदर कुछ ठंडा और अप्रिय बिखर रहा है। "वह मेरी पत्नी है। मैंने उसे कभी ऐसा महसूस नहीं कराया कि वह ..... "

"हाँ तुमने कराया। तुमने भी, और बाकी सभी ने भी तुम्हारे सामने बार-बार किया। तुम्हारी माँ, बहन, भाई, देविका और यहाँ तक कि तुम्हारे बच्चे भी। तुम सब उसके साथ ऐसा व्यवहार करते हो जैसे कि वह इंसान ही नहीं हो। लेकिन वह तुम लोगों के जैसी नहीं है। कागजों पर हस्ताक्षर करो, नहीं तो मैं भगवान की कसम खाती हूँ, मैं कोर्ट मेँ तुम्हारी क्रूरता के सारे सबूत देकर तुम्हें, तुम्हारे परिवार के बड़े नाम सम्मान को तबाह कर दूँगी।"

वह पैर पटकती हुई मेरे कार्यालय से बाहर चली गई, और मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मैं उससे भी बड़ा बेवकूफ हूं, जितना कि मैं समझ रहा था।


मंगलवार, 13 जनवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग नौ (09)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग नौ (09)


भाग 9

प्रियंका



“हैलो नीलिमा। हे बेबी। यह माँ है। मुझे आशा है कि तुम ठीक हो। मैं तुम्हें कॉल करना चाहती थी यह देखने के लिए कि तुम लोग कैसे हो। यह मेरा नया नंबर है बेटी, और तुम मुझे कभी भी कॉल कर सकती हो। मेरी तरफ से यशस्वी को हैलो कहना, डार्लिंग। ढेर सारे आलिंगन और चुंबन। मैं तुमसे प्यार करती हूं, बेबी गर्ल।" मैंने फोन रख दिया। बेशक, उसने फोन नहीं उठाया। जब वह मेरा नंबर पहचानती थी तो भी मेरी कॉल को अनदेखा कर देती थी - अब जब कॉल किसी अनजान नंबर से आ रही है तो वह कॉल क्यों उठाएगी?

जब मैंने शाश्वत का संपर्क विवरण निकाला तो मेरी साँस रुक गई। वह इस चित्र मेँ ठीक अंशुमन जैसा ही दिखता था और किसी कारण से उसने तय कर लिया था कि मैं उसकी कहानी में खलनायक हूँ। मुझे नहीं पता था कि मेरा लाड़ला बेटा कब मेरा मज़ाक उड़ाने वाला बन गया था, जो कहता था कि मैं कॉलेज में पढ़ी-लिखी नहीं हूँ। जो संकेत देता था कि मैं स्मार्ट या चतुर नहीं हूँ, कि मैं बेवकूफ हूँ। लेकिन वह मेरा बच्चा था और दुनिया मेँ ऐसा कुछ भी नहीं था जो मुझे उससे दूर कर सके। मैं अपने पति अंशुमन से दूर जा सकती थी, लेकिन अपने बच्चों से नहीं। अगर उन्हें जीवन मेँ कभी भी मेरी ज़रूरत पड़ी, तो मैं उनके लिए हमेशा तैयार रहूँगी, चाहे कुछ भी हो जाए।

"शाश्वत राव-सिन्हा बोल रहा हूँ। कौन?"

मैंने लगभग फोन काट दिया था; मुझे उम्मीद नहीं थी कि वह फोन उठाएगा। मैं एक मेसेज छोड़ने के लिए तैयार थी, लेकिन उससे बात करने के लिए नहीं। मैंने खुद को सम्हाला "बेटे? शाश्वत, यह मैं हूँ” .....

"कौन??? .... कौन, माँ???"

"तुम सब कैसे हो, बेटा?" .....

"यह क्या बकवास है, माँ? आप तो बस उठ कर चली गईं? हमें यह भी नहीं बताया कि कहाँ हो, और बस चली गईं? आपको हो क्या गया है?"

मैंने अपनी आँखें बंद कीं और गहरी साँसें लीं। "शाश्वत, बेटे, मुझसे ऐसे बात मत करो। मैं तुम्हारी माँ हूँ, तुम्हारी दोस्त नहीं, इसलिए तुम्हें सम्मान से बात करना चाहिए, है न?"

"सम्मान? आप तो हम सब को छोड़कर चली गई हो," वह चिल्लाया।

मैंने आह भरी। मुझे इस बात का डर था। अंशुमन भी इसी तरह की प्रतिक्रिया देगा। मुझे यह पता था। वह मुझे दोषी ठहराएगा। वह कहेगा कि यह मेरी गलती थी, कि मैं स्वार्थी थी जिस तरह से मैं चली गई। ..... बस बहुत हो गया। मुझे अंशुमन की बकवास सहन नहीं करनी थी और न ही अपने बच्चों की, चाहे मैं उनसे कितना भी प्यार क्यों न करती हूँ। "ठीक है, बेबी, फोन रखती हूँ। अपना ख्याल रखना, ठीक है?"

"क्या? माँ?"

"मैं बस तुमसे हैलो करना चाहती थी, लेकिन मैं यहाँ बैठकर यह नहीं सुनूँगी कि तुम मुझे कोस रहे हो या मेरा अपमान कर रहे हो, जैसा कि तुम काफी समय से करते आए हो। शाश्वत राव-सिन्हा, तुम इससे बेहतर जानते हो। मैंने तुम्हें अच्छे संस्कारों के साथ बड़ा किया है लेकिन बड़े होकर तुम बहुत बदल गए हो। अब मैं दोबारा फोन नहीं करूँगी। लेकिन अगर तुम फोन करोगे, तो मैं जरूर फोन उठाऊँगी और बात करूँगी। लेकिन सिर्फ तब, अगर तुम ऐसी बदतमीजी फिर से नहीं करो, जैसी अभी की या पिछले कुछ वर्षों से करते आए हो।"

मैंने फोन रख दिया और फोन को ऐसे घूरने लगी जैसे उसमें आग लग जाएगी। मैंने पहले कभी ऐसा नहीं किया था, किसी को इतनी जोर से डांटा हो। लेकिन मैं इस बात से बहुत थक गई थी कि वह इस तरह व्यवहार करता था। मैं इस दुर्व्यवहार के लायक नहीं थी। वह मेरा बच्चा हो सकता है, लेकिन मुझे उससे ऐसा व्यवहार सहने की ज़रूरत नहीं थी।

मैंने अंशुमन को फ़ोन किया लेकिन जानती थी कि काव्या उठाएगी। मैं वास्तव में काव्या से बात नहीं करना चाहती थी। जब ईशानी ने कहा कि सभी को लगता है कि अंशुमन अपनी असिस्टेंट के साथ सो रहा है, तो मैंने कहा कि मुझे पता है कि वह ऐसा नहीं है। लेकिन मेरे अंदर का एक हिस्सा सोच रहा था। मैं ऐसा कैसे नहीं सोचती? अगर मेरा पति हमारी शादी की शपथों को धोखा दे रहा है तो यह मुझे तोड़कर रख देगा। मैंने उसे मेसेज किया।

मैं: मेरे प्यारे अंशुमन, यह मेरा नया नंबर है। मुझे उम्मीद है कि आप सभी अच्छे होंगे। ईशानी कागजी कार्रवाई के लिए संपर्क करेगी। मैंने 'भेजें' बटन दबाया और मुझे एहसास हुआ कि मैंने उसे यह नहीं बताया कि मैं कौन हूं। मैं: यह प्रियंका है।

