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सोमवार, 28 नवंबर 2011

आलू और गुस्सा


एक किंडरगार्टन स्कूल में टीचर बच्चों को भावनाओं को सही दिशा देना सिखाना चाहती थी |

जैसा कि होता है -कुछ बच्चे शांत स्वभाव के थे, कुछ चंचल, कोई हँसते खिलखिलाते, तो कोई गुस्से वाले आदि | और बच्चों को गुस्सा आता है - तो हम जानते ही हैं कि कैसे होता है :)

तो टीचर जी ने बच्चों से कहा कि "अब से जब जब हमें किसी पर गुस्सा आये - हम अपनी कापी में अंकित करेंगे - और इस हफ्ते के अंत तक कापी में जो गिनती हो - उतने आलू सोमवार को एक थैले में रख कर कक्षा को लाने हैं | सब बच्चे मान गए [अक्सर टीचर की बात मानना काफी सरल होता है बच्चों के लिए - माता पिता की मानना भले ही कुछ कठिन हो :) ]  

तो जो खुशमिजाज स्वाभाव के बच्चे थे - उन्हें तो कुछ लाना ही न पड़ा - या अधिक से अधिक एक या दो आलू | पर जो गुस्से वाले बच्चे थे - उन्हें कई आलू लाने पड़े | 

टीचर ने कहा - अब सब बच्चे अपने अपने आलुओं को दिन भर उठा कर घूमेंगे | इन्हें बिलकुल नीचे नहीं रखना है | बच्चों के लिए तो यह खेल ही था - ख़ुशी ख़ुशी मान गए | जो गुस्से वाले बच्चे थे - वे खुश भी थे - कि अब मेरे पास एक "भारी हथियार" है | जो सताए - उसे डराने के लिए "क्रोध का भारी थैला" | पर आखिर बच्चे तो ठहरे छोटे (किंडरगार्टन ) और आलू भारी होते हैं काफी | जिसके पास आलू नहीं थे - वे शुरू में कुछ डरे हुए थे - कि कोई गुस्से वाला हमें आलू भरी थैली मार दे तो ? पर कोई दो घंटे गुज़रते गुज़रते आलुओं का भार उन बच्चों को महसूस होने लगा - जो कई लोगों से नाराज़ थे | पर जो एक दो लोगों से ही नाराज़ थे - उन्हें यह भार महसूस होने तक शाम हो चली थी | ये बच्चे घर गए तो खुश थे कि चलो - बोझ से पीछा छूटा ( अगले दिन फिर स्कूल में अपने अपने थैले सम्हालने हैं ) | थैलियाँ स्कूल में ही छूट गयीं |

अगले दिन फिर अपने अपने थैले उठाने थे | अब बच्चे पहले ही परेशान थे , क्योंकि पिछले दिन के अनुभव से जान चुके थे कि क्या परेशानी होगी |

तीसरे दिन भी ऐसा ही चला | चौथे दिन दोपहर होते होते कुछ आलुओं के ख़राब होने से कक्षा में दुर्गन्ध फैलने लगी | अब तो जो बच्चे गुस्सा न भी होते थे - वे भी परेशान - कि आलू उठाये भले ही किसी और ने हों - दुर्गन्ध तो सबको आती थी न ? किन्तु जिसकी थैली में जितने आलू - उसकी परेशानी उतनी अधिक - कि तीव्रता दुर्गन्ध की उसके पास ज्यादा होनी ही है न ?

अब बच्चे टीचर से पूछने लगे - इन आलुओं से कैसे पीछा छुड़ाया जाये ? टीचर ने कहा - जिससे तुम गुस्सा हो - उस पर से गुस्सा हटाओं - यदि उससे झगडा किया था गुस्से में - तो माफ़ी मांग कर दोस्ती करो - तब एक आलू निकाल कर फेंक सकते हो |

अब - पहली मुसीबत तो यह कि माफ़ करो - और ऊपर से उससे माफ़ी मांगो जिससे आप नाराज़ थे | Adjust होने में कुछ समय गया  और माफ़ी मांगने में कुछ और समय गया - पर आख़िरकार प्रोब्लम सोल्व हो ही गयी |

तो दोस्तों - जब क्रोध आये - तो ध्यान दे - कि हमारा क्रोध उसे तो पल भर को तकलीफ देता है जिसपर क्रोध है - पर वह वजन उठाये हमें हर वक़्त घूमना पड़ता है | जितना गुस्सा - उतना वजन | शुरुआत में लगता है - कि यह क्रोध एक "भारी हथियार" है - जिससे मैं दूसरों को डरा कर काबू कर सकूं - और दूसरों को भी कुछ डर लगता है शुरुआत में ( जिसके पास जितना भारी हथियार हो , उससे उतना ज्यादा डर ) ...... यह क्रोध अधिक समय तक लाद कर घूमे - तो सड़ने लगता है - सडांध उठती है - जो सिर्फ क्रोध करने वाले को ही नही - उसके आसपास चुप रहने वालों को भी महसूस होती है | ( उस दुर्गन्ध की शिद्दत भले ही अलग हो )|  तो - शायद बेहतर हो कि हम अपने क्रोध को समझें और उसे handle करना सीखें - उसे justify कर के सही साबित करने से वह सही हो जाएगा क्या ?

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