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सोमवार, 28 नवंबर 2011

क्रोध और पश्चाताप


इस पोस्ट से मैं पश्चात्ताप की महिमा को कम नहीं बता रही, बल्कि यह कह रही हूँ की बाद में पश्चात्ताप करने से बहुत बेहतर है पहले ही गुस्से पर काबू रखना | that prevention is better than cure ...

तो हुआ यूँ की एक बच्चे को बहुत गुस्सा आता था -वह खुद पर काबू न रख पाता था | बाद में शांत भी हो जाता - किन्तु गुस्सा करते वक्त सब भला बुरा भूल जाता |

एक दिन उसके पिता ने उसे कहा की बाहर की fencing (लकड़ी की होती हैं ) वह पेंट करे इस बार - तो उसे इनाम मिलेगा - बच्चे ने ख़ुशी ख़ुशी कर दी |

अब यह fence  बहुत सुन्दर लग रही थी |

पिता ने कहा - बेटे - यह मैं तुन्हें कीलों का एक डब्बा और एक हथौड़ी देता हूँ - जब जब तुम्हे बहुत गुस्सा आये - तब इस दीवार को ही अपना शत्रु समझना और इस पर एक कील ठोंक देना - एक महीने तक यही करते रहना |

बच्चे ने यही किया - और कहने की ज़रुरत नहीं की महीने भर बाद वह दीवार बहुत बुरी स्थिति में थी :(

अब बच्चा समझने लगा की क्रोध से खूबसूरत चीज़ें भी कुरूप दिखने लगती हैं - और क्रोध जब उन चीज़ों पर हम बरसाते हैं, तो वे आहत होती हैं, और धीरे धीरे वाकई बदसूरत होने लगती हैं |

उसने पिता से कहा की अब मैं समझ रहा हूँ - अब क्या करूँ - यह दीवार तो बहुत ही खराब लगने लगी है ?

पिता बोले - ठीक है बेटा - यदि तुम पछता रहे हो - तो अब से क्रोध में आकर कीले न ठोकना |

बेटा बोला -परन्तु दीवार तो फिर भी ऐसे ही रहेगी न ?

पिता बोले - तो ठीक है - जब तुम किसी पर क्रोध करो - और समझने के बाद पछताओ - माफ़ी मांगो - तब एक कील उखड लेना |

बच्चा यह भी करने लगा - और करते हुए उसे समझ में आया की क्रोध में कील ठोंक देना तो बहुत आसान है - पर उस गाड़ी हुई कील को पछतावे के कारण बाद में उखाड़ फेंकना (अर्थात माफ़ी माँगना, और फिर माफ़ी मिल पाना ) उससे कई गुना अधिक कठिन है |

फिर भी ५-६ महीनों में (क्योंकि अब उसमे अपने क्रोध पर अधिक काबू था - तो क्रोध की पुनरावृत्ति घट गयी थी - जितनी कीलें उसने सिर्फ एक महीने में ही ठोंक दी थीं, उतने बार क्रोध और माफ़ी होते हुए अब ज्यादा समय लगा) धीरे धीरे - पछतावे और कील निकलने की मेहनत के चलते - उस दीवार से सब कीलें निकल गयी थीं |

जब दीवार पूरी साफ़ हो गयी - तब बच्चा फिर से पिता को बुला कर बोला - यह दीवार कीलें निकलने से बेहतर तो हो गयी है - परन्तु यह पहले जैसी नहीं है |

पिता बोले - हाँ बेटा - the nails you hammer in in a fit of anger go in very deep without effort ... but repenting and taking them out (asking for and receiving forgiveness ) is much more difficult. Even when they do come out, they leave behind scars, which remain as ugly reminders of the incident life long ...

यह दोहा सुना होगा आपने - 

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय,
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े तो गांठ परि जाय।

फिर मिलेंगे ....

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