भेजने के बाद सोचा, ‘मेरा प्रिय अंशुमन’ नहीं कहना चाहिए था। यह बेवकूफी थी। लेकिन मेरे पास नर्वस ब्रेकडाउन के लिए समय नहीं था। मुझे चार कमरे सेट करने थे। लीला की बेटी की तबीयत ठीक नहीं थी, इसलिए वह घर पर थी, जिसका मतलब था कि आज मैं रिज़ॉर्ट की सफाई करूँगी। मैंने अपनी उदासी को दूर किया और काम पर लग गई। मैंने सफाई की, चादरें बदलीं और हर कमरे में ताजे फूलों के फूलदान रखे। मैंने स्थानीय रूप से बने स्नान उत्पादों के नमूनों से भरी टोकरियाँ भी रखीं। ये मुफ़्त नमूने हर कमरे में उपलब्ध थे, जिससे स्थानीय कारीगरों को अपने उत्पादों को पर्यटकों और हमारे मेहमानों के सामने प्रदर्शित करने का एक शानदार अवसर मिलता था। यह सबके लिए अच्छा था। मैं दरवाजे पर खड़ी होकर उस खूबसूरत कमरे को देखने लगी जिसे मैंने अभी-अभी सजाया था।

बड़ी खिड़कियाँ खुली थीं, जहाँ से एक तरफ समुद्र और दूसरी तरफ बगीचे का नज़ारा दिखाई दे रहा था। बगीचा अभी खाली था, लेकिन वसंत आने पर यह रंगों से भर जाएगा। मेरी आँखों में आँसू भर आए, श्रेया तब यहाँ नहीं होगी। उसके साथ हर दिन एक उपहार था - हर दिन थोड़ा अतिरिक्त था जो भगवान हमें दे रहे थे। मुझे पता था कि वह दर्द में थी, लेकिन वह अभी जाना नहीं चाहती थी, और मुझे पता था कि वह इसलिए जीना चाहती थी क्योंकि वह मेरे बारे में चिंतित थी। मैं अपनी बहन को खो रही थी और चाहती थी कि अंशुमन यहाँ होता; मेरे बच्चे मेरा साथ देने के लिए मेरे साथ होते। लेकिन वे कई सालों से साथ नहीं थे, तब भी नहीं जब मैं श्रेया के साथ रहने के लिए बैंगलोर से आती थी। इसलिए मुझे पता था कि मुझे यह सब अकेले ही करना होगा। श्रेया सही थी। ‘अकेले रहना’ ज़्यादा आसान था, ‘साथ रहने के अकेलेपन’ से। मैं अपने परिवार में भी अकेली थी; श्रेया के चले जाने के बाद, मैं यहाँ भी अकेली ही रहूँगी। मैंने खुद से वादा किया कि मैं खुश रहूँगी। अब यही मेरी ज़िंदगी थी। इस रिज़ॉर्ट को वह सब कुछ बनाऊँगी जो वह हो सकता है। मैं एक खूबसूरत द्वीप पर रहूँगी और कौन जानता है, शायद एक दिन ... हम्म ... मैं अंशुमन से प्यार करती थी। यह सोचना एक कल्पना थी कि मैं उससे उबर जाऊँगी और आगे बढ़ जाऊँगी। मैं जानती थी कि यह संभव ही नहीं। लेकिन मैं रोज रोती हुई अकेली सोने जाकर ठंडे बिस्तर पर नहीं जागूँगी। नहीं, मैं अपने बिस्तर पर रहूँगी, जो खुद बनाया गया गर्म बिस्तर होगा, क्योंकि उसमें कोई गायब नहीं होगा।

सोमवार, 12 जनवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग आठ (08)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग आठ (08)



भाग 8

अंशुमन



मैं काम से जल्दी निकलकर रक्षित के घर चला गया। हम भाई भी थे और दोस्त भी, और अगर कोई मेरी कमज़ोरियों को पहचान सकता था, तो वह वही था। "अरे, क्या हुआ?" रक्षित ने घबरा कर पूछा। मैं जानता था कि मेरा दर्द मेरे चेहरे पर लिखा हुआ था।

"देविका आसपास है?" मैं उसकी पत्नी से, जो बहुत क्रूर थी, अच्छे दिन पर भी, मिलना नहीं चाहता था। "नहीं। वह बाहर है। महिलाओं की पार्टी।"

"बहुत बढ़िया। मुझे एक अच्छी ड्रिंक चाहिए।"

हम उसके ‘बार’ वाले कमरे मेँ गए, उसके घर में यही एक जगह थी जहां देविका रक्षित को फुटबॉल देखने के लिए अकेला छोड़ देती थी और वह शराब पीकर मदहोश हो जाता था।

मैं बैठ गया। रक्षित ने मुझे दो फिंगर स्कॉच दी तो मैंने उसका शुक्रिया अदा किया। वह मेरे सामने बैठ गया। "तुम्हारे दिमाग में क्या गड़बड़ चल रही है, भाई?"

"प्रियंका मुझे छोड़कर चली गई है रक्षित।" शब्द फुसफुसाहट के रूप में निकले।

"कब?" ..... "कुछ सप्ताह पहले।"

रक्षित ने सिर हिलाया, जैसे उसे आश्चर्य न हुआ हो। "बधाई हो?"

"क्या???? यह क्या बकवास है, रक्षित?"

उसने मेरी ओर उलझन में देखा। "मुझे... हम सब को, ऐसा लग रहा था कि तुम यही तो चाहते थे। क्या ऐसा नहीं है?" क्या उसकी आवाज मेँ आरोप घुला था?

"क्या?" मुझे ऐसा महसूस हुआ कि मैं एक ऐसा जीवन जी रहा था जिसके बारे में मुझे कुछ भी पता नहीं था, कम से कम, जिसे दूसरे लोग मुझसे बहुत अलग तरीके से देखते थे।

"मतलब? तुम्हारे प्री-नेपुटल समझौते के अनुसार यदि तुम तलाक मांगों तो उसे हिस्सा देना होगा, लेकिन यदि वह खुद चली जाए तो वह कुछ भी लेकर नहीं जाएगी। इसीलिए तुम उसे अपमानित करते, उपेक्षा करते, जिससे वह खुद तंग आकर तुम्हें छोड़ जाए – नहीं?"

"मैं तलाक नहीं चाहता। मैं अपनी पत्नी से प्यार करता हूँ।"

रक्षित ने अपनी दोनों भौंहें उठाईं। "अच्छा जी! चलो-चलो, मुझे मूर्ख मत बनाओ। अगर तुम अपनी पत्नी से प्यार करते होते, तो तुमने अपनी सेक्रेटरी से प्रेम-संबंध क्यों बनाए होते?"

मैंने थोड़ी व्हिस्की पी और अपना गिलास नीचे रख दिया। मेरी ज़िंदगी एक झंझट बन गई थी। बस यही था। "तुमने ऐसा क्यों सोचा कि मैं काव्या के साथ हूँ?"

रक्षित ने हंसते हुए कहा, "अंशुमन, मैं ही नहीं सब जानते हैं। तुम हमेशा उसके साथ रहते हो। लोग तुम्हें रेस्तराँ में देखते हैं। तुम उसके साथ यात्रा करते हो। पार्टियों में भी तुम काव्या के साथ होते हो और प्रियंका एक कोने में बैठी रहती है और हर कोई उसे ‘पहली पत्नी’ के रूप में देखता है, जिसे जल्द ही बदल दिया जाएगा। हमारी बहन दिव्या और मेरी पत्नी कई बार उसका मजाक बनाती हैं कि वह एक रोड़ा है और जैसे ही वह रास्ते से हटेगी तुम अपनी सेक्रेटरी से शादी कर लोगे। मैंने कई बार उन्हें उससे कहते सुना है और वह चुप चाप आँसू पी लेती। तुम यह अनदेखा करते थे, उसकी हर पार्टी मेँ उपेक्षा करते थे। हम सब को तो यही लगता है कि तुम उसे चले जाने के लिए मजबूर करने के लिए ऐसा कर रहे हो।"

