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शनिवार, 26 नवंबर 2011

the beautiful garden



This story is not mine , it is a story I once got in an e-mail :


एक अस्पताल में, एक ही कमरे में दो आदमी भर्ती थे | दोनों ही बहुत बीमार थे - और ठीक होने की संभावना न के बराबर थी|

उनमे से एक का बिस्तर खिड़की के साथ था, और एक का कमरे के अन्दर की ओर |  रोज़ दिन में दो बार नर्स उन्हें फ्रेश करा कर कुछ देर के लिए सहारे से बिठा देती - कि शरीर में अकड़न न हो | जो आदमी खिड़की के पास बैठता था - वह अपने साथी को बड़ी खूबसूरती से बाहर के दृश्य का वर्णन करता | वह अधिक बीमार था , और कुछ ही दिन का मेहमान था | बाहर एक सड़क थी, जिस पर से कभी कभी कुछ सुन्दर जुलूस भी गुज़रते | तो जुलूस की सजावट और चमक दमक को सुन कर अन्दर वाला व्यक्ति बहुत खुश होता |

सड़क के पार ही एक बागीचा था - जिसमे बच्चे खेलने आते - और उनके खेलने का ही वक़्त  था जब नर्स इन लोगों को बैठाती थी - तो खिड़की वाला आदमी बच्चों की अठखेलियाँ , तितलियों , चिड़ियों, पौधों पेड़ों, फूलों आदि की बातें भीतर वाले को सुनाता रहता | भीतर वाले मित्र का भी मन होता - कि काश मेरा बिस्तर वहां होता | एक बार दबी ज़बान से अपने साथी से कहा भी , किन्तु उसने यह कहा कि 'मुझे यहीं रहने दो मित्र' - तो आगे बात न कर पाया | अन्दर कुछ परेशान अवश्य हुआ - कि मेरे साथी में थोडा स्वार्थी  है - पर क्योंकि वह साथी ज्यादा बीमार था - तो चुप रह गया |  पर वह इन बातों को सुन कर ऐसा अनुभव करता ज्यों मैं ही बागीचे में हूँ - और बच्चों के साथ घूम रहा हूँ | खिड़की वाला आदमी इतना सुन्दर और जीवंत वर्णन करता कि उसे ऐसा ज्यादा महसूस ही नहीं होता - कि यह मैं खुद नहीं देख पा रहा हूँ |

एक दिन - उस खिड़की वाले साथी की मृत्यु हो गयी - तो उसे ले जाया गया | अब कुछ दिन गुज़र जाने के बाद भीतर वाले व्यक्ति ने डोक्टर से कहा कि उसका बिस्तर खिड़की के पास बदल दिया जाए | ऐसा ही किया गया | शाम को जब नर्स बिठाने आई - तो वह बड़ा उत्साहित था - कि आज मैं अपनी आँखों से अपने मित्र के बताये बागीचे को देखूँगा | 
जब उसने देखा - तो वहां सिर्फ एक कच्ची पगडण्डी थी, जिस पर जुलूस तो क्या - एक स्कूटर भी ना जाए ! और उसके उस ओर थी एक ऊंची दीवार | वह चकित हो गया - और नर्स आने पर उस से पूछा - यहाँ तो बागीचा था न ? क्या बागीचे के मालिकों ने अभी अभी पक्की दीवार बनवा दी है ? नर्स ने चकित हो कर कहा - नहीं तो !! - यहाँ तो कभी कोई बागीचा नहीं था | यह अस्पताल बनने से पहले से ही यह दीवार है - उस ओर काफी बड़ी ज़मीन है - जो खाली पडी है , तो मालिक ने यह दीवार बनवा रखी है कि कोई इस ज़मीन पर कब्जा न कर ले | 

तब उस आदमी को समझ में आया कि मेरा मित्र अपने आप  को और मुझे - दोनों को अपने अंतिम दिनों में खुश मिजाज़ बनाए रखने के लिए यह सुन्दर स्वर्ग रचता रहा ...| इसीलिए  उसने बिस्तर बदलने से मना कर दिया था ...... 

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