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शनिवार, 26 नवंबर 2011

हवा और पंखा


पंखे ने हवा से कहा - "तू बड़ी आलसी है रे !! तभी चलती है जब मैं घूमता हूँ और तुझे घुमाता हूँ ,नहीं तो चलती ही नहीं!! अगर बिजली चली जाए - तो कमरे में सब परेशान होते रहते हैं - और तू है की घूमने का नाम ही नहीं लेती | सब मेरी और देख देख कर बिजली का इंतज़ार करते रहते हैं - कि  कब बिजली आये और मैं घूमूं, तो तू चले | दादी माँ तो कागज़ य पत्रिका लेकर तुझे जोर जोर से मारती भी हैं (हाथ से पंखा करना) - पर तू पूरी बट्ठर है - हिलने का नाम ही नहीं लेती !!!

यह सुन कर हवा खूब हंसी | बेचारे कमरे तक की सिमटी दुनिया में अपना पूरा जीवन गुज़र देने वाले पंखे को वह कैसे समझाती - की पवन तो चंचलता और स्फूर्ति का प्रतीक मानी जाती है? उसने कहा - तू मनुष्य का बनाया हुआ उपकरण है जो एक मनुष्य की सिमटी दुनिया (कमरा) में मनुष्य की सीमित ऊर्जा (बिजली की सप्लाय) पर चलता है - एक दिन नया आता है - कुछ वर्षों का जीवन गुज़ार कर चूँ चां करने लगता है - और बूढा हो कर अपने काम से रिटायर कर दिया जाता है - फिर कोई नया पंखा तेरी जगह आ जाता है|

मैं तुझे इस कमरे से बाहर की दुनिया के बारे में कैसे समझाऊँ ? बाहर ईश्वर की बनाई एक अपार दुनिया है - जिसमे मैं निरंतर चलती हूँ - कभी नहीं रुकती ! अनादि काल (सृष्टि की शुरुआत) से चल  रही  हूँ और अनंत काल (प्रलय - और कुछ पुराण कहते हैं कि प्रलय के बाद भी पवन देव स्थिर नहीं होते) तक चलती रहूंगी | और ऐसे वैसे नहीं - पूरे नियम कायदे से चलती हूँ | जहाँ भी मेरी शक्ति (प्रेशर) कम हो - तो मैं आस पास के पूरे घेरे से उस जगह का प्रेशर सामान्य करने दौड़ पड़ती हूँ | ज्यादा प्रेशर से कम प्रेशर की ओर दौड़ने और सब जगह बराबरी स्थापित करने के लिए मुझे किसी बाहरी बिजली की सप्लाय की ज़रुरत नहीं पड़ती - मेरे रचनाकार (ईश्वर) ने मुझे किसी और ऊर्जा पर निर्भर नहीं रखा है, मेरी अपनी ऊर्जा है - जिससे मैं पूरी तरह स्वयंचालित हूँ - ना मुझे पेट्रोल चाहिए चलने को, ना न्यूक्लीयर पावर ना ही तेरी तरह बिजली !"


यह सुन कर पंखा खूब हंसा और बोला - " गप्प भी सोच समझ कर मारनी चाहिए - तू - जो इस छोटे से कमरे में नहीं घूम सकती मेरे धकेले बिना - तू कह रही है यह सब ! अजब झूठी है रे तू तो!!!"


और पंखा हँसता रहा - जब तक बिजली आ नहीं गयी और वह अपने काम में लग नहीं गया (घूमने लगा) उसे यह सोच रह रह कर गुदगुदाती रही कि हवा आलसी होने के साथ ही साथ कितनी झूठी और गप्पी है!!!


(कुँए के मेंढक कि कहानी तो आपने ज़रूर सुनी होगी - जिसमे मेंढक को कोई सागरवासी मिलता है और वह मेंढक उस नए दोस्त से यह समझने कि कोशिश करता है कि सागर कितना बड़ा होगा - लेकिन उसकी अधिकतम सोच अपने संसार (कुँए) से बड़ी कभी नहीं हो पाती  )

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