मैंने उन पार्टियों को याद करने की कोशिश की। क्या मैं वाकई प्रियंका के साथ इतना बुरा बर्ताव करता था? अगर सभी ने देखा, तो उसे भी तो ऐसा महसूस हुआ होगा। इससे मेरी प्यारी पत्नी को कितना दुख पहुंचा होगा? प्रियंका, जिसने कभी किसी के बारे में बुरा नहीं कहा, यहाँ तक कि मेरी माँ के बारे में भी नहीं, जिसने उसे हर मौके पर अपमानित किया। मुझे माँ से उसकी रक्षा न करने के लिए दोषी महसूस होता था, यही वजह थी कि मैं आखिरकार अपने अलग घर मेँ जाने के लिए सहमत हो गया। लेकिन सच में मैं अपनी माँ के साथ कोई तमाशा नहीं चाहता था। मुझे उम्मीद थी कि प्रियंका उससे निपटेगी, और उसने चुपचाप यही किया। हमारी शादी के पहले दो वर्षों के बाद, प्रियंका बिल्कुल वैसी पत्नी बन गई थी जिसकी मुझे ज़रूरत थी। वह घर चलाती थी, जब भी मुझे उसकी ज़रूरत होती थी, हमेशा मौजूद रहती थी, जब भी मैं चाहता था, मेरे साथ समागम करती थी, और मेरे परिवार को संभालती थी ताकि वे उसके बारे में मुझसे शिकायत न करें। धिक्कार है! मैं एक स्वार्थी व्यक्ति था। हमारा वैवाहिक जीवन सिर्फ इस बात पर निर्भर करता था कि उसने मेरे लिए क्या किया। आखिरी बार मैंने उसके लिए कब कुछ किया था?

"तो क्या सभी लोग यह मान रहे हैं कि मैं अपनी असिस्टेंट के साथ संबंध बना रहा हूं और अपनी पत्नी को तलाक देने के लिए तैयार हूं?"

रक्षित ने आह भरी। "मुझे समझ नहीं आ रहा क्या कहूँ अंशुमन। यह तो हम सब को वर्षों से स्पष्ट रहा है कि तुम्हें अपनी पत्नी में कोई दिलचस्पी नहीं है। पारिवारिक रात्रिभोज में, हमेशा एक तरफ तुम और जुड़वाँ बच्चे होते हैं, जबकि दूसरी तरफ प्रियंका चुपचाप बैठी रहती है। मुझे उस पर तरस आता था और मैं उससे बात करने की कोशिश करता था, लेकिन देविका ईर्ष्या से भर जाती थी, इसलिए मैंने बात करना बंद कर दिया।"

"देविका प्रियंका से ईर्ष्या क्यों करती है?" यह सब बहुत उलझन भरा था। रक्षित ने उपहास किया और फिर अविश्वास में अपना सिर हिलाया। "तुम्हें पता है कि तुम्हारी पत्नी बहुत खूबसूरत है, है न?"

"हाँ।" प्रियंका एक क्लासिक सुंदरता की मिसाल थी। कभी-कभी, मैं उसके चेहरे से नज़र नहीं हटा पाता था। "और जहां देविका रोजाना डाइट पर रहती है, प्रियंका सहज रूप से छरहरी और सुंदर है। वह प्यारी, मधु-भाषी है और उससे बात करना आसान है। काश मेरी भी ऐसी पत्नी होती..." उसने आह भरी। "तुम्हें तो पता ही है कि देविका कैसी है। बस इसलिए देविका को प्रियंका से ईर्ष्या है" मुझे पता था। देविका एक खास तरह की गड़बड़ थी। मेरा भाई कह रहा था कि मेरी एक अद्भुत पत्नी है, जिसे मैं इस हद तक नजरअंदाज करता रहा हूं कि मेरे मित्रों और परिवार सहित सभी लोग सोचते हैं कि मैं उससे छुटकारा पाना चाहता हूं इसलिए जान-बूझ कर तंग कर रहा हूँ। मैंने व्हिस्की पी ली और अपने लिए कुछ और डाला।

"बच्चे उससे बुरा व्यवहार करते हैं, और तुम इसे कभी नहीं रोकते। खास तौर पर शाश्वत। इस गणेश चतुर्थी के पर्व पर, मुझे उससे बकवास बंद करने के लिए कहना पड़ा, लेकिन शाश्वत ने अनदेखा कर दिया।" यह कैसे हुआ कि मेरा भाई मेरी पत्नी का योद्धा बन गया? वही जिसने उसके मुँह पर उसे लालच मेँ मुझे फँसाने वाली कह कर अपमानित किया था?

"शाश्वत ने क्या कहा था?"

"बस कुछ बकवास था कि वह कुछ नहीं समझ पाएगी क्योंकि वह अनपढ़ है और उसके पास कॉलेज की डिग्री नहीं थी। यह अपमानजनक था, और प्रियंका की आँखों मेँ आँसू आ गए थे।

"मैं कहाँ था?" हां, अंशुमन, इस पूरे समय तुम थे कहां?

“वहीं तो थे - यह सब तुम्हारे सामने ही होता था, अंशुमन। तुम मुझे यह नहीं कह सकते कि तुमने ध्यान नहीं दिया।" जब उसने मेरी आँखों में दर्द देखा, तो वह हैरान रह गया। "तुम सच में मुझसे कह रहे हो कि तुमने नहीं देखा कि कैसे तुम्हारे बच्चे हर बार जब वह बोलने की कोशिश करती थी, तो उसे अपमानित कर के चुप करा देते थे? मेरा मतलब है, नीलिमा तो सिर्फ उसे अनदेखा करती थी, जो बेहतर था, क्योंकि शाश्वत बहुत क्रूर हो जाता है।"

"तुमने कभी कुछ कहा क्यों नहीं?" मैंने घबराकर पूछा।

"जब यह सब तुम्हारे सामने हो रहा था, तो मैं कुछ क्यों कहूँगा?" उसने जवाब दिया। "क्या बकवास है, अंशुमन? मुझे तो यही लगता था कि तुम उससे छुटकारा पाने की कोशिश कर रहे हो। जान बूझ कर यह सब कर रहे हो जिससे वह तुम्हें छोड़ जाए और तुम्हें उसे कुछ देना न पड़े। मुझे तुम्हारे तरीके पसंद नहीं आए, लेकिन मेरी अपनी वैवाहिक समस्याएँ हैं, एक पत्नी के साथ जो हर पाँच मिनट में खाने दौड़ती है, इसलिए तुम अपनी शादी की गड़बड़ी का दोष मुझ पर मत लगाओ।"

मुझे एहसास हुआ कि इसके लिए मैं किसी को दोषी नहीं ठहरा सकता। मैंने अपनी पत्नी को हल्के में लिया और मेरे बच्चे भी मेरे व्यवहार का अनुकरण करने लगे। "पहले ऐसा नहीं था।" रक्षित ने आगे कहा, "ठीक है, तुम हमेशा काम करते रहते थे लेकिन पहले उसके साथ नरमी से पेश आते थे। मुझे लगता है कि जब बच्चे छोटे थे तो वह खुश रहती थी। वह एक बहुत अच्छी माँ है। देविका के साथ मेरे झगड़ों को देखते हुए, मुझे ईर्ष्या होती थी कि तुम कितने खुश-किस्मत थे। अरे, मेरे बच्चे भी प्रियंका के साथ घूमना पसंद करते थे, यही वजह थी कि देविका जलन के मारे उन्हें ऐसा करने नहीं देती थी। लेकिन फिर जुड़वाँ बच्चे किशोर हो गए, और वे बदल गए। वे तुम्हारे साथ अलग हैं। वे तुम्हारा सम्मान करते हैं।"

"वे प्रियंका का भी सम्मान करते हैं," मैंने कहने की कोशिश की।

"नहीं, अंशुमन, वे उसका लगातार अपमान करते हैं। और मेरे ऊपर गुस्सा मत करो; लेकिन वे यह अपमान इसलिए करते हैं क्योंकि तुम खुद उसका हर समय अपमान करते हो। वे यह क्रूरता तुमसे ही सीखे हैं।"

"मैं उसका सम्मान करता हूँ," मैंने झल्लाकर कहा। लेकिन मैं भी अपने दिमाग में अतीत की बातें सुन सकता था। "भगवान के लिए, प्रियंका, मैं काम कर रहा हूँ। क्या तुम खुद अपना काम नहीं संभाल सकती हो?” यह तब, जब उसे मेरी मां के आगे मेरी मदद चाहिए थी।

