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शनिवार, 26 नवंबर 2011

Marxist communism


 सोशलिसटिक चिन्तक एक आईडीयलिस्टिक समाज की स्थापना का स्वप्न देखते और दिखाते हैं - वह समाज जिसमें सब सामान हों - कोई भेदभाव नहीं - न कोई मालिक हो - न कोई लेबर - सारे संसाधन सबके बराबरी से इस्तेमाल के लिए हों एवं सबकी सामाजिक स्थिति एक सी हो |

लेकिन मुश्किल यह है कि सब मनुष्य एक से नहीं हैं -   कोई मेधावी है - तो कोई बुद्धि हीन ; कोई विचारशील है - तो कोई विचार शून्य ; कोई अपने सोच को शब्दों में खूबसूरती से लिख सकता है - तो कोई नहीं ; कोई कर्मठ है तो कोई आलसी, !!!

 मेधावी एवं विचारशील व्यक्ति सोचता है कि समाज की बुराइयों को  दूर करने का कोई रास्ता निकले ( और यह ध्यान रहे कि हर समाज में हर समय कुछ बुराइयां होती ही हैं - क्योंकि हर समाज में मेजोरिटी की सोच के हिसाब से कुछ बातें सही और कुछ गलत मानी जाती हैं - (फिर चाहे वह मान्यता ऑब्जेक्टिव्ली  सही हो या नहीं) - और ऐसे कुछ लोग हमेशा होते हैं जो इस मान्यता को  फ़ॉलो  नहीं करते ) - और वह योजना बना भी लेता है | फिर - यदि उस व्यक्ति में लीडरशिप क्वालिटी हो - तो वह अपने पीछे कर्मशील व्यक्तियों की एक फ़ौज भी बना लेता है (- जैसे मिस्टर गांधी ने अपने पीछे कांग्रेसियों की बनाई थी ) 

यहाँ तक तो ठीक है - लेकिन अब जब कर्मशील लोग उनके पीछे चलते हैं - और कुछ कामयाबियां मिलती हैं - तो साधारण जन उस नेता को भगवान का दर्जा देने लगते हैं | धीरे धीरे वह नेता खुद, उस नेता के निकटतम संगी (जैसे मिस्टर नेहरु आदि) भी इस विचारधारा से हिप्नोटाइज़ हो कर इस पहले नेता को "भगवान" या "महात्मा" का दर्जा दे देते हैं और उस भगवान् के निकटतम साथी छोटे भगवान् हो जाते हैं !!! वे खुद भी मानने   लगते हैं कि वे जो सोच रहे हैं और कर रहे हैं - वही सही है - बाकी तरीके सब गलत हैं (जैसा कि हमारे अपने स्वाधीनता संग्राम में देखा गया - श्री भगत सिंह जब छोटे थे तब गांधी जी से प्रभावित थे - फिर जब उस छोटे बच्चे ने देखा कि एक आन्दोलन एक ऐसी वजह से वापस ले लिया गया जो वजह उस बच्चे के दिमाग से कोई सशक्त वजह थी ही नहीं - तो वह बच्चा अपने नेता से निराश हो कर अपने तरीके खोजने निकला)        

अब यह दुनिया ब्लैक एंड  व्ह़ाइट तो है नहीं - कि सिर्फ दो ही ऑप्शन हों - एक सही और एक गलत!! तो होता यह है कि - चलते हुए राह में कुछ दोराहे  भी आते हैं तो राहें बंट जाती हैं - अब (१) पहला नेता यदि सच में विचारशील है तो वह समझता है कि दोनों ही राहें ठीक हो सकती हैं - और अपने जो संगी दूसरी राह पकडें उनसे कोई गिला शिकवा नहीं रखता | (२) यदि वह पहला नेता अब तक अपने ही तिलिस्म  में बंध  चुका  है - तो वह सोचता है कि जो दूसरी राह पर जाए - वह शत्रु हो गया (३) पहला नेता तो राहें अलग होने का बुरा नहीं मानता - लेकिन उस की कर्मनिष्ठ सेना उस दूसरी राह पकड़ने वाले राही को एक तरह का गद्दार मान लेती है (४) पहला नेता अब तक इस दुनिया से विदा हो गया होता है - और उसके अंध भक्त सिर्फ नाक की सीध में जाती राह को ही राह मानते हैं , और मुडती हुई हर राह को भटकन !!

