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शनिवार, 26 नवंबर 2011

womens lib



महिला मुक्ति???

तो क्या पहले महिलाएं मुक्त नहीं थीं? हाँ, माना की समाज में बहुत सी बुराइयाँ थीं, लड़कियों के साथ बहुत भेद भाव था आदि आदि आदि ..... क्या अब नहीं है? है - पहले से ज्यादा नहीं है तो कोई बहुत कम भी नहीं है!! हाँ -पहले बच्चियों को पढने का मौका नहीं था, अब है - पहले बचपन में ब्याह दी जाती थीं बच्चियां, अब कम हो गया है यह रिवाज़!! पर पहले - मैं बीस साल पहले की नहीं - इस  "महिला मुक्ति " आन्दोलन के पहले की बात कर रही हूँ - लड़कियों को दहेज़ के लिए जलाया नहीं जाता था इस पैमाने पर जिस पर आज!!! पहले अगर लड़कियों का बाल विवाह होता था, तो क्या उस लड़के का बाल विवाह न था जिसके साथ वह ब्याही जाती थी? हम अपने आप को मूर्ख बनाते हैं यह कह कर की हम "बच्चियों" के ही लिए बाल विवाह को बुरा समझते हैं - यदि बुरा है - तो दोनों बच्चों के लिए है - और यदि नहीं - तो दोनों ही के लिए नहीं!! 

अब बात करते हैं पढने की - तो हाँ - आजकल लड़कियों के लिए पढने की सुविधा है - जो पहले नहीं के बराबर थी - लेकिन उसके बाद क्या ? लड़की के पास चार ऑप्शन होते हैं -

 (१)  या तो वह शादी न करे - अपना करियर बनाये - इसे कितने लोग स्वीकार करते हैं? ईमानदारी से जवाब दें - क्या आप स्वीकार करते हैं?

(२) वह शादी करे - फिर नौकरी न करे (ज्यादातर यही होता है - और मेरे विचार से इसमें कोई बुराई भी नहीं है - हम खुद ही घर के काम की गरिमा को कम कर रहे हैं यह मान कर की यदि पढी लिखी लड़की घर में ही रह रही है तो वह अपनी पढाई को  ""वेस्ट""    कर रही है - क्या हमारी दादी नानियाँ घर के ही काम नहीं करती थीं?)

(३) जिस तरह से लड़का अपने करियर के लिए काम करता है - घर और बच्चों की जिम्मेदारियों से करीब करीब मुक्त (मैं सारे घरों की बात बिलकुल नहीं कर रही - किन्तु ९०% से ज्यादा कपल्स में ऐसी ही स्थिति है) - वैसे ही शादीशुदा लड़की भी कर सके ( - जैसे - ऑफिस के काम से हफ्ते भर के आये दिन टूर, देर रात तक चलने वाली मीटिंग्स , घर आने पर बिना किचन में घुसे गर्म खाना तैयार मिलने की अपेक्षा - आदि )  ईमानदारी से जवाब दें - क्या आप स्वीकार करते हैं? क्या हमारे आसपास की कोई कामकाजी महिला यदि घर में खाना बनाने वाली बाई रखे तो समाज के ठेकेदारों की नाक भौं नहीं चढ़ जाती? कितने घरों में यह बात एक्सेप्ट होगी की बहू घर आकर थक कर सो गयी है और बेटा खाना बना रहा है - (जिसका उल्टा हर घर में हर दिन होता देखा जा सकता है) और हो भी एक्सेप्ट तो महीने में एक आध बार या की साल में एक आध बार - क्या हफ्ते में तीन तीन दिनों का इक्वल डिविज़न स्वीकारा जाएगा?

(४) और जो वर्किंग कपल्स में सबसे ज्यादा देखा जाता है - पति पत्नी दोनों बाहर काम करते हैं - दोनों के वर्किंग आर्स भी करीब करीब बराबर हैं - लेकिन - घर आने पर पति को तो थक कर सो जाने का पूरा अधिकार है - वहीँ पत्नी से अपेक्षा है की वह घर को साफ़ भी रखे - खाना भी पकाए - बच्चों को पढाये - और मेहमान वगैरह की नवाजी भी करे 

अब - जो महिलाएं घरेलु हैं - उन्हें तो खैर यह सुनना होता हैं की वह "काम नहीं करतीं" और जो नौकरी करती हैं - वे डबल वर्कलोड को झेलती हैं - शायद और एक शताब्दी बाद सच में इक्वालिटी आये - आज की वेमेंस लिब या महिला मुक्ति तो सिर्फ एक खूबसूरती से पेंटेड कारागृह है जिसमे बंद कैदी पहले से ज्यादा बंधन में हैं - लेकिन अपने आप को मुक्त समझ कर खुश हो रहे हैं!! मैं यह भी जानती हूँ की इस पोस्ट के बाद मुझे मेरी बहुत सी दोस्तों की नाराज़गी भरी मेल्स आएँगी - की मैं महिला मुक्ति की विरोधी हूँ - लेकिन यह सच है की आज की वेमेंस लिब - लिब बिलकुल नहीं है|