"क्या तुम सच में डिनर तैयार न कर पाने की बात कह रही हो, प्रियंका? मैंने तुम्हें एक सप्ताह पहले ही बता दिया था कि हमारे यहाँ लोग आ रहे हैं। तुम कैसे भूल सकती हो? तुम बिल्कुल बेकार पत्नी हो" यह तब की बात है जब मैंने उस पर उसकी गलती के बिना ही क्रोध किया और इसके लिए माफी नहीं मांगी, जबकि मुझे पता था कि मैं झूठ बोल रहा हूँ, मैंने उसे हफ्ते पहले नहीं बताया था। मैंने उसे दस लोगों के लिए डिनर तैयार करने के लिए तीन घंटे का समय दिया था, क्योंकि मेरी सेक्रेटरी उसे इस बारे में फोन करना भूल गई थी। लेकिन मैंने प्रियंका पर ही दोष लगाया था।

फिर एक और डिनर के दिन "यह महत्वपूर्ण है, इसलिए कृपया इन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करने का प्रयास करना।" मैं यही कह रहा था कि मुझे शर्मिंदा मत करना। लेकिन उसने तो कभी मुझे शर्मिंदा नहीं किया। तो मैं उसके साथ इतना बुरा व्यवहार क्यों करता रहा था? ऐसे करना मेरी आदत बन गई थी, बिना सोचे कि इससे उसे कैसा लगता होगा। लेकिन जब मैं उसके साथ था, तो उसने जीवन को सुरक्षित और प्रेमपूर्ण बना दिया; उसने मेरी दुनिया को प्रेम और गर्मजोशी का आश्रय बना दिया।

उसे सबके सामने अपमानित करने के बाद रात मेँ मैं अपनी प्यास बुझाने पहुँच गया था "आज रात मुझे ज़रूरत है, बेब," उसकी भावनाओं को पूरी तरह नजरअंदाज करके मैंने बेरुखी से कहा। मेरे लिए सिर्फ अपनी जरूरत महत्वपूर्ण थी "मेरे प्रिय अंशुमन, मैं तुमसे प्यार करती हूँ।" उसने हमेशा की तरह मुस्करा कर मेरे लिए अपनी बाहें खोल दी थीं, कोई शिकवा शिकायत नहीं थी। तब मुझे गर्व होता था कि मेरी पत्नी इतनी समर्पित थी, मेरे दोस्त मुझे कहते थे कि वे मुझसे ईर्ष्यालु थे। अब मुझे समझ आ रहा था कि वे प्रियंका को दया से देखते थे। वे सोचते थे कि घर पर मेरी बेचारी पत्नी मुस्कराती हुई मेरी परवाह करती थी जबकि उसका पति जाहिर तौर पर अपनी सहायक के साथ संबंध बना रहा था। यह सच नहीं था। मेरा अपनी सेक्रेटरी से संबंध नहीं था। लेकिन सब तो ऐसा ही सोचते थे। मैंने बाद मेँ उससे कहा, "प्रियंका, तुम मुझे मना कर सकती हो।"

"मुझे पता है। लेकिन मैं ऐसा नहीं करना चाहती। हम जो कुछ भी करते हैं, प्रिये, वह अद्भुत है क्योंकि हम इसे एक साथ करते हैं। यह हमारी अपनी दुनिया है।" क्या उसे लगता होगा कि अगर वह मेरी बात नहीं मानेगी तो मैं नाराज़ हो जाऊँगा? नहीं, ऐसा नहीं था। उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि यही वह समय था जब मैं उसके लिए पूरी तरह से अकेला होता था। मैं अभी भी अपनी सांसें थाम रहा था। उसने आगे कहा था "यही समय है जब हम सिर्फ़ ‘हम दोनों’ होते हैं, जो अनमोल है।"

मैंने मज़ाक में कहा, "प्रियंका, यहाँ हमेशा सिर्फ़ हम ही रहते हैं। बच्चे पढ़ने चले गए हैं।"

"खैर, तुम काम में व्यस्त रहते हो, इसलिए यह अच्छी बात है।"

"काम की बात हुई है तो, मैं अगले सप्ताह के अंत तक न्यूयॉर्क जा रहा हूँ - हमारा वहां एक बड़ा प्रोजेक्ट है।"

"आह... अम्म ... क्या मैं साथ आ जाऊँ?"

मैंने उसे एक तरफ़ बिठाया और बैठ गया। "यह कोई छुट्टी नहीं है, प्रियंका। मैं काम पर जा रहा हूँ, और हम शायद बिज़नेस डिनर करेंगे।"

"ठीक है।" उसके चेहरे पर निराशा थी, उसकी आंखें उदास थी लेकिन मुझे खुश रखने के लिए मुस्कराई। "चलो प्रियंका, ऐसा मुंह मत बनाओ। तुम काम के बीच में आओगी। मैं काम पर हूँ। तुम वहाँ भी अकेली होगी, तो न्यूयॉर्क के होटल में रहने के बजाय यहीं अकेली रहो।"

"मैं समझती हूँ प्रिय अंशुमन। यह सिर्फ़ एक विचार था। चिंता मत करो।" वह बिस्तर से उठी और बाथरूम में चली गई। मैंने शॉवर शुरू होते सुना। मेरा एक हिस्सा अंदर जाकर उसके साथ दूसरा दौर शुरू करना चाहता था। मैं उससे कभी भी तृप्त नहीं होता था। लेकिन मैं नहीं गया। मैं उसके चेहरे पर उस हार के भाव के बारे में दोषी महसूस नहीं करना चाहता था जब मैंने उसे बताया कि वह मेरे रास्ते में आएगी। लेकिन अहंकार – मैं उसके सामने अपनी गलती स्वीकार नहीं कर सकता था। उफ्फ़! मेरे जैसे ‘समझदार आदमी’ ने उसकी प्यार माँगने की विनती कैसे नहीं सुनी? मैं कैसे नहीं देख पाया कि वह कह रही थी कि मैं उस पर ध्यान दूँ? वह अपने पति से मिलने के लिए कह रही थी। "वह कहाँ गयी है?" रक्षित ने पूछा।

मैंने अपने बालों में हाथ फेरा। "यह सबसे ज़्यादा गड़बड़ वाली बात है रक्षित; मुझे बिल्कुल नहीं पता। उसने सब कुछ छोड़ दिया। उसका फ़ोन, और उसके सारे क्रेडिट कार्ड, सारे गहने। कपड़े भी सिर्फ पुराने कामचलाऊ जींस-टॉप ले गई है, कोई डिजाइनर कपड़े या हैन्ड्बैग नहीं। हर चीज़ यहीं छोड़ गई है। मुझे एक नोट छोड़ा, कि वह पाँच हज़ार रुपये ले रही है, लेकिन वह उस बकवास प्री-नेपुटल समझौते की वजह से उसे भी वापस कर देगी।" मैंने अपना चेहरा अपने हाथों में छिपा लिया और मेरे अंदर आँसू उमड़ कर बाहर निकलने लगे।

"भाड़ में जाओ," रक्षित बुदबुदाया। "बेचारी प्रियंका।"

मैंने ऊपर देखा, मुझे एहसास हुआ कि मेरे चेहरे पर आँसू बह रहे थे। "तुमने तो उसे लालची औरत कहा था। उसके सामने ही।"

"मैं तब एक मूर्ख बच्चा था। मेरा विश्वास करो, मैं ऐसी औरतों से मिला हूँ। प्रियंका खुद सोना थी। उसने हमारी राक्षसी माँ को संभाला। वह तब भी शालीन रहती थी जब देविका या दिव्या क्रूर होती थीं। जानते हो, उसने कभी भी तुम्हारे बारे में शिकायत नहीं की, तब भी नहीं जब मैंने उससे कई बार पूछा कि चीजें कैसी चल रही हैं? वह बस इतना कहती थी कि तुम अपने परिवार के लिए कड़ी मेहनत करते हो, और उसे तुम पर बहुत गर्व है।"

"मुझे बहुत अच्छा लगता था कि वह मेरी ओर ऐसे देखती थी जैसे मैं कोई सुपरहीरो हूँ।"

रक्षित इस बात पर कड़वाहट से हंस पड़ा। मैं उससे सहमत था। सुपरहीरो! मैं तो अपनी शादी की बीसवीं सालगिरह भी भूल गया। "तुम्हें क्या लगता है वह कहां गई होगी?"