पहली परिस्थिति तो खैर ठीक ही है - लेकिन यह पहले या दूसरे दोराहे तक ही होती है - जैसे जैसे आगे बढ़ती है राह - वैसे वैसे दोराहे - तिराहे और चौराहे आते ही रहते हैं - किसी न किसी जगह तो मनमुटाव आ ही जाता है!! तो बाकी तीनो ही परिस्थितिया अक्सर देखी जा सकती हैं| इन परिस्थितियों में फिर से "हैव्स एंड हेव नोट्स" का संघर्ष सामने आ जाता है - जिस व्यक्ति के बड़ी "भक्त सेना" हो (ज्यादा अनुयायी हों) वह बड़ा लीडर हो जाता है (हैव)   और दूसरा दुश्मन - जिसे किसी तरह से हराना और नीचे कर देना पेहली "सेना" का ध्येय हो जाता है | फिर से समाज तीन हिस्सों में बाँट जाता है - मूल नेता - उसका प्रतिद्वन्धी  और साधारण जन - जो शान्ति   से जीना चाहता है ! 

तो- मेरे विचार में यह संभव ही नहीं कि एक संपूर्ण साम्यवादी समाज कि स्थापना हो सके | ज़रुरत यह है कि जो जन मेधावी, विचारशील और कर्मठ हैं - वे अपनी और से भरसक प्रयास करते रहे कि जैसा हो , जितना हो अपने और अपने सह-वैचारिक लोगों के साथ प्रयास करते रहे कि जनसाधारण की स्थिति में सुधार लाया जाय, जीवन की मूल भूत ज़रूरतों को पाने में जनसाधारण समर्थ हों (रोटी - कपडा - मकान - मूल भूत शिक्षा - शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य व स्वाधीनता , एवं एक निर्भय समाज )


 हम सब को ही लगातार बढ़ते रहना है - और यह समझना है कि हमारी मंजिल एक क्षितिज की भाँति है - जो जितना उसकी और बढ़ते चलें - उतना ही दूर बढती जायेगी -तो मंजिल की तलाश हमारा ध्येय न हो - हमारी यात्रा ही हमारा लक्ष्य हो - कर्म हमें तय करना है - फल कि प्राप्ति हमारा लक्ष्य नहीं हो!   "सुख दुखे समे कृत्वा - लाभालाभौ जयाजयौ - ततो युद्धाय युज्यस्व - नैवं पापमवाप्स्यसि " सुख दुःख - हार जीत - लाभ हानि सबको परे रख कर यदि हम यह युद्ध (और यह युद्ध ही है) करें - अर्थात समाज की बेहतरी के लिए संघर्ष करें ( और यह संघर्ष - संघर्ष करने के लिए हो - खुद को विजेता या नेता बनाने के लिए नहीं ) तो ही हम पाप से मुक्त रह कर (यह किसी धार्मिक पाप की नहीं - बल्कि साम्यवादी विचारधारा के सबसे बड़े पाप - खुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगने का पाप की बात है )   

जब साम्यवाद के एडवोकेट्स और नेता यह पूरी तरह समझ लेंगे कि जीत के बाद उन्हें स्वयं को जनसाधारण से ऊपर नहीं गिनना है  - और यह कि वे जनसाधारण के लिए हैं - जनसाधारण उनके लिए नहीं -तब ही साम्यवाद आ सकता है - तब तक कभी नहीं - और आज तक के इतिहास में तो यह होता देखा नहीं गया!!!!    

   

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