मैं कुछ एक्जाम्पल दे सकती हूँ - मेरी माँ एक वर्किंग महिला थीं - पर उन्होंने कभी अपने आप को घर आकर आराम करने की छूट नहीं दी - घर को एकदम टिप टॉप रखने की होड़ (सॉरी मामी - आपको शायद बुरा लग रहा होगा - पर सच यही है की आप एक एक्स्ट्रीमली ओवरलोडेड वर्क शेड्यूल फोलो करती रहीं ) ने उन्हें कभी रिलेक्स नहीं करने दिया - उनका घर और उनका करिएर दोनों बेस्ट लेवल पर रहे - लेकिन उन्हें मैंने कभी फ्री नहीं देखा | दूसरा एक्जाम्पल - मेरी एक मुहबोली दीदी हैं - वे रशिया में पढ़ कर आई हैं - नौकरी करती हैं - लेकिन मैंने कभी जीजाजी को खाना पकाते नहीं देखा - ! मेरी हेड ऑफ़ डिपार्टमेंट भी एक महिला हैं - जो ऑफिस के सारे काम के बाद घर के सारे काम भी करती हैं - और वे अपने पति से ज्यादा कवालीफायीड  और हायर अर्निंग हैं | मेरे पति के ऑफिस में (जब हमारी नयी शादी हुई थे) उनकी बॉस एक महिला थीं - जो घर जा कर कपडे वगैरह धोने से ले कर खाना पकाने तक सब सम्हालती थीं| मैं खुद भी इसी कड़ी का हिस्सा हूँ - |

हमारी हिन्दुस्तानी मनोवृत्ति हमें घर के कामों से दूर होने नहीं देती - और ऑफिस में जब दोनों बराबर सैलरी लें तो महिला और पुरुष दोनों को बराबर काम करना ही होगा!!! 

क्या यही है "वेमेंस लिब"??? ज़रा सोचिये - हमारी न्यूज़ चंनेल्स - करवा चौथ के दिन - कैसी महिमा बढ़ाती हैं स्त्री के भूखे प्यासे रह कर पति के जीवन की कामना करने की ? क्या यह एक तरह का बढ़ावा नहीं है ऐसी परम्परा को जो स्त्री और पुरुष के भेद को एक भूखे प्यासे रहने की सज़ा के रूप में महिमा मंडित करता है? यहाँ साउथ में करवा चौथ नहीं होती - और मेरे सहकर्मी मुझसे यह पूछते हैं की - महिलाएं ही क्यों पति के लिए भूखी रहे, पति क्यों नहीं? ( यहाँ तो पत्नी के भूखे रहने न रहने से पति पर कोई अनिष्ट होते मैंने देखा नहीं पिछले १३ वर्षों में!! ) अब इस सवाल का कोई जवाब तो होता नहीं - तो मैं उल्टा पूछ लेती हूँ की आप लोगो के यहाँ महिला मंगलसूत्र और बिछये क्यों पेहेनति हैं - उनके पति क्यों नहीं? लेकिन - यह सवाल और जवाब दोनों ही मीनिंग लेस हैं - क्योंकि हम सिर्फ एक दुसरे को चिढा रहे हैं - इस सब का असलियत में विमेंस लिब से कोई सरोकार ही नहीं है..... अब इस पर मुझे कई लोगों की आस्था को छेड़ने का इलज़ाम ज़रूर लगेगा - लेकिन - ज़रा सोचिये - जब पश्चिम में करवा चौथ नहीं होती - तो क्या वहां पति के जीवन पर कोई संकट हैं?

कहाँ तक लिखा जाए - मुझे तो महिला मुक्ति - महिला परतंत्रता की हे एक मजबूत कड़ी लगती है !!! "मुक्ति " तो तब हो जब (१) पहले गुलामी रही हो और(२) सब महिलाएं एक दुसरे के साथ एक दूसरे  को साथ ले कर आगे बढें | अभी जो हो रहा है वह यह की --

           जो महिलाएं "नौकरी" कर रही हैं वे अपने को नौकरी न करने वाली महिलाओं से एक दर्जा ऊपर एवं पुरुष वर्ग से कम (हाँ - यही कहा मैंने - अधिकतर वर्किंग लेडीज़ कितना ही कहें की हम अपने को पुरुषों से कम नहीं मानतीं - लेकिन वे  यही मानती हैं की अगर घर में काम करने वाले ने छुट्टी ली - तो बर्तन मेरा पति धोये या की कपडे पति धोये या की पोछा लगाये यह सोचना भी कुछ अशुद्ध सा है - यह सब मेरे ही काम हैं ) 
          और जो महिलाएं नौकरी नहीं करतीं - वे करने वालियों की कमियां ढूँढने में लगी रहती हैं - कहीं यह भावना लिए की मुझे प्रूव करना है की वह मुझसे बढ़ कर नहीं -- क्यों प्रूव करना है?? वह आपसे बढ कर नहीं ही हैं - वे भी आप ही की तरह एक स्त्री हैं - जो की अपनी ताकत से ज्यादा कर के अपने आप को "मुक्त" प्रूव करने में लगी हैं !! दोनों ही परेशान हैं - |

दो गधों की कहानी याद आती है - की   मालिक को इम्प्रेस करने के लिए एक गधा दूसरे से बढ़ कर काम करता - और धीरे धीरे हुआ यह की मालिक ने इसे बेहतर समझ कर दूसरे को हटा दिया - और सारा बोझ इस पर आ पड़ा!! तो बेहतर होगा की हम कोम्पीटीटर  न बन कर एक दूसरे की इज्ज़त करें, और एक दूसरे की इज्ज़त बढाएं भी - और दोनों ही आगे बढें - तभी "मुक्ति" मुक्ति कहलाएगी सही मायनों में!!

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