"मैं अनुमान लगा रहा हूं - श्रेया।"

रक्षित ने सिर हिलाया, "क्या यह उसकी दोस्त है जिसे कैंसर है?"

"हाँ।" ..... "मैंने उसे पिछले साल कंपनी की नए साल की पार्टी में रोते हुए देखा था।"

मैंने रक्षित की ओर देखा, "क्या?"

उसने सिर हिलाया। "हाँ, वह अकेली ही आग के पास बैठी हुई थी। मुझे उसके लिए बुरा लगा। उसने बहुत बढ़िया खाना पकाया था, पूरी पार्टी का आयोजन किया था, लेकिन वह अकेली थी जिसे इसका कोई मज़ा नहीं आ रहा था। कोई उससे बात नहीं कर रहा था, तुम काव्या के साथ हंस बोल रहे थे। वह बहुत उदास थी।" मुझे याद आया कि मैंने काम से कुछ लोगों को आमंत्रित किया था। काव्या वहाँ आई थी। मैंने बहुत अच्छा समय बिताया - अपने बच्चों, अपने सहकर्मियों, अपने भाई, अपने दोस्तों के साथ समय बिताया। जब हमने नया साल मनाया तो मैंने बच्चों को चूमा। लेकिन मुझे याद नहीं कि अगले दिन क्या हुआ।

क्या मैंने अपनी पत्नी को नव वर्ष की शुभकामनाएँ दी थीं? रक्षित कहता रहा "वह परेशान थी। अगली सुबह उसे अपनी दोस्त के पास जाना था जो कीमोथेरेपी करवा रही थी। वह दो दिन पहले जाना चाहती थी लेकिन तुमने उसे कहा कि तुम्हारी ‘नेटवर्किंग’ पार्टी महत्वपूर्ण है और उसका रहना जरूरी है।" मैं सुबह करीब चार बजे बिस्तर पर कर सो गया था। जब तक मैं उठा, प्रियंका जा चुकी थी। उसने हमेशा की तरह मेरे लिए खाना छोड़ा था, जो वास्तव में कोई मायने नहीं रखता था क्योंकि मैंने काव्या और काम से जुड़े अन्य लोगों के साथ खूब खाया था। "मैंने उससे कहा कि वह एक अच्छी दोस्त है। मेरा मतलब है, वह श्रेया के सभी कीमो उपचारों में गई थी, सिवाय एक दो के, जब मुझे लगता है कि तुम्हारा कोई काम रहा था। यह होती है देखभाल!" बोलते हुए रक्षित सिर हिला रहा था, उसकी आँखों में मेरी पत्नी के लिए विस्मय और सम्मान था। हाँ, प्रियंका ठीक ऐसी थी, देखभाल करने वाली, ध्यान रखने वाली, प्यार करने वाली। मुझे याद है कि उसे वह कीमोथेरेपी छोड़ देनी पड़ी क्योंकि मुझे कार्यक्रम में उसके साथ की ज़रूरत थी। क्या मैंने अपना समय उसके साथ बिताया, या मैंने वही किया जो रक्षित ने कहा था; काव्या और अन्य लोगों के साथ रहा, अपनी ‘पहली’ पत्नी को एक कोने में बैठा कर?

"मैं उससे प्यार करता हूँ, रक्षित।"

"लगता तो नहीं है अंशुमन। किसी को भी नहीं लगता। क्या सच मेँ?"

"हाँ," मैंने ईमानदारी से कहा। "प्रियंका मेरी ज़िंदगी को बेहतर बनाती है। पिछले कुछ महीने हमारे अंतर्राष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स में बहुत व्यस्त रहे हैं, लेकिन जब मैं घर आता हूँ और उसके साथ बिस्तर पर जाता हूँ, तो ऐसा लगता है जैसे मेरी पूरी दुनिया सही है।" तो फिर तुम अक्सर अतिथि कक्ष में क्यों सोते हो, बेवकूफ? मुझे लग रहा था कि मेरे इर्द-गिर्द दुनिया ढह रही है, और अब मुझे पता चल रहा था कि यह सब मेरे ही हाथों से होता रहा है। "मैं उसे कभी धोखा नहीं दूंगा। मैं ऐसा नहीं करना चाहता। बच्चों के बाद भी, सभी कहते हैं कि सेक्स खत्म हो गया, लेकिन हमारे साथ ऐसा नहीं हुआ।" लेकिन हाल ही में हमारा साथ नहीं हुआ, पिछले कई महीनों से नहीं। मैं देर रात तक काम कर के अतिथि कक्ष में सोने लगा था।

"अंशुमन, बिस्तर मेँ अपनी शारीरिक जरूरत पूरी करने के लिए पत्नी को उपयोग कर लेना प्यार नहीं होता मेरे भाई। किसी को नहीं लगता कि तुम्हें उससे प्यार है। मुझे संदेह है कि प्रियंका को भी कभी ऐसा लगता होगा। तुम भाग्यशाली हो।"

"हाँ, मैं भाग्यशाली था।" मैंने आह भरी। "ओह! क्या मैं उसके साथ इतना बड़ा गधा था?"

"पता नहीं जब तुम दोनों अकेले होते थे, तब कैसा था, लेकिन जब मैं आसपास था, हाँ। फिर एक बार तुम नशे में थे, और हम सब शादी के रिश्ते के बारे में बात कर रहे थे।"

मुझे वह रात याद आ गई। हमारे साथ कुछ लोग आए थे। हमारे दोस्त ईशानी और विवेक भी वहाँ थे। एक साल बाद उनका तलाक हो गया। मेरी बहन दिव्या और शुभम भी थे। लेकिन उस रात हम सब इस बारे में बात कर रहे थे कि हम सब कैसे एक साथ आए। "मैं प्रियंका से तब मिला था जब वह यूनिवर्सिटी के पास एक रेस्टोरेंट में काम करती थी," मैंने कहा। "वह बहुत खूबसूरत थी और बेशक, मैं प्यार मेँ पड़ गया। मूर्खता की उम्र थी। हम उन दिनों कैसे बेवकूफ होते थे?" देविका और रक्षित सोफे पर साथ बैठे थे जबकि ईशानी और विवेक कॉफी टेबल के दूसरी तरफ के सोफ़े पर। प्रियंका मेरे पास में एक आराम-कुर्सी पर बैठी थी ताकि वह रसोई में अंदर-बाहर जा सके और सभी का ख्याल रख सके। उसने खाना पकाया था, क्योंकि वह बहुत बढ़िया खाना बनाती थी, जिस पर मुझे हमेशा बहुत गर्व होता था। यहाँ तक कि माँ या देविका भी उसके खाने के बारे में कुछ नहीं कह सकती थीं। हम खाना खा कर अंत में वाइन और कॉफी पी रहे थे। "हमने बच्चों की वजह से शादी आगे भी बनाए रखी। लेकिन कौन जानता है कि अगर वे न होते तो क्या होता।"

प्रियंका ने मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे मैंने उसे थप्पड़ मार दिया हो, और मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं और चिढ़ गया। "मेरा ऐसा मतलब नहीं था, अपने चेहरे से वह दुख भरी नज़र हटाओ, लानत है यार। और यह सालों पहले की बात है; हम इसे भूल सकते हैं, है न?"

"बेशक। क्या कोई और कॉफी या वाइन लेना चाहेगा?"

"क्यों न मैं आपकी मदद करूँ?" रक्षित प्रियंका के साथ रसोई में चला गया।

मैंने अगले दिन प्रियंका से माफ़ी मांगी और कहा कि मैंने बहुत ज़्यादा शराब पी ली थी। उसने मेरी माफ़ी स्वीकार की और नाश्ता बनाया, और बस इतना ही। अब, जब मैंने उस बातचीत के बारे में सोचा, तो मुझे उल्टी आने लगी। मैंने उसे कितना अपमानित किया। कोई आश्चर्य नहीं कि सभी ने मान लिया कि मैं उससे छुटकारा पाना चाहता हूँ; सच ही मेँ, शायद उसे भी यही लगता होगा। रक्षित ने आगे कहा "मैंने अंदर जाकर पूछा कि क्या वह ठीक हैं, मुझे आश्चर्य हुआ था कि तुमने सबके सामने ऐसा कहा। उस पल मेँ, किसी दूसरे पुरुष के पूछने पर, कोई भी दूसरी महिला अपने पति के खिलाफ बोल पड़ती। लेकिन प्रियंका ने मुझे कॉफी को लिविंग रूम में वापस ले जाने में मदद करने के लिए कहा और मुझे उसका हालचाल पूछने के लिए धन्यवाद दिया। कोई शिकायत नहीं की।"

"मैंने उसके लिए उससे माफ़ी मांगी थी"

"हुँह! और माफी मेँ क्या कहा था तुमने?"

"यह ‘लेकिन मैं नशे में था’ वाली माफी थी, जो बिल्कुल भी ईमानदार नहीं थी।"

"क्या जुड़वाँ बच्चों के कारण तुम्हें उससे शादी बनाए रखने की मजबूरी पर कोई क्रोध है?"

मैंने ‘न’ मेँ अपना सिर हिलाया. "मुझे उसके साथ जीवन पर बहुत खुशी है।"

"तो फिर अंशुमन, तुम अपनी पत्नी के साथ कूड़े जैसा व्यवहार क्यों करते रहे हो?" मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था। मुझे लगता था कि मैं खुश हूँ। मुझे लगता था कि हम ठीक-ठाक हैं। नहीं, यह सच नहीं है। मुझे पता था कि वह खुश नहीं थी। मैं सोचता रहा, कि जैसे ही काम मेँ चीजें आसान हो जाएंगी, मैं उसके पास पहुँच जाऊँगा। वह कहीं नहीं जाने वाली, लेकिन मेरे ग्राहक शायद जा सकते थे।

तभी देविका आई, एक बहुत ही टाइट ड्रेस में जो मैं उसकी उम्र की किसी महिला को पहने हुए नहीं देखना चाहता था। मेरा मतलब है, मुझे इस बात से कोई मतलब नहीं था कि कोई महिला क्या पहनती है; यह उसकी अपनी पसंद थी, लेकिन देविका, प्रियंका के बारे में झुग्गी के बारे में की गई सभी बकवास टिप्पणियों के बावजूद, बहुत अभद्र कपड़े पहनती थी। जब प्रियंका झुग्गी में रहती थी, तब भी ऐसी नहीं दिखती थी। वह हमेशा, सस्ते कपड़ों में भी, सुंदर सौम्य और आकर्षक दिखती थी। क्या मैंने उसे कभी यह बताया था? देविका ने नीले रंग का सीक्विन वाला गाउन पहना था जो उसके शरीर को और उभार रहा था। उसने हाल ही में महंगा टमी टक करवाया था जो कारगर रहा, क्योंकि उसका पेट सपाट था। प्रियंका ने बिना सर्जरी के कसरत की और अपना ख्याल रखा। क्या प्रियंका को लगा कि उसे ऐसा करने की ज़रूरत है क्योंकि मैं उसे नहीं चाहता? अब मेरे मन में बहुत सारे सवाल थे। "अंशुमन, तुम्हें देखकर बहुत अच्छा लगा। कैसा चल रहा है?" उसने मुझे हवा में चूमा और फिर अपने पति के पास बैठ गई। "प्रियंका उसे छोड़कर चली गई," रक्षित ने उससे कहा।

देविका ने दोनों भौंहें उठाईं और खुशी से ताली बजाई। "अच्छा, अरे, तब तो हमें शैंपेन खोलनी चाहिए।" मैंने उसकी तरफ देखा। खैर, उसे ऐसा क्यों नहीं लगेगा कि यह जश्न मनाने का क्षण है, क्योंकि मेरा भाई भी, जो मुझे बेहतर जानता था, ऐसा ही सोचता था? "क्या हुआ?" देविका ने हम दोनों की उदासी देख कर चकित आवाज मेँ पूछा।

"मैं नहीं चाहता था कि वह मुझे छोड़ कर चली जाए, देविका," मैंने कहा।

"सच में? क्योंकि हम सब को तो ऐसा लग रहा था कि तुमने जान बूझ कर ऐसा माहौल बनाया। और माँ जी ने कई बार सभी को बताया कि तुम्हारा प्री-नेपुटल समझौता कैसे सेट किया गया था। उन्होंने मुझे बताया था कि प्रियंका ने इसे बिना पढे हस्ताक्षर कर दिए थे। ‘मूर्ख लड़की’, उन्होंने कहा था। मैंने तो भाई, अपने वकीलों से अपने समझौते को बारीकी से जांचने को कहा” देविका अपने पति की ओर मुड़ी। "प्रिय, एक ग्लास वाइन प्लीज।" रक्षित उसके लिए कुछ पीने के लिए लेने चला गया। वह षड्यंत्रकारी ढंग से आगे झुकी। "अंशुमन, कृपया अपनी असिस्टेंट से शादी मत करना। मेरा मतलब है, तुम जो भी कर रहे हो, ठीक है, लेकिन उसे राव-सिन्हा मत बनाओ। प्रियंका जैसी गंदगी की पैदाइश से छुटकारा पाने में तुम्हें बहुत समय लग गया और अब एक और मध्यम वर्ग से आई लड़की को परिवार मेँ ---"

"देविका, मैं अपनी पत्नी से प्यार करता हूँ," मैंने बीच में कहा। " मैं उससे बहुत प्यार करता हूँ। मेरा काव्या के साथ कोई संबंध नहीं है। मैं अपनी पत्नी से प्यार करता हूँ। मैं उसे वापस लाना चाहता हूँ।"

देविका भी रक्षित की ही तरह उलझन में दिखी! "कोई भी विश्वास नहीं कर सकता, कोई नहीं सोचता कि तुम अपनी पत्नी से प्यार करते हो, अंशुमन" उसने उपहास करते हुए कहा।

"हाँ, मुझे एहसास होने लगा है, कि मैं प्रियंका के लिए एक बहुत बुरा आदमी रहा हूँ।"

"खैर, कम से कम वह तुमसे कुछ नहीं ले सकती, यह राहत की बात है।"

"किसके लिए राहत?" ..... "हम सभी जो परिवार की परवाह करते हैं।"

"तुम चाहती हो कि मेरी पत्नी के पास पैसे न हों? बीस साल की शादी के बाद वह कंगाल हो जाए?" मैं उठ खड़ा हुआ, मेरे अंदर उलटी आने का भाव उमड़ रहा था। "क्यों? वह एक अद्भुत पत्नी और माँ है। तुम सब उसे इतना नापसंद क्यों करते हो?"

"ईमानदारी से कहूँ तो अंशुमन, सवाल तो यह है कि ‘तुम’ उसे क्यों नापसंद करते हो? हम सब तो इसलिए ऐसा करते हैं कि तुमने हमें ऐसा करने के लिए हमेशा प्रोत्साहित किया है।" देविका ने पलटकर कहा।

"मैं उसे नापसंद नहीं करता, थोड़ा सा भी नहीं। मैं उससे बहुत प्यार करता हूँ।"

"जिस तरह से तुम उसके साथ व्यवहार करते हो, जिस तरह से तुम्हारे बच्चे तुम्हारे सामने उसके साथ व्यवहार करते हैं? किसी को भी ऐसा नहीं लगता। रक्षित और मेरे बीच कुछ मुद्दे हो सकते हैं, लेकिन अगर हमारे बेटे कभी मुझसे उस तरह बात करें जैसे शाश्वत प्रियंका से करता है, तो वह अपना आपा खो देगा।"

रक्षित रेड वाइन का गिलास लेकर वापस आया और देविका के सामने रख दिया, और अपनी पत्नी के पास बैठते हुए बोला "मैं सोच रहा था कि यह कौन जानता होगा कि प्रियंका कहाँ है? ईशानी। वे दोनों दोस्त थीं।” “हाँ, ठीक कहा तुमने” मैंने उठते हुए कहा। “मैं ईशानी से बात करूँगा।"


शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग सात (07)

 

ज़िंदगी अधूरी तेरे बिन - भाग सात (07)



भाग 7

प्रियंका



"श्रेया कैसी है?" ईशानी ने फोन पर पूछा, जब मैं मेहमानों के सो जाने के बाद सुबह के लिए आटा गूंथ रही थी। यह शांत समय था - जब मैं अगले दिन की तैयारी करते हुए सोच सकती थी। मुझे बैंगलोर छोड़े दस दिन हो गये थे, मेरा दिल टूट गया था। मुझे अंशुमन की याद आती थी। मैं कई बार फ़ोन करने के लिए ललचाती थी, लेकिन खुद को रोक लेती थी। जब मैं घर पर थी, तब भी तो वह फ़ोन नहीं उठाता था, जबकि वह मेरा नंबर पहचानता था, तो अब क्या संभावना थी कि वह फ़ोन उठाएगा, खासकर अपरिचित नंबर से?

"वह धीरे-धीरे खोती जा रही है ईशानी। मैं कल उसके साथ डॉक्टर के पास गई थी, और उसके पास अब ज्यादा समय नहीं बचा है।"

"हे भगवान, प्रियंका, मुझे बहुत खेद है। मैं कल्पना भी नहीं कर सकती कि यह तुम्हारे लिए कितना कठिन है।" ..... "वह बहुत छोटी है। हम दोनों कमोबेश दोनों एक ही उम्र की तो हैं.... उसे ऐसी हालत मेँ देखकर मेरा दिल टूट जाता है।"

"दिल टूटने की बात करें तो, मेरे पास तलाक के सारे कागज़ात तैयार हैं।" मैंने अस्थिर साँस छोड़ी और एक पल के लिए आटा गूंथना बंद कर दिया।

मैंने ईशानी से तलाक की प्रक्रिया संभालने और अंशुमन को कागजात सौंपने को कहा था। मुझे डर था कि मैं कहीं खुद ही कागज उसे दूँ, और फिर वह उन्हें देखकर भी अनदेखा कर दे या अरुचि से हाँ मेँ सिर हिलाए, और फिर अपने कंप्यूटर स्क्रीन पर जो कुछ भी था, उसे देखने लगे। मेरा रहा-सहा दिल भी टूट जाएगा। उस दर्दनाक पल से बचने के लिए, मैंने कायरतापूर्ण तरीका अपनाया और ईशानी से कागजी प्रक्रिया संभालने को कहा था। "ठीक है। कागज मुझे भेज दो, तो मैं हस्ताक्षर करके उन्हें वापस भेज दूँगी।"

"प्रियंका, क्या तुम सच में कुछ पैसे नहीं लेना चाहती हो? हनी, तुमने इतने सालों तक उसके घर और उसके बच्चों का ख्याल रखा था।"

"हमारा घर और हमारे बच्चे ईशानी। मुझे उससे एक पैसा भी नहीं चाहिए।"

"मैं प्री-नेपुटल समझौते को चुनौती दे सकती हूँ। तुम दोनों बीस साल से साथ हो।"

"मैं नहीं चाहती, ईशानी।"

"मुझे इस बात से नफरत है कि तुम्हें तलाक से गुजरना पड़ रहा है। लेकिन मैं समझती हूँ। मेरा मतलब है, यह बात पूरे शहर में है इसलिए...."

"शहर में? क्या बात? क्या हो रहा है?" मैंने पूछा, मेरा दिल धड़क रहा था।

"चलो प्रियंका, तुम्हें पता है।" उस ने अपना गला साफ किया। मुझे जाकर कुछ ही दिन हुए थे, क्या अंशुमन इतनी जल्दी ही आगे बढ़ चुका था? खैर, इससे मुझे समझना चाहिए कि मैं उसकी प्राथमिकताओं की सूची में कहाँ हूँ। "भगवान जाने कब से उसका अपनी सहायिका के साथ प्रेम-संबंध चल रहा है। हर किसी को पता है।"

मैं जोर से हंस पड़ी, "नहीं ईशानी, मुझे ऐसा नहीं लगता।"

"तुम अंशुमन से प्यार करती हो प्रियंका, लेकिन प्यार मेँ हम इतने अंधे नहीं हो सकते।"

"मैं अंधी नहीं हूँ, मुझ पर विश्वास करो ईशानी। मैं अंशुमन को अंदर और बाहर से जानती हूँ। हो सकता है कि वह अब मुझसे प्यार नहीं करता, या शायद उसने कभी सच में किया ही नहीं, लेकिन धोखा देकर अपनी शादी की कसमें तोड़ रहा हो? वह ऐसा नहीं है।"

"मैं एक घरेलू वकील ऑफिस चलाती हूँ प्रियंका! मुझे नहीं पता कि मेरे पास आने वाली कितनी महिलाएं जीवन भर सोचती हैं कि उनके पति उन्हें धोखा नहीं देंगे और—"

"अंशुमन मुझे किसी दूसरी महिला के साथ धोखा नहीं देंगे, ईशानी। यह उससे भी बदतर स्थिति है। उन्होंने मुझसे कभी प्यार ही नहीं किया। और यह सच्चाई पिछले कुछ सालों में और भी स्पष्ट होती जा रही है। शायद उन्हें लगता है कि मुझ से शादी कर के मुझ पर कोई एहसान किया है, क्योंकि मैं एक गरीबी मेँ पली हुई लड़की थी और वे खानदानी अमीर लोग थे। उन्होंने उनकी माँ के हर दुर्व्यवहार पर हर बार मुझ पर एहसान दिखाया कि ‘मैंने तुमसे शादी की न? और क्या चाहती हो?’ और हर बार याद दिलाया कि प्री-नेपुटल समझौते के अनुसार यदि मैंने उन्हें छोड़ा तो मुझे कुछ नहीं मिलेगा। वे यही सोचते और कहते रहे कि मैं पैसे के लिए उनसे बंधी रही, जबकि मैं अपने प्यार के कारण उनके साथ थी।"

"हम्म - क्या कागज मैं उसे किसी के हाथ से पहुंचाऊं या कोरियर से भेज दूँ?"

"वही करो जो तुम आम तौर पर करती हो। ईमानदारी से कहूँ तो, अंशुमन को कोई परवाह नहीं होगी।” उसे तो पता लगने में भी कुछ दिन लग गए होंगे कि मैं चली गई हूँ। ईशानी ने आह भरी, "और तुम्हें उससे कुछ भी नहीं चाहिए?"

"नहीं। बस इतना करना कि मर्सिडीज और पाँच हज़ार रुपये के बारे में एक नोट जोड़ देना। मैंने उसे जो पत्र छोड़ा था, उसमें मैंने कार का ज़िक्र नहीं किया था। अगर वह चाहे तो कार उसे तुरंत वापस मिल सकती है। पैसे.... खैर, पैसे लौटाने के लिए मुझे कुछ समय चाहिए, इसलिए शायद हम मेरे लिए पैसे वापस करने की कोई महीने की किश्तों की योजना बना सकें। और हाँ, यह भी कहना कि मैं प्री-नेपुटल समझौते के कारण नहीं बल्कि प्यार के कारण इतने सालों उसके साथ थी।"

"प्रियंका, वह अमीर आदमी पांच हजार रुपये तो खर्च कर ही सकता है," ईशानी ने खीज कर कहा। "मैं खुद ये तलाक के कागजात अंशुमन राव-सिन्हा को सौंपने जा रही हूँ और जब मैं ऐसा करूँगी, तो मैं उसे कुछ अक्ल की बात भी बता दूँगी।"

"तुम जो करना चाहो करो, ईशानी, लेकिन तुम अपना समय ही बर्बाद करोगी।"

हमने लक्षद्वीप में मेरे जीवन के बारे में थोड़ी और बातें कीं। जब तक मैंने कॉल खत्म की, मैं डबल-रोटी के आटे को रसोई के सबसे गर्म हिस्से में खमीर उठने के लिए छोड़ने को तैयार थी। मैंने एक आवाज़ सुनी और रसोई के दरवाजे पर खड़ी श्रेया की ओर देखा, "क्या तुम तलाक लेने के बारे में निश्चित हो?" ..

"नहीं, लेकिन वापस नहीं जा सकती श्रेया।" मैंने कहा "मैं वहाँ धीरे-धीरे खत्म हो रही थी। और... और...." मेरे आंसुओं ने मेरा गला घोंट दिया।

"ओह, रोना बंद करो," श्रेया ने अपने चिर परिचित शुष्क हास्य के साथ कहा। "रोना इस धरती पर मेरे आखिरी दिनों को उदास कर देगा, और मैं ऐसा नहीं चाहती।" मैंने उसे नाश्ते के कोने में कुर्सी पर आराम से बैठने में मदद की और उसके चारों ओर एक कंबल लपेट दिया। वह थक कर तकिये पर झुक गई। अपने बेडरूम से रसोई तक चलने में ही वह थक गई थी। डॉक्टर ने मुझे एक साल या कुछ महीने बताए थे, लेकिन संभवतः? डॉक्टर ने अस्पताल का सुझाव दिया था, और मैंने मना कर दिया था। श्रेया भी ऐसा नहीं चाहती थी। मैं यहाँ थी, और मैं उसकी देखभाल कर सकती थी। मैं उसे नहलाती, सहारा देती, उसे बाथरूम ले जाती और यदि वह उल्टी करती थी तो उसे सम्हालती। वह सब करती जो उसे चाहिए होता था। वह अब बहुत सोती थी, बहुत कम खाती थी, थोड़ी चाय पीती थी क्योंकि पानी का स्वाद उसे बुरा लगता था। अपनी प्यारी दोस्त को इस तरह मरते हुए देखना दर्दनाक था। "पुदीने की चाय चाहिए?" उसने सिर हिलाया, उसकी साँसें उथली थीं। मैंने केतली चालू की और एक बर्तन में चाय, पुदीने की पत्तियाँ और थोड़ा शहद डाला। उसका गला दुखता था और शहद दर्द को कुछ हद तक कम करने में मदद करता था।

"अंशुमन बुरा आदमी नहीं है," श्रेया ने अचानक कहा।

"नहीं, वह बुरा आदमी नहीं है।"

"वह एक स्वार्थी कमीना इंसान है, लेकिन तुमने भी तो उसे अपने साथ ऐसा व्यवहार करने की अनुमति दी। गलती तुम्हारी भी है, तुमने कभी विरोध नहीं किया"

"मुझे पता है श्रेया, कि मेरी भी गलती है" मैंने चाय के प्याले को मेज पर रख दिया।

श्रेया ने अपने दिवंगत पति के बीमे के पैसे का इस्तेमाल उस घर को रिसॉर्ट में बदलने के लिए किया, घर जो पति ने उसके लिए छोड़ा था। वह जगह, जो कभी उसके पति की दादी की थी, एक अविश्वसनीय संपत्ति थी। पहले यह बस एक उपेक्षित कूड़ा-घर था जिसे कोई नहीं चाहता था, लेकिन श्रेया ने इसकी क्षमता देखी और इसे बहाल करने में खुद को झोंक दिया। जैसे भी मैं मदद कर सकती थी, मैंने मदद की। जब वह दो साल पहले बीमार पड़ी, तो मेरा उस से मिलने जाना और भी ज़्यादा बढ़ गया। मैं उसकी कीमोथेरेपी के दौरान उसके साथ रहना चाहती थी और यह सुनिश्चित करना चाहती थी कि रिज़ॉर्ट का संचालन सुचारू रूप से चलता रहे - आखिरकार यह उसकी आजीविका थी। और अब मेरी भी तो!

"तुमने बच्चों को मेसेज कर लिया?" श्रेया ने पूछा।

मैंने अपना सिर ना मेँ हिलाया। "मुझे डर लग रहा है। शनिवार को करूँगी। लेकिन चिंता की ज़रूरत नहीं है - वैसे भी जब मैं फ़ोन करती हूँ तो वे शायद ही कभी फ़ोन उठाते हैं।"

"प्रियंका, तुम अपने परिवार से बहुत प्यार करती हो।"

मैंने श्रेया के हाथ को थपथपाया। जब हम छोटे थे, तो लोग हमें ब्लैक एंड व्हाइट कहकर बुलाते थे। हम अविभाज्य थे, जैसे आप तभी हो सकते हैं जब आपका घर संकट में हो, और आप एक दूसरे की जीवन रेखा हों। हमने अपने लिए अच्छा किया। हम झोंपड़ पट्टी से बाहर निकल आए। अब हमको देखो! "मैं अपने परिवार से प्यार करती हूँ, लेकिन मुझे भी तो प्यार की ज़रूरत है," मैंने कहा। "मैं उन लोगों की देखभाल करते-करते थक गई हूँ जो मेरा कभी साथ नहीं देते।" ... "इसमें मैं भी शामिल हूँ क्या?" श्रेया ने कर्कश स्वर में कहा।

मैं हँस पड़ी "तुम मेरी हो, श्रेया। हमारा साथ हमेशा का है, प्यारी सखी।" उसने एक कमजोर हंसी निकाली जो खाँसी में बदल गई। उसने अपना गला शांत करने के लिए थोड़ी चाय पी। "तुम्हें उन्हें बताना तो होगा न, कि तुम कहाँ हो।"

“वे जानते हैं कि मैं तुम्हारे साथ हूँ। वे जानते हैं तुम ही मेरी दोस्त हो। और उन्होंने मेरी एकमात्र मित्र से मिलने की कभी जहमत नहीं उठाई। मैंने उनसे लक्षद्वीप का ज़िक्र किया, लेकिन पता नहीं वे मेरी बात सुन भी रहे थे या नहीं।" मैं कड़वाहट से भरी थी। अपने परिवार के लिए मैं कुछ नहीं थी - सिर्फ माँ और पत्नी; जो “मौजूद” थी एक कुर्सी टेबल की तरह। उनकी सुविधा के लिए। मेरा अपना कोई अस्तित्व नहीं था उन सब के लिए।

"प्रियंका, अकेले रहना कोई बुरी बात नहीं है। मैं अकेली थी, लेकिन मेरे पास तुम थी। अरे, मेरे चले जाने के बाद तुम्हारे पास वह भी नहीं रहेगा। देखो, अकेले रहना ठीक है; एकाकी हो जाना ठीक नहीं है। इसलिए, जब अंशुमन तुम्हारे पास आए, क्योंकि वह आएगा, तो तुम सुनिश्चित करो कि उसे पता हो कि वह तुम्हें वापस क्यों चाहता है।"

मेरे मुँह से सिसकी निकल पड़ी। "मुझे नहीं लगता कि वह मुझे वापस चाहता है, श्रेया। मुझे नहीं लगता कि वह मुझे पहले भी सच्चे मन से चाहता था। उसने हमेशा मुझे एहसास दिलाया कि उसने मुझसे शादी कर के मुझ पर एहसान किया है। और एक समझौते पर हस्ताक्षर के कारण मैं उसके साथ रहने पर मजबूर हूँ।"

मैंने अपना सिर उसके कंधे पर टिका दिया और उसने मुझे अपने पास खींच लिया। हम साथ में वैसे ही बैठे रहे, जैसे बचपन में झोंपड़ पट्टी मेँ बैठते थे। तब बाहरी दुनिया हमारी दुश्मन थी। और अब?

अब, हमारे शत्रु हमारे अंदर बस गए थे - उसका कैंसर और मेरा टूटा हुआ